नोटबंदी के एक साल बाद, किसको फायदा हुआ?

Submitted by cgpiadmin on बुध, 01/11/2017 - 23:30

8 नवम्बर, 2017 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 500 और 1000 रुपये के नोटों की बंदी की घोषणा के एक साल बाद भी लोग उसके तबाहकारी परिणामों को भुगत रहे हैं, जबकि यह दावा किया गया था कि “लंबे समय के फायदे” के लिए “थोड़े समय का कष्ट” झेलना पड़ेगा। हमारे देश में जहां अधिकांश लोग नगदी पर निर्भर हैं, वहां 86 प्रतिशत मूल्य की नगदी को प्रचलन से अचानक हटाये जाने से मज़दूरों, किसानों तथा छोटे और मंझोले उत्पादकों व व्यापारियों की ज़िन्दगी तबाह हो गयी है।

 Employment of labourers hit by demonetisation

सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकॉनमी द्वारा किये गए एक शोध से पता चलता है कि जनवरी से अप्रैल 2017 के बीच 15 लाख से अधिक नौकरियां खत्म हो गयी हैं। भाजपा से संबंधित ट्रेड यूनियन, भारतीय मज़दूर संघ ने अनुमान लगाया है कि 3 लाख से अधिक, खासतौर से छोटे और मंझोले उद्योगों के बंद हो जाने से, 4 करोड़ से अधिक लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। नोटबंदी के चलते किसानों को अपनी फसल को कम दाम पर बेचने के लिये मजबूर होना पड़ा है, जिसके नुकसान से वे अभी तक उबर नहीं पाए हैं। अप्रैल-जून 2017 की तिमाही के बीच सकल घरेलू उत्पाद की दर पिछले 3 वर्षों में सबसे निचले स्तर पर गिर गयी है।

नोटबंदी का सबसे बुरा असर बैंक के कर्मचारियों पर हुआ, क्योंकि उनको कई महीनों तक लगातार रोज़ काम की समय सीमा से अधिक काम करने के लिये जबरन मजबूर किया गया। कई मामलों में तो बैंक कर्मचारियों को 14 घंटों तक काम करना पड़ा, उनकी छुट्टियाँ रद्द कर दी गयीं, ताकि वे 500 और 1000 के नोटों को बंद किये जाने की वजह से फैले हाहाकार को संभाल सकें। आज करीब एक वर्ष बाद भी उनको इस काम का कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया है। करीब 4 लाख बैंक कर्मचारियों पर इसका बहुत बुरा असर हुआ है। इसके अलावा उनको लोगों के गुस्से का भी सामना करना पड़ा है। उनके खिलाफ़ बदनाम करने वाला प्रचार चलाया गया, कि वे नए नोटों को बैंकों से निकालकर, नोटों की कालाबाज़ारी कर रहे हैं। सार्वजनिक बैंकों के मज़दूरों ने सरकार को चेतावनी दी है कि नोटबंदी के दौरान उनके द्वारा किये गए अधिक काम के बराबर पैसे नहीं दिए गये तो वे हड़ताल करेंगे।

जबकि नोटबंदी की वजह से अधिकांश लोगों को “लंबे समय के लिये कष्ट” हुआ है, कुछ खास वर्गों के लिए इसका अल्पकालीन और दीर्घकालीन फायदा हुआ है। सरकार ने जानबूझकर अर्थव्यवस्था में नगदी की कमी की स्थिति पैदा कर दी है ताकि लोग डिजिटल लेन-देन की ओर मुड़ने के लिए मजबूर हो जायें।

भारतीय रिज़र्व बैंक (आर.बी.आई.) की 2016-17 की वार्षिक रिपोर्ट में बताया गया है कि अर्थव्यवस्था में नगदी की मात्रा को 20 प्रतिशत कम कर दिया गया है। नोटबंदी से पहले यह आंकड़ा 16.41 लाख करोड़ था, जो अब घटकर 13.10 लाख करोड़ हो गया है। पिछले कई वर्षों से अर्थव्यवस्था में रुपये का चलन लगातार बढ़ता आया है। 2014-15 में यह 11 प्रतिशत से बढ़ा तो 2016-17 में इसमें 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी।

नोटबंदी के बाद सरकार ने अर्थव्यवस्था में नगदी के चलन पर कई पाबंदियां लगायी हैं। अप्रैल 2017 से 2 लाख से अधिक के लेन-देन को नगदी से करने पर रोक लगायी गई है। अप्रैल 2017 से स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एस.बी.आई.) ने महीने में तीन से अधिक बार नगदी जमा करने पर शुल्क लगाना शुरू कर दिया है। एच.डी.एफ.सी. बैंक महीने में केवल तीन बार नगदी जमा करने या निकालने की इज़ाज़त देता है, और उसके बाद हर एक लेन-देन पर 150 रुपये का शुल्क वसूलता है।

हिन्दोस्तानी और विदेशी इज़ारेदार पूंजीपति इसे एक सुनहरे मौके के रूप में देखते हैं जहां वे लोगों को डिजिटल भुगतान व्यवस्था अपनाने के लिए मजबूर कर सकते हैं, जिसमें उनके लिए भारी मुनाफे़ की संभावना है। इज़ारेदार पूंजीपतियों द्वारा इस संभावना को मूर्त रूप देने और उससे मुनाफ़े बनाने के लिए ज़रूरी है कि कम से कम 50 करोड़ हिन्दोस्तानी लोग नगदी के लेन-देन को छोड़ दें और डिजिटल भुगतान के किसी न किसी तरीके को अपनायें। हिन्दोस्तान के अधिकांश लोगों को इस बात के लिये तैयार करने में बहुत समय लग सकता था, इसलिये इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों ने यह फैसला किया कि डिजिटल लेन-देन को तेज़ी से आगे बढ़ाने के लिए लोगों के हाथों से नगदी ही छीन ली जाये।

हिन्दोस्तान के वित्तमंत्री और उनके सहयोगियों का नया मंत्र है “नगदी-विहीन अर्थव्यवस्था”। यह इज़ारेदार अरबपतियों के हित में हिन्दोस्तानी और अंतर्राष्ट्रीय वित्त संस्थानों का अजेंडा है। ऐसा बताया जाता है कि नगदी-विहीन अर्थव्यवस्था सभी के हित में है, जबकि इस बात को छुपाया जाता है कि ऐसी व्यवस्था के सबसे बड़े लाभकारी दुनियाभर के बड़े-बड़े अरबपति पूंजीपति हैं।

इसी मकसद को हासिल करने के लिए सितंबर 2012 में “बैटर दैन कैश अलायन्स” (“नकद से बेहतर गठबंधन”) बनाया गया, जिसका काम था नगदी भुगतान पर आधारित अर्थव्यवस्था को डिजिटल अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए “रणनैतिक प्रचार, शोधकार्य और दिशा निर्देश” प्रदान करना।

संयुक्त राष्ट्र संघ कैपिटल डेवलपमेंट फण्ड का दफ्तर “बेटर दैन कैश अलायन्स” के सचिवालय के रूप मंे काम करता है। “बैटर दैन कैश अलायन्स” के लिये बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन, सिटी बैंक, फोर्ड फाउंडेशन, मास्टर कार्ड, ओमीदयार नेटवर्क, यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यू.एस.एड) और वीसा इंक, इत्यादि संगठन धन देते हैं। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि यूरोप के सबसे बड़े बैंकों के मुख्य कार्यकारी अफसरों ने ऐसा अनुमान लगाया है कि आने वाले 10 वर्षों में दुनिया से नगदी का अस्तित्व मिट जाएगा।

ऐसा माना जाता है कि 14 अक्तूबर, 2017 को यू.एस.एड और मोदी सरकार के बीच, “कैटेलिस्ट: समावेशी नगदी-विहीन भुगतान सांझेदारी” (“कैटेलिस्ट: इंक्लूसिव कैशलेस पेमेंट पार्टनरशिप”) पर समझौता हुआ। यू.एस.एड इस परियोजना का खर्च तीन वर्षों तक उठाता रहेगा। कैटेलिस्ट के सदस्यों में एच.डी.एफ.सी. बैंक, आई.सी.आई.सी.आई. बैंक, गेट्स फाउंडेशन (माइक्रोसॉफ्ट), ओमीदयार नेटवर्क (इ-बे), डैल फाउंडेशन, मास्टर कार्ड, वीसा, मेटलाइफ फाउंडेशन, इत्यादी शामिल हैं। कैटेलिस्ट “बेटर देन कैश अलायन्स” का हिस्सा है। इस गठबंधन को विश्व बैंक का पूरा समर्थन है। बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सी.ई.ओ. के वक्तव्य का हवाला देते हुए विश्व बैंक की प्रेस रिलीज में कहा गया है कि:

“डिजिटल वित्तीय व्यवस्था को विकसित करने के लिए सरकारों को नेतृत्व देना होगा और उसको ज़ोर देकर आगे चलाना होगा... हम चाहते हैं कि करोड़ों लोगों को इस आधुनिक अर्थव्यवस्था में शामिल करने के लिए सरकारों को एक नज़रिया पेश करना चाहिए, डिजिटल प्लेटफार्म और नियामक गारंटी बनानी चाहिए”

बिल गेट्स ने व्यक्तिगत तौर से नोटबंदी का समर्थन किया था। बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाऊंडेशन का हिन्दोस्तान के निदेशक रिज़र्व बैंक के बोर्ड में सदस्य है, जिसने 8 नवंबर की अपनी बोर्ड मीटिंग में नोटबंदी को मंजूरी दी, उसके बाद ही प्रधानमंत्री के इसकी घोषणा की।

एक संपूर्ण नगदी-विहीन समाज में, राज्य यह जान पायेगा कि किसी भी वक्त कौन कहां है, और क्या कर रहा है। एक नगदी-विहीन समाज में काम करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को राज्य द्वारा बनाये गए सारे नियमों का पालन करना पड़ेगा। यदि सभी या अधिकांश लेन-देन का रिकॉर्ड होगा तो ज्यादा लोगों से टैक्स की वसूली करने की और उनपर सेवा शुल्क लागू करने की संभावना बढ़ जाएगी। विशाल डेटाबेस जिसमें हर एक व्यक्ति की जानकारी जमा होगी, उसका इस्तेमाल लक्षित विज्ञापन और राजनीतिक प्रचार के लिये किया जा सकेगा।

नोटबंदी का असली मकसद यह था कि हम अपनी सारी नगद पूंजी को बैंकों में जमा कर दें और डिजिटल भुगतान के तमाम तरीकों की ओर बढ़ें। इसीलिए लोगों को बंद किये गए पुराने नोटों की जगह पर नए नोटों को लेने से रोका गया और सारी नगदी को बैंकों में जमा करने के लिए उनको मजबूर किया गया। रिज़र्व बैंक द्वारा किये गए शोध से पता चलता है कि नोटबंदी के दौरान बैंकों में 2.8-4.3 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि जमा हुई है। नोटबंदी का मकसद था इज़ारेदार पूंजीपतियों को और मजबूत करना ताकि वे और व्यापक तथा असरदार तरीके से लोगों को लूट सकें।

प्रधानमंत्री ने नोटबंदी को भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ़ धर्मयुद्ध के रूप में पेश किया था। उन्होंने दावा किया था कि नोटबंदी का मकसद है भ्रष्टाचारियों की तिजोरियों से कालाधन निकाल कर लोगों के कल्याण के लिए इस्तेमाल करना। उन्होंने लोगों से अपील की थी कि इस पवित्र काम के लिए, लोग केवल 50 दिन तक तकलीफ़ बर्दाश्त कर लें। उन्होंने दावा किया कि नोटबंदी से बड़े पैमाने पर “कालाधन” खत्म कर दिया जायेगा। उनकी सरकार के कई लोगों ने दावा किया कि अर्थव्यवस्था से एक-तिहाई से भी अधिक नगदी निकाल दी जाएगी, क्योंकि जिन अमीरों के पास कालाधन है, वे या तो उसको ऐसा ही छोड़ देंगे या फिर उसे नष्ट कर देंगे, लेकिन इस बात को स्वीकार नहीं करेंगे कि उन्होंने रुपयों की जमाखोरी की है।

30 अगस्त, 2017 को जारी की गयी रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट ने इस बनावटी कहानी को भी धराशायी कर दिया, जिसका इस्तेमाल नोटबंदी के पक्ष में, लोगों का समर्थन प्राप्त करने के लिए किया गया था। रिज़र्व बैंक की रिपोर्ट ने इस बात का पर्दाफाश कर दिया और बताया कि 15.28 लाख करोड़ मूल्य के बंद किये गये नोट यानी करीब 89.96 प्रतिशत नोट बैंकों में वापस आ गए हैं। इसके अलावा रिज़र्व बैंक ने जुलाई 2016 से जून 2017 के बीच नए नोटों को छापने के लिए 7965 करोड़ रुपये खर्च किये हैं। यह 16000 करोड़ रुपये का करीब आधा हिस्सा है, जिसे रिज़र्व बैंक नोटबंदी से हुए फायदे के रूप दिखा रहा है।

जब रिज़र्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट में इसका पर्दाफाश हो गया तो वित्त मंत्री ने अपने सारे पुराने तर्क वापस ले लिए। उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष की गयी नोटबंदी का मकसद कालेधन को ज़ब्त करना नहीं था। आखिर में उन्होंने नोटबंदी के “असली मकसद” का खुलासा कर ही दिया। “ज्यादा करदाता बनाना, कर इकट्ठा करने का व्यापक आधार बनाना, अधिक डिजिटलीकरण करना, अर्थव्यवस्था में कम नगदी, औपचारिक और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का विलयन - ये सारे नोटबंदी के लक्ष्य थे। हमारा यह मानना है कि इन सभी क्षेत्रों में नोटबंदी का असर बेहद सकारात्मक रहा है।”

भाजपा अध्यक्ष आमित शाह ने 9 सितम्बर को फिक्की की एक सभा को संबोधित करते हुए इन “नए” लक्ष्यों का समर्थन किया और कहा कि: “मेरा यह मानना है कि नोटबंदी की वजह से औपचारिक अर्थव्यवस्था की बढ़ोतरी हुई है। जो पैसा लोगों के पास पड़ा हुआ था वह अब अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन गया है।”

कालेधन को ज़ब्त करना और भ्रष्टाचार को मिटाना, ये कभी भी नोटबंदी के मकसद नहीं थे। मौजूदा हिन्दोस्तानी राज्य में भ्रष्टाचार इस हद तक पैठा हुआ है कि इसे किसी भी भ्रष्टाचार-विरोधी मुहिम से खत्म करने का दावा करना ही एक बड़ा धोखा है। लोकसभा में उठाये गए सवालों का जवाब देते हुए सरकार ने बताया कि 8 नवंबर से 30 दिसंबर के बीच 1.48 लाख लोगों ने 80 लाख या उससे भी अधिक मूल्य के बंद किये गये नोट जमा किये। इस हिसाब से इन लोगों ने कुल मिलाकर 4.3 लाख करोड़ रुपये जमा किये, जो कि कुल जमा की गयी रकम का एक-तिहाई हिस्सा है। यदि सरकार काले धन के बारे में गंभीर होती तो वह केवल इन 1.5 लाख लोगों के पैसों के स्रोत के बारे में जांच पड़ताल करती।

भ्रष्टाचार के खिलाफ़ धर्मयुद्ध होना तो दूर, नोटबंदी अपने आप में महा-भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा मामला है, क्योंकि इतना बड़ा सार्वजनिक फैसला तंग निजी हितों के लिए लिया गया था। इस फैसले की पूरी योजना बनायी गयी और इसका असली लक्ष्य हासिल करने के लिए उसको अचानक अमल में लाया गया। नोटबंदी का फैसला हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों और उनकी संस्थाओं की मांग पर और उनके दबाव में लिया गया, लेकिन उसे लोक-परस्त धर्मयुद्ध के रूप में पेश किया गया।

प्रधानमंत्री के नोटबंदी के समर्थन में एक और तर्क दिया और कहा कि इसका लक्ष्य है अर्थव्यवस्था से नकली नोटों को खत्म करना, जिसका इस्तेमाल विदेशी शक्तियां हिन्दोस्तान में आतंकवादी कार्यवाही को अंजाम देने के लिए करती हैं। लेकिन यह तर्क भी केवल नोटबंदी के पक्ष में समर्थन जुटाने के लिए दिया गया था, क्योंकि सरकार के अपने अनुमान के मुताबिक कुल 15 लाख करोड़ रुपयों के नोट थे जिन्हें बंद किया गया था, उनमें से केवल 400 करोड़ रुपये के नोट ही नकली थे। इस दावे का खोखलापन तब खुलकर सामने आया जब रिज़र्व बैंक ने बताया कि 2016-17 के दौरान जमा किये गए 500 और 1000 के नकली नोटों का कुल मूल्य केवल 41 करोड़ रुपये ही था।

आतंकवाद और भ्रष्टाचार को मिटाना, यह कभी भी नोटबंदी का असली मकसद नहीं था। उसका असली मकसद था अपनी सारी जमा पूंजी को बैंकों में जमा करने और डिजिटल लेन-देन की ओर बढ़ने के लिये लोगों को मजबूर करना, जिससे सबसे बड़े और सबसे अमीर पूंजीपतियों को फायदा हो सके। जैसे कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी द्वारा जनवरी 2017 में प्रकाशित पुस्तिका “नोटबंदी के असली इरादे और झूठे दावे” में बताया गया है कि हिन्दोस्तानी राज्य बर्तानवी बस्तीवाद की विरासत है, यही तमाम भ्रष्टाचार की जड़ है। इस राज्य के सभी अंग ऊपर से नीचे तक पूरी तरह से भ्रष्ट हैं। उस पुस्तिका में यह भी बताया गया है कि आतंकवाद का सामना करने के सभी दावे लोगों के साथ धोखा हैं - जब तक कि इनका निशाना अमरीकी साम्राज्यवाद पर न हो, क्योंकि अमरीकी साम्राज्यवाद और उसकी खुफिया एजेंसियां ही दक्षिण एशिया समेत पूरी दुनिया में, आतंकवादी गुटों और संगठनों की सबसे बड़ी प्रायोजक हैं और उनको पैसा देने वाली ताक़त हैं। द

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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