कर्ज़ माफ़ी और सार्वजनिक खरीदी की मांग पूरी तरह से जायज़ है! किसानों की सुरक्षा और खुशहाली सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है! यह कोई एहसान नहीं, जो करे हम पर कोई सरकार! सुरक्षित आजीविका है, हमारा बुनियादी अधिकार!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी का आह्वान, 20 नवंबर 2017

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बुलावे पर आज देशभर के किसान दिल्ली में इकट्ठा हुए हैं। उनकी मांगों में शामिल हैं - बैंकों द्वारा दिए गए कर्ज़ों की एक बार में पूरी माफ़ी और सार्वजनिक खरीदी व्यवस्था के माध्यम से सभी फसलों की लाभकारी मूल्यों पर खरीदी की गारंटी। उनकी ये मांगें पूरी तरह से जायज़ हैं। सभी किसानों के लिए सुरक्षित आजीविका सुनिश्चित करने और देश को कृषी संकट से उबारने के लिए इन मांगों को पूरा करना बेहद ज़रूरी है।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सभी राजनीतिक पार्टियों और मज़दूरों, महिलाओं व नौजवानों के सभी जन संगठनों से यह आह्वान करती है कि वे अपने देश के किसानों की इन मांगों का पूरा समर्थन करें।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि किसानों का यह जनप्रदर्शन, 9 से 11 नवंबर के बीच देशभर से आये मज़दूरों के तीन दिवसीय महापड़ाव के तुरंत बाद हो रहा है। मज़दूरों के इस महापड़ाव के आयोजक, मज़दूरों के सर्व-हिन्द सम्मलेन, ने किसानों के आंदोलन और उनकी मांगों को पूरा समर्थन दिया था। यह हमारे देश के सभी मेहनतकश लोगों के बुनियादी अधिकारों की हिफ़ाज़त में मज़दूरों और किसानों की बढ़ती एकता को दिखाता है।

प्रधानमंत्री मोदी यह दावा करते हैं कि उनकी सरकार किसानों की आय को दुगना करने के लिए बहुत मेहनत से काम करती आयी है। लेकिन हम जो नतीजा देखते हैं वह इससे ठीक विपरीत है। हमारे देश के गरीब और मंझोले किसानों के हालात इतने दयनीय हैं कि उनके बच्चे खेती छोड़ देना चाहते हैं। यहां तक कि जिन किसानों की हालत बेहतर समझी जाती है, उनकी कुल आय भी पिछले कुछ वर्षों से लगातार गिरती जा रही है। हालात इतने बुरे हैं कि तथाकथित समर्थन मूल्य उत्पादन की कीमत से भी नीचे गिर गए हैं। किसानों की आय दोगुनी नहीं हो रही है, उनके कर्ज़े दोगुने हो रहे हैं। तंग होकर बहुत से किसानों ने अपनी फसल को सड़कों पर फेंक दिया है। हर साल अनेक किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो जाते हैं।

भाजपा, कांग्रेस तथा अन्य पार्टियों की सरकारें किसानों की जायज़ मांगों को पूरा करने से इसलिए इनकार कर रही हैं क्योंकि, ये सभी पार्टियां इज़ारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के प्रति समर्पित हैं। कृषि उत्पादन की लागत वस्तुओं और कृषि उत्पादों के व्यापार में राज्य की भूमिका और अधिक विस्तृत करने के बजाय, ये पार्टियां टाटा, बिरला, रिलायंस और अन्य इज़ारेदार पूंजीपति घरानों की कंपनियों के लिये स्थान बनाने में लगी हुई हैं ताकि इज़ारेदार पूंजीपति घराने इस व्यापार से अधिकतम मुनाफ़े बना सकें। उदारीकरणऔर न्यूनतम सरकारके नाम पर पूंजीपतियों की ये पार्टियां हिन्दोस्तानी इज़ारेदार पूंजीपति घरानों और मोनसांटो व अन्य विदेशी कृषि-व्यापार कंपनियों की लालच को पूरा करने की होड़ में लगी हुई हैं।

हिन्दोस्तानी राज्य इज़ारेदार पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफे़ की गारंटी के लिए काम करता है। किसानों को ऐसे बाज़ार में खुद अपने भरोसे जीनेके लिए छोड़ दिया जा रहा है जहां इन कंपनियों का बोलबाला है। व्यापार में उदारीकरण, जिसकी वजह से दुनियाभर में लाखों-करोड़ों किसान बर्बाद हुए हैं, हिन्दोस्तानी राज्य उसी रस्ते को सभी के विकासका रास्ता बताकर, बढ़ावा दे रहा है।

हमारे समाज में इस सिद्धांत को माना गया है कि जो ज़मीन जोतता है, उसकी देखभाल करना राज्य की जिम्मेदारी है। ज़मीन जोतने वाले के लिए सुरक्षित आजीविका उसका अधिकार है। समाज के लिए उनके महत्वपूर्ण योगदान को ध्यान में रखते हुए, किसानों की खेती के लिए सिंचाई और अन्य चीजों की आपूर्ति सुनिश्चित करना और उनकी देखभाल करना, राज्य की जिम्मेदारी है। लेकिन आज सत्ता में बैठा पूंजीपति वर्ग और उनकी सेवक सरकारें इस महत्वपूर्ण सिद्धांत को मिट्टी में मिला रही हैं।

पूंजीपतियों के प्रवक्ता दावा करते हैं कि यदि किसानों को उनकी फसल के लिए लाभकारी मूल्य दिया जाये तो इससे खुदरा दुकानों में अनाज की कीमतें बढ़ जाएंगी। यह एक सफेद झूठ है जिसका मकसद है लोगों को किसानों के खिलाफ़ भड़काना। असलियत तो यह है किसानों को अपनी फसल के लिए जो औसतन दाम मिलता है वह खुदरा दुकानों में बिकने वाले अनाज के दाम का एक चैथाई से भी कम होता है। इन दो दामों में इतना भारी अंतर इसलिए है क्योंकि इस अंतर का एक बड़ा हिस्सा निजी व्यापारी और बड़ी पूंजीवादी व्यापार कंपनियां हड़प लेती हैं।

किसानों को अपनी फसलों के लिए लाभकारी दाम देना बिलकुल संभव है। और खुदरा कीमत में कोई भी बढ़ोतरी किये बिना किसानों को मिलने वाले मूल्य को फसल के उत्पादन मूल्य का 1.5 गुना किया जा सकता है। लेकिन यह तभी संभव होगा जब कृषि के लिए ज़रूरी सामग्री की आपूर्ति और फसल की खरीदी के क्षेत्र से निजी व्यापारियों की हानिकारक भूमिका को खत्म कर दिया जायेगा।

ऐसा करने के लिए ज़रूरी है कि केंद्र और राज्य सरकारें तमाम खाद्य और गैर-खाद्य उत्पादों की सार्वजनिक खरीदी के लिए व्यवस्था बनाने का अपना फर्ज़ अदा करें। ऐसी व्यवस्था के तहत यह सुनिश्चित करना होगा कि कृषि के लिए लगने वाली सभी सामग्रियां किसानों को किफ़ायती दामों पर दी जाएं और सारी फसल को स्थिर और लाभकारी दाम पर सार्वजनिक एजेंसियों द्वारा खरीदा जाये। फसल की सार्वजनिक खरीदी व्यवस्था को सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के साथ जोड़ना होगा ताकि उपभोग की सभी चीजें किफ़ायती दामों पर सभी को उपलब्ध करवाई जा सकें। इसके लिए मज़दूरों और किसानों के संगठनों और देहातों व शहरों में लोगों की समितियों को इन सार्वजनिक व्यवस्था पर निगरानी रखनी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि निजी मुनाफ़ाखोर और भ्रष्ट अफ़सर इसमें सेंध न लगा पाएं।

रिज़र्व बैंक के गवर्नर और सरकार के प्रवक्ता यह दावा करते हैं कि बैंक व्यवस्था किसानों के सारे कर्ज़ों को माफ़ नहीं कर सकती। लेकिन कर्ज़ न चुकाने वाले बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों को डूबने से बचाने के लिए सरकार ने हजारों-करोड़ों रुपयों का इंतजाम अपने बजट में कर रखा है। कृषि व्यापार में बरसों से चल रही लूट से पूंजीपति वर्ग ने जो धन कमाया है, उसकी तुलना में किसानों की एक बार में पूरी कर्ज़ माफ़ी की मांग की रकम बहुत छोटी है।

आगे एक ही रास्ता है - किसान खुद अपनी संघर्षशील एकता और मज़दूरों के साथ अपनी एकता को मजबूत करें। ज़रूरी है कि मज़दूर और किसान एकजुट होकर अपने हाथों में राजनीतिक सत्ता लेने के लिए तैयारी करें, जैसे की सौ वर्ष पहले रूस के मज़दूरों और किसानों ने किया था।

पूंजीवादी हुक्मरान वर्गों के खिलाफ़ मज़दूर-किसान गठबंधन का निर्माण करने और उसको मजबूत करने के लिए हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सभी कम्युनिस्टों और तमाम जन संगठनों के साथ एकजुट होकर काम करने के लिए वचनबद्ध है। आओ, हम सब मिलकर पूंजीवादी राज को खत्म करने और अपने देश में मज़दूरों और किसानों का राज स्थापित करने के लिए इंक़लाब की तैयारी करें!

इंक़लाब ज़िंदाबाद!

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पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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