रूस में अक्टूबर क्रांति के 100 वर्ष : रूस के मज़दूर वर्ग ने सरमायदारी राज का तख़्ता पलट किया और खुद अपना राज बसाया

Submitted by cgpiadmin on मंगल, 17/10/2017 - 03:30

कॉर्निलोव विद्रोह के कुचलने से यह साफ हो गया कि क्रांति का ज्वार उठ रहा था। उसके साथ सोवियतों के बोल्शेविकरण का दौर आया। फक्ट्रियों, मिलों, और सैनिक टुकड़ियों में सोवियतों के लिए नए चुनाव हुए, और इस बार, मेन्शेविकों और सोशलिस्ट रेवोलूशनरियों की जगह पर सोवियतों में बोल्शेविक पार्टी के प्रतिनिधि चुने गए। पेत्रोग्राद सोवियत और मास्को सोवियत बोल्शेविकों के हाथों में आ गये और मेन्शेविकों और सोशलिस्ट रेवोलूशनरियों को अपने पदों से इस्तीफा देना पड़ा।

oct revolution
पेत्रोग्राद में क्रांतिकारी सैनिक व नौसैनिक बख़्तरबंद गाड़ी पर सवार
October Revolutuon
1917 की क्रांति के दौरान पेत्रोग्राद की सड़कों पर क्रांतिकारी युद्ध करते हुये

कॉर्निलोव की हार के बाद, मेन्शेविकों और सोशलिस्ट रेवोलूशनरियों ने एक बार और कोशिश की कि क्रांति का उठता हुआ ज्वार थम जाये। इस उद्देश्य से, उन्होंने 12 सितम्बर 1917 को एक अखिल रूसी प्रजातांत्रिक सम्मेलन बुलाया और प्रजातंत्र की एक अस्थायी समिति बनायी, जिसका नाम प्रेद पार्लियामेंट था। समझौतावादियों को उम्मीद थी कि इसकी मदद से वे क्रांति रोक लेंगे और देश को सोवियत क्रांति के रास्ते से हटा कर पूंजीवादी वैधानिक विकास की राह पर, पूंजीवादी संसदवाद की राह पर ले आयेंगे।

बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय समिति ने प्रेद पार्लियमेंट का बायकाट करने का फैसला किया। बोल्शेविक पार्टी का विचार था कि कुछ दिनों के लिये भी प्रेद पार्लियामेंट में हिस्सा लेना गलत होगा, क्योंकि इससे आम जनता में यह झूठी आशा पैदा हो सकती थी कि प्रेद पार्लियामेंट मेहनतकश जनता के लिये सचमुच कुछ कर सकती है।

इसके साथ ही, बोल्शेविकों ने सोवियतों की दूसरी कांग्रेस बुलाने के लिये जोरदार तैयारियां की। इस कांग्रेस को टालने की मेन्शेविकों और सोशलिस्ट रेवोलूशनरियों की सारी कोशिशों को नाकाम कर दिया गया।

साथ-साथ, बोल्शेविकों ने विद्रोह की जोरदार तैयारियां शुरू की। लेनिन ने कहा कि दोनों राजधानियों - मास्को और पेत्रोग्राद - में मज़दूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सोवियतों में बहुमत हासिल करने के बाद, बोल्शेविक अपने हाथ में राज्य सत्ता ले सकते हैं, और उन्हें लेना चाहिये।

23 अक्तूबर 1917 को, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ऐतिहासिक बैठक हुई जिसमें अगले कुछ दिनों में सशस्त्र विद्रोह आरम्भ करने का फैसला किया गया। पार्टी की केन्द्रीय समिति के ऐतिहासिक प्रस्ताव में, जिसे लेनिन ने लिखा था, कहा गया था :

केन्द्रीय समिति यह समझती है कि रूसी क्रांति की अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति (जर्मन जल-सेना में विद्रोह, जो समूचे यूरोप में विश्व समाजवादी क्रांति का चरम प्रदर्शन है; रूस की क्रांति का गला घोंटने के उद्देश्य से साम्राज्यवादियों के बीच शान्ति की धमकी), साथ ही सैनिक परिस्थिति (रूसी पूंजीपतियों और करैन्स्की एण्ड कम्पनी का यह निश्चित फैसला कि पेत्रोग्राद जर्मनों को सौंप दिया जाये) और सोवियतों में श्रमजीवी पार्टी का बहुमत हासिल होना - यह सब और इसके साथ यह कि किसान-विद्रोह हो रहे हैं और आम जनता का विश्वास तेजी से पार्टी पर जम रहा है (मास्को के चुनाव), और अंत में एक दूसरे कॉर्निलोव-कांड के लिये जो खुली तैयारी हो रही है (पेत्रोग्राद से फौज वापस बुलाना, पेत्रोग्राद में कॉसेक भेजना, कॉसेकों द्वारा मिन्स्क का घेरा डालना, वगैरह) - इन सब कारणों से, सशस्त्र विद्रोह फौरी कार्यक्रम में शामिल हो गया है।

इसलिये, यह समझ कर कि सशस्त्र विद्रोह होकर रहेगा और उसके लिये वक्त बिल्कुल आ गया है, केन्द्रीय समिति सभी पार्टी-संगठनों को निर्देश देती है कि वे सभी काम इसी बात को ध्यान में रख कर करें और इसी दृष्टिकोण से सभी अमली सवालों पर (उत्तरी प्रदेश की सोवियतों की कांग्रेस, पेत्रोग्राद से फौजें हटाना, मास्को और मिन्स्क में हमारी जनता की कार्यवाही, वगैरह) इन पर विचार करें और फैसले लें।

(लेनिन, सं.ग्रं., खण्ड 6 पृष्ठ 303)।

बोल्शेविक पार्टी की केन्द्रीय समिति ने विद्रोह संगठित करने के लिये अपने प्रतिनिधियों को देश के अलग-अलग इलाकों में सशत्र बलों के बीच काम करने के लिए भेजा।

पार्टी की केन्द्रीय समिति के निर्देश से, पेत्रोग्राद-सोवियत की एक क्रांतिकारी सैन्य समिति बनायी गयी। यह संस्था विद्रोह का कानूनी तौर पर चलने वाला हैड क्वार्टर बन गया।

उधर क्रांति-विरोधी भी जल्दी-जल्दी अपनी शक्ति बटोर रहे थे। हर जगह क्रांति-विरोधियों ने लड़ाकू दस्ते बनाने के लिये हैड क्वार्टर स्थापित किये।

क्रांति को रोकने के लिये करैन्स्की की अस्थायी सरकार पेत्रोग्राद को जर्मनों के हाथ सौंपने की तैयारी कर रही थी। इसके लिए सरकार शासन केन्द्र पेत्रोग्राद से मास्को ले जाने के सवाल पर विचार कर रही थी। पेत्रोग्राद के मजदूरों और सैनिकों के विरोध ने अस्थायी सरकार को पेत्रोग्राद में ही रहने पर मजबूर किया।

29 अक्टूबर को, पार्टी की केन्द्रीय समिति ने विद्रोह का संचालन करने के लिये एक पार्टी केन्द्र चुना गया, जिसके अगुवाई कॉमरेड स्टालिन को दी गयी। यह पार्टी केन्द्र पेत्रोग्राद-सोवियत की क्रांतिकारी सैन्य समिति का प्रमुख नेतृत्व था और समूचे विद्रोह का अमली संचालन उनके हाथ में था।

कामेनेव और जिनोवियेव ने दुश्मन को केन्द्रीय समिति का विद्रोह सम्बन्धी फैसला सरमायदारी मीडिया के सामने बता दिया। गद्दारों से चेतावनी पाकर, क्रांति के दुश्मन तुरंत ही इस बात के उपाय करने लगे कि विद्रोह को रोक दें और क्रांति के संचालक दल - बोल्शेविक पार्टी - का नाश कर दें।

अस्थायी सरकार ने एक गुप्त बैठक बुलायी, जिसमें बोल्शेविकों का मुकाबला करने के लिये क्या उपाय किये जायें, इसका फैसला हुआ। अस्थायी सरकार ने एक योजना बनायी कि सोवियतों की दूसरी कांग्रेस शुरू होने से पहले बोल्शेविक केन्द्रीय समिति के हैड क्वार्टर स्मोल्नी पर हमला किया जाये और उस पर कब्जा कर लिया जाये और बोल्शेविक संचालन-केन्द्र का नाश कर दिया जाये। इसी उद्देश्य से, सरकार ने पेत्रोग्राद में वह फौज बुलाई जिसकी वफादारी पर उसे भरोसा था।

बोल्शेविकों ने सभी क्रांतिकारी सैन्य दस्तों के पास क्रांतिकारी सैन्य समिति के कमिसार भेजे। विद्रोह होने से पहले के बचे हुए दिनों में फौजी दस्तों, मिलों और कारखानों में कार्यवाही की जोरदार तैयारी की गयी। युद्ध-पोत अरोरा और जारिया स्वोबोदी के लिये भी निश्चित निर्देश भेजे गये।

6 नवम्बर को सुबह तड़के, अस्थायी सरकार ने हमला शुरू कर दिया। उसने बोल्शेविक पार्टी के केन्द्रीय पत्र रबोचीपूत् (मजदूर पथ) को बन्द करने का आदेश दिया और सम्पादकीय दफ्तर और बोल्शेविकों के छापेखाने पर हथियारबन्द गाड़ियां भेजी।

रेड गार्डों के दस्तों और क्रांतिकारी सैनिकों ने हथियारबन्द गाड़ियों को पीछे ठेल दिया। रबोचीपूत में ऐलाननामा प्रकाशित हुआ, जिसमें अस्थायी सरकार का तख्ता उलट देने के लिये आह्वान था। उसी समय, विद्रोह के पार्टी केन्द्र के निर्देश से क्रांतिकारी सैनिकों और रेड गार्डों के दस्ते स्मोल्नी की तरफ दौड़ाये गये। विद्रोह शुरू हो गया।

6 नवम्बर की रात को, लेनिन स्मोलनी आ पहुंचे और उन्होंने खुद विद्रोह के संचालन का भार संभाला। उस रात भर फौज के क्रांतिकारी दस्ते और रेड गार्डों के जत्थे बराबर स्मोल्नी आते रहे। बोल्शेविकों ने विंटर पेलेस घेरने के लिये, जहां अस्थायी सरकार ने अपना अड्डा बनाया था, उन्हें राजधानी के केन्द्र की तरफ भेजा।

7 नवम्बर को, रेड गार्डों के दस्तों और क्रांतिकारी सैनिकों ने रेलवे स्टेशनों, डाकखानों, तारघरों, मंत्रालयों और स्टेट बैंक पर कब्जा कर लिया। प्रेद पार्लियामेंट भंग कर दी गयी। युद्ध-पोत अरोरा ने अपनी तोपें विंटर पेलेस की तरफ मोड़ दीं और उनकी घन-गरजन ने एक नया युग आरम्भ किया, महान् समाजवादी क्रांति का युग।

7 नवम्बर की रात को क्रांतिकारी मजदूरों, सैनिकों और नौसैनिकों ने विंटर पेलेस पर हमला बोल कर कब्जा कर लिया और अस्थायी सरकार को गिरफ्तार कर लिया। पेत्रोग्राद में सशस्त्र विद्रोह की विजय हुई।

7 नवंबर को, बोल्शेविकों ने “रूस के नागरिकों के नाम” एक घोषणापत्र निकाला। इसमें कहा गया था कि पूंजीवादी अस्थायी सरकार हटा दी गयी है और राज्य सत्ता सोवियतों के हाथ में आ गयी है।

सोवियतों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस 7 नवंबर 1917 को रात 10:45 बजे स्मोल्नी में शुरू हुई, जबकि राजधानी में सत्ता सचमुच पेत्रोग्राद-सोवियत के हाथ में आ गयी थी।

कांग्रेस में बोल्शेविकों को भारी बहुमत मिला। मेन्शेविक और अन्य मौकापरस्त कांग्रेस छोड़कर चले गये। कांग्रेस ने मेन्शेविकों और सोशलिस्ट रेवोलूशनरियों की निंदा की और उनके चले जाने पर अफसोस करना तो दूर, उसका स्वागत किया। कांग्रेस ने ऐलान किया कि गद्दारों के चले जाने से अब वह मज़दूर और सैनिक प्रतिनिधियों की सच्ची क्रांतिकारी कांग्रेस हो गयी है।

मज़दूरों, सैनिकों और किसानों के भारी बहुमत का समर्थन पाकर और पेत्रोग्राद में होने वाले मज़दूरों और सैनिकों के सफल विद्रोह का समर्थन पाकर कांग्रेस अपने हाथ में सत्ता लेती है।

8 नवम्बर 1917 की रात को, सोवियतों की दूसरी कांग्रेस ने शान्ति सम्बन्धी आदेश स्वीकार किया। कांग्रेस ने युद्ध करने वाले देशों को बुलावा दिया कि कम से कम तीन महीने के लिये सुलह कर लें, जिससे शान्ति की बातचीत की जा सके। कांग्रेस ने एक तरफ तो युद्ध करने वाले देशों की जनता और वहां की सरकारों से अपनी बात कही, दूसरी तरफ उसने संसार की तीन सबसे आगे बढ़ी हुई शक्तियों और मौजूदा युद्ध में हिस्सा लेने वाले सबसे बड़े राज्यों यानी ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के वर्ग-सचेत मज़दूरों से” अपील की। उसने इन मजदूरों से कहा कि वे “शान्ति के उद्देश्य को सफलता की मंजिल तक ले जाने में और साथ ही सभी तरह की गुलामी और शोषण से मेहनतकश और शोषित जनता की मुक्ति के उद्देश्य को सफलता की मंजिल तक ले जाने में” मदद करें।

उसी रात को, सोवियतों की दूसरी कांग्रेस ने भूमि सम्बन्धी आदेश स्वीकार किया जिसमें कहा गया था “भूमि पर जमींदारों की मालिकी बिना मुआवजे के तुरंत खत्म की जाती है।” इसके अनुसार, जमीन पर व्यक्तिगत मालिकी हमेशा के लिये खत्म कर दी गयी और उसके बदले सार्वजनिक या राज्य की मालिकी स्थापित हुई।

जमींदारों, जार के परिवार और मठों की जमीन बिना पैसा दिये हुए सभी मेहनतकशों को इस्तेमाल के लिये लेना तय हुआ।

इस आदेश से, किसानों ने अक्टूबर समाजवादी क्रांति से 15 करोड़ देसियातिन (40 करोड़ एकड़ से ज्यादा) जमीन पायी जो पहले जमींदारों, पूंजीपतियों, जार के परिवार, मठों और गिरजाघरों के पास थी।

खनिज पदार्थों के तमाम साधन (तेल, कोयला, धातुएं, वगैरह) जंगल और जलाशय जनता की सम्पत्ति हो गये।

अंत में सोवियतों की दूसरी अखिल रूसी कांग्रेस ने पहली सोवियत सरकार बनायी - जन कमिसारों की समिति बनायी जिसमें सभी बोल्शेविक थे। जन कमिसारों की पहली समिति के पहले सभापति लेनिन चुने गये।

कांग्रेस के प्रतिनिधि चारों ओर चल पड़े, जिससे कि पेत्रोग्राद में सोवियतों की जीत की खबर फैला दी जाये और सोवियतों की सत्ता सारे देश में फैलाने का काम निश्चित हो सके।

हर जगह सोवियतों के हाथ तुरंत ही सत्ता नहीं आ गयी। सत्ता मास्को-सोवियत के हाथ में न जाये, इसके लिये क्रांति-विरोधी ताकतों ने मजदूरों और सैनिकों के खिलाफ हथियारबन्द लड़ाई शुरू कर दी। लेकिन आखिर उनकी हार हुई। नवम्बर 1917 से फरवरी 1918 तक, देश के विशाल प्रदेशों में सोवियत क्रान्ति इतनी तेजी से फैली कि लेनिन ने उसे सोवियत सत्ता की ‘विजय-यात्रा’ कहा।

महान् अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति विजयी हुई।

सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी का इतिहास (बोल्शेविक) बताता है कि रूस में समाजवादी क्रान्ति की इस अपेक्षाकृत आसान विजय के कई कारण थे।

(1) अक्टूबर क्रान्ति को अपेक्षाकृत ऐसे कमजोर, ऐसे असंगठित और राजनीतिक रूप से ऐसे अनुभवहीन दुश्मन का सामना करना था जैसे कि रूसी पूंजीपति ...

जब तक सोशलिस्ट रेवोलूशनरियों और मेन्शेविक पार्टियों का थोड़ा बहुत असर जनता पर था, तब तक पूंजीपति उन्हें पर्दे की तरह इस्तेमाल कर सकते थे और अपनी सत्ता बनाये रख सकते थे। लेकिन, जब मेन्शेविकों और सोशलिस्ट रेवोलूशनरियों ने जाहिर कर दिया कि वे साम्राज्यवादी पूंजीपतियों के दलाल हैं और इस तरह जनता में उन्होंने अपना असर खो दिया, तब पूंजीपतियों और उनकी अस्थायी सरकार का कोई मददगार न रहा।

(2) अक्टूबर क्रांति का नेतृत्व रूस के मजदूर वर्ग जैसे क्रांतिकारी वर्ग ने किया। यह ऐसा वर्ग था जो संघर्ष की आंच में तप चुका था, जो थोड़ी ही अवधि में दो क्रांतियों से गुजर चुका था और जो तीसरी क्रांति के शुरू होने से पहले शान्ति, जमीन, स्वाधीनता और समाजवाद के लिये संघर्ष में जनता का नायक माना जा चुका था।

(3) रूस के मज़दूर वर्ग को क्रांति में गरीब किसानों जैसा समर्थ साथी मिला, जो जनता का भारी बहुसंख्यक भाग था।

जहां तक आम मेहनतकश किसानों का सवाल था, क्रांति के आठ महीनों का तजुर्बा बेकार नहीं गया। इस तजुर्बे से उन्होंने देख लिया कि रूस में एक ही पार्टी है - बोल्शेविक पार्टी - जो किसानों की जरूरतें पूरी करने के लिये जमींदारों को कुचलने को तैयार है।

(4) मज़दूर वर्ग का नेतृत्व राजनीतिक संघर्षो में तपी और परखी हुई बोल्शेविक पार्टी जैसी पार्टी ने किया था। बोल्शेविक पार्टी इतनी साहसी पार्टी थी कि निर्णायक हमले में जनता का नेतृत्व कर सकती थी। वह इतनी सावधान थी कि मंजिल की तरफ जाने के रास्ते में ढंकी-मुंदी खाई-खन्दकों से बच कर निकल सकती थी। ऐसी ही पार्टी विभिन्न क्रांतिकारी आंदोलनों को चतुराई से एक ही सामान्य क्रांतिकारी धारा में मिला सकती थी। शान्ति के लिये आम जनवादी आंदोलन, रियासती जमीन छीनने के लिये किसानों का जनवादी आंदोलन, राष्ट्रीय स्वाधीनता और राष्ट्रीय समानता के लिये पीड़ित राष्ट्रीय आंदोलन, और पूंजीपतियों का तख्ता उलटने के लिये और श्रमजीवी अधिनायकत्व कायम करने के लिये श्रमजीवी वर्ग का समाजवादी आंदोलन - इन सबको ऐसी ही पार्टी एक सामान्य क्रांतिकारी धारा में मिला सकती थी।

इसमें संदेह नहीं कि इन विभिन्न क्रांतिकारी धाराओं के एक ही सामान्य शक्तिशाली क्रांतिकारी धारा में मिलने ने रूस में पूंजीवाद की तकदीर का फैसला कर दिया।

(5) अक्टूबर क्रांति ऐसे समय आरम्भ हुई जबकि साम्राज्यवादी युद्ध अभी जोरों पर था, जबकि प्रमुख पूंजीवादी राज्य दो विरोधी खेमों में बंटे हुए थे और जब परस्पर युद्ध में फंसे रहने और एक-दूसरे की जडें काटने में लगे रहने से, वे ’रूसी मामलों’ में सफलता से दखल न दे सकते थे और सक्रिय रूप से अक्टूबर क्रांति का विरोध न कर सकते थे।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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