रोहिग्ंया शरणार्थी संकट

Submitted by cgpiadmin on रवि, 01/10/2017 - 23:30

सितंबर महीने की शुरुआत से म्यांमार से लाखों रोहिंग्या लोगों द्वारा म्यांमार के सशस्त्र बलों के दमन से अपनी जान बचाकर बांग्लादेश (बर्मा के नाम से जाना जाता है) में भागने की खबरें अंतराष्ट्रीय मीडिया में मुख्य खबर बन गयी है।

Myanmar map with Rakhine oprovince Hindi

बांग्लादेश की सरकार के मुताबिक, 25 अगस्त, 2017 के बाद से, करीब 4,20,000 रोहिंग्या लोग म्यांमार से भागकर बांग्लादेश में आये हैं। अभी उन्हें म्यांमार-बांग्लादेश सीमा पर कॉक्स बाजार में शरणार्थी शिविरों में रखा गया है। बांग्लादेश ने संयुक्त राष्ट्र संगठन और उसके सदस्य देशों से, जिसमें हिन्दोस्तान भी शामिल है, अनुरोध किया है कि वे म्यांमार सरकार पर शरणार्थियों के प्रवाह को रोकने, और बांग्लादेश में पहुंचे शरणार्थियों को वापस म्यांमार ले जाने के लिए वहां की सरकार पर दबाव डाले।

खबरों के अनुसार, 25 अगस्त, 2017 को तथाकथित रूप से “अराकान रोहिंग्या मुक्ति सेना” के सदस्यों ने म्यांमार के सीमा सुरक्षा पोस्ट पर हमला किया, जिसमें 12 सैनिक मारे गए। इस हमले के बाद, म्यांमार के सुरक्षा बलों ने राखिन इलाके पर हमला बोल दिया, और विद्रोहियों को पकड़ने के लिए कोम्बिंग ऑपरेशन शुरू किया है। अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने शरणार्थियों द्वारा पलायन का इसे एक कारण बताया है और सुरक्षा बलों पर आरोप लगाया है कि उन्होंने तथाकथित रूप से रोहिंग्या मुसलमानों के सभी गाँवों को निशाना बनाते हुए हमला किया है।

संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार कमिश्नर जिद बिन राद अल-हुसेन ने इसे “नस्लवादी शुद्धीकरण का एक उदाहरण” बताया है। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से म्यांमार में रोहिंग्या लोगों पर हो रही हिंसा को खत्म करने के लिए “तुरंत और सख्त कार्यवाही” करने को कहा है। अमरीका के उप-राष्ट्रपति माइक पेंसे ने म्यांमार की सेना पर आरोप लगाया है कि उन्होंने सरकारी आउटपोस्ट पर हमले का जवाब “बेहद बर्बर तरीके से गाँवों को जलाकर और रोहिंग्या लोगों को अपने घरों से बेदखल करके दिया है”। उन्होंने आगे कहा कि “जब तक यह हिंसा खत्म नहीं होती है, जो कि इंसाफ के खिलाफ है, हालात और भी बिगड़ते जायेंगे। इससे नफरत और अराजकता बढ़ती ही जाएगी और पीढ़ियों के लिए पूरे इलाके में हम सब लोगों की शांति के लिए खतरा पैदा करेगी”। अमरीकी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, अमरीका के डिप्टी सहायक विदेश मंत्री पैट्रिक मर्फी “रोहिंग्या लोगों की हालत के बारे में वाशिंगटन की चिंताओं को जाहिर करने और टकराव क्षेत्र में मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को पहुँचने को आसान बनाने” के लिए म्यांमार गए। फ्रांस के राष्ट्रपति ने भी म्यांमार में चल रहे “नरसंहार” की निंदा की।

इस बीच, हिन्दोस्तान की सरकार ने ऐलान किया कि वह अपने देश में मौजूद 40,000 रोहिंग्या लोगों को वापस म्यांमार निर्वासित करेगी। ये शरणार्थी पिछले पांच वर्षों में बांग्लादेश के रास्ते हिन्दोस्तान में आये हैं। ये शरणार्थी जम्मू, जयपुर, अरुणाचल प्रदेश, और अन्य जगहों पर कई शरणार्थी शिविरों में रहते हैं। शरणार्थियों ने कहा है कि यदि वे वापस म्यांमार भेजे जाते हैं तो उनकी जान को खतरा हो सकता है। यह बात उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के सामने पेश की है। दूसरी तरफ हिन्दोस्तान की सरकार ने शरणार्थियों को निर्वासित करने के फैसले को जायज बताते हुए सर्वोच्च न्यालालय में एक एफिडेविट दायर किया है।

हिन्दोस्तान की सरकार का दावा है कि रोहिंग्या शरणार्थी नहीं है, बल्कि गैरकानूनी आप्रवासी है। आगे उन्होंने दावा किया है कि उसके पास इस बात का “सबूत” है कि इन लोगों के अल-कायदा और आई.एस.आई.एस. जैसे संगठनों के साथ संबंध हैं। सरकार ने यह भी दावा किया है कि देश में मुसलमान धर्म के 40,000 रोहिंग्या लोगों के रहने से उनका बौध धर्म के लोगों के साथ सांप्रदायिक टकराव हो सकता है। हिन्दोस्तान की सरकार की इस भूमिका की बेझिझक निंदा की जानी चाहिए। एक पूरे समुदाय को जो कि अपने देश से दूर किसी और देश में शरणार्थी बनकर बेहद बुरे हालातों में अस्थायी शरणार्थी शिविरों में जी रहे हैं, उनको आतंकवादियों के पालने और पैदा करने के ठिकाने बताना, इसे कभी भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह दावा करना कि इनके हिन्दोस्तान में रहने से सांप्रदायिक टकराव होगा, सच्चाई को तोड़-मरोड़कर पेश करना है। हिन्दोस्तानी लोग अपने बड़े दिल के लिए जाने जाते हैं और उन्होंने हमेशा से शरणार्थियों का स्वागत किया है, जो किसी कारणवश अपने ही देश से भागने के लिए मजबूर हुए हैं। असलियत में, हिन्दोस्तानी राज्य और उसकी एजेंसियों द्वारा रोहिंग्या शरणार्थियों के खिलाफ नफरत का प्रचार, चैबीसों घंटे चलने वाला गलत-प्रचार, इन सब की वजह से एक खतरनाक हालात पैदा हो रहे हैं। इसके अलावा, मौजूदा हालात में इन शरणार्थियों को वापस इनके देश निर्वासित करना, सभी अन्तर्राष्ट्रीय मानदंडों के खिलाफ है, हालांकि हिन्दोस्तान की सरकार यह दावा कर रही है कि वह ऐसे किसी भी मानदंडों से बंधी हुई नहीं है। यह मानवता के खिलाफ है।

गंभीर हालात

ऐसा अनुमान है कि म्यांमार में करीब 12 लाख रोहिंग्या लोग रहते है। इनमें से अधिकांश लोग इस्लाम धर्म को मानने वाले हैं और राखिन इलाके में वास करते हैं। यह इलाका म्यांमार के उत्तर पूर्व में बांग्लादेश के साथ समुद्री सीमा पर है।

इस घटना से न केवल रोहिंग्या लोगों के लिए, बल्कि इस पूरे इलाके म्यांमार, बांग्लादेश और हिन्दोस्तान के लोगों के लिए भी गंभीर हालत पैदा हो गए हैं। बांग्लादेश और म्यांमार तथा बांग्लादेश और हिन्दोस्तान के बीच तनाव बढ़ गया है। इसके अलावा, एक तरफ म्यांमार और दूसरी तरफ इंडोनेशिया और मलेशिया के बीच भी तनाव बढ़ गया है, क्योंकि कई रोहिंग्या शरणार्थियों ने भागकर इन देशों में शरण लेने की कोशिश की है। “मानव अधिकारों की हिफाजत” करने के नाम पर इस इलाके में अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा दखलंदाजी का भी खतरा बढ़ गया है।

रोहिंग्या लोगों की यह बेहद भयानक हालत इस इलाके में बस्तीवादी शासन और बस्तीवादी विरासत का नतीजा है, जो एशिया में बस्तीवाद के पूर्व गुलाम देश आज भी भुगत रहे हैं। यह हालात, खुली और छुपी, क्रूर साम्राज्यवादी दखलंदाजी की वजह से और भी गंभीर हो गए हैं।

बस्तीवाद और बस्तीवादी विरासत

1820 के दशक में, बर्तानवी बस्तिवादियों ने बर्मा के शासकों के साथ लगातार चलायी गयी खूनी जंग में असम, अरकान (मौजूदा म्यांमार में राखिने इलाका) और अन्य इलाकों पर जीत हासिल की और उन पर अपना कब्जा जमाया। इन अंग्रेज-बर्मा युद्धों से पहले बर्मा ने असम और अरकान और इस इलाके के तमाम अन्य राजाओं को हराया था। 1885 तक बर्तानवी बस्तीवादियों ने पूरे बर्मा को हड़प लिया था। बर्तानवी बस्तीवादियों ने बर्मा (मौजूदा म्यांमार) पर 1826 से 1948 तक अपना राज चलाया।

बर्मा के साथ-साथ एशिया में अपनी बस्तियों पर राज करने के लिए बर्तानवी बस्तीवादियों ने बांटो और राज करो की नीति का जांचा परखा तरीका अपनाया। उन्होंने अपनी बस्तियों में प्लांटेशन और खेतों पर काम करने के लिए हिन्दोस्तान के कई इलाकों से लोगों को करारनामा मजदूर के रूप में भेजा। बंगाल-म्यांमार की सीमा पर राखिन इलाके में उन्होंने बंगाल के लोगों को प्रवासन करने को प्रोत्साहित किया। बस्तीवादियों ने म्यांमार के लोगों के बीच धर्म, राष्ट्रीयता और नस्ल, इत्यादि के आधार पर दुश्मनी पैदा की और यह सुनिश्चित किया कि यह दुश्मनी हमेशा बनी रहे।

1948 में बर्मा ने बस्तीवादी राज से आजादी हासिल की। बर्मा के राज्य ने राखिन प्रान्त के लोगों को, जो खुद को रोहिंग्या पुकारते थे, कभी भी अपने देश के नागरिक के रूप में मान्यता नहीं दी। उनके साथ, बांग्लादेश और हिन्दोस्तान से आये गैर-कानूनी आप्रवासी के रूप में बर्ताव किया गया। जबकि हिन्दोस्तान और बांग्लादेश की सरकार रोहिंग्या लोगों को अब बर्मा के नागरिक होने का दावा कर रही है। दूसरी ओर रोहिंग्या लोगों का मानना है कि वे अराकन साम्राज्य का हिस्सा थे।

दक्षिण एशिया में बस्तीवाद के अंत के 70 साल बाद भी रोहिंग्या लोगों का अपना कोई देश नहीं है। न तो म्यांमार, न ही हिन्दोस्तान और न ही बांग्लादेश उनको अपना नागरिक के रूप में स्वीकार करने को तैयार है। इसके चलते, एक तरफ बांग्लादेश और दूसरी तरफ म्यांमार के साथ हिन्दोस्तान का तनाव बढ़ता ही जा रहा है। अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके मित्र देश, एशिया में अपने हितो को आगे बढ़ने के लिए, इस संकट का इस्तेमाल कर रहे हैं।

अमरीकी साम्राज्यवादी खेल

अमरीकी साम्राज्यवाद, चीन को घेरने की रणनीति में म्यांमार को एक रूकावट के रूप में देखता है। चीन और म्यांमार के बीच करीबी आर्थिक और राजनीतिक संबंध है। कई वर्षों से अमरीका “लोकतंत्र की बहाली” और “मानव अधिकार के उल्लंघन को रोकने” के नाम पर म्यांमार में सत्ता परिवर्तन के मकसद से दखलंदाजी की कोशिश कर रहा है।

फिर एक बार अमरीकी साम्राज्यवाद शरणार्थी संकट का इस्तेमाल म्यांमार के आंतरिक मामलों में दखलंदाजी के लिए कर रहा है। जब कभी अमरीकी साम्राज्यवाद या उसके मित्र देश, एक या दूसरे देश में मानव अधिकारों के उल्लंघन के बारे में आवाज उठाते हंै तो यह बहुत जरूरी है कि लोग इन खतरनाक इशारों को समझे। दूसरे देशों में आतंकवादी गुटों को तैनात करने और वहां गृह युद्ध भड़काने और इसका इस्तेमाल सैनिकी दखलंदाजी के लिए करने का अमरीकी साम्राज्यवाद का लंबा इतिहास है। ऐसा करते हुए हर बार अमरीकी साम्राज्यवाद ने उस राज्य का विनाश किया है और देश पर अपना दबदबा जमाया है। 

पिछले 6 वर्षों में सीरिया के अनुभव को और उससे दो दशक पहले युगोस्लाविया के अनुभव को लोगों को नहीं भूलना चाहिए। 6 वर्ष पहले अमरीकी साम्राज्यवादियों ने आई.एस.आई.एस. को बनाया और सीरिया में तमाम विरोधी गुटों को देश में बर्बर गृह युद्ध चलाने के लिए उकसाया। अमरीकी साम्राज्यवादियों का मकसद था पश्चिमी एशिया के न नक्शे को बदलना। इस गृह युद्ध के चलते दसों लाखों लोग शरणार्थी बन गए और उनकी जिंदगी पूरी तरह से तबाह हो गयी।

युगोस्लाविया में अमरीकी साम्राज्यवादियों ने बोस्निया और सरबिया के बीच गृह युद्ध उकसाने के लिए अपने एजेंट तैनात किये। ऐसा करने में उनका मकसद था यूगोस्लाविया के टुकड़े-टुकडे कर देना और कोसोवा में अपना सैनिकी अड्डा स्थापित करना। इस मामले में भी सर्बियाई सरकार द्वारा लोगों पर दमन का बहाना बनाकर अमरीकी सेना ने वहां पर दखलंदाजी की थी।

म्यांमार में राखिन प्रांत रणनैतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। 2004 में इस प्रांत में बंगाल की खाड़ी की समुद्री तट पर हाइड्रोकार्बन (प्राकृतिक तेल और गैस) के विशाल भण्डार की खोज की गयी है। चीन ने राखिन में बंदरगाह से 770 किलोमीटर दूर यूनान प्रदेश तक तेल की पाइपलाइन का निर्माण किया। यह तेल की पाइपलाइन इसी वर्ष शुरू हुई है। इस पाइपलाइन से चीन पश्चिम एशिया और अफ्रीका से तेल का व्यापार कर सकता है, और अब उसे मल्लका जलमार्ग से होकर नहीं गुजरना होगा, जिसे अमरीकी सशस्त्र बलों द्वारा बंद किये जाने का अंदेशा है। इस पाइपलाइन से म्यांमार के समुद्री कुओं से तेल चीन भेजा जा रहा हैं।

राखिन प्रांत में बर्मा की सरकार और रोहिंग्या लोगों के बीच टकराव 2012 से शुरू हुआ है, और उसी समय से चीन-म्यांमार ऊर्जा परियोजना पर भी काम शुरू हुआ है। बेशक, इस टकराव में अमरीकी साम्राज्यवाद का हाथ है।

2013 से इस इलाके में बर्मा टास्क फोर्स सक्रिय है, जिसमें अमरीकी पूंजीपति जॉर्ज सोरोस के पैसों से चलाये जा रहे कई संगठन शामिल हैं। यह संगठन अंतराष्ट्रीय समुदाय को यह बुलावा देते आये हैं कि, यहाँ चल रहे दमन को बंद कराये जिससे वह “अल्पसंखक रोहिंग्या मुसलमानों के समूह का नरसंहार” कहते आये हैं। इससे पहले 2003 में जॉर्ज सोरोस एक अमरीकी टास्क फोर्स में भी शामिल हुए, जिसका लक्ष्य था “बर्मा (म्यांमार) के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन के लिए अमरीका और अन्य देशों के बीच सहकार्य” को बढ़ाना।

कौंसिल फॉर फॉरेन रिलेशन (सी.एफ.आर.) 2003 के दस्तावेज ‘‘बर्माः टाइम फॉर चेंज’’, जिसमें अमरीकी टास्क फोर्स समूह की स्थापना की घोषणा की गयी थी, इस बात पर जोर दिया गया था कि “संयुक्त राज्य अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मदद के बिना बर्मा में लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता।’’

अमरीकी साम्राज्यवादी एक बेहद शैतानी खेल खेल रहे हैं। वे विभिन्न एशियाई देशों के भीतर धर्म और नस्ल के आधार पर टकराव को उकसा रहे हैं तथा साथ ही पड़ोसी देशों के बीच टकराव को बढ़ावा दे रहे हैं। वे म्यांमार और बांग्लादेश को अस्थिर करने के लिए रोहिंग्या शरणार्थी संकट का उपयोग कर रहे हैं। उनका उद्देश्य है उत्तर-पूर्वी हिन्दोस्तान और दक्षिण-पूर्व एशिया में अराजकता और अस्थिरता पैदा करना, जैसा कि उन्होंने पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में किया है। रोहिंग्या शरणार्थी संकट के समाधान के लिए एक कारक होना तो बहुत दूर, अमेरिकी साम्राज्यवादी इस समस्या का हिस्सा हैं।

निष्कर्ष

म्यांमार, बांग्लादेश, भारत और एशिया के अन्य देशों के लोगों को रोहिंग्या शरणार्थी संकट में अमरीकी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का पर्दाफाश करना चाहिए। हमें इतिहास के सबक से सीखना चाहिए। हम सभी के देश बस्तीवादी विरासत के शिकार है और हमारे देशों की प्रगति के रास्ते को खोलने के लिए इस विरासत से नाता तोड़ना होगा। वक्त की यह मांग है कि बस्तीवादी ‘बांटों और राज करो’ की नीति से नाता तोड़ा जाए और प्रत्येक देश के भीतर सभी राष्ट्रों और लोगों के अधिकारों की गारंटी दी जाए। हिन्दोस्तान का राज्य, उसके संघराज्य के भीतर मौजूद ऐतिहासिक रूप से निर्मित राष्ट्रों और लोगों के अस्तित्व को मानने से इंकार करता है। वह लोगों को अधिकारों की गारंटी देने से इंकार करता है। वह जानबूझकर धर्म, जाति, नस्ल, भाषा के आधार पर लोगों के बीच बंटवारे को भड़काता है और साम्राज्यवादियों

द्वारा दखलंदाजी के लिए एक उपजाऊ जमीन पैदा करता है। इस वक्त हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा रोहिंग्या लोगों के म्यांमार के लिए निर्वासन का फैसला, यह कहते हुए लेना कि वे मुसलमान है, सांप्रदायिक तनाव को भड़काने के इरादे से किया गया है। इस बात के लिए उन सभी लोगों द्वारा हिन्दोस्तानी राज्य की निंदा की जानी चाहिए, जो हिन्दोस्तानी लोगों और दक्षिण एशिया के सभी लोगों की एकता और एकजुटता के लिए लड़ रहं हैं।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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