मुंबई में रेल प्रशिक्षुओं का रेल रोको आंदोलन

20 मार्च, 2018, मंगलवार के दिन सुबह सात बजे, हजारों प्रशिक्षुओं, जिन्होंने भारतीय रेल संस्थान में अपना प्रशिक्षण पूरा कर लिया है, उन्होंने मुंबई शहर का गढ़ कहे जाने वाली सेंट्रल लाइन के दादर और माटुंगा के बीच रेल पटरियों पर बैठकर चक्का जाम किया। उन्होंने सुबह 11 बजे तक पटरियों पर बैठकर ट्रेनों के आवागमन को पूरी तरह से ठप्प कर दिया, इसी समय पर मुंबई के सबसे ज्यादा लोग रेलों में सफर करते हैं और यह बहुत भीड़-भाड़ का समय होता है।

Rail-rokoआल इंडिया रेलवे एक्ट अपरेंटिस एसोसिएशन के ये प्रशिक्षु सदस्य महारष्ट्र के कई भागों तथा बिहार और पंजाब सहित कई अन्य राज्यों से भी यहां स्थायी काम की मांग के लिए आये थे। इन प्रशिक्षुओं ने भारतीय रेल के सेंट्रल अप्रेन्टिस एक्ट 1969 के तहत अपना प्रशिक्षण पूरा किया है। उन्होंने यह दावा किया है कि 2014 से पहले यह प्रावधान था कि जो लोग सफलतापूर्वक अपना प्रशिक्षण पूरा कर लेते थे, उन्हें यहीं पर तकनीकी कामों के लिए नौकरी मिल जाती थी।

एक प्रदर्शनकारी जो बिहार से इस रेल रोको आंदोलन में हिस्सा लेने आया था उनसे कहा “भारतीय रेल अब शायद ही किसी रेल प्रशिक्षु को काम दे रहा है, हममें से कई पिछले तीन-चार साल से बेरोज़गार बैठे हैं हालांकि हमारे पास रेलवे में काम करने का हुनर है। पिछले साल के अगस्त महीने से हमने कई बड़े प्रदर्शन दिल्ली और गोरखपुर में किये हैं, तीस से ज्यादा सांसदों को खत लिखे हैं, यहां तक कि रेलमंत्री से भी मिले हैं, लेकिन हर तरफ से हमें झूठे आश्वासन ही मिले हैं।” 23 साल का यह प्रशिक्षु जिसने 2015 में एक फिटर बनकर अपना प्रशिक्षण समाप्त किया था जो लोकोमोटिव भागों को जोड़ता है उसने आगे कहा कि मेरी जो लोकोमोटिव पर समझ है इस कला को लेकर मुझे भारतीय रेल के अतिरिक्त और कहां काम मिल सकता है? वे सारे काम कहां हैं जो “स्किल इंडिया” के नाम पर इस सरकार ने तमाम वायदे किये थे?

एक और प्रदर्शनकारी ने कहा कि “वे हमें प्रशिक्षण तो देते हैं परन्तु हमें काम नहीं देना चाहते। क्या यह ठीक है? लोग पूरे हिन्दोस्तान से प्रदर्शन करने आये हैं, यदि हमारी मांगें पूरी नहीं हुईं तो हमारा क्रोध और भड़केगा और हम इससे भी बड़े आंदोलन करेंगे।”

एक 24 साल का प्रदर्शनकारी जो पंजाब के कपूरथला से आया था और 2014 से बेरोज़गार है उसने कहा कि “कोटा प्रणाली आने के पहले रेलवे में काम मिलना लगभग एक गारंटी होती थी, लेकिन यदि वे आजकल सिर्फ 20 प्रतिशत प्रशिक्षुओं को काम देते हैं तो बाकी के 80 प्रतिशत प्रशिक्षु कहां जायेंगे?

यह निर्णय है कि रेलवे का महज 20 प्रतिशत तकनीकी काम उन लोगों के लिए आरक्षित रखना है, जो अपना प्रशिक्षण समाप्त कर चुके हैं ऐसी अधिसूचना सरकार द्वारा जून 2016 में जारी की गई थी। प्रदर्शन कर रहे प्रशिक्षुओं की यह मुख्य मांग है कि इस 20 प्रतिशत की कोटा प्रणाली को फौरन समाप्त करके उन सभी प्रशिक्षुओं को काम दिया जाना चाहिए जिन्होंने सफलतापूर्वक अपना प्रशिक्षण संपन्न किया है।

बिकाऊ मीडिया ठीक उसी वक्त पहुंचकर प्रशिक्षुओं के इस संघर्ष को इस तरह से पेश कर रही थी जैसे कि प्रशिक्षुओं का यह संघर्ष मुंबई के काम-काजी लोगों के खिलाफ़ है। पुलिस ने उन प्रर्दशनकारी युवाओं पर लाठी चार्ज करने और उनके खिलाफ़ केस दर्ज करने की कोशिश की, परन्तु उनकी दृढ़ता को देखते हुये, वहां पर रेलवे के अधिकारियों को आना ही पड़ा। प्रदर्शनकारियों के साथ हुई बातचीत में रेलवे ने इस बात की सहमति दी कि वे दो दिन के भीतर अपना जवाब देंगे, इसके बाद 20 मार्च की सुबह प्रदर्शनकारियों ने अपना आंदोलन रोक दिया।

प्रशिक्षण अधिनियम 1963 के तहत भारतीय रेल प्रशिक्षुओं को कुछ निर्दिष्ट ट्रेड्स में प्रशिक्षित करता है। रेलवे इन प्रशिक्षुओं को सिविल, मेकेनिकल, कम्युनिकेशन एंड टेलिकॉम इंजीनियरिंग, उत्पादन इकाइयों, डीजल और बिजली के इंजनों, गाड़ियों तथा गाड़ियों के डिपुओं और विद्युत परियोजनाओं में शामिल करता है।

रेलवे के नियमों के अनुसार सिविल, मेकेनिकल, कम्युनिकेशन एंड टेलिकॉम इंजीनियरिंग मौजूद कुल कुशल शक्ति का 3 प्रतिशत प्रशिक्षुओं की भर्ती को होनी चाहिए। डीजल और बिजली के इंजन शेड, सी-डब्ल्यू  डिपो, रेलवे विद्युत परियोजनाओं में मौजूद कुल कुशल शक्ति का 1 प्रतिशत प्रशिक्षुओं की भर्ती होनी चाहिए।

प्रशिक्षुओं की तीन तरह की श्रेणी है - 1. ट्रेड प्रशिक्षु-जिनमें नए या आई.टी.आई. योग्यता प्राप्त उम्मीदवार हो सकते हैं। 2. तकनीशियन प्रशिक्षु (डिप्लोमा धारक) 3. ग्रेजुएट इंजीनियर प्रशिक्षु। जो सबसे बड़ी पहली श्रेणी है जिसमें चार सालों का प्रशिक्षण है जबकि तीसरी श्रेणी के इंजीनियर को एक साल का प्रशिक्षण दिया जाता है। लगभग दूसरे साल से ये प्रशिक्षु वे सारे कार्य करने लगते हैं जिसके लिए नियमित कर्मचारी ज़िम्मेदार होते हैं। लेकिन इन प्रशिक्षुओं को जो वेतन मिलता है वह नियमित कर्मचारियों की तुलना में काफी कम होता है। उदाहरण के तौर पर 7वें वेतन आयोग 2016 के घोषित होने से ठीक पहले ट्रेनिंग के दौरान  जो वेतन थे :

प्रथम वर्ष - 1490 रुपये प्रति माह

द्वितीय वर्ष - 1700 रुपये प्रति माह

तृतीय वर्ष - 1970 रुपये प्रति माह

चैथे साल - 2220 रुपये प्रति माह 

पिछले कुछ सालों में सरकार के ‘कौशल भारत’ पहल के ज़रिये भारतीय रेल में प्रशिक्षुओं की संख्या बढ़ी है। 2018-19 के लिये देशभर में 30,000 प्रशिक्षुओं को रेलवे में रखा जाना है। ये प्रशिक्षु रेलवे के 16 आंचलिक और 7 उत्पादन इकाइयों में अलग-अलग भूमिकाओं के लिए तैयार किये जायेंगे - जिनमें फिटर, टर्नर, वेल्डर, पेंटर, मशीन इंजीनियर, बढ़ई, बिजली मिस्त्री, फ्रिज और वातानुकूलन संयंत्रों और वाहनों की इंजीनियरिंग इत्यादि हैं।

हालांकि बड़ी संख्या में खाली पद उपलब्ध हैं परन्तु इन रिक्त पदों पर स्थायी रूप से नियमित कर्मचारियों की भर्ती करने के बजाय, रेलवे बड़ी संख्या में कुशल और नौजवान प्रशिक्षुओं से काम करवाता है और प्रशिक्षण देने के नाम पर बहुत ही कम वेतन देता है।

भारतीय रेल के प्रशिक्षुओं की मांग पूरी तरह से जायज़ है और मज़दूर वर्ग के सभी तबकों के समर्थन की आवश्यकता है।

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पार्टी के दस्तावेज

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सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

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