“आतंकवाद पर जंग” के नाम पर अमरीकी साम्राज्यवाद एशिया पर अपना दबदबा कायम करने की कोशिश कर रहा है

Submitted by cgpiadmin on मंगल, 17/10/2017 - 02:30

23 सितम्बर, 2017 को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की 72वीं बैठक में दिए गए अपने भाषण में हिन्दोस्तान की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा कि “दुनिया भर में पाकिस्तान की पहचान केवल एक आतंक का निर्यात करने वाली फैक्ट्री के रूप में है”। (हिन्दू, 26 सितम्बर, 2017)

विदेश मंत्री के इस बयान के साथ-साथ पाकिस्तान के खिलाफ हिन्दोस्तानी राज्य का जंग-भड़काऊ प्रचार तेज हो गया है। वायु सेना के प्रमुख ने ऐलान किया कि हिन्दोस्तान की वायु सेना पाकिस्तान में किसी भी निशाने पर हमला करने की काबिलियत रखती है और हमेशा तैयार है, और इन निशानों में परमाणु ठिकाने भी शामिल हैं।

हिन्दोस्तानी राज्य लगातार पकिस्तान के खिलाफ प्रचार करता आया है, और यह बताता आया है कि हिन्दोस्तान में किये गए तमाम आतंकी हमलों को पाकिस्तान द्वारा आयोजित किया गया है। इसके अलावा हिन्दोस्तानी राज्य जानबूझकर कश्मीरी लोगों के आत्मनिर्धारण के अधिकार के संघर्ष को पाकिस्तान प्रेरित “सीमा-पार आतंकवाद” बताते हुए बदनाम करता आया है।

पाकिस्तान में सी.आई.ए. की ख़ुफिया कार्यवाहियां

अफग़ानिस्तान में अमरीका के ख़ुफिया जंग की शुरुआत दिसम्बर 1979 में सोवियत हमले के काफी पहले ही कार्टर प्रशासन के दौरान हो गयी थी, और इसके लिए पाकिस्तान की धरती का इस्तेमाल किया गया।

“अमरीका के आधिकारिक इतिहास के अनुसार अफग़ानिस्तान में मुजाहिदीन के लिए सी.आई.ए. की सहायता 1980 से शुरू की गयी, यानि 24 दिसंबर 1979 को सोवियत सेना के अफग़ानिस्तान पर हमले के बाद। लेकिन असलियत इसके विपरीत है, जिसे अभी तक गुप्त रखा गया है। यह सच है कि काबुल में सोवियत-परस्त सरकार के विरोधियों के लिए खुफिया मदद देने के फरमान पर 3 जुलाई 1979 को राष्ट्रपति कार्टर ने हस्ताक्षर किये।

और उसी दिन, मैंने राष्ट्रपति को एक चिट्ठी भेजी जिसमें मैंने विस्तार से बताया कि मेरे खयाल में हमारी यह सहायता सोवियत सैनिकी हस्तक्षेप को उकसाएगी।”1

अमरीका के भूतपूर्व रक्षा मंत्री रोबर्ट्स गेट्स ने अपने प्रकाशित संस्मरण में बताया है कि सोवियत हमले के बहुत पहले से ही अमरीकी खुफिया एजेंसी (सी.आई.ए.) इस्लामी गुटों को सहायता देती आई है। सोवियत अफग़ान युद्ध जिस समय चरम अवस्था पर था उस दौरान रोबर्ट्स गेट्स सी.आई.ए. के सहायक निदेशक थे।

अफग़ानिस्तान में मुजाहिद्दीनों के लिए सी.आई.ए. की ख़ुफिया मदद पाकिस्तान की आई.एस.आई. के जरिये पहुंचाई जाती थी। अफग़ानिस्तान और उसके बाद भूतपूर्व सोवियत संघ यूनियन के मुस्लिम गणराज्यों में सक्रिय इस्लामी सशत्र गुटों को मदद पहुंचाने में आई.एस.आई. ने प्रमुख भूमिका निभाई।

सी.आई.ए. के लिए काम करते हुए आई.एस.आई. मुजाहिद्दीनों को भर्ती करना और उनको प्रशिक्षण देना शामिल था। 1982 से 1992 के बीच, 10 वर्षों में 43 इस्लामिक देशों से 35,000 मुसलमानों को अफग़ान जिहाद में लड़ने के लिए भर्ती किया गया।

सी.आई.ए.-आई.एस.आई. द्वारा दी गयी गुर्रिला प्रशिक्षण में निशाना बनाकर क़त्ल करने और कार से बम-हमले जैसे कार्यवाहियां शामिल था।

अमरीका द्वारा मदद के रूप में दिए गए पैकेज में तीन मुख्य सामग्री हुआ करती थी - संगठन और लोजिस्टिक्स, फौजी टेक्नोलॉजी और अफग़ान विद्रोह को बरकरार रखने और उसे प्रोत्साहन देने के लिए के लिए विचारधारात्मक समर्थन ... इसमें अमरीका का सबसे बड़ा योगदान अरब देशों से और अन्य स्रोतों से मानवीय और भौतिक संसाधनों की आपूर्ति करना था।

दुनियाभर से नौजवानों को अफग़ान जिहाद में शामिल होने के लिए अखबारों और पत्रिकाओं में विज्ञापन दिए जाते थे, जिसमें उनको तमाम तरह के प्रलोभन और प्रोत्साहन दिए जाते थे। इन विज्ञापनों का खर्च सी.आई.ए. के फण्ड से उठाया जाता था।2

अमरीका ने अपनी एक एजेंसी यु.एस.ए.आई.डी. (यु.एस. एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट - यु.एस.-ऐड) के जरिये धार्मिक भावना को भड़काने की प्रक्रिया को समर्थन और पैसे दिए।

... अफग़ानी स्कूली बच्चों को हिंसक चित्रों, आतंकवादी इस्लामी शिक्षाओं से भरी किताबों की आपूर्ति करने के लिए अमरीका ने लाखों करोड़ों डॉलर खर्च किये, ताकि ख़ुफिया रूप से सोवियत कब्जे के विरोध में लोगों को भड़का सके।

अफग़ानी स्कूलों के पाठ्यक्रम में ऐसी किताबें शामिल की गयी जो बंदूकें, गोलियां, सैनिक और माइंस के चित्रों से भरी हुयी थी। यहां तक की तालिबान भी स्कूलों में अमरीकी किताबों का इस्तेमाल करता था ...

... यह किताबें 1980 की शुरुआत में यु.एस.-ऐड के एक ग्रांट के तहत नेब्रेस्का विश्वविद्यालय ओमाहा और उसके अफग़ानिस्तान अध्ययन केंद्र द्वारा विकसित की गयी थी। 1984 और 1994 के बीच, अफग़ानिस्तान में विश्वविद्यालय शिक्षा कार्यक्रम के तहत इस एजेंसी ने 5.1 करोड़ अमरीकी डॉलर की राशि खर्च की।”3

1. अमरीका के भूतपूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, ब्रेजिन्स्की द्वारा ले नौवेल ओब्सेर्वतुर को दिया गया साक्षात्कार, 15-21 जनवरी 1998

2. परवेज हुडबोय, अफग़ानिस्तान और विश्व जिहाद का उद्गम, पीस रिसर्च, 1 मई 2005

3. वाशिंगटन पोस्ट, 23 मार्च 2002
Reagan meeting mujahiddins
1985 में वाइट हाउस में अफग़ान मुजाहिद्दीन कमांडरों के साथ अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन

हिन्दोस्तान के विदेश मंत्री का यह बयान ऐसे वक्त पर आया है जब अमरीकी साम्राज्यवाद, अफग़ानिस्तान और एशिया में अपनी रणनीति का हिस्सा बतौर पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ऐलान किया है कि अमरीका अफग़ानिस्तान से अपनी सेना को तब तक नहीं हटाएगा जब तक सैन्य “जीत” हासिल नहीं हो जाती। उन्होंने पाकिस्तान पर आरोप लगाया है कि अफग़ानिस्तान में “आतंकवाद से लड़ने” के लिए पाकिस्तान अपनी “पूरी ताकत” नहीं लगा रहा है। हिन्दोस्तानी राज्य इस बात से बहुत खुश है कि अमरीका पाकिस्तान को निशाना बना रहा है। हिन्दोस्तानी राज्य का प्रचार तंत्र हिन्दोस्तानी लोगों को बता रहा है कि “देखो, अब तो अमरीका भी पाकिस्तान पर आतंकवाद का आरोप लगा रहा है”।

नवंबर 2001 में अमरीका के नेतृत्व में पाकिस्तान के हवाई और समुद्री सेना के अड्डों का इस्तेमाल करते हुए अफग़ानिस्तान पर हमला किया गया और उस पर कब्जा जमाया गया। अमरीका के नेतृत्व में कब्जाकारी सेना के जूतों तले अफग़ानिस्तान में अपने पसंद की नागरिक सरकार कायम की गयी। लेकिन इस नागरिक सरकार की हुकूमत बहुत दूर तक नहीं चलती है। देश का करीब आधा हिस्सा तालिबान के नियंत्रण में है, और ऐसी रिपोर्ट आई है कि आई.एस.आई.एस. भी कुछ सूबों पर नियंत्रण करती है।

पिछले कई सालों से अमरीकी और पाकिस्तानी लोगों के बीच अन्तर्विरोध काफी तीखे होते जा रहे हैं। अमरीका ने पाकिस्तान पर ड्रोन द्वारा कई हमले किये हैं, जिसमें हजारों बेगुनाह लोग मारे जा चुके हैं। पाकिस्तान की संप्रभुता पर किये गए इन हमलों के खिलाफ पाकिस्तान में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए हैं। दूसरी तरफ, पाकिस्तान की सरकार ने इस बात की ओर इशारा किया है कि उनके देश में हुए कई आतंकी हमले सीमा पार अफग़ानिस्तान से किये गए हैं।

पाकिस्तान की सरकार ने अपनी फौज को अफग़ानिस्तान के अंदर भेजे जाने की इजाजत नहीं दी है। अब पाकिस्तान ने खुला ऐलान किया है कि अफग़ानिस्तान की समस्या का फौजी समाधान नहीं हो सकता। पाकिस्तान ने तालिबान और अफग़ानिस्तान सरकार सहित सभी राजनितिक ताकतों के बीच चर्चा के आधार पर समस्या का समाधान निकाले जाने का आह्वान किया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए पाकिस्तान सरकार रूस, चीन और ईरान के साथ समन्वय बना रही है। पाकिस्तान का यह दृष्टिकोण अफग़ानिस्तान और एशिया में अमरीकी रणनीति के साथ टकरा रहा है।

अमरीका अफग़ानिस्तान का इस्तेमाल आतंकवादी गुटों को ट्रेनिंग देने और पड़ोसी देशों पर आतंकी हमलों को अंजाम देने के लिए करना चाहता है। इन देशों में ईरान, पाकिस्तान, रूस, चीन और मध्य एशिया के गणराज्य शामिल हैं। पूरे एशियाई महाद्वीप पर अपना दबदबा कायम करने के लिए अमरीका यहाँ के राज्यों का गुटवादी जंग के द्वारा विनाश करना चाहता है और उनको आपसी जंग में झोंकना चाहता है।

पाकिस्तान सरकार के प्रवक्ताओं ने आतंकवाद के सवाल पर अमरीका की दोगली नीति का पर्दाफाश कर दिया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने इस बात की पुष्टि की है कि जब सोवियत संघ ने अफग़ानिस्तान पर अपना कब्जा जमाया था उस दौर में, अमरीका ने पाकिस्तान के साथ साझेदारी में वहां तमाम जिहादी गुट बनाये।

इस बात को सभी जानते है कि 1980 के दशक में सोवियत कब्जाकारी सेना पर हमला करने के लिए अमरीकी खुफिया एजेंसी सी.आई.ए. ने पाकिस्तान को अड्डे के रूप में इस्तेमाल करते हुए, खुलेआम जिहादी गुट बनाये, उनको प्रशिक्षण दिया और पैसे और हथियार दिए। इन गुटों में कई देशों से भर्ती किया गया। उस वक्त अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने उनका वाइट हाउस में स्वागत किया था। सोवियत कब्जे के खिलाफ अफग़ानिस्तान के लोगों के न्यायसंगत संघर्ष को अमरीका ने अपने ही खुदगर्ज लक्ष्यों को आगे बढ़ाने की दिशा में धकेल दिया (देखिये बॉक्सः पाकिस्तान में सी.आई.ए की खुफिया कार्यवाहियां) सोवियत संघ के विघटन के बाद सी.आई.ए. ने इन गुटों को बरकरार रखा और अन्य देशों में अपनी कार्यवाहियों को अंजाम देने के लिए तैनात किया। अजरबैजान, चेचन्या और दागेस्तान सहित कई देशों में आतंकवादी हमलों को अंजाम देने के लिए इनका इस्तेमाल किया गया। बोस्निया हेर्जेगोविना और कोसोवो में गृह युद्ध और भ्रातृहत्या भड़काने के लिए सी.आई.ए. ने इन सशस्त्र गुटों को युगोस्लाविया भेजा।

दक्षिण एशिया और तमाम इस्लामी देशों में सुन्नी-शिया के आधार पर गुटवादी हिंसा भड़काकर मौजूदा राज्यों का विनाश करने और पश्चिम एशिया के नक्शे को बदलने के लिए अमरीका सी.आई.ए. ने सऊदी अरब और अपने अन्य मित्र देशों के साथ मिलकर आई.एस.आई.एस. को जन्म दिया। सी.आई.ए. ने इसका इस्तेमाल सीरिया और अन्य देशों में गड़बड़ी फैलाने और तबाही मचाने के लिए किया। बताया जाता है कि इस वक्त आई.एस.आई.एस. ने अफग़ानिस्तान के कुछ इलाकों पर अपना नियंत्रण जमाया है। अफग़ानिस्तान में अमेरिका की कब्जाकारी सेना के समर्थन के बिना यह सब कैसे संभव है?

असलियत तो यह है कि आज दुनियाभर में आतंकवाद का प्रमुख प्रायोजक अमरीका ही है। “आतंकवाद पर जंग” के नाम पर अमरीकी साम्राज्यवाद एशिया और पूरी दुनिया पर अपना दबदबा कायम करने की अपनी रणनीति पर काम कर रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की आम सभा के मंच से अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उत्तर कोरिया का नामोनिशान मिटा देने की धमकी दी। ट्रम्प ने इसी मंच का इस्तेमाल ईरान पर पश्चिम एशिया में आतंकवाद का प्रमुख प्रायोजक होने का आरोप लगाते हुए उसको बदनाम करने और उस देश में सत्ता परिवर्तन की अपनी नापाक कोशिशों को जायज बताने के लिए किया।

अमरीकी साम्राज्यवाद ने बार-बार अपनी फौजी ताकत का इस्तेमाल करते हुए दूसरे देशों पर हमले किये और उनको बर्बाद कर दिया है। यूगोस्लाविया, अफग़ानिस्तान, इराक, लिबीया, सोमालिया, सीरिया, यमन अमरीकी साम्राज्यवाद द्वारा बर्बाद किये गए देशों की सूची बढ़ती ही जा रही है। अब उत्तर कोरिया और ईरान अमरीकी साम्राज्यवाद के निशाने पर है। और भी कई अन्य देश इस सूची में शामिल हो जायेंगे अगर अमरीकी लोगों सहित, दुनिया भर के तमाम लोगों की एकजुट ताकत अमरीकी साम्राज्यवाद के इस तबाहकारी रास्ते पर चलने से जल्द ही नहीं रोकते। ज्यादा से ज्यादा राज्य अब अमरीकी साम्राज्यवाद की रणनीति से उनके अस्तित्व और दुनियाभर में शांति को होने वाले ख़तरे को पहचानने लगे हैं।

हिन्दोस्तानी राज्य की भूमिका पाकिस्तान के प्रति उसकी अंधी दुश्मनी से निर्धारित है। अमरीका और पाकिस्तान के बीच अंतर्विरोधों का इस्तेमाल वे अपने तंग हितों को आगे बढ़ाने के लिए कर रहा है। वे अमरीकी रथ पर सवार होते हुए पाकिस्तान पर हमला करना चाहता है। कई देशों के खिलाफ अमरीका द्वारा किये गए आतंकी हमलों का पर्दाफाश करने और उसका विरोध करने को हिन्दोस्तानी राज्य तैयार नहीं है। हिन्दोस्तानी राज्य की विदेश नीति हिन्दोस्तान के शासक वर्ग के तंग और खुदगर्ज हितों

द्वारा निर्धारित होती है, जो एशिया में अमरीकी रणनीति के साथ करीबी रिश्ता बनाते हुए दुनिया में एक बड़ी ताकत बनकर उभरना चाहते है। एशिया में अपने हितों को आगे बढाने के लिए अमरीकी साम्राज्यवाद अपनी अगुवाई में एक फौजी गठबंधन बनाकर चीन पर नकेल लगाने की कोशिश कर रहा है। वह चाहता है कि हिन्दोस्तान इस गठबंधन का हिस्सा बने। अमरीका के साथ गठबंधन में अपने हितों को हासिल करने की संभावना से हिन्दोस्तानी राज्य बेहद उत्साहित है। यह सब हिन्दोस्तानी लोगों, तमाम अन्य देशों के लोगों और शांति के लिए बेहद ख़तरनाक है।

अमरीकी साम्राज्यवाद ने हिन्दोस्तान और पकिस्तान को हमेशा एक दूसरे के खिलाफ भड़काया है। उनके बीच की ऐतिहासिक दुश्मनी को और एक दूसरे के खिलाफ मंसूबों को हवा दी है। वह नहीं चाहता है कि यह दो पड़ोसी आपस में बैठकर शांतिपूर्ण तरीके से आपसी समस्याओं को हल करें। आज भी वह यही काम कर रहा है।

अमरीकी साम्राज्यवादी, दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादी, ऐलान कर रहे हैं कि उनको यह अधिकार है कि वे किसी भी राज्य को “दुष्ट राज्य” घोषित करे और फिर इसके आधार पर उस देश पर हमले को व उसकी बर्बादी को जायज करार दे। वे एक ऐसी विश्व-व्यवस्था कायम करना चाहते है जहां “जिसकी लाठी उसकी भैंस” का कानून चलेगा और जहां वे पूरी दुनिया पर अपना दबदबा चलाएंगे। “आतंकवाद पर जंग” को इसी आधार पर जायज बताया जा रहा है। अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अमरीकी साम्राज्यवादी आतंकवादी गुटों को समर्थन देना जारी रखेंगे।

हिन्दोस्तान के लोगों को यह समझाना होगा कि आतंकवाद पूंजीवादी साम्राज्यवादी राज्यों के हाथों में अपने साम्राज्यवादी हितों को आगे बढ़ाने का हथियार है। दुनियाभर में अमरीकी साम्राज्यवाद आतंकवाद का प्रमुख प्रायोजक है। “आतंकवाद पर जंग” के नाम पर अमरीकी साम्राज्यवाद एशिया पर और दुनियाभर में अपना दबदबा कायम करने की कोशिश कर रहा है।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा पाकिस्तान के खिलाफ लगातार जंग भड़काऊ प्रचार करने के लिए उसकी कड़ी निंदा करती है। हिन्दोस्तान के लोगों को सरकार से यह मांग करनी चाहिए कि वह अमरीका के साथ अपनी रणनैतिक गठबंधन को तोड़ दे, और इस इलाके के अन्य देशों को भी ऐसा ही करने की अपील करे। लोग सरकार से यह मांग करें कि वह अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा दूसरे देशों और लोगों की संप्रभुता पर सभी तरह के हमलों का विरोध करे। इस इलाके में दीर्घकालीन शांति का यही एक रास्ता है।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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