कम्युनिस्ट घोषणापत्र के प्रकाशन की 170वीं सालगिरह : मज़दूर वर्ग के लिये अपने उद्धार के संघर्ष में अनिवार्य मार्गदर्शक

कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स द्वारा लिखित कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र का प्रथम प्रकाशन 170 वर्ष पहले हुआ था। अपने प्रकाशन के समय से ही, वैज्ञानिक समाजवाद की यह प्रथम महान कार्यक्रमिक रचना सारी दुनिया के मज़दूर वर्ग के लिये, पूंजीवादी व्यवस्था का तख्तापलट करने और सभी प्रकार के शोषण से मुक्त नया समाजवादी समाज बनाने के संघर्ष में अनिवार्य मार्ग दर्शक रही है।

Karl-Marx-and-Frederick-Engelsकम्युनिस्ट घोषणापत्र यूरोप के अनेक देशों को झकझोरने वाली, 1848 की क्रांतियों की पूर्व संध्या पर लिखा गया था। उन क्रांतियों की वजह से सामंती ताक़तों की हुकूमतें गिराई जा रही थीं और सरमायदार वर्ग की हुकूमत स्थापित की जा रही थी। उन क्रांतियों में मज़दूर वर्ग ने सामंती ताक़तों के खि़लाफ़, सरमायदार वर्ग के साथ मिलकर संघर्ष किया था। उस समय मज़दूर वर्ग अपने वर्ग के स्वतंत्र उद्देश्यों के साथ लड़ने वाले एक वर्ग बतौर मात्र उभरने ही लगा था।

कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स उन क्रांतिकारी संघर्षों में सक्रिय सहभागी थे। उन हालतों में, मज़दूरों के अंतर्राष्ट्रीय संगठन, कम्युनिस्ट लीग, ने नवंबर 1847 में हुये अपने महाअधिवेशन में, कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स को कम्युनिस्ट पार्टी का विस्तारित सैद्धांतिक और अमलनीय कार्यक्रम लिखने का दायित्व सौंपा था। इस प्रकार से कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र का जन्म हुआ था।

कम्युनिस्ट घोषणापत्र के ज़रिये मार्क्स और एंगेल्स ने मज़दूर वर्ग के सबसे अगुवा दस्ते, कम्युनिस्टों के विश्व-दृष्टिकोण का विस्तारपूर्वक विवरण किया। उन्होंने दिखाया कि जिस तरह सामंती व्यवस्था को गिराकर, उसकी जगह पर पूंजीवादी व्यवस्था स्थापित की गई थी, ठीक उसी तरह पूंजीवादी व्यवस्था का भी तख्तापलट किया जायेगा और उसकी जगह पर कम्युनिज़्म - सभी प्रकार के शोषण से मुक्त, वर्ग विहीन समाज - की स्थापना की जायेगी। उन्होंने यह भी दिखाया कि उस नये समाज की अगवानी करने का ऐतिहासिक दायित्व मज़दूर वर्ग का है।

मार्क्स और एंगेल्स ने सरमायदार वर्ग और श्रमजीवी वर्ग के ऐतिहासिक विकास को समझाया। पूरा समाज अधिक से अधिक हद तक, दो विशाल व आपस में शत्रुतापूर्ण खेमों, एक-दूसरे का आमना-सामना करने वाले दो विशाल वर्षों में बंट रहा था। एक खेमे में था सरमायदार वर्ग, आधुनिक पूंजीपतियों का वर्ग, जो उत्पादन के साधनों के मालिक थे; दूसरे खेमे में था श्रमजीवी वर्ग, आधुनिक वेतनभोगी श्रमिकों का वर्ग, जिसके पास उत्पादन के कोई साधन नहीं हैं। मार्क्स और एंगेल्स ने समझाया कि “जिस अनुपात में पूंजीपति वर्ग का, अर्थात पूंजी का विकास होता है, उसी अनुपात में श्रमजीवी वर्ग का, आधुनिक मज़दूर वर्ग का, उन श्रमजीवियों के वर्ग का विकास होता है, जो तभी तक ज़िन्दा रह सकते हैं जब तक उन्हें काम मिलता जाये, और उन्हें काम तभी तक मिलता है, जब तक उनका श्रम पूंजी में वृद्धि करता है।”

मार्क्स और एंगेल्स ने यह दिखाया कि पूंजीवादी व्यवस्था में निहित मूल अंतरविरोध उत्पादन के बढ़ते सामाजीकृत स्वभाव तथा उत्पादन के फलों के निजी हितों द्वारा हड़पे जाने के बीच का अंतरविरोध है। पूंजीवादी व्यवस्था मज़दूरों के श्रम से निचोड़े गये बेशी मूल्य को अधिक से अधिक बनाने पर आधारित है। इसकी वजह से अनिर्वायतः, अत्यधिक उत्पादन के संकट बार-बार होते रहते हैं। बाज़ार सामग्रियों से भरा हुआ होता है परन्तु मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय की कंगाली इस हद तक पहुंच जाती है कि वे उन सामग्रियों को खरीद नहीं सकते। बाज़ार में सामग्रियों के न बिकने पर, पूंजीपति वर्ग उत्पादन में कटौती करने लगता है। मज़दूरों की छंटनी की जाती है। उत्पादक ताक़तों का विनाश किया जाता है। पूंजीपति संकट से बचने की कोशिश करते हुये, उन्नत प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करते हैं, मज़दूरों के शोषण को बढ़ाते हैं और अपने बाज़ारों का विस्तार करते हैं। परन्तु इन कदमों से अत्यधिक उत्पादन के अगले संकट की हालतें तैयार हो जाती हैं, जो पिछले संकट से और भी गंभीर होता है।

पूंजीवादी व्यवस्था में बार-बार होने वाले संकटों से यह स्पष्ट हो जाता है कि पूंजीवादी संबंध समाज की प्रगति के रास्ते में रुकावट बन गये हैं। मानव समाज पूंजीवाद के इस मूल अंतरविरोध का समाधान करके ही आगे बढ़ सकता है। उत्पादन के साधनों की निजी मालिकी को बदलकर, उन पर समाज की मालिकी स्थापित करनी होगी। समाज को समाजवादी आधार पर फिर से संगठित करना होगा। अधिकतम मुनाफ़ों की पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के बजाय, उत्पादन के उद्देश्य को पूरे समाज की बढ़ती ज़रूरतें पूरी करने में बदलना होगा।

मार्क्स और एंगेल्स ने यह समझाया कि पूंजीपति वर्ग अपनी ही कब्र खोदने वालों, यानी श्रमजीवी वर्ग को पैदा करता है।

आदि वर्गहीन समाज के ख़त्म होने के समय से लेकर वर्तमान समय तक मानव समाज के विकास के इतिहास का विवरण देते हुये, कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो यह दर्शाता है कि संपूर्ण इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है, समाज के विकास के अलग-अलग पड़ावों में शोषित और शोषक के बीच, दबे-कुचले और दमनकारी वर्गों के बीच संघर्षों का इतिहास रहा है। इतिहास में जिस तरह भूतपूर्व सामाजिक व्यवस्थाओं की जगह पर नई उत्पादक ताक़तों का प्रतिनिधित्व करने वाली, ज्यादा उन्नत सामाजिक व्यवस्थायें स्थापित की गई थीं, उसी तरह पूंजीवाद की जगह पर भी अंत में एक उन्नत सामाजिक व्यवस्था स्थापित होगी।

कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो श्रमजीवी वर्ग के उद्धार के आंदोलन की विशेषता को स्पष्ट करता है। सभी भूतपूर्व ऐतिहासिक आंदोलन अल्पसंख्यक वर्षों के आंदोलन थे, जिनसे नये शोषक वर्ग और नये प्रकार के शोषण पैदा हुये थे। परन्तु पूंजीवाद से उद्धार के लिये श्रमजीवी वर्ग का आंदोलन “बहुसंख्यक वर्ग का सचेत, स्वतंत्र आंदोलन है, जो समाज की बहुसंख्या के हित में है।” श्रमजीवी वर्ग खुद को तब तक मुक्त नहीं कर सकता है जब तक वह पूरे समाज को हर प्रकार के शोषण और दमन से मुक्त नहीं करता है।

मार्च 1852 में जोजे़फ़ वेडेमेयर के नाम एक पत्र में कार्ल मार्क्स ने लिखा कि “... जहां तक मेरा सवाल है, आधुनिक समाज में वर्गों के अस्तित्व की खोज करने के श्रेय का मैं अधिकारी नहीं हूं। न ही उनके संघर्ष की खोज करने का श्रेय मुझे मिलना चाहिये। मुझसे बहुत पहले ही पूंजीवादी इतिहासकार वर्गों के इस संघर्ष के ऐतिहासिक विकास का और पूंजीवादी अर्थशास्त्री वर्गों की आर्थिक बनावट का वर्णन कर चुके थे। मैंने जो नई चीज़ की, वह यह सिद्ध करना था कि:

(1) वर्गों का अस्तित्व उत्पादन के विकास के खास ऐतिहासिक दौरों के साथ बंधा हुआ है;

(2) वर्ग संघर्ष लाज़िमी तौर से श्रमजीवी वर्ग के अधिनायकत्व की दिशा में ले जाता है;

(3) यह अधिनायकत्व स्वयं सभी वर्गों के उन्मूलन तथा वर्गहीन समाज की ओर संक्रमण मात्र है...”

मार्क्स और एंगेल्स ने कम्युनिस्टों और मज़दूर वर्ग आंदोलन के बीच संबंध को बहुत स्पष्ट रूप से पेश किया। कम्युनिस्ट पार्टी मज़दूर वर्ग का हिस्सा है, उसका सबसे सचेत और संगठित दस्ता, उसका हिरावल दस्ता है। कम्युनिस्ट अपने-अपने देशों में श्रमजीवी क्रांति की जीत के लिये काम करते हैं और सारी दुनिया में इसी संघर्ष का समर्थन करते हैं। उन्होंने कम्युनिस्टों के बारे में कहा कि:

“समग्र रूप से श्रमजीवी वर्ग के हितों के अलावा और उनसे पृथक उनके कोई हित नहीं हैं।

वे श्रमजीवी आंदोलन को किसी खास नमूने पर ढालने या उसे विशेष रूप प्रदान करने के लिये अपना कोई संकीर्णतावादी सिद्धांत स्थापित नहीं करते।

कम्युनिस्टों और दूसरी मज़दूर पार्टियों में सिर्फ यह अंतर है कि:

(1) विभिन्न देशों के श्रमजीवियों के राष्ट्रीय संघर्षों में राष्ट्रीयता के तमाम भेदभावों को छोड़कर वे पूरे श्रमजीवी वर्ग के सामान्य हितों का पता लगाते हैं और उन्हें सामने लाते हैं;

(2) पूंजीपति वर्ग के खिलाफ़ श्रमजीव वर्ग का संघर्ष जिन विभिन्न मंज़िलों से गुजरता हुआ आगे बढ़ता है, उनमें हमेशा और हर जगह वे समग्र आंदोलन के हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं।”

मार्क्स और एंगेल्स ने मज़दूर वर्ग के संघर्ष के विकास का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया। मार्च 1871 में पैरिस के क्रांतिकारी श्रमजीवी वर्ग ने पैरिस कम्यून की स्थापना की थी। हालांकि कम्यून मात्र दो महीनों तक स्थापित रह सका, जिसके बाद खूनी प्रतिक्रांति के ज़रिये उसका तख्तापलट कर दिया गया था, परन्तु मार्क्स और एंगेल्स ने यह माना कि पैरिस कम्यून के अनुभव से कम्युनिस्टों और मज़दूर वर्ग को पूंजी के खि़लाफ़ अपने संघर्ष में कई अत्यंत महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं, क्योंकि वह इतिहास में पहली बार था जब मज़दूर वर्ग ने अपने हाथों में राज्य सत्ता ले रखी थी। पैरिस कम्यून के अनुभव के आधार पर मार्क्स और एंगेल्स ने कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के 1872 के जर्मन संस्करण की भूमिका में यह स्पष्ट किया कि “मज़दूर वर्ग राज्य की बनी-बनाई मशीनरी पर कब्ज़ा करके ही उसका उपयोग अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिये नहीं कर सकता।” अर्थात, क्रांति के ज़रिये सरमायदार राज्य को नष्ट करना होगा और उसकी जगह पर श्रमजीवी वर्ग के अधिनायकत्व का नया राज्य स्थापित करना होगा।

मार्क्स और एंगेल्स द्वारा विस्तार में समझाये गये, वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांत पर खुद को आधारित करते हुए, लेनिन की अगुवाई में बोल्शेविक पार्टी ने रूस के मज़दूर वर्ग को सरमायदार हुकूमत का तख़्तापलट करने के लिए संगठित किया और दुनिया में सबसे पहला समाजवादी राज्य स्थापित किया। दुनिया के जिन-जिन देशों में कम्युनिस्टों ने मज़दूर वर्ग को क्रांति और समाजवाद के लिए संगठित करने का प्रयास किया है, उन सभी देशों में कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो में इतनी प्रबलता से पेश किए गए असूलों और दृष्टिकोण कम्युनिस्टों का मार्गदर्शन करते रहे हैं। आधुनिक दुनिया के भविष्य पर इतना शक्तिशाली प्रभाव शायद ही किसी और रचना का रहा हो।

साम्राज्यवादी सरमायदार कम्युनिज़्म के सिद्धांत के ख़िलाफ़ लगातार प्रचार करते रहते हैं। वे कहते हैं कि मार्क्स और एंगेल्स की शिक्षाएं अब पुरानी हो चुकी हैं और वर्तमान दुनिया में लागू नहीं होतीं। उनका उद्देश्य है मज़दूर वर्ग को उस क्रांतिकारी सिद्धांत से लैस होने से रोकना, जो पूंजीवाद का तख़्तापलट करने और नया समाजवादी समाज बनाने के संघर्ष में उसका मार्गदर्शन कर सके। इस तरह वे आदमखोर पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को बरकरार रखना चाहते हैं। परंतु बीते 170 वर्षों में दुनिया में जो-जो गतिविधियां हुईं हैं, वे सब कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के सबकों की बार-बार पुष्टि करती हैं। मानव समाज पूंजीवाद की वर्तमान स्थिति से आगे बढ़कर समाजवाद की ओर अवश्य ही जाएगा, ताकि प्रगति का रास्ता खुल सके। सरमायदारों की हुकूमत का तख्तापलट करना और नया समाजवादी समाज बनाना मज़दूर वर्ग का ऐतिहासिक दायित्व है। मज़दूर वर्ग का हिरावल दस्ता बतौर, कम्युनिस्ट पार्टी का काम है मज़दूर वर्ग को संगठित करना और अपने इस दायित्व के बारे में जागरुक करना।

अपने देश में मज़दूर वर्ग को संगठित करने तथा अपने ऐतिहासिक दायित्व के बारे में जागरुक करने के काम में हम हिन्दोस्तानी कम्युनिस्टों के लिए, कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो हमारा मार्गदर्शक है।

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कम्युनिस्ट घोषणापत्र    वैज्ञानिक समाजवाद    Mar 16-31 2018    Communist School    Economy     History    Theory    2018   

पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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