पुणे में दलितों पर हिंसा : जाति के आधार पर अत्याचार और जातीय दंगे आयोजित करने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य ही ज़िम्मेदार है

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 10 जनवरी, 2018

3 जनवरी को महराष्ट्र में, विभिन्न दलित संगठनों द्वारा आयोजित राज्य-व्यापी बंद में लाखों लोगों ने हिस्सा लिया।

1 जनवरी, 2018 को पुणे जिले के भीमा कोरेगांव में, एक शहीद स्तम्भ पर एकत्रित दलितों पर क्रूर हमलों के विरोध में यह बंद आयोजित किया गया था। कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, दलितों पर किये गए क्रूर हमलों की कड़ी निंदा करती है। इज़ारेदार पूंजीपतियों की मीडिया द्वारा सरासर झूठा प्रचार किया जा रहा है - हिंसा के शिकार लोगों को ही हिंसा के लिए ज़िम्मेदार कहा जा रहा है। दलितों के खिलाफ़ हो रहे जातीय अत्याचारों के विरोध में जो लोग अपनी आवाज़ उठा रहे हैं, उनको राष्ट्रीय एकता का दुश्मन बताकर, उनके खिलाफ़ झूठा प्रचार किया जा रहा है। और जिन्होंने दलितों के ऊपर हमला किया उनको देशप्रेमी जैसे पेश किया जा रहा है। विडम्बना तो यह है कि राज्य ने देश में दलितों पर हो रहे अत्याचारों और हिंसा के खिलाफ़ नौजवान छात्रों द्वारा आयोजित मीटिंगों और रैलियों पर प्रतिबन्ध लगाये हैं। उन पर इलजाम लगाया जा रहा है कि वे जातीय दंगों को बढ़ावा दे रहे हैं।

सभी सबूतों से यही संकेत मिलता है कि भीमा कोरेगांव में आयोजित दलित रैली पर हमला सुनियोजित था। इस तरह की बहुत सी खबरें हैं कि 1 जनवरी, 2018 की घटना के कम से कम दो हफ्ते पहले से, भाजपा से संलग्न कई संगठनों ने, जिन्होंने स्वयं अपने को “हिन्दुओं के समर्थक” और “हिन्दोस्तानी देशप्रेमी” होने का ऐलान किया था, उन्होंने खुल्लम-खुल्ला इस रैली के खिलाफ़ बहुत ही भड़काऊ प्रचार किया। इन सब संगठनों ने दलितों के खिलाफ़ अपने बयानों में ज़हर उगला और दूसरी जाति के लोगों को दलितों के खिलाफ़ भड़काया। महाराष्ट्र सरकार ने इस नफ़रतभरे अभियान को रोकने की कोई कोशिश नहीं की। महाराष्ट्र सरकार ने 1 जनवरी को, दलितों की रैली पर सुनियोजित हिंसा और हमलों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया।

भीमा कोरेगांव में हर साल 1 जनवरी को दलित सभा आयोजित की जाती है। ब्रिटिश बस्तिवादियों ने 1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना की पेशवा पर विजय की याद में वहां एक स्तम्भ की स्थापना की थी। उस स्तम्भ पर उन लोगों के नाम हैं जो ईस्ट इंडिया कंपनी की तरफ से लड़ते हुए मारे गये थे। कई दलितों के नाम भी इस सूची में हैं।

200 साल पहले हुई इस लड़ाई को, जिसमें बहुत से दलितों ने ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में लड़ते हुए अपनी जानें दी थीं, आज याद करने से, दलितों पर हो रहे अत्याचारों और हिंसा से मुक्ति संघर्ष में योगदान होगा या नहीं, इस मुद्दे पर अलग-अलग विचार हो सकते हैं। डॉ. अंबेडकर वहां गए थे और उन्होंने भीमा कोरेगांव की लड़ाई को जातीय अत्याचारों के खिलाफ़ विजय कहकर सराहा था। तब से आज तक महराष्ट्र के दलित आन्दोलन में यह मुद्दा एक विवाद का विषय रहा है। इस मुद्दे पर मतभेद हो सकते हैं, परन्तु इस विजय की याद में एकत्रित दलितों पर राज्य के द्वारा आयोजित आतंकी हमले को किसी भी तरीके से जायज़ नहीं कहा जा सकता।

यह हिन्दोस्तानी गणतंत्र, जिसका संविधान जातीय भेदभाव और हिंसा को नाजायज़ कहता है, इसमें दलितों का निरंतर दमन और अत्याचार एक ऐसा सच है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। अधिकांश दलित मज़दूर वर्ग का हिस्सा हैं। वर्गीय शोषण के साथ, उनको जातीय अत्याचार का भी सामना करना पड़ता है। जो मज़दूर सबसे निम्न श्रेणी के काम करते हैं, जैसे कि मरे हुए जानवरों की खाल उतारना और मल-जल की सफाई करना, उनमें से अधिकांश दलित हैं। दलितों पर अत्याचार की घटनाएं जैसे कि दलितों की हत्याएं, दलितों की बस्तियों को जला देना, दलित महिलाओं का बलात्कार, दलित नौजवानों की हत्या केवल इसलिए कि उन्होंने “ऊंची जाति” वालों से शादी की है, दलितों के जुलूसों पर हमले, अपने त्यौहारों को मनाने के लिये दलितों पर हमले, आदि अपने देश में आम बात हो गये हैं।

हिन्दोस्तानी राज्य दावा करता है कि वह दलितों के दमन और उनके खिलाफ़ होने वाले भेदभावों का विरोधी है और सभी तरह के जातीय भेदभावों का अंत करने के लिये वचनबद्ध है। हिन्दोस्तानी राज्य अन्य जातियों के लोगों के “पिछड़ेपन” को इस समस्या के लिए ज़िम्मेदार बताता है। यह एक सफेद झूठ है। इसका केवल एक ही मकसद है कि मेहनतकश लोगों और जातीय दमन और वर्गीय शोषण के खिलाफ़ प्रगतिशील ताक़तों की एकता को तोड़ना।

हिन्दोस्तानी राज्य 150 इज़ारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में, पूंजीपति वर्ग द्वारा हिन्दोस्तानी लोगों पर राज करने का एक साधन है। हिन्दोस्तानी राज्य ने जानबूझकर दलितों का दमन करने वाली इस घृणात्मक जातीय व्यवस्था को बरकरार रखा है ताकि मज़दूरों और किसानों को इस शोषण और दमन के राज को चुनौती देने से रोका जा सके और इस राज्य की हिफ़ाज़त की जा सके।

जातीय भेदभाव और दमन का अंत करने के कदम उठाना तो दूर, हिन्दोस्तानी राज्य ने जातियों के बीच मतभेदों को बढ़ावा देना, इसे राज करने के एक तरीके बतौर, संस्थागत बनाया है। इसी मकसद से जातियों के कुछ विशिष्ट लोगों के लिये राज्य में स्थान बनाया गया है। हिन्दोस्तानी राज्य ने “पिछड़ी जातियों को ऊपर उठाने” के नाम पर राज्य प्रशासन की नौकरियों में और सरकारी शिक्षा संस्थानों में विशेषाधिकार बांटने की ताक़त अपने पास रखी है। मेहनतकश लोगों में जाति के आधार पर फूट डालने के लिये इसी ताक़त का इस्तेमाल किया जाता है। शासक वर्ग की सभी राजनीतिक पार्टियां जाति और धर्म के आधार पर ही संगठित की जाती हैं। वे नियमित तौर पर इसी आधार पर लोगों की भावनाओं को भड़काती हैं और लोगों की इन्हीं पहचानों को और मजबूत करती हैं।

जाति और धर्म के आधार पर लोगों को बांटना तथा जानबूझकर उनके बीच मतभेदों को भड़काना ही उपनिवेशवादी हुकूमत की बुनियाद थी। उपनिवेशवादियों ने एक मनगढ़ंत सिद्धांत की रचना की, जिसके अनुसार, हिन्दोस्तान एक ऐसा देश है जिसमें लोग धर्म और जाति के आधार पर आपस में लड़ते हैं और इनको एक साथ रखकर शासन करने के लिये सत्ता को ऊपर से थोपना ज़रूरी है। अपने हित में बनाए इस मनगढ़ंत सिद्धांत के ज़रिये, उन्होंने हिन्दोस्तान को लूटने और अपने लोगों का शोषण व दमन करने को सही ठहराया। अपने देश में भक्ति लहर के दौरान, लोगों ने घृणित जातीय व्यवस्था के खिलाफ़ जो भी सफलताएं हासिल की थीं, उनको उपनिवेशवादियों ने जानबूझकर उलटाया। हिन्दोस्तानी लोग जिस जातीय व्यवस्था से घृणा करते थे, बर्तानवियों ने अपने राज को कायम रखने के लिये उसको संस्थागत किया। हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग आज भी उसी आधार पर मजदूरों और किसानों पर राज करता है।

इज़ारेदार पूंजीपति जो हिन्दोस्तानी राज्य का नेतृत्व करते हैं, वे दुनिया की बड़ी साम्राज्यवादी ताक़तों में गिने जाने के लिये एक बहुत ही ख़तरनाक रास्ते पर चल रहे हैं। इस रास्ते पर चलने से अपने लोगों को बहुत ही ख़तरनाक परिणाम भुगतने होंगे। लोगों को इस राष्ट्र-विरोधी और समाज-विरोधी रास्ते के खिलाफ़ अपनी एकता बनाने से रोकने के लिए, शासक वर्ग अपने लोगों में जाति और धर्म के आधार पर फूट डालने की कोशिश कर रहा है। वह लोगों की एकता और भाइचारे को तोड़ना चाहता है।

हिन्दोस्तान में जो संघर्ष चल रहा है वह जातियों के बीच संघर्ष नहीं है। इस संघर्ष में - एक तरफ हैं शोषण करने वाले, जिनका नेतृत्व हिन्दोस्तान के बड़े इज़ारेदार पूंजीपति करते हैं, और दूसरी तरफ हैं, शोषितों और दबे-कुचले लोग, जिनका नेतृत्व मज़दूर वर्ग करता है। दलितों पर हो रहे अत्याचारों के लिए दूसरी जातियों के मेहनतकश लोग ज़िम्मेदार नहीं है। इसके लिए ज़िम्मेदार है यह राज्य, जो इस पूंजीवादी व्यवस्था की हिफ़ाज़त करता है और जो इस जातीय दमन और अत्याचारों के लिए ज़िम्मेदार है।

इस जातीय भेदभाव और दमन का अंत करने के लिए, मेहनतकश लोग कांग्रेस पार्टी, भाजपा या शासक वर्ग की किसी अन्य पार्टी से उम्मीद नहीं रख सकते हैं। समाधान के लिये सभी मेहनतकश और दबे-कुचले लोगों को इस पूंजीवादी व्यवस्था और राज्य, जो इस व्यवस्था की हिफ़ाज़त करता है, इसको उखाड़ फेंकने के संघर्ष के लिए लामबंध करना होगा। इस संघर्ष का मकसद होना चाहिये कि मज़दूरों व किसानों का एक नया राज लायें, जो एक ऐसे नए संविधान पर आधारित होगा जिसमें सभी के लिए मानव अधिकारों की गारंटी होगी। जो यह सुनिश्चित करेगा कि जो लोग जाति के आधार पर भेदभाव और दमन करते हैं, उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा मिले।

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दलितों पर हिंसा    जातीय दंगे    Jan 16-31 2018    Statements    Communalism     Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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