फ्रांस के सार्वजनिक क्षेत्र के लाखों मज़दूरों ने हड़ताल की

22 मार्च, 2018 को फ्रांस के लाखों मज़दूरों - ट्रेन चालकों, शिक्षकों, एयर ट्रैफिक कंट्रोलरों और सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य मज़दूरों ने देशभर में हड़ताल की। पहली बार सरकारी अधिकारी और रेल कर्मचारी भी हड़ताल में शामिल हुए। देशभर में 180 से अधिक विरोध प्रदर्शन आयोजित किये गए।

Public services workers protest actions in France
Public services workers organise massive protest actions in France to oppose labour law reforms

फ्रांस की सरकार ने अगस्त 2017 से श्रम कानूनों में बदलाव शुरू किये, जिसके ख़िलाफ़ मज़दूर सड़कों पर उतर आये। मई 2017 से जब से मौजूदा सरकार चुनकर आई है, वह दावा कर रही है कि पिछले चुनाव में राष्ट्रपति मैक्रॉन की जीत श्रम कानूनों में बदलाव के लिए लोगों का जनादेश है, जिससे अर्थव्यवस्था और अधिक कार्यकुशल बन जाएगी और बड़े पैमाने पर फैली बेरोज़गारी की समस्या को सुलझाया जा सकेगा! सच्चाई तो यह है कि श्रम कानूनों में बदलाव पूंजी के फायदे में है जिससे मज़दूरों को अब हर सप्ताह 35 घंटे की जगह 46 घंटे काम करना पड़ेगा और पूंजीपति इन अतिरिक्त घंटों के लिए मज़दूरी की दर को कम कर पाएंगे और आर्थिक कारणों का बहाना बनाकर मज़दूरों की छंटनी कर पाएंगे।

इन श्रम सुधारों के तहत नाजायज़ तरीके से नौकरी से निकाले जाने की हालत में मज़दूरों को मिलने वाले मुआवजे़ की अधिकतम सीमा निर्धारित की गयी है, और पूंजीपतियों को मज़दूरों को किसी भी वक्त नौकरी पर रखने और निकालने की पूरी छूट दी गयी है।

फ्रांस में सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले 50 लाख से अधिक मज़दूर मैक्रॉन द्वारा चुनाव के समय किये गए वादों के साथ की गई गद्दारी से बहुत गुस्से में हैं। चुनाव के दौरान मैक्रॉन ने वादा किया था कि वह सार्वजनिक क्षेत्र के मज़दूरों की मेहनत और योगदान के लिए उनको बेहतर पहचान और वेतन दिलाएगा। लेकिन इसके ठीक विपरीत वह सरकारी बजट में कटौती, बढ़ते पैमाने पर ठेका मज़दूरों को रखने जैसे मज़दूर-विरोधी कदम उठाने की बात कर रहा है। सरकार अगले पांच वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र से 1,20,000 मज़दूरों की छंटनी करने की योजना बना रही है।

फ्रांस के रेल मज़दूर एक लंबी अवधि की हड़ताल की योजना बना रहे हैं जो जून 2018 तक चल सकती है। 3 अप्रैल से 28 जून तक रेल मज़दूर हर पांच दिनों में 2 दिन हड़ताल पर जाने की योजना बना रहे हैं। रेल मज़दूर सरकार की उस योजना का विरोध कर रहे हैं जिसके तहत सरकार फ्रांस की विशाल रेल व्यवस्था में बड़े पैमाने पर बदलाव करने जा रही है, और खर्चा कम करने के नाम पर रेल मज़दूरों को मिलने वाले विशेष रोज़गार अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर रही है। श्रम कानूनों में इन मज़दूर-विरोधी बदलावों को लागू करने के लिए सरकार जल्दी ही एक कार्यकारी अध्यादेश जारी करने पर विचार कर रही है, ताकि इन मज़दूर-विरोधी बदलावों को फ्रांस की संसद में पेश करने और उस पर वोट करने की ज़रूरत नहीं होगी। इससे पहले की सरकार ने भी ऐसे ही मज़दूर विरोधी कदम उठाये थे।

इससे पहले की सरकार ने जुलाई 2016 में फ्रांस में मज़दूर-विरोधी कानून लागू करने के लिए संविधान में मौजूद प्रावधान का इस्तेमाल किया था जिसके तहत किसी कानून पर संसद में चर्चा और वोट किये बगैर ही उसे पारित किया जा सकता है। उस समय मौजूदा राष्ट्रपति आर्थिक मामलों के मंत्री थे और मज़दूर-विरोधी सुधारों के जनक थे।

मई 2017 में राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से मैक्रॉन श्रम कानूनों में सुधारों को आगे बढ़ाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, और लोगों के गुस्से को शांत करने के लिए यह दावा कर रहे हैं कि इन सुधारों से फ्रांस अपनी आर्थिक समस्याओं से उबर पायेगा। लेकिन फ्रांस के मज़दूरों का अनुभव कुछ और ही कहानी बता रहा है कि वे अपने ऊपर हो रहे हमलों का मुंह तोड़ जवाब देने के लिए संगठित हो रहे हैं।

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ट्रेन चालकों    शिक्षकों    एयर ट्रैफिक    रेल कर्मचारी    Apr 16-30 2018    Struggle for Rights    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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