कामरेड लेनिन को लाल सलाम!

हाल ही में त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमाओं पर हमले के बाद जोर-शोर से प्रचार किया जा रहा है कि हिन्दोस्तानियों को रूस के इस कम्युनिस्ट नेता का सत्कार करने की कोई ज़रूरत नहीं है। लेकिन हिन्दोस्तान के बहुसंख्य लोग ऐसे बचकाने दावे को स्वीकार नहीं करते हैं।

Leninन केवल कम्युनिस्ट पार्टियों बल्कि बहुसंख्य अन्य पार्टियों, जाने-माने पत्रकारों, सम्मानीय विद्वानों, कवियों और लेखकों ने लेनिन की प्रतिमा पर किये गये हमले की कड़ी निंदा की है। यह साफ दिखाता है कि लेनिन और रूसी क्रांति ने किस कदर हिन्दोस्तानी लोगों के मुक्ति संघर्ष पर गहरी छाप छोड़ी है।

सोशल मीडिया पर लेनिन के बारे में चलाये जा रहे झूठे प्रचार के बीच यह बहुत ज़रूरी हो गया है कि हम हिन्दोस्तान के बस्तीवाद-विरोधी संघर्ष में लेनिन और सोवियत रूस की भूमिका को याद करें। मज़दूर एकता लहर के आने वाले अंक में हम इस बात पर गौर करेंगे कि हमारे समाज को सभी प्रकार के शोषण और दमन से मुक्त करने के लिए लेनिन की सीख कितनी ज़रूरी है।

लेनिन और हिन्दोस्तान में बस्तीवाद-विरोधी संघर्ष

बस्तीवाद से मुक्ति के लिए हिन्दोस्तानी लोगों के संघर्ष में लेनिन की बहुत पहले से दिलचस्पी थी। लेनिन हिन्दोस्तान में हो रही घटनाओं का, बर्तानवी बस्तीवादी दबदबे के चरित्र का और हिन्दोस्तानी लोगों के मुख्य संघर्षों का नियमित तौर से अध्ययन करते थे और उनका विश्लेषण करते थे। 1857 में हिन्दोस्तान की आजा़दी की पहली जंग और 1905 में बर्तानवी हुक्मरानों द्वारा बंगाल के बंटवारे की कोशिश के बारे में लेनिन कई क्रांतिकारी दस्तावेज़ पीछे छोड़ गए हैं। इन विषयों पर उन्होंने लिखा है कि “बर्तानवी हुक्मरान ‘बांटो और राज करो’ की नीति के द्वारा हिन्दोस्तान पर अपना दबदबा कायम रखे हुए हैं... बर्तानवी हुक्मरानों द्वारा बंगाल के बंटवारे की कोशिश राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन को कमजोर करने के मकसद से की गयी थी”।

1909 में जब बाल गंगाधर तिलक ने अपने अख़बार केसरी में क्रांतिकारी खुदीराम बोस के समर्थन में लेख लिखा तो बर्तानवी हुक्मरानों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 6 वर्षों के लिए निर्वासित कर दिया। इस पर लेनिन ने अपने लेख “इन्फ्लेमेबल मटेरियल इन वल्र्ड पॉलिटिक्स” (वैश्विक राजनीति में ज्वलनशील मुद्दे) में लिखा :

“अपने देश में बढ़ते मज़दूर आंदोलन से परेशान और हिन्दोस्तान में उभरते क्रांतिकारी संघर्षों से घबराये हुए बर्तानवी उदारवादी सरमायदार अब बार-बार और खुलकर यह दिखा रहे हैं कि जब पूंजी और पूंजीवादी बस्तीवादी व्यवस्था के ख़िलाफ़ लोगों का संघर्ष तेज़ होता है तो अपने आप को “सभ्य” यूरोपीयाई राजनीतिज्ञ होने का दावा करने वाले कितने बर्बर... हो सकते हैं।” 

हिन्दोस्तान में तेज़ी से बढ़ते बस्तीवाद-विरोधी आंदोलन के समर्थन में लेनिन ने लिखा :

“हिन्दोस्तान के लोग अपने लेखकों और राजनीतिक नेताओं के समर्थन में सड़कों पर उतर रहे हैं। हिन्दोस्तान के जनवादी नेता तिलक को बदले की भावना से जब पैसे वालों की दलाल बर्तानवी सरकार द्वारा सज़ा सुनाई गई, तब बॉम्बे के लोगों ने उसके विरोध में सड़कों पर प्रदर्शन किये और हड़तालें कीं। तिलक को लम्बे समय के लिए निर्वासित किया गया और इस बारे में बर्तानिया के हाउस ऑफ कॉमन्स में जब सवाल उठाये गए, तो सवाल का उत्तर देते हुए बताया गया कि हिन्दोस्तानी न्यायाधीशों ने उनको बरी करने का फैसला सुनाया, लेकिन बर्तानवी न्यायाधीशों ने उनको सज़ा देने का फैसला किया। हिन्दोस्तान में भी श्रमजीवी अब सचेत राजनीतिक संघर्ष के लिए तैयार हो गए हैं और हिन्दोस्तान में रूसी-ज़ारशाही की तरह चलने वाली बर्तानवी सत्ता का अंत नजदीक है”।

1919 में जलियांवाला बाग के नरसंहार के बाद “बर्तानवी हुक्मरानों की बढ़ती बर्बरता, बढ़ते पैमाने पर लोगों का कत्लेआम करना और कोड़ों से उनकी सरेआम पिटाई करने” की लेनिन ने निन्दा की। इसके साथ ही उन्होंने यह अनुमान भी लगाया कि बर्तानवी हुक्मरानों की बढ़ती बर्बरता और देश में औद्योगिक और रेल मज़दूरों की तादाद में बढ़ोतरी से हिन्दोस्तान में क्रांति और भी परिपक्व होगी।

1917 में रूस की अक्तूबर क्रांति के बाद बोल्शेविक पार्टी और लेनिन ने यह माना कि सामाजिक और राष्ट्रीय मुक्ति के लिए, दुनियाभर में चल रहे आंदोलनों को प्रोत्साहन देना और उनकी सहायता करना उनके लिए फौरी कार्य है। जबकि उनके अपने देश में क्रांति को मजबूत करने का कार्य अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी। हिन्दोस्तानी क्रांतिकारियों के लिए भी रूस एक मिसाल था और प्रेरणा का स्रोत था। खास तौर से बोल्शेविकों द्वारा राष्ट्रों के आत्म-निर्धारण के अधिकार की खुली वकालत से वे प्रेरित थे। चीन जैसे देशों पर स्थापित ज़ार के विशेषाधिकारों को उन्होंने एकतरफा तरीके से त्याग दिया जो हिन्दोस्तानी क्रांतिकारियों के लिये एक और प्रेरणा का स्रोत था।

बोल्शेविक पार्टी और लेनिन की अगुवाई में रूस में आयोजित क्रांति के महत्वपूर्ण चरित्र को हिन्दोस्तानी क्रांतिकारियों ने और तमाम तरह के राजनीतिक विचार रखने वाले प्रगतिशील लोगों ने बखूबी पहचाना था। अक्तूबर क्रांति के एक महीने पहले एक मराठी की मासिक पत्रिका चित्रमय जगत में के.पी. खाडिलकर का एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें रूस के श्रमजीवियों द्वारा चलाये जा रहे संघर्ष के चरित्र की समझ को बखूबी दर्शाया गया था। इस लेख में कहा गया था कि “रूस में एक नए तरह का संघर्ष चल रहा है। मज़दूर और सैनिक जिन्होंने बगावत के ज़रिये ज़ार की सत्ता का तख्ता पलट किया है, समाजवाद के समर्थक हैं... वे पूंजीपति वर्ग के ख़िलाफ़ हैं। यह नया संघर्ष... एक ऐसा संघर्ष है जो पूरे यूरोप को अपनी आगोश में लेने जा रहा है...”।

हिन्दोस्तानी देशभक्तों ने लेनिन और अक्तूबर क्रांति के बारे में बर्तानवी बस्तीवादियों द्वारा फैलाये गए झूठ पर कतई भी विश्वास नहीं किया। तिलक ने अपने अख़बार केसरी में लिखा कि: “लेनिन शांति के समर्थन में हैं... वे केवल दबे-कुचले लोगों के लिए इंसाफ चाहते हैं... वे लोगों और सैनिकों के बीच इसलिए बहुत लोकप्रिय हैं क्योंकि उन्होंने किसानों के बीच ज़मीनें बांटी हैं।”

17 फरवरी, 1920 को काबुल में आयोजित हिन्दोस्तानी क्रांतिकारियों की सभा ने लेनिन को संबोधित करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया :

“हिन्दोस्तानी क्रांतिकारी सोवियत रूस द्वारा दुनियाभर के सभी दबे-कुचले वर्गों और लोगों व खास तौर से हिन्दोस्तान की आज़ादी के लिए चलाये जा रहे महान संघर्ष के लिए अपनी कृतज्ञता जाहिर करते हैं और उसकी तारीफ करते हैं। साम्राज्यवाद के बोझ तले कुचले जा रहे 31 करोड़ 50 लाख लोगों की वेदना को सुनने के लिए हम सोवियत रूस का अभिवादन करते हैं। उत्पीड़ित हिन्दोस्तान के प्रति आपके द्वारा दोस्ती का हाथ बढ़ाये जाने का और आपके समर्थन का, यह सभा बेहद खुशी के साथ स्वागत करती है।

सभा में पारित इस प्रस्ताव पर लेनिन के जवाब को 10 मई, 1920 को रेडियो द्वारा प्रसारित किया गया :

“मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि मज़दूरों और किसानों के गणराज्य द्वारा घोषित किये गए राष्ट्रों के आत्म-निर्धारण और दबे-कुचले राष्ट्रों का विदेशी और देशी पूंजीपतियों द्वारा शोषण से मुक्ति के सिद्धांत को प्रगतिशील हिन्दोस्तानियों ने खुले दिल से स्वीकार किया है, जो खुद अपनी आज़ादी के लिए बहादुरी से संघर्ष कर रहे हैं। रूस के मेहनतकश लोग हिन्दोस्तान के मज़दूरों और किसानों की जागरुकता को बड़े गौर से देख रहे हैं। मेहनतकश लोगों का संगठन व अनुशासन और दुनियाभर के मेहनतकश लोगों के प्रति उनकी दृढ़ता और एकजुटता हमारी अंतिम जीत के लिए बेहद ज़रूरी है। हम मुसलमान और गैर-मुसलमान लोगों के बीच गठबंधन का स्वागत करते हैं। हम दिल से चाहते हैं कि यह गठबंधन पूर्वी देशों के सभी मेहनतकश लोगों के बीच फैलाया जाये। जब हिन्दोस्तानी, चीनी, कोरियाई, जापानी, तुर्की और फारस के मज़दूर, किसान हाथों से हाथ मिलाकर अपनी मुक्ति के सांझे लक्ष्य की तरफ आगे बढेंगे, तभी शोषकों के ख़िलाफ़ हमारी जीत सुनिश्चित हो सकती है। आज़ाद एशिया, ज़िन्दाबाद!”

विदेशों को निर्वासित किये गए लोगों सहित कई हिन्दोस्तानी राजनीतिक कार्यकर्ता लेनिन की इज्जत करते थे और उन्होंने उनसे मुलाकात भी की थी। वी.डी. सावरकर, भीकाजी कामा और वीरेंदर नाथ चट्टोपाध्याय, सहित कई और लोग इनमें शामिल हैं।

कामरेड लेनिन ने हिन्दोस्तानी क्रांतिकारियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ मिलने और उनके साथ हिन्दोस्तान के हालात और हिन्दोस्तान की आज़ादी के संघर्ष के बारे में चर्चा करने के लिए समय निकाला। अक्तूबर क्रांति के बाद 23 नवम्बर, 1918 को प्रोफेसर जब्बार खैरी और प्रोफेसर अब्दुल सत्तार खैरी ने लेनिन से क्रेमलिन में उनके दफ्तर में मुलाकात की। 1915 में हिन्दोस्तान ग़दर पार्टी द्वारा काबुल में स्थापित हिन्दोस्तान की पहली तत्कालीन सरकार के नेता राजा महेंद्र प्रताप और मौलाना बरकतुल्लाह 7 मई, 1919 को लेनिन से मिले। इसके अलावा कई अन्य नेताओं ने हिन्दोस्तान की आज़ादी के संघर्ष के बारे में लेनिन से मुलाकात की और उनके साथ पत्र व्यवहार किया जिनमें शामिल हैं - एम.एन. रॉय, अबनी मुखर्जी, टी.एम.पी.बी. आचार्य, वी.एन.चट्टोपाध्याय, पांडुरंग सदाशिव खंकोजे, जी. अम्बिया खान लुहानी, भुबेन्द्र नाथ दत्ता और शौकत उस्मानी।

हमारे स्वतंत्रता संग्राम के कवि और लेखक, लेनिन और अक्तूबर क्रांति से बेहद प्रेरित हुए थे, जिनमें प्रेमचंद, सुब्रमनियम भारती और निराला, शामिल हैं।

1930 में लेनिन की मृत्यु की सालगिरह पर भगत सिंह और उनके साथियों ने बर्तानवी अदालत को तब अचंभित कर दिया, जब उन्होंने एक टेलीग्राम पढ़कर सुनाया जिसका शीर्षक था “महान क्रांतिकारी लेनिन को क्रांतिकारी अभिवादन”। लेनिन की मृत्यु के बाद भी हिन्दोस्तान के क्रांतिकारियों और देशभक्तों पर लेनिन का जबरदस्त प्रभाव रहा है। दमन और शोषण से मुक्त हिन्दोस्तान के निर्माण के लिए, हिन्दोस्तानी लोगों के संघर्षों और आकांक्षाओं के साथ, लेनिन के नाम और उनके कार्य का बहुत ही अटूट रिश्ता है।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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