स्कूली शिक्षा का निजीकरण : राज्य ने अपने दायित्व को निभाने से इंकार किया

Submitted by cgpiadmin on रवि, 01/10/2017 - 22:30

बच्चों के लिये अच्छी बुनियादी शिक्षा प्रदान करना किसी भी आधुनिक समाज में राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी मानी जाती है जिसे व्यापक तौर पर मान्यता प्राप्त है।

हाल ही में राजस्थान की सरकार ने घोषणा कर दी है कि “असंतोषजनक रूप से चलने वाले” 300 सरकारी स्कूलों को निजी हाथों में सौंप दिया जायेगा। इन्हें “शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने” के नाम पर पी.पी.पी. मॉडल पर चलाने की घोषणा की गयी है। इस घोषणा से सरकारी स्कूलों की दुर्दशा पर ध्यान आकर्षित तो होता ही है, साथ ही, राज्य द्वारा लोगों के प्रति अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी को निभाने में घोर विफलता के बारे में भी पता चलता है।

स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में, हिन्दोस्तानी राज्य ने शुरूवात से ही दोहरी व्यवस्था बनाई हुई है। एक तरफ निजी स्कूल हैं जिनकी मालिकी निजी हाथों में है और इन्हें निजी प्रबंधनों या ट्रस्टों द्वारा चलाया जाता है। दूसरी तरफ, राज्य द्वारा चलाये जाने वाले सरकारी स्कूल हैं (जिनमें केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा चलाये जाने वाले स्कूल भी शामिल हैं)। जबकि सरकारी स्कूलों का मकसद कम खर्चे में एक समान स्तर की अच्छी शिक्षा प्रदान करना था। निजी स्कूल अधिकांश रूप से उन लोगों के लिये थे जो अधिक फीस भरने में सक्षम थे। सरकारी स्कूल, जो मेहनतकश लोगों के बच्चों को सब-तरफा अच्छी शिक्षा देने के मकसद से चलाये जाने थे, जैसे-जैसे समय बीतता गया, राज्य की सोची-समझी नीति के तहत उनको क्रमशः बर्बाद होने दिया गया। यह सब, बहुत ही अपर्याप्त धनराशि आबंटित करके, भ्रष्टाचार, बुरे प्रबंधन और राजनीतिक उदासीनता तथा जानबूझकर उपेक्षा करके किया गया।

देश के करोड़ों मेहनतकशों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिये सरकारी स्कूली व्यवस्था को बेहतर करने तथा उसे और व्यापक बनाने का संघर्ष, मज़दूर वर्ग व मेहनतकश लोगों के उज्ज्वल भविष्य के संघर्ष का एक अहम हिस्सा रहा है। शिक्षक, विद्वान व सभी प्रगतिशील लोग जो समाज के भले के बारे में चिंतित हैं, वे सभी इस मांग पर सक्रियता से अपनी आवाज़ उठाते आये हैं कि राज्य, एक समान, अच्छी व कम खर्च की शिक्षा प्रदान करने की अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाए।

शिक्षा में सार्वजनिक निजी सांझेदारी

राजस्थान सरकार की “स्कूली शिक्षा में सार्वजनिक निजी सांझेदारी 2017” नीति के तहत ग्रामीण इलाकों में 75 प्रतिशत और शहरी इलाकों में 25 प्रतिशत, उन स्कूलों को निजी प्रबंधनों द्वारा चलाने के लिये चुना जायेगा जिनके शैक्षणिक नतीजे बहुत खराब हैं। निजी खरीददार को प्रत्येक स्कूल को चलाने के लिये 75 लाख रुपये देने होंगे। राज्य सरकार स्कूल की कीमती भूमि, इमारतें तथा अन्य ढांचागत संपदा, छात्र, शिक्षक तथा अन्य कर्मचारियों को निजी प्रबंधन के हाथों सौंप देगी और अगले सात सालों तक, हर साल 16 लाख रुपये निजी खरीददार को वापिस करेगी। निजी मालिक को पूरी छूट होगी कि वह छात्रों की फीस, कर्मचारियों के वेतन, दाखिले की नीति और कर्मचारियों के चुनने के मापदंड तय करे।

शिक्षक-छात्र अनुपात

शिक्षा के अधिकार कानून के तहत एक शिक्षक के लिये अधिकतम छात्रों की संख्या कक्षा 1 से 5 के लिये 30 है और कक्षा 6 से 8 के लिये 35 है। जबकि हिन्दोस्तान का औसत इसके आसपास ही है, अलग अलग राज्यों में इसमें बहुत भिन्नता है।

कुछ अन्य देशों में शिक्षक - छात्र अनुपात इस प्रकार है:

Teacher-student ratio_hindiTeacher-student ratio

toilets are available for boys

toilets are available for boys

रख-रखाव व संसाधनों के लिये आवेदनों को अनसुना किया गया

स्कूल के प्रधान अध्यापकों का कहना है कि रखरखाव व नयी चीजों के लेने के लिये अनुरोधों की स्वीकृति में बहुत समय लगता है। दक्षिण दिल्ली के एक सर्वोदय बाल विद्यालय के प्रधान अध्यापक ने कहा कि “मुझे स्कूल के एक खराब बिजली के मीटर को ठीक कराने में दो साल लग गये।” पश्चिम दिल्ली के एक सर्वोदय बाल विद्यालय के एक शिक्षक ने दस्तावेज दिखाये जो ये सिद्ध करते हैं कि खिड़कियां, डैस्कों व कुर्सियों की मरम्मत के आवेदन की स्वीकृति पिछल दो सालों में नहीं हुई है।

सरकार के रिकार्ड दिखाते हैं कि विभिन्न स्कूलों से मरम्मत व रखरखाव की 1000 से भी ज्यादा अर्जियों को निपटाया नहीं गया है। किसी भी ढांचागत जरूरत के लिये स्कूल शिक्षा विभाग को अर्जी देते हैं और फिर उनके आवेदन को लोक निर्माण विभाग (पी.डब्ल्यू.डी.) को भेजा जाता है।

सरकारी अफसर मानते हैं कि स्कूलों में ढांचागत सुविधायें कमजोर हैं और इनके रखरखाव व ठीक करने में बहुत देरी होती है।

उत्तर प्रदेश में शिक्षा मित्रों की हालत

उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों के शिक्षा मित्रों (ठेके के शिक्षकों) को अंधकारमय भविष्य का सामना करना पड़ रहा है।

1999 में, राज्य सरकार ने फैसला लिया था कि ग्राम सभाओं व नगरनिगम पार्शदों के जरिये हर सरकारी स्कूल में दो शिक्षा मित्र नियुक्त किये जायेंगे। शुरुवात में इन्हें 2,250 रुपये प्रति माह दिये जाते थे। 2010 तक उत्तर प्रदेश में 1,68,000 शिक्षा मित्र नियुक्त किये गये। 2010 में उनके वेतन को बढ़ाकर 3,500 रुपये प्रति माह कर दिया गया।

शिक्षा के अधिकार का कानून आने के बाद, स्कूलों में शिक्षकों की संख्या में कमी को पूरा करने के लिये राज्य सरकार ने इन शिक्षा मित्रों को सहायक शिक्षक में तब्दील करने का फैसला लिया। डिग्री प्राप्त शिक्षकों को दो साल का बी.टी.सी. (बुनियादी प्रशिक्षण प्रमाणपत्र) प्रशिक्षण दिया गया ताकि उन्हें राज्य की शिक्षा व्यवस्था में सहायक शिक्षा के पद पर नियुक्त किया जा सके। 2015 तक 1,67,000 शिक्षा मित्रों को सहायक शिक्षक के पद पर नियुक्त किया जा चुका था। 2015 की सितम्बर में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने घोषणा कर दी कि ऐसी पदोन्नतियां अवैध हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगा दी। 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू हो जाने से शिक्षा मित्रों का वेतनमान बढ़कर 39,000 रुपये हो गया।

परन्तु हाल के एक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने उनके लिये बढ़े वेतनमान पर काम करने के लिये दो साल के अंदर टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (टी.इ.टी.) पास करने की शर्त लगा दी है तथा टी.इ.टी. पास करने तक उनका सहायक शिक्षक के पद की नियुक्ति रद्द कर दी। अतः 1,67,000 शिक्षकों का भविष्य अब अधर में लटक गया है।

इस संघर्ष के दबाव की वज़ह से ही, 1 अप्रैल, 2011 को पिछली संप्रग सरकार ने शिक्षा के अधिकार (आर.टी.ई.) का कानून पास किया था। इस कानून ने सरकार को 6 से 14 साल के सभी बच्चों के लिये (आठवीं कक्षा तक) मुफ्त व अनिवार्य, अच्छी व गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा प्रदान करने का आदेश दिया है। आर.टी.ई. कानून में सभी सरकारी स्कूलों के लिये न्यूनतम मापदंड स्थापित किये गए। इनमें छात्र-शिक्षक अनुपात (नीचे बॉक्स देखिये), ज़रूरी ढांचागत व्यवस्था व सुविधाएं, शिक्षकों के काम के दिन व घंटे, शिक्षकों की योग्यता, इत्यादि शामिल हैं। इस कानून में बिना भेदभाव के दाखिले, बिना रुकावट के अगली कक्षा में जाने तथा स्कूल प्रबंधन कमेटी (एस.एम.सी.) में अभिभावकों व स्थानीय निवासियों के सदस्यों के शामिल किये जाने के नियम भी हैं। कानून में एक किलोमीटर के अंदर पड़ोस में स्कूल स्थापित करने का प्रावधान है ताकि बच्चों को स्कूल जाने के लिये बहुत दूर न चलना पड़े। “सामाजिक समावेश” को बढ़ावा देने के नाम पर कानून ने सभी निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक तौर पर कमज़ोर (ई.डब्ल्यू.एस.) तबकों के लिये आरक्षित करना अनिवार्य बनाया। आर.टी.ई. कानून न्यायोचित है और इसमें न्याय पाने के तंत्र शामिल किये जाने थे ताकि इसका उल्लंघन होने पर लोग कानूनी कार्यवाई कर सकें।

साथ-साथ, सरकार स्कूली शिक्षा में सरकारी-निजी सांझेदारी (पी.पी.पी.) को बढ़ावा देती आई है। ऐसा “सभी के लिये अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराने” के नाम पर किया गया है। परन्तु स्कूली शिक्षा के संदर्भ में पी.पी.पी. का असली मतलब होता है सरकारी स्कूलों को निजी हाथों में सौंपना ताकि वे इससे मुनाफा बना सकें। (शिक्षा में सरकारी-निजी सांझेदारी पर बॉक्स देखिये)। निजी स्कूल व्यवस्था को बरकार रखा गया है और बढ़ावा दिया गया है।

मेहनतकश लोगों ने आशा की थी कि आर.टी.ई. कानून के आने से उनके बच्चों के लिये अच्छी शिक्षा पाने का उनका सपना आखिरकार साकार होगा। परन्तु देशभर के शहरी और ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूलों की स्थिति की समीक्षा करने से यह साफ हो जाता है कि आर.टी.ई. कानून के लागू करने के 6 साल बाद भी राज्य हर तरह से और हर पहलू पर, अपनी जिम्मेदारी निभाने में नाकामयाब रहा है। कानूनी कार्यवाई का तंत्र तो अधिकांशतः बनाया ही नहीं गया है!

देशभर के सरकारी स्कूलों में आज भी आर.टी.ई. कानून के नियमों का पालन कम और उल्लंघन ज्यादा होता है। यह चिंता की बात है कि सरकारी बुनियादी स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में हिन्दोस्तान, बहुत सारे अन्य देशों की तुलना में, बदतर हालत में है।

आज अधिकांश सरकारी स्कूलों में सबसे बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी नहीं होती हैं, जैसे कि कक्षा के कमरे, मेज, पेयजल, आदि उपलब्ध होना। लड़कों व लड़कियों के लिये अलग-अलग शौचालय तक नहीं हैं। देशभर में सरकारी स्कूलों में यह आम बात है कि खिड़कियों के शीशे, कुर्सियां, मेजें, पंखे टूटे होते हैं, दीवारों से रंग-रोगन उतर रहा होता है, छतों से पानी टपकता है, शौचालयों में भयकंर बदबू आती है, कोने-कोने में कचरा होता है, कमरों की कमी की वजह से बच्चों की कक्षाएं बरामदों में लगाई जाती हैं। शहरी व ग्रामीण इलाकों में अनेक ऐसे स्कूल हैं जिनमें बिजली और पानी की सप्लाई नहीं है। इनमें से बहुत से स्कूलों में पुस्तकालय और प्रयोगशालाएं नहीं हैं। देश के बहुत से इलाकों में छात्रों-छात्राओं को स्कूल तक आने के लिये लंबी दूरी का सफर करना पड़ता है, पहाड़ियां से गुजरना पड़ता है या नदी-नालों को पार करना पड़ता है या जंगलों में से गुजरना पड़ता है। (शौचालयों की उपलब्धता, बिजली की उपलब्धता, आदि के बारे में नीचे के ग्राफ देखिये।)

राजकीय प्राधिकरणों द्वारा उपलब्ध करायी जाने वाली किताबें और लेखन सामग्री कक्षाएं शुरू होने के कई हफ्तों बाद तक नहीं पहुंचती हैं। मिड-डे मील का भोजन अधिकतर बासी, संक्रामक होता है और इसे अस्वास्थ्यकर परिस्थिति में दिया जाता है, जिससे सैंकड़ों बच्चे बीमार पड़ते रहते हैं।

छात्रों को छोटे-छोटे कमरों में बैठना पड़ता है। बहुत बार एक ही समय पर एक शिक्षक को सौ से भी अधिक छात्रों को पढ़ाना पड़ता है। राजधानी शहर दिल्ली में भी सबसे अच्छे सरकारी स्कूलों में शिक्षक-छात्र अनुपात 1:80 है। शिक्षकों को बहुत सी अन्य जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं, जैसे कि स्कूल का प्रशासन व क्लर्क की जिम्मेदारियां (स्कूल में प्रशासनिक कर्मचारियों व क्लर्कों की कमी की वजह से), सूचना अधिकार के तहत पूछे गये सवालों के जवाब, धनराशियों, अनुदानों व छात्रवृत्तियां का, किताबों व वर्दियों का वितरण, अनुपस्थित व स्कूल छोड़ कर जाने वालों के साथ संपर्क करना, मतदान व मतगणना का काम, राज्य सरकार की सचिवालय ड्यूटी, इत्यादि। इनके लिये शिक्षकों को कुछ भत्ता भी नहीं मिलता है। इससे शिक्षकों पर बहुत दबाव आता है और उनके लिये अपनी शैक्षणिक जिम्मेदारियां संभालना मुश्किल हो जाता है। शिक्षकों के लाखों पदों पर नियुक्तियां नहीं हुईं हैं। यह दलील देकर कि पदों को भरने के लिये “योग्यता-प्राप्त शिक्षक नहीं मिल रहे हैं”, सरकार ने अनियमित व अतिथि शिक्षकों को अनुबंध में, बहुत कम वेतन पर रखना शुरू कर दिया है। (उत्तर प्रदेश के शिक्षा मित्रों की हालत पर बॉक्स देखिये)।

सरकारी स्कूलों के प्रधान अध्यापकों द्वारा, ढांचागत सुविधाओं व शिक्षकों की नियुक्तियों के लिये अतिरिक्त धनराशि की उच्च अधिकारियों को बार-बार दर्खास्त देने पर भी उन्हें अनुकूल प्रतिक्रिया नहीं मिलती है। (देखिये रख-रखाव व संसाधनों के लिये अनुरोधों को अनसुना करने पर बॉक्स)।

सरकारी स्कूल व्यवस्था को बेहतर बनाने की लगातार मांग के दबाव में राज्य ने अनेक मॉडल स्कूल स्थापित किये हैं (नवोदय विद्यालय, सर्वोदय विद्यालय, प्रतिभा विकास विद्यालय, इत्यादि)। इन स्कूलों में आस-पास के 80 से 100 स्कूलों से चुने हुए छात्रों को दाखिला दिया जाता है। सरकार से पर्याप्त धनराशि व समर्थन मिलने पर ऐसे अनेक स्कूलों ने उचित ढांचे, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं, खेल के मैदान व अन्य सुविधाएं, प्रशिक्षित शिक्षक, इत्यादि जुटाए हैं। ऐसे स्कूलों के छात्रों ने केन्द्र व राज्य सरकारों की बोर्ड परीक्षाओं में, निजी स्कूलों के छात्रों से ज्यादा अच्छे नतीजे पाये हैं। यह दिखाता है कि जब भी राज्य ने संसाधन जुटाने पर जरूरी ध्यान दिया हो तब यह अच्छी शिक्षा देने में सफल होता है। परन्तु ऐसे सरकारी स्कूल बहुत कम और दूर-दूर हैं। इनका लाभ किसी-किसी इलाके में ही और बहुत कम लोग ही पाते हैं। ऐसे मॉडल स्कूलों में से भी बहुत को अब सरकारी धनराशि व संसाधन मिलने कम हो गये हैं। अब ऐसे स्कूलों को अपने शैक्षणिक पहल-कदमियों को जारी रखने के लिये गैर सरकारी संगठनों (एन.जी.ओ.) व कार्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी (सी.एस.आर.) कार्यक्रमों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

सरकारी स्कूलों की बेहद बुरी परिस्थिति की वजह से ही बहुत से मेहनतकश लोग अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजते हैं जो बहुत ऊंची फीस तो लेते हैं परन्तु जिन पर कोई सामाजिक नियंत्रण या जवाबदेही नहीं होती। बहुत से स्थानों पर सरकारी स्कूलों का न होना, स्कूलों तक आने-जाने की समस्याएं, विस्थापन और प्रवास, शौचालय न होने की वजह से बहुत सी किशोरावस्था की बालिकाओं का स्कूल न जाना - ये सभी, समस्या को और जटिल बनाते हैं तथा बच्चों को निजी पढ़ाई की दुकानों में जाने को मज़बूर करते हैं। इसकी वजह से बहुत से सरकारी स्कूलों को दाखिलों में कमी और ज्यादा छात्रों के स्कूल छोड़ने की बढ़ती समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इन सब के बहाने, राज्य, सरकारी स्कूलों की और अधिक उपेक्षा करने व नष्ट करने की सफाई देता है।

ये सभी बिंदू जान-बूझ कर और सुनिश्चित तरीके से सरकारी स्कूल व्यवस्था को बर्बाद करने और साथ ही साथ निजी स्कूल व्यवस्था को बढ़ावा देने की तरफ इशारा करते हैं। आज जो हम देख रहे हैं, वह इसका तर्कसंगत नतीजा है, याने कि सरकारी स्कूलों को भी अब निजी खरीददारों के हाथों में सौंपा जा रहा है ताकि वे मेहनतकश लोगों को लूटकर मुनाफा बना सकें।

अपने देश के मज़दूर वर्ग व मेहनतकश लोगों ने तथा सभी प्रगतिशील लोगों ने लगातार यह मांग की है कि एक समान ऊंचे स्तर की, बिना ज्यादा खर्चें की स्कूली शिक्षा उपलब्ध कराना, हिन्दोस्तानी राज्य की जिम्मेदारी है। बुनियादी स्कूली शिक्षा एक व्यापक मानव अधिकार है, जिसकी गारंटी देना किसी भी आधुनिक राज्य का दायित्व है। हिन्दोस्तानी राज्य ने इस व्यापक मानव अधिकार का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन किया है। पूरे समाज की उत्पादकता व जीवन स्तर को ऊंचा करने के लिये शिक्षा एक बेहद जरूरी सामाजिक निवेश है। समान सामाजिक विकास के सूचकांकों वाले दुनिया के बहुत से देशों के मुकाबले, हिन्दोस्तानी राज्य ने कई दशकों से शिक्षा पर कम निवेश किया है। शिक्षा को निजी पूंजीपतिओं के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता है, जिनका एकमात्र मकसद अधिकतम मुनाफा कमाना होता है। सरकारी स्कूलों को जान-बूझकर बर्बाद करना तथा इस बेहद जरूरी क्षेत्र को मुनाफे के भूखे निजी पूंजीपतिओं के हाथों में सौंपना, एक बार फिर दिखाता है कि हिन्दोस्तानी राज्य का चरित्र पूरी तरह से लोक-विरोधी और समाज-विरोधी है। मेहनतकश लोगों को अपनी इस मांग के लिये संघर्ष को और आगे बढ़ाना होगा कि राज्य लोगों के प्रति अपने इस अहम दायित्व को पूरा करे।

 

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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