नागरिकता का सवाल

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 17/11/2017 - 02:30

26 जनवरी, 1950 में जबसे हिन्दोस्तानी गणराज्य का संविधान लागू हुआ है, उस वक्त से आज तक हिन्दोस्तानी राज्य ने नागरिकता के सवाल पर जो भूमिका अपनाई है, वह उसके सांप्रदायिक नज़रिये का पर्दाफाश करती है। हिन्दोस्तानी राज्य ने लोगों के बीच सांप्रदायिक और गुटवादी उन्माद भड़काने और लोगों की एकता पर हमला करने के लिए नागरिकता के सवाल का सुनियोजित तरीके से इस्तेमाल किया है। हिन्दोस्तान के तमाम राष्ट्रों और लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों के संघर्षों को भटकाने और उनको तोड़ने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य ने नागरिकता के मुद्दे का इस्तेमाल किया है। 

असम में नागरिकों का राष्ट्रीय पंजीकरण और “डी वोटर्स”

असम विधान सभा के लिए हुए पिछले चुनावों में भाजपा ने नेशनल रजिस्ट्री ऑफ सिटीजन्स (एन.आर.सी.) (नागरिकों का राष्ट्रीय पंजीकरण) को पूरा करने और बांग्लादेश से आप्रवासियों के गैर-कानूनी तरीके से असम में आने पर रोक लगाने के लिए, बांग्लादेश के साथ सीमा को पूरी तरह से बंद किये जाने को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया था।

कौन नागरिक है, इस सवाल पर असम में कई दशकों से बहस चलती आ रही है। यह बहस खास तौर से 1971 के बांग्लादेश युद्ध के दौरान चली जब असम और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर लोगों का आप्रवासन हुआ। इसके अलावा इससे पहले हिन्दोस्तान के बंटवारे के दौरान हिन्दोस्तान के उत्तर-पूर्व और पूर्वी इलाकों में बहुत से लोग आकर बसे थे।

असम समझौते के अनुसार (जो कि गैर-कानूनी आप्रवासियों के खिलाफ़ चले 6 वर्ष के लंबे खूनी संघर्ष के बाद 1985 में किया गया था), जो भी व्यक्ति 1 जनवरी, 1966 को या उसके बाद और 25 मार्च, 1971 को या उससे पहले असम में आये हैं और वहां निवास किया है, उन लोगों का नाम मतदाता सूची में शामिल किया जायेगा।

एन.आर.सी. में अपना नाम दर्ज़ करने और नागरिकता साबित करने के लिए कई दस्तावेज़ों की ज़रूरत पड़ती है जो आप्रवासी समुदायों के लिए पेश करना बहुत मुश्किल है। जो लोग अपनी नागरिकता साबित नहीं कर पाते उन्हें “डी वोटर्स” या संदिग्ध मतदाता या “संदिग्ध नागरिक” या “विदेशी” करार दिया जाता है। ऐसे लोगों को राज्य द्वारा चलाये जा रहे तथाकथित ‘निरोध केंद्र’ (डिटेंशन सेंटर) में भेजा जाता है। किसी भी पत्रकार या शोधकर्ता को इन लोगों से ‘निरोध केंद्र’ में मिलने की इजाज़त नहीं दी जाती है।

“डी वोटर्स” में से अधिकांश लोग बांग्लादेश से हैं और कुछ म्यांमार से हैं। बांग्लादेश इन लोगों को अपना नागरिक मानने से इंकार करता है। इनमें से बहुत से लोगों को यह पता ही नहीं है कि उनका मूल निवास कहां है।

जो लोग हिन्दोस्तान में “गैर-कानूनी” तरीके से रह रहे हैं उन लोगों के बारे में हिन्दोस्तान और बांग्लादेश के बीच प्रत्यर्पण संधि पर अभी तक हस्ताक्षर ही नहीं किये गए हैं।

1947 में सांप्रदायिक आधार पर बंटवारे के बाद दो अलग-अलग राज्य, हिन्दोस्तान और पाकिस्तान अस्तित्व में आये। इस बंटवारे के बाद पूरे उपमहाद्वीप में लोगों का बड़े पैमाने पर आप्रवासन हुआ। उनके पास जो कुछ था उसे पीछे छोड़कर उन्हें दूसरे देश जाने के लिये मजबूर होना पड़ा। वे कहां से आये हैं इसका कोई भी आधिकारिक दस्तावेज़ उनके पास नहीं था। 1971 में बांग्लादेश के बनने के बाद, एक बार फिर बड़े पैमाने पर बांग्लादेश से शरणार्थियों का आप्रवासन हुआ और ये लोग मुख्य तौर से असम गए। (देखिये बॉक्स: असम में नागरिकों का राष्ट्रीय पंजीकरण और “डी वोटर्स”)। हिन्दोस्तान और भी कई अन्य शरणार्थियों के लिए घर बना, जो बड़े पैमाने पर हिन्दोस्तान आये। इन लोगों में शामिल हैं तिब्बती, अफगानी और श्रीलंकाई शरणार्थी, जो किसी न किसी वजह से अपनी मातृभूमि को छोड़ने के लिए मजबूर हुये।

हिन्दोस्तान में आये अधिकांश शरणार्थी कई दशकों से बेहद ग़रीबी और बदहाली में जी रहे हैं, यहां उनको नागरिकता से वंचित रखा गया है। नागरिकता हासिल न होने से न तो उनको राज्य द्वारा कोई अधिकार दिए जाते हैं और न ही अन्य सुविधाएं। उनके पास काम करने के कानूनी परमिट भी नहीं हैं, वे गुलामों की तरह जीने के लिए मजबूर हैं और अत्यधिक शोषण के शिकार भी हैं। किसी भी वक्त “गैर-कानूनी” घोषित किये जाने, जेल में डाले जाने और निर्वासित किये जाने की तलवार उनके सिर पर हर समय लटकती रहती है। वे लोग अक्सर राज्य और उसकी एजेंसियों के हमलों का शिकार बनते हैं तथा राज्य उनका अपने हिसाब से इस्तेमाल करता है।

चकमा और हाजोंग लोगों के प्रति हिन्दोस्तानी राज्य का रवैया, उसकी इस शैतानी रणनीति की पुष्टि करता है। चकमा और हाजोंग शरणार्थी बांग्लादेश (जिसे पहले पूर्वी पाकिस्तान कहते थे) के चटगांव पहाड़ी क्षेत्र से आये हैं। पाकिस्तानी राज्य के हाथों उत्पीड़न से बचने के लिए वे हिन्दोस्तान में शरणार्थी बनकर आये। 1964 और 1969 के बीच हिन्दोस्तानी राज्य ने इन शरणार्थियों का अरुणाचल प्रदेश और असम में पुनर्वास किया। तब से हिन्दोस्तानी राज्य और उसकी अनेक राजनीतिक पार्टियों ने जानबूझकर अरुणाचल प्रदेश के जनजातीय लोगों और इन शरणार्थियों के बीच बंटवारे के बीज बोये हैं। अरुणाचल प्रदेश की सभी समस्याओं के लिए जानबूझकर इन शरणार्थियों को दोषी बताया गया है - फिर वे चाहे लकड़ी के व्यापारियों द्वारा बड़े पैमाने पर जंगलों को काटना हो या रोज़गार तथा आवास की कमी, इन सबका दोष उन शरणार्थियों के मत्थे मढ़ दिया जाता है।

आज पांच दशक बाद भी इन शरणार्थियों के पास नागरिकता नहीं है। कमेटी फॉर सिटीजनशिप राइट्स ऑफ द चकमा (चकमा लोगों के लिए नागरिकता के अधिकार की समिति) द्वारा सर्वोच्च अदालत में दायर की गई एक याचिका पर, अपना फैसला सुनाते हुए सितम्बर 2015 में सर्वोच्च अदालत ने सरकार को आदेश दिया कि तीन महीने के भीतर चकमा लोगों को नागरिकता प्रदान की जानी चाहिए। लेकिन अरुणाचल प्रदेश की सरकार, अरुणाचल प्रदेश की राजनीतिक पार्टियों और ऑल अरुणाचल प्रदेश स्टूडेंट यूनियन (ए.ए.पी.एस.यू.) सहित कई जन संगठनों ने अदालत के इस आदेश का विरोध किया है।

सर्वोच्च अदालत द्वारा दिए गए इस आदेश के 2 वर्ष बाद 13 सितम्बर, 2017 को केंद्र सरकार ने ऐलान किया कि चकमा और हाजोंग शरणार्थियों को “सीमित नागरिकता” दी जाएगी। इनको ज़मीन का मालिक बनने का अधिकार नहीं होगा। केंद्र सरकार के इस फैसले के खिलाफ़ फिर से अरुणाचल प्रदेश में जन-प्रदर्शन शुरू हो गए, इस आदेश के एक ही सप्ताह बाद 19 सितम्बर को सरकार ने सर्वोच्च अदालत को बताया कि एक लाख चकमा और हाजोंग लोगों को नागरिकता दिए जाने का सर्वोच्च अदालत का फैसला “अमल में नहीं लाया जा सकता है”।

नागरिकता अधिनियम-1955

हिन्दोस्तान में नागरिकता को, ‘नागरिकता अधिनियम- 1955’ में जन्म के आधार पर नागरिकता और देशीकरण के आधार पर नागरिकता, के रूप में परिभाषित किया गया है।

इस अधिनियम के अनुसार, देशीकरण के आधार पर नागरिकता हासिल करने के लिए हिन्दोस्तान में लगातार 11 वर्षों तक निवास करना ज़रूरी है। यह अधिनियम किसी भी गैर-कानूनी आप्रवासी को नागरिकता से वंचित करता है। ‘गैर-कानूनी आप्रवासी’ की परिभाषा इस तरह दी गयी है कि - (1) हिन्दोस्तान में बिना किसी वैध पासपोर्ट के या फर्ज़ी दस्तावेज़ के साथ दाखिल होना, (2) जो व्यक्ति वीसा परमिट की समय सीमा के बाद भी हिन्दोस्तान में रहते हैं।  

जुलाई 2016 में लोकसभा में पेश किये गए नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 में अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आये हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और इसाई धर्म के गैर-कानूनी आप्रवासियों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान प्रस्तावित किया गया है। इन आप्रवासियों के लिए देश में लगातार आवास की अवधि को भी 11 वर्ष से घटाकर 6 वर्ष करने का प्रस्ताव है। यह अधिकार इन तीन पड़ोसी देशों से आये मुसलमान धर्म के लोगों और यहूदी, बहाई, इत्यादि जैसे अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों को नहीं दिए गए हैं।

यह संशोधन खुल्लम-खुल्ला सांप्रदायिक है। इस संशोधन का मकसद है असम, बंगाल और अन्य राज्यों में राजनीतिक माहौल को और अधिक सांप्रदायिक बनाना। राज्य द्वारा प्रायोजित कई संगठन इस विधेयक के समर्थन में रैलियां आयोजित कर रहे हैं और ऐसा प्रचार कर रहे हैं कि बांग्लादेशी हिन्दू आप्रवासियों को नागरिकता दी जाएगी। असम के कई अन्य संगठन इन संशोधनों का विरोध कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि इस संशोधन से 1.5 लाख ऐसे हिन्दू बांग्लादेशियों को नागरिकता मिल जाएगी जिनके पास उचित दस्तावेज़ नहीं हैं। ये संगठन केंद्र सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि सरकार 1985 के असम समझौते का उल्लंघन कर रही है, जिसमें यह कहा गया है कि जो कोई 24 मार्च, 1971 के बाद बांग्लादेश से हिन्दोस्तान में आये हैं, वे सब “गैर-कानूनी आप्रवासी” हैं।

यह सब कुछ पहली बार नहीं हो रहा है कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक 2016 के द्वारा, धर्म के आधार पर नागरिकता तय करने की कोशिश की जा रही है। संविधान के अनुच्छेद 6 और 7 धर्म के आधार पर भेदभाव करते हैं। अनुच्छेद 6 उन लोगों को नागरिकता प्रदान करता है जिन्होंने बंटवारे के बाद हिन्दोस्तान में आप्रवासन किया, जबकि अनुच्छेद 7 ऐसे लोगों को नागरिकता प्रदान करता है जो बंटवारे की घोषणा के बाद पाकिस्तान चले गए, लेकिन उसके बाद हिन्दोस्तान वापस लौट आये।

जबकि अनुच्छेद 6 पाकिस्तानी हिन्दुओं के लिए लागू होता है जो हिन्दोस्तान आ गए थे, अनुच्छेद 7 उन हिन्दोस्तानी मुसलमानों के संदर्भ में है जो बंटवारे की हिंसा के दौरान पाकिस्तान चले गए लेकिन बाद में अपने घर लौट आना चाहते थे। इस दूसरी श्रेणी में आने वाले लोगों को हिन्दोस्तान में आने के लिए पंजीकरण की एक लम्बी प्रक्रिया का सामना करना पड़ा, और नागरिकता मिलने से पहले उनको बहुत सताया गया। यह सब इसलिए लिए किया गया क्योंकि तथाकथित रूप से “उनकी वफादारी पर यकीन नहीं किया जा सकता”।

जन्म के आधार पर नागरिकता की परिभाषा देने वाले खंड को 1987 में संशोधित किया गया और कहा गया कि जुलाई 1987 से पहले हिन्दोस्तान में जन्म लेने वाला हर एक व्यक्ति हिन्दोस्तान का नागरिक है। उसके बाद 2004 में फिर से इसमें संशोधन किया गया और 1987 से 2004 के बीच पैदा हुए व्यक्तियों को भी नागरिक घोषित किया गया, यदि उनके पालकों (माता या पिता) में से कोई एक हिन्दोस्तानी नागरिक है। लेकिन 2004 के बाद पैदा हुये व्यक्ति को नागरिकता से वंचित कर दिया गया यदि उसके पालकों (माता या पिता) में से कोई एक “गैर-कानूनी आप्रवासी” है, फिर भले ही दूसरा पालक हिन्दोस्तान का नागरिक क्यों न हो। लेकिन दूसरी ओर वे लोग जिनको नागरिकता अधिनियम के तहत जन्म के आधार पर नागरिक माना जाना चाहिए जैसे चकमा, हाजोंग, तिब्बती और बांग्लादेश से आये कई आप्रवासी, उन लोगों को आज भी नागरिकता से वंचित किया जाता है।

निष्कर्ष

फिर चाहे वह जन्म के आधार पर नागरिकता का सवाल हो या देशीयकरण के आधार पर, हिन्दोस्तानी राज्य का नज़रिया हमेशा से पूरी तरह सांप्रदायिक रहा है। हिन्दोस्तानी राज्य ने हमेशा से लोगों के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव किया है।

बंटवारे से पहले अखंडित हिन्दोस्तान कई राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों की धरती रहा है। हिन्दोस्तान के बंटवारे के साथ पंजाब और बंगाल इन दो बड़े राष्ट्रों को जबरदस्ती बांट दिया गया। बड़े सरमायदारों के हितों में हिन्दोस्तान का केंद्रीय राज्य सभी राष्ट्रों और लोगों का बर्बर शोषण और दमन करता है। यह खास तौर से असमिया लोगों, मणिपुरी लोगों और उत्तर-पूर्व के लोगों का बर्बर शोषण और उनकी लूट और राष्ट्रीय दमन करता आया है। केंद्रीय राज्य द्वारा किये जा रहे उनके इस शोषण और दमन के खिलाफ़ उत्तर-पूर्व के लोग कई दशकों से लड़ते आये हैं। उत्तर पूर्व के लोगों की समस्या के स्रोत इस राज्य, से लोगों के ध्यान को हटाने और उनके संघर्ष को भटकाने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य उनके आंदोलन के बीच जानबूझकर सांप्रदायिक और गुटवादी बंटवारा थोपता आया है। केंद्रीय राज्य ने अपने इस शैतानी खेल में बांग्लादेश से आये आप्रवासियों को शतरंज के मोहरों की तरह इस्तेमाल किया है।

हमारे देश में मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया के चलते लोगों को सत्ता से और फैसले लेने की प्रक्रिया से दरकिनार कर दिया गया है। जाति, धर्म, जातीय मूल इत्यादि के आधार पर लोगों को “विशेष हितों वाले गुटों” में बांट दिया गया है। राजनीतिक पार्टियां इन “विशेष हितों वाले गुटों” से इसी आधार पर वोट बटोरती हैं और अपने राजनीतिक हितों को हासिल करने के लिए लोगों के बीच बंटवारे को और अधिक गहरा बनाती जाती हैं। इससे लोग राजनीतिक सत्ता से और ज्यादा दरकिनार होते जाते हैं।

वे सारे कारक जो नागरिक की आधुनिक परिभाषा को धुंधला बनाने का काम करते हैं, जो ऐसा विचार फैलाते हैं कि किसी व्यक्ति की पहचान उसकी नागरिकता के अलावा किसी और आधार पर की जानी चाहिए, ये सारे कारक जनतंत्र के नवीकरण के संघर्ष के रास्ते में एक रोड़ा हैं।

वेबस्टर अंग्रेजी शब्दकोष के अनुसार “नागरिक” राज्य का ऐसा सदस्य है, जिसे सारे राजनीतिक अधिकार हासिल हैं। जब कोई यह कहता है कि कोई व्यक्ति किसी देश का नागरिक है, तो यह वाक्य एक राजनीतिक बयान है।

नागरिकता को राष्ट्रीयता, धर्म, भाषा या जातीय मूल के साथ भ्रमित नहीं किया जाना चाहिए। किसी एक राज्य या राजनीतिक व्यवस्था में एक से अधिक राष्ट्रीयता, धर्म, भाषा या जातीय मूल के लोग एक साथ हो सकते हैं। कोई भी नागरिक किसी भी जातीय या राष्ट्रीय पृष्ठ-भूमि से आ सकता है, किसी भी धर्म को मानने वाला हो सकता है, किसी भी लिंग का हो सकता है, किसी भी देश में पैदा हुआ हो सकता है या फिर आप्रवासी हो सकता है। किसी व्यक्ति का नागरिक होने का मतलब है उस राजनीतिक व्यवस्था के तहत, उसके बराबर के अधिकार हैं और कर्तव्य भी हैं।

राजनीतिक सत्ता, यानी कि राज्य को अपने सभी नागरिकों के हितों का प्रतिनिधित्व करना चाहिए। किसी भी देश का बुनियादी कानून, यानी उसके संविधान को हर एक नागरिक के लिए बराबरी का दर्ज़ा और बराबरी के अधिकार और कर्तव्यों की गारंटी देनी चाहिए। किसी भी नागरिक की पहचान केवल इस बात से तय की जानी चाहिए कि वह व्यक्ति उस राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा है। इसके अलावा कोई और आधार नहीं हो सकता।

मौजूदा हिन्दोस्तानी राज्य सभी नागरिकों के हितों का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। वह केवल बड़े इज़ारेदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करता है जो अन्य सभी हिन्दोस्तानी लोगों के हितों को कुचल रहे हैं। लोगों के जनसमुदायों को “गैर कानूनी आप्रवासी” घोषित करते हुए उनको नागरिकता से वंचित करना, यह काम हुक्मरान सरमायदारों द्वारा मेहनतकश लोगों को बांटने और अपने राज को बरकरार रखने के लिए किया जाता है।

आज हिन्दोस्तान का एक नयी बुनियाद पर पुनर्गठन करने की ज़रूरत है, जहां राज्य हक़ीक़त में सभी नागरिकों के हितों का प्रतिनिधित्व करेगा और सभी के लिए बराबर अधिकारों की गारंटी देगा।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

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