राज्य द्वारा आयोजित सिखों के जनसंहार की 33वीं बरसी के अवसर पर :

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 02/11/2017 - 03:30

1984 के कत्लेआम के गुनहगारों को सज़ा देने के संघर्ष को आगे बढ़ायें!

सबकी सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले नये राज्य की स्थापना के लिये संगठित हों!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का आह्वान, 24 अक्तूबर, 2017

एक नवंबर, 2017 को सिखों के जनसंहार की 33वीं बरसी के अवसर पर, पुरुष और महिलायें, बूढ़े और नौजवान, सभी धर्मों के लोग, कम्युनिस्ट और अन्य राजनीतिक कार्यकर्ता, दिल्ली की सड़कों पर, सुप्रीम कोर्ट से संसद तक प्रदर्शन करेंगे।

इस संयुक्त मोर्चे के द्वारा हिन्दोस्तानी लोग ये ऐलान कर रहे हैं कि हम 33 वर्ष पहले हुए इस वहशी कत्लेआम को भूलने और माफ करने के लिए तैयार नहीं हैं। हिन्दोस्तानी लोग सारी दुनिया को यह सन्देश देना चाहते हैं कि इंसाफ के लिये हमारा संघर्ष जारी है। हमारा संघर्ष तब तक जारी रहेगा, जब तक हम एक ऐसे राज्य को स्थापित नहीं कर लेते, जो सभी लोगों की सुख-सुरक्षा और खुशहाली सुनिश्चित करने की अपनी जिम्मेदारी को निभायेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि किसी पर भी उसके धर्म या आस्था के कारण हमला नहीं होगा।

हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि 1984 का कत्लेआम दिल्ली, कानपुर और उत्तरी हिन्दोस्तान के कई भागों में तीन दिन तक लगातार चलता रहा। उस समय की सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के जाने-माने नेताओं के नेतृत्व में, खून के प्यासे गिरोहों, जो पेट्रोल बमों और रबर के टायरों से लैस थे, ने सिखों को घरों, बसों और ट्रेनों से निकालकर जिन्दा जला दिया था। लड़कियों और महिलाओं का बलात्कार किया गया। गुरुद्वारों को आग लगा दी थी।

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इस कत्लेआम से चार साल पहले, बड़े पूंजीपतियों की मीडिया और उनकी बड़ी पार्टियों ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से, सिखों के खिलाफ़ सांप्रदायिक नफ़रत फैलाने का प्रचार शुरू कर दिया था। इस तरह का माहौल बनाया गया जैसे कि हर एक सिख हिन्दोस्तान का दुश्मन है, वह एक खतरनाक आतंकवादी है और अलगाववादी है, जो हिंदुओं का कत्ल करना चाहता है। सिखों के अपने राष्ट्रीय अधिकारों को पाने के संघर्ष को जानबूझकर सांप्रदायिक रंग दिया गया। उनके संघर्ष को पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित अलगाववादी लड़ाई कहा गया और इस बहाने से सिखों को क्रूर राजकीय आतंक का निशाना बनाया गया।

एक नवम्बर के दिन अफवाहें फैलाई गयीं कि सिख लोग प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कि हत्या की खुशी में मिठाइयां बांट रहे हैं, जबकि यह भी दावा किया गया कि प्रधानमंत्री की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों ने की है। दिल्ली में तो यह भी अफवाह फैलाई गयी कि सिखों ने पानी की सप्लाई के टैंकों में भी जहर मिला दिया है। सतारूढ़ पार्टी के नेता टीवी पर चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे के “खून का बदला खून” से लेना है। कुछ जाने-माने लोगों ने देश के राष्ट्रपति और गृहमंत्री से अपील की कि इस कत्लेआम को रोका जाये, लेकिन उनकी बातों को अनसुना कर दिया गया। पुलिस चुपचाप देखती रही और हमलों को होने दिया या जानलेवा गिरोहों को इन हमलों में सहायता भी दी। जब दिल्ली की सड़कों पर निर्दाेष सिखों का खून बह रहा था, सुप्रीम कोर्ट चुप रहा। अंतरिम प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कत्लेआम को सही ठहराते हुये कहा कि “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है!”

पिछले 33 वर्षों में नागरिकों की अनेक जांच समितियों ने इस कत्लेआम को आयोजित करने में उस समय की सत्तारूढ़ पार्टी और पूरे प्रशासनिक राज्य तंत्र की भूमिका को बहुत अच्छी तरह से स्थापित किया है। दूसरी तरफ कम से कम दस आयोगों और समितियों जिनका गठन विभिन्न सरकारों द्वारा इस कत्लेआम के पीछे की साज़िश का पता लगाने के लिए किया गया था। इन आयोगों ने सत्ता में बैठे लोगों की भूमिका को उजागर नहीं किया। राज्य द्वारा सुनियोजित कत्लेआम को सरकारी दस्तावेज़ों में अभी भी “दंगे” के नाम से दर्ज किया जाता है। जिन्होंने हिन्दोस्तानी लोगों के इस कत्लेआम को आयोजित किया उनको अभी तक कोई सज़ा नहीं मिली है, क्योंकि “उनके खिलाफ़ पर्याप्त सबूत नहीं हैं”। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि नवम्बर 1984 में सिखों का कत्लेआम राजकीय आतंकवाद था। हिन्दोस्तान का पूरा राज्य तंत्र इस कत्लेआम को आयोजित करने में शामिल था। बड़े सुनियोजित तरीके से पहले कत्लेआम का वातावरण बनाया गया और फिर उसको कार्यांवित किया गया।

बड़े पूंजीपतियों ने जो हिन्दोस्तानी राज्य पर नियंत्रण रखते हैं, उन्होंने एक बहुत ही विस्तृत तंत्र बनाया हुआ है जिसके द्वारा सांप्रदायिक जहर लोगों के बीच फैलाया जाता है, लोगों को सांप्रदायिक आधार पर बांटा जाता है और समय-समय पर किसी एक समुदाय के लोगों को हमले का निशाना बनाया जाता है। इस तरह का माहौल पैदा किया जाता है कि ऐसा प्रतीत हो कि लोग सांप्रदायिक हैं और लोगों ने उस समुदाय के खिलाफ़ दंगे शुरू कर दिये हैं।

1984 के कत्लेआम के बाद, 1992 में बाबरी मस्जिद गिराई गयी और उसके तुरंत बाद, मुबई और अन्य कई शहरों में, हिन्दुओं और मुसलमानों का कत्लेआम किया गया। 2002 में गुजरात में मुसलमानों को निशाना बनाया गया और मुसलमानों के साथ उसी पैमाने पर कत्लेआम हुआ, जितना सिखों के खिलाफ़ 1984 में हुआ था।

एक समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर, उसे लोगों का दुश्मन घोषित कर देना और फिर उस समुदाय को राजकीय आतंक का शिकार बनाना, यह हिन्दोस्तानी शासक वर्ग की विशेषता बन गई है। हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग जिसका नेतृत्व 150 बड़े इज़ारेदार घराने करते हैं, 120 करोड़ हिन्दोस्तानियों पर अपनी हुकूमत थोपने के लिये, यह उनका एक पसंदीदा हथियार है।

कांग्रेस पार्टी और भाजपा जैसी बड़ी राजनीतिक पार्टियां जिनको बड़े पूंजीपति पैसा देते हैं, वे चुनाव जीत कर पूंजीपतियों की सेवा करने के लिये और उनके अजेंडा को आगे ले जाने के लिए, सांप्रदायिक राजनीति का सहारा लेती हैं। इस तरह की पार्टियां हिन्दोस्तानी राज्य तंत्र पर कब्ज़ा करने के लिए चुनाव में भाग लेती हैं, एक दूसरे के खिलाफ़ लड़ती हैं और सत्ता में आने के बाद पूंजीपतियों के अजेंडा को ही लागू करती हैं। ये पार्टियां धर्म, जाति और नस्ल की पहचान के आधार पर लोगों को भड़काती हैं, मज़दूरों और किसानों की वर्गीय एकता को तोड़ने की कोशिश करती हैं और उन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती हैं। इन पार्टियों के अलावा, फूट डालो और राज करो के इस तंत्र में, वे संगठन भी शामिल हैं जिनका मकसद है इस या उस धर्म के लोगों के खिलाफ़ निरंतर सांप्रदायिक जहर उलगना। इसमें वे भूमिगत संगठन भी शामिल हैं जिन्हें विभिन्न खुफिया एजेंसियां बनाती और चलाती हैं। बड़े पूंजीपति इस तरह के कई संगठनों को सीधे तौर पर धन मुहैया कराते हैं। कुछ को राज्य के द्वारा धन मिलता है।

हमें उन दोनों प्रकार की पार्टियों के बीच के फर्क को साफ-साफ समझना होगा, एक प्रकार की पार्टियां जो राजकीय आतंकवाद के लिये अपराधी हैं और उन्हें सज़ा मिलनी चाहिये तथा दूसरे प्रकार की पार्टियां जो राजकीय आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ रही हैं और राजकीय आतंकवाद के खिलाफ़ संयुक्त मोर्चे का हिस्सा हैं। जब लोगों को धर्म के नाम पर निशाना बनाया जाता है, और वे साथ आकर अपने ज़मीर के अधिकार की रक्षा के लिए लड़ते हैं, तो उनको धर्म के आधार पर संगठित होने के लिये दोषी नहीं ठहराया जा सकता। जो राजकीय आतंकवाद का शिकार हैं, उन्हें सांप्रदायिक नहीं कह सकते। सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा के लिए केवल सत्तारूढ़ वर्ग और उसकी पार्टियां ही जिम्मेदार हैं, जो बारी-बारी से सत्ता में आती हैं और इस राज्य तंत्र को चलाती हैं।

सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा तथा हर तरह के राजकीय आतंकवाद का स्रोत मुट्ठी पूंजीपति वर्ग के नियंत्रण में चलाये जा रहे हिन्दोस्तानी राज्य में है, जिसका नेतृत्व बड़े-बड़े इज़ारेदार घराने करते हैं। इस शोषक वर्ग ने ही अंग्रेजी बस्तीवादी राज्य की “फूट डालो और राज करो” की बस्तीवादी नीति और राज्य तंत्र को मेहनतकश जनता पर राज करने के लिये और भी सुरक्षित और सशक्त बनाया है। एक ऐसा समाज बनाने के लिए जिसमें विभिन्न संप्रदायों और अस्थाओं के लोग मिलजुल के रह सकें और हर मानव अधिकार की हिफाज़त हो सके, इसके लिये बहुत ज़रूरी है कि हम पूंजीपति वर्ग की हुकूमत का अंत करें और मज़दूरों का राज स्थापित करें। और सभी दबे-कुचले लोगों के साथ मिलकर एक नए समाज के रचना करें।

एक ऐसा राज्य जो अपने नागरिकों की रक्षा नहीं कर सकता और जो समाज में कत्लेआम आयोजित करने वालों को सज़ा नहीं दे सकता, उसे कायम रहने का कोई हक़ नहीं हैं। इसलिए हिन्दोस्तानी लोगों का यह हक़ और उनका यह कर्तव्य भी है कि ऐसे राज्य को उखाड़ फेंके और एक नए राज्य की स्थापना करें जो सबकी सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। हिन्दोस्तानी लोग एक नया मूलभूत कानून बनाने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करके यह सुनिश्चित करें कि संप्रभुता लोगों के हाथों में हो। जो भी लोगों के मानव, लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय अधिकारों का हनन करता है उस पर तुरंत मुकदमा चलाया जाना चाहिये और तुरंत सज़ा मिलनी चाहिये, चाहे वह समाज या राज्य में कितने भी ऊंचे पद पर क्यों न हो।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी उन सभी लोगों को जो राजकीय आतंकवाद, सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं, उनसे आह्वान करती है कि वे अपने संघर्ष को इस क्रान्तिकारी दृष्टिकोण से आगे ले जायें कि हम सबको मिलकर एक ऐसे राज्य को स्थापित करना है जो सबको सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभायेगा।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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