रक्षा उत्पादन क्षेत्र के मज़दूरों ने निजीकरण का एकजुट होकर विरोध किया

11 जनवरी, 2018 को देशभर की 430 से अधिक रक्षा उत्पादन यूनिटों के चार लाख मज़दूरों ने दिनभर भूख हड़ताल की इस दौरान उन्होंने चाय भी नहीं पी। यह भूख हड़ताल निजीकरण को रोकने और रक्षा संस्थानों को बंद करने के ख़िलाफ़ और अपनी मांगों की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास थी।

इस हड़ताल का आयोजन रक्षा उत्पादन मज़दूरों की तीन मान्यता प्राप्त फेडरेशनों - आल इंडिया डिफेंस एम्प्लाइज़ फेडरेशन (ए.आई.डी.ई़.एफ.) इंडियन नेशनल डिफेन्स वर्कर्स फेडरेशन (आई.एन.डी.डब्ल्यू.एफ.) और भारतीय प्रतिरक्षा मज़दूर संघ (बी.पी.एम.एस.) के साथ-साथ 39 यूनियनों ने मिलकर किया। यह हड़ताल इन फेडरेशनों और यूनियनों द्वारा तय किए गए कार्यक्रम का हिस्सा थी। ए.आई.डी.ई.एफ., आई.एन.डी.डब्ल्यू.एफ. और बी.पी.एम.एस. इन तीनों फेडरेशनों ने अभी तक रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को चार संयुक्त ज्ञापन भेजे हैं। लेकिन सरकार ने अब तक उनके ज्ञापन को स्वीकार करने या फेडरेशनों को बातचीत के लिए आमंत्रित करने से इंकार किया है। इन फेडरेशनों ने 15 फरवरी को दिल्ली में संसद के सामने एक विशाल प्रदर्शन आयोजित करने और 15 मार्च को ध्यान-आकर्षण हड़ताल करने की चेतावनी सरकार को दी है।

राजग सरकार द्वारा देश की रक्षा के संबंध में लिये गये नीतिगत फैसलों तथा रक्षा उत्पाद क्षेत्र में की जा रही नौकरियों की कटौती पर, ये यूनियनें चिंता प्रकट करती आई हैं, इस नीति के अनुसार, 31,000 मज़दूरों को “बेशी” घोषित किया गया है। ये यूनियनें सरकार द्वारा रक्षा उपकरणों के उत्पादन का निजीकरण करने और 250 से अधिक वस्तुओं को “नॉन-कोर” करार देते हुए उनके उत्पादन की आउट-सोर्सिंग करके निजी कंपनियों को दिए जाने का भी विरोध करती आयी हैं। इन वस्तुओं के उत्पादन, युद्ध सामग्री का निर्माण करने वाली सरकार की 41 कंपनियों में किया जाता है। इसके अलावा सरकार द्वारा स्टेशन वर्कशॉप को बंद करने, सेना के वर्कशॉप को निजी ठेकेदारों को सौंपे जाने, सेना की 39 कृषि भूमियों और डिपुओं को बंद किये जाने और मिलिट्री इंजीनियर सर्विस (एम.इ.एस.) में नौकरियों को कम किये जाने के फैसले का भी सभी यूनियनें विरोध करती आई हैं। रक्षा के मामलों में डिफेन्स रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाईजेशन (डी.आर.डी.ओ.) और डायरेक्टरेट जनरल क्वालिटी अश्योरंस (डी.जी.क्यू.ए.) की भूमिका को कम किये जाने का भी ये फेडरेशनें विरोध कर रही हैं।

रक्षा क्षेत्र का निजीकरण सरकार के अजेंडे पर सबसे महत्वपूर्ण कार्यों में से एक है। हिन्दोस्तानी राज्य अमरीका, रूस, फ्रांस, इस्राइल और ब्रिटेन की हथियार बनाने वाली बहुराष्ट्रीय बड़ी इज़ारेदार कंपनियों से हर साल हजारों करोड़ों रुपये के हथियार और उपकरण खरीदता है। पिछले कुछ वर्षों से टाटा, बिरला, लार्सेन एंड टुब्रो, महिंद्रा, कल्याणी, अंबानी, अदानी जैसे हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीवादी इज़ारेदार घराने इस मुनाफे़दार क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए सरकार पर रक्षा खरीदी में नीतिगत बदलाव लाने के लिए दबाव डालते आ रहे हैं। हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीवादी इज़ारेदार घरानों के साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने की दिशा में हिदोस्तानी राज्य का सैन्यीकरण करना और रक्षा उत्पादन क्षेत्र का इन पूंजीवादी घरानों के लिए खोल दिया जाना, हमारे इस उप-महाद्वीप में शांति के लिए बेहद ख़तरनाक है।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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