नगालैंड: विधानसभा चुनावों के बहिष्कार के लिए आवाज़ें बढ़ती ही जा रही हैं

Election boycott declaration
नगालैंड विधानसभा चुनावों के बहिष्कार की घोषणा करते हुये नगा होहो

29 जनवरी, 2018 को नगालैंड की 11 चुनावी राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों ने ऐलान किया कि वे 27 फरवरी को होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों में अपना कोई भी उम्मीदवार खड़ा नहीं करेंगे। कोर कमेटी ऑफ नगालैंड ट्राइबल होहो एंड सिविल आर्गेनाईजेशन (सी.सी.एन.टी.एच.सी.ओ.) के साथ हुई बैठक के बाद जारी किये संयुक्त घोषणापत्र में कहा गया कि “सभी राजनीतिक पार्टियों और चुनाव में खड़े होने के इच्छुक सभी उम्मीदवारों की ओर से हम यह ऐलान करते हैं कि, लोगों की इच्छा को मद्देनज़र रखते हुए हम न तो किसी को चुनाव के लिए पार्टी का टिकट देंगे और न ही किसी को नामांकन भरने देंगे”।

“चुनाव से पहले समाधान” इस नारे के तहत सी.सी.एन.टी.एच.सी.ओ. अभियान चला रहा है और ये मांग कर रहा है कि लम्बे समय से चली आ रही नगा लोगों की आत्म-निर्धारण के अधिकार की मांग का राजनीतिक समाधान निकाला जाना चाहिए। इन 11 पार्टियों में नगा पीपल्स फ्रंट (एन.पी.एफ.), भारतीय जनता पार्टी, और कांग्रेस सहित नगालैंड में सक्रिय तमाम राज्य स्तरीय और सर्व हिन्द पार्टियों की नगालैंड इकाइयां शामिल हैं। (यह परिस्थति 1 फरवरी की है। अख़बार के प्रकाशन तक परिस्थिति में बदलाव आया है।)

सी.सी.एन.टी.एच.सी.ओ. ने यह ऐलान किया है कि वह 1 फरवरी, 2018 से पूरे राज्य में बंद का आयोजन करेगा। जो कोई चुनाव के बहिष्कार का विरोध करेगा उसे “नगा-विरोधी” माना जायेगा। सी.सी.एन.टी.एच.सी.ओ. के संयोजक और नगा ट्राइबल कौंसिल के अध्यक्ष थेजा थेरी ने कहा कि “नगा लोगों के तमाम नागरिक संगठन पहली बार इस मांग को लेकर एकजुट हुए हैं कि ‘चुनाव से पहले समाधान’ किया जाना चाहिए। ऐसा एक भी संगठन नहीं है जो इस मांग का विरोध कर रहा हो।”

एन.एस.सी.एन. (आई.एम.) और वर्किंग कमिटी ऑफ नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स, जो नगा समस्या के राजनीतिक समाधान के लिए केंद्रीय सरकार के साथ वार्तालाप कर रहे हैं, उनका जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि यह दोनों ही संगठन “चुनाव से पहले समाधान” इस विषय पर अपनी भूमिका को स्पष्ट करते हुए अपना संयुक्त बयान जारी करेंगे। “हम लोगों के बीच कई मतभेद थे। लेकिन अंत में हमने इस बात को स्वीकार किया कि हम सब एक हैं, और हमारी मंजिल एक है, और अब हम दो अलग-अलग नावों में सवार नहीं हो सकते है।”

अगस्त 2015 को हिन्दोस्तान की सरकार ने यह ऐलान किया कि उन्होंने नगा लोगों की आत्म-निर्धारण की मांग के विषय पर एन.एस.सी.एन. (आई.एम.) के साथ एक समझौते के ढांचे पर फैसला किया है। 2017 में हिन्दोस्तान की सरकार ने वर्किंग कमेटी ऑफ नगा नेशनल पॉलिटिकल ग्रुप्स के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया है। यह समूह नगा लोगों के आत्म-निर्धारण के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे नगा लोगों के 6 संगठनों का प्रतिनिधित्व करता है।

सी.सी.एन.टी.एच.सी.ओ. ने ऐलान किया है कि हिन्दोस्तान की सरकार ने नगा राजनीतिक संगठनों के बीच चाहे जो समझौते किये हों, लेकिन इन समझौतों को स्वीकार किया जाना या नहीं, इसका अंतिम फैसला लोगों का होगा। “जब तक हम यह न जान लें कि इन समझौतों में क्या लिखा है, तब तक लोग आंख मूंदकर इसको स्वीकार नहीं कर सकते।”

सी.सी.एन.टी.एच.सी.ओ. के संयोजक ने बताया कि नगा लोगों द्वारा बार-बार प्रतिनिधिमंडल भेजे जाने और ‘चुनाव के पहले समाधान’ की मांग किये जाने के बावजूद केंद्र सरकार ने चुनाव आयोजित करने का फैसला ले लिया है। यहां तक कि नगालैंड विधानसभा ने नवम्बर 2017 में एकमत के साथ यह प्रस्ताव पारित किया कि जब तक नगा राष्ट्रीय समस्या का राजनीतिक समाधान नहीं किया जाता, तब तक कोई भी चुनाव न कराया जाये।

चुनावों का बहिष्कार करने के फैसले के पीछे कारण का खुलासा करते हुए सी.सी.एन.टी.एच.सी.ओ. ने कहा है कि यदि चुनाव आयोजित किये जाते हैं, तो नगा लोगों के आत्म-निर्धारण की सांझी मांग के आधार पर जो राजनीतिक एकता बनायी जा रही है, उसे नुकसान होगा। “... चुनाव के दौरान काफी धु्रवीकरण होगा। जो लोग हिन्दोस्तान की सरकार के साथ समझौते के लिए बातचीत कर रहे हैं, उनके बीच में भी बंटवारा होगा। वे केवल अपने उम्मीदवारों और पार्टियों का समर्थन करेंगे और इससे राजनीतिक प्रक्रिया में बाधा पैदा हो जाएगी।”

नगा लोगों की भयानक अवस्था के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि “हम नहीं चाहते हैं कि चुनाव हों और फिर 5 साल में 10 सरकारें बनें। हम चाहते हैं कि पहले समस्या का समाधान हो और एक ऐसी सरकार बने जिसकी कोई वैधता हो, बजाय इसके कि 10 सरकारें राज्य को लूटती रहें। अब बहुत हो गया अब और ऐसे चलने नहीं दिया जा सकता हैं।” 

यह नगालैंड की हकीक़त है। तथाकथित रूप से चुनी हुई नागरिक सरकार के पास अधिकार नहीं हैं। इस दिखावटी नागरिक सरकार के मुखौटे के पीछे सेना द्वारा चलायी जा रही हिन्दोस्तानी राज्य की वहशी हुकूमत है। ऐसी नागरिक सरकार और सेना द्वारा लूट के अलावा नगा लोगों पर आत्म-निर्धारण के लिए संघर्ष कर रहे तमाम सशस्त्र गुटों का बोझ भी है।

25 जनवरी को एन.एस.सी.एन (आई.एम.) के प्रवक्ता ने लोगों से यह फैसला करने का आह्वान की किया कि “हम क्या चाहते हैं - चुनाव या समाधान; आज़ादी या गुलामी।” उन्होंने ऐलान किया कि “इस वक्त चुनाव, समाधान के खिलाफ़ हैं। समाधान का हम नगा लोगों के भविष्य से संबंध है, जबकि चुनाव महज संविधान का मसला है; समाधान का संबंध हमारे विशेष इतिहास, हमारी संस्कृति, और पहचान के साथ है, जबकि चुनाव का संबंध केवल हिन्दोस्तान से है; समाधान का वास्ता हम नगाओं की ज़मीन से है, जबकि चुनाव का मतलब है केवल हिन्दोस्तान के क्षेत्र से है; समाधान का मतलब है आत्म-निर्भरता, जबकि चुनाव का मतलब है दूसरों पर निर्भर होना; समाधान का मतलब है हम नगा लोग खुद अपनी राजनीति के केंद्र बिन्दू होंगे, जबकि चुनाव का मतलब है हम नगा लोगों की राजनीति पर दिल्ली का दबदबा चलेगा।”

मौजूदा हालात में चुनावों के बारे में अपने कड़वे अनुभव से नगा लोग यह बात समझ गए हैं कि केवल समय-समय पर चुनाव किये जाने से लोगों और समाज के ज्वलंत सवालों का समाधान नहीं होता है केवल चुनाव किये जाने से यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है कि संप्रभुता लोगों के हाथों में निहित हो, और वे खुद अपने फैसले ले पाएं। इसके ठीक विपरीत मौजूदा चुनावी प्रक्रिया हम सभी हिन्दोस्तानी लोगों सहित नगा लोगों की ज़मीन, श्रम और प्राकृतिक संसाधनों पर बड़े सरमायदारों की हुकुमशाही को वैधता प्रदान करती है। इन बड़े सरमायदारों की अगुवाई हिन्दोस्तान के सबसे बड़े पूंजीपति इजारेदार घराने करते हैं। नगालैंड में चुनावों को मुट्ठीभर लोगों को मौजूदा दमनकारी राज्य मशीनरी में शामिल करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है इन लोगों को राज्य के लोगों की लूट में हिस्सा मिलता है।

इसके अलावा हुक्मरान वर्ग के हाथों में एक हथियार है, जिसका इस्तेमाल वह लोगों की राजनीतिक एकता को तोड़ने के लिए करता है। हर एक चुनाव का इस्तेमाल धर्म, जाति, भाषा, राष्ट्रीयता, जनजाति और पार्टी के आधार पर लोगों के बीच बंटवारा करने के लिए किया जाता है।

बस्तीवाद के जमाने से ही नगा लोगों का अपने आत्म-निर्धारण के लिए बहादुरी से संघर्ष छेड़ने का इतिहास रहा है। हिन्दोस्तानी राज्य ने नगा लोगों पर सबसे वहशी दमन चलाया है, लेकिन राष्ट्रीय अधिकारों के लिए नगा लोगों की चाहत को कुचल नहीं पाया है। आत्म-निर्धारण के लिए संघर्ष कर रहे गुटों के बीच फूट डालने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य कभी अपनी खुफिया एजेंसियों का इस्तेमाल करता है तो कभी अलग-अलग गुटों के साथ अलग-अलग समझौते करता है।

हिन्दोस्तानी राज्य उत्तर-पूर्व के तमाम लोगों को एक दूसरे के खिलाफ़ भड़काने की शैतानी साज़िश करता आया है वह ऐसा प्रचार करता आया है कि उत्तर-पूर्व के तमाम लोगों के हित एक दूसरे के खिलाफ़ हैं और उनके बीच कोई समझौता नहीं हो सकता। अपनी चुनावी पार्टियों का इस्तेमाल वह लोगों के बीच उन्माद फैलाने और लोगों को एक दूसरे के खिलाफ़ भड़काने के लिए करता है। इस तरह से हिन्दोस्तानी राज्य यह सुनिश्चित करता है कि उत्तर पूर्व के लोग राष्ट्रीय अधिकारों के लिए अपने सांझे संघर्ष में केंद्रीय राज्य के खिलाफ़ एकजुट न हो पाएं।

नगालैंड की घटनायें साफ दिखा रही हैं कि नगालैंड के लोग हिन्दोस्तानी राज्य के इस शैतानी खेल को अब समझने लगे हैं। संप्रभुता के लिए नगा लोगों का संघर्ष पूरी तरह से जायज़ है। उनका यह संघर्ष हिन्दोस्तान के तमाम मज़दूर वर्ग और मेहनतकश लोगों के संघर्ष का हिस्सा है जिसके तहत वे हिन्दोस्तान का नव-निर्माण स्वेच्छा पर आधारित सभी राष्ट्रों और लोगों के एक संघ के रूप में करना चाहते हैं, जहां हर एक राष्ट्र और लोगों को आत्म-निर्धारण के अधिकार की गारंटी होगी, और जिसमें संघ से अलग हो जाने का अधिकार भी शामिल है।

Tag:   

Share Everywhere

बहिष्कार    ट्राइबल कौंसिल    नेशनल पॉलिटिकल    Feb 16-28 2018    Political-Economy    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

thumbnail

इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)