उच्च शिक्षा में निजीकरण के ख़िलाफ़ शिक्षकों व छात्रों का विरोध

डूटा-फेडकूटा (दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसियेशन - फेडरेशन ऑफ सेंट्रल यूनिवर्सिटीज टीचर्स ऐसोसियेशन्स) के आह्वान पर, 28 मार्च 2018 को दसों हजारों छात्रों और शिक्षकों ने नई दिल्ली के मंडी हाउस से संसद तक विरोध प्रदर्शन किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के लगभग सभी कॉलेजों व शिक्षा विभागों के छात्र तथा शिक्षक भारी संख्या में प्रदर्शन में मौजूद थे। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, अंबेडकर विश्वविद्यालय, अलिगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के शिक्षकों और छात्रों ने भी प्रदर्शन में भाग लिया। अनेक नौजवान और छात्र संघ भी अपने-अपने बैनर सहित बड़ी संख्या में उपस्थित थे, जिनमें ए.आई.एस.एफ., एस.एफ.आई, ए.आई.एस.ए., छात्र युवा संघर्ष समिति, क्रांतिकारी युवा संगठन, आदि शामिल थे।  सरकार की तथाकथित 

DUDA and JNUTA
Duta
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ग्रेडेड अटॉनोमी स्कीम को उच्च शिक्षा के निजीकरण का एक कदम बताते हुए, प्रदर्शनकारियों ने जोर-जोर से उसके विरोध में नारे लगाए। छात्रों ने हाथों में प्लेकार्ड ले रखे थे जिन पर “शिक्षा का बाजारीकरण बंद करो!” “, “उच्च शिक्षा हमारा अधिकार!”, “हम मांग रहे अपना अधिकार, कोई भीख नहीं!”, “नौजवानों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करना बंद करो!”, आदि नारे लिखे हुए थे।

प्रदर्शन के आरम्भ में, मंडी हाउस पर डूटा-फेडकूटा के कार्यकर्ताओं एवं अन्य नेताओं ने प्रदर्शनकारियों को संबोधित किया। इन वक्ताओं में शामिल थे एटक की महासचिव, कॉमरेड अमरजीत कौर, डूटा के पूर्व अध्यक्ष ए.एन. मिश्र, दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, अनेक कॉलेजों के शिक्षक संघों के प्रतिनिधियों, लोक राज संगठन की ओर से कॉमरेड सुचरिता, आदि।

जोशीले नारों के साथ यह विशाल जन प्रदर्शन, आस-पास की दिल्ली की जनता को अपनी समस्याओं और मांगों के बारे में जागरुक करते हुए, संसद पर पहुंचा। वहां एक विशाल मंच को प्रदर्शनकारियों की मांगों के बैनरों से सजाया गया था। मंच से अन्य छात्र संगठनों तथा राजनीतिक दलों के नेताओं ने शिक्षकों और छात्रों का हौसला बढ़ाते हुए और अपनी एकता बनाकर संघर्ष को आगे बढ़ाने का आह्वान देते हुए, प्रदर्शनकारियों को संबोधित किया।

हाल ही में सरकार ने ग्रेडेड अटॉनोमी स्कीम घोषित की थी जिसके तहत पांच केन्द्रीय विश्वविद्यालयों, 21 प्रांतीय विश्वविद्यालयों, 24 डीम्ड विश्वविद्यालयों तथा दो निजी विश्वविद्यालयों के साथ-साथ आठ कालेजों, कुल मिलाकर 60 संस्थानों, को स्वायत्तता दी जायेगी। इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) के ज़रिये लागू किया जायेगा। सरकार के इस निर्णय का दिल्ली विश्वविद्यालय (डी.यू.) व जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जे.एन.यू.) के शिक्षक व छात्र विरोध करते आये हैं। शिक्षकों व छात्रों ने, उच्च शिक्षा में निजीकरण को बढ़ावा देने वाली योजना बतौर, इसकी निंदा की है।

डूटा विश्वविद्यालय के परिसर में एक सप्ताह से विरोध प्रदर्शन करता आ रहा है और इसी तरह के प्रदर्शन दिल्ली के विभिन्न कॉलेज परिसरों में किये जा रहे हैं। जे.एन.यू. के छात्र व शिक्षक अपने परिसर में लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं और उन्होंने 23 मार्च को संसद तक एक जुलूस निकाला जिस पर पुलिस ने निर्दयता से हमला किया (रिपोर्ट देखिये)। अन्य विश्वविद्यालय परिसरों में भी विरोध प्रदर्शन आयोजित किये जा रहे हैं।

आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिये जे.एन.यू.टी.ए. (जनूटा) ने विश्वविद्यालय परिसर में हड़ताल को 28 मार्च तक जारी रखने का निर्णय लिया।

विरोध कर रहे शिक्षकों ने एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये जिसमें साफ तौर से समझाया गया है कि वे इस योजना का विरोध क्यों कर रहे हैं। 'स्वायत्ता' के नाम पर सरकार उच्च शिक्षा पर खर्चे में जबरदस्त कटौती कर रही है और अपने देश के नौजवानों के प्रति अपना दायित्व त्याग रही है। विश्वविद्यालयों के प्रबंधनों व प्रशासनों को फीस बढ़ाने की छूट दी जा रही है। उन्हें सेल्फ फाइनेन्सिंग कोर्स चलाने, परिसर के बाहर विश्वविद्यालय का केन्द्र, आदि स्थापित करने की छूट दी जा रही है जिनमें अत्याधिक

फीस वसूली जायेगी। इस योजना के अनुसार, संस्थानों से अपेक्षा है कि वे सातवें वेतन आयोग के अनुसार शिक्षकों के वेतनों को बढ़ाने पर होने वाले अतिरिक्त खर्च के लिये 30 प्रतिशत अधिक पैसा जुटाएं। इसके लिये उच्च शिक्षा पा रहे छात्रों की फीसें बढ़ाई जायेंगी जिससे नौजवानों की बड़ी संख्या उच्च शिक्षा से वंचित हो जायेगी। शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षा के लिये पर्याप्त ढांचागत सुविधाओं संबंधी नियमों में ढील दी जा रही है।

नयी नीति में स्वायत्त संस्थानों को शिक्षकों व छात्रों की कुल संख्या का 20 प्रतिशत विदेशियों के लिये रखने को बाध्य किया जायेगा। विदेशी शिक्षकों को अवश्य ही अधिक वेतन देने पड़ेंगे जबकि विदेशी छात्रों से अधिक फीस वसूली जा सकती है। यह ऐसे समय पर किया जा रहा है जब अधिकांश विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है और शिक्षकों के रिक्त पदों के लिये भर्ती महीनों-महीनों और सालों तक भी नहीं की जा रही है। नियमित शिक्षकों की जगह लगाये गये अस्थाई शिक्षकों को नौकरी में भयानक असुरक्षा का सामना कर पड़ रहा है और बहुत ही दमनकारी शर्तों पर काम करना पड़ रहा है। अनेक कॉलेजों में शिक्षकों को नियमित तौर पर वेतन नहीं दिया जा रहा है जिससे उन्हें अत्याधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

शैक्षणिक व छात्र परिषदों, जिनमें शिक्षकों व छात्रों को अपनी बात रखने का मौका मिलता था, नयी नीति के तहत इनकी जगह पर ऐसे निकायों का गठन किया जायेगा जिनका नियंत्रण सीधे तौर पर प्रबंधन के हाथों में होगा।

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पार्टी के दस्तावेज

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ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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