मणीपुर के नौजवान वहां के इतिहास व उसकी पहचान को झुठलाने का विरोध कर रहे हैं!

28 मार्च, 2018 को मणिपुर के मुख्यमंत्री नोंगथोमबम बिरेन सिंह ने गुजरात के पोरबंदर में अपने भाषण में यह दावा किया कि अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और पूर्वोत्तर के अन्य इलाके “भगवान श्री कृष्ण के जमाने से” हिन्दोस्तान का हिस्सा रहे हैं। उन्होंने आगे दावा किया कि कालांतर में इस एकता को खंडित किया गया और उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उस एकता को पुनः स्थापित करने के लिए धन्यवाद दिया। मुख्यमंत्री के इन झूठे दावों का जवाब मणिपुर के नौजवानों और छात्रों ने गुस्से और आक्रोश के साथ दिया।

मणिपुर के छात्रों ने मुख्यमंत्री के झूठे दावों के ख़िलाफ़ एक बयान जारी किया जिसमें यह कहा गया है कि “मणिपुर के मुख्यमंत्री ने बड़ी बेशर्मी के साथ मणिपुर, उसके लोगों और उसके इतिहास के बारे में झूठे प्रचार को स्वीकार किया है, जिस प्रचार को हिन्दोस्तान की उपनिवेशवादी चर्चाओं में मणिपुर को जबरदस्ती से हिन्दू-जातिवादी व्यवस्था में विलीन करने की कोशिश बतौर किया जाता रहा है।” उन्होंने बयान में आगे कहा है कि “1949 में मणिपुर से आज़ादी छीन ली गयी और आज हम अपनी पहचान भी खोने की कागार पर खड़े हैं। नोंगथोमबम बिरेन सिंह ने अपने मौकापरस्त राजनीतिक फायदे के लिए हमारे इतिहास को हिन्दोस्तान की प्रमुख राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगियों को बेच दिया है, इससे शर्मनाक व नीच कोई और हरकत नहीं हो सकती है।”

असलियत तो यह है कि 15 अक्तूबर, 1949 को हिन्दोस्तानी राज्य ने मणिपुर को एक तरफा कार्यवाही द्वारा गैरकानूनी तरीके से हड़प लिया था। अगस्त 1947 में बर्तानवी बस्तीवादियों ने जब हिन्दोस्तान में सत्ता का हस्तांतरण किया था, उस वक्त मणिपुर के लोगों ने और राजा ने हिन्दोस्तानी संघ राज्य में शामिल होना स्वीकार नहीं किया था। जुलाई 1947 को मणिपुर ने खुद अपना संविधान बनाया और उसे स्वीकार किया। यहां तक कि जब मणिपुर के राजा बोधचन्द्र सिंह ने अगस्त 1947 में हिन्दोस्तान के साथ परिग्रहण के समझौते पर हस्ताक्षर किये उस वक्त यह साफ कर दिया गया था कि हिन्दोस्तानी राज्य की सत्ता केवल तीन विषयों तक सीमित रहेगी और अन्य विषयों पर मणिपुर राज्य की संप्रभुता हिन्दोस्तानी राज्य को हस्तांतरित नहीं की गयी है। मणिपुर ने अपनी पहली विधानसभा को संविधान के तहत चुना और इस

विधान सभा का पहला सत्रा 1948 में हुआ। इसके दौरान जो गठबंधन सरकार बनी थी वह हिन्दोस्तान के साथ विलय के खिलाफ़ थी। लेकिन अक्तूबर 1949 को हिन्दोस्तानी राज्य ने मणिपुर को हड़प लिया। मणिपुर के राजा को बंदी बनाया गया और मणिपुर को हिन्दोस्तानी संघ राज्य में पूर्ण रूप से विलीन करने के लिए उन्हें जोर-जबरदस्ती से तैयार किया गया।

हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा मणिपुर को जबरदस्ती से हड़पे जाने को मणिपुर के लोगों ने कभी भी स्वीकार नहीं किया है और उस समय से इस फैसले के ख़िलाफ़ लगातार आंदोलन उठते आये हैं। कई दशकों से मणिपुर को हिन्दोस्तानी सेना के जूतों के तले रखा गया है, और इस सरासर गैरकानूनी कब्जे़ को सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (अफ्स्पा) को थोपकर जायज़ ठहराया जाता रहा है। इसके साथ ही इस तथाकथित हिन्दोस्तानी जनतांत्रिक प्रक्रिया और उसकी पार्टियां और चुनावी व्यवस्था का इस्तेमाल स्थानीय सत्ता के भागीदारों को भ्रष्ट बनाने और उनको खरीदने के लिए किया गया है ताकि मणिपुर पर हिन्दोस्तानी संघ राज्य के कब्ज़े को वैधानिकता का जामा पहनाया जा सके। इस तरह से कांग्रेस पार्टी और भाजपा दोनों ने ही स्थानीय पार्टियों और राजनेताओं के साथ सांठगांठ में मणिपुर के लोगों को आज़ादी से वंचित रखा है।

इसके अलावा मणिपुर के लोगों के विशिष्ट और आज़ाद इतिहास व उनकी पहचान को मिटाने की हर तरह की कोशिश की जा रही है, जिसका जिक्र मणिपुरी छात्रों द्वारा जारी बयान में किया गया है। मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर के इलाके आदि काल से “एक हिन्दोस्तान” का हिस्सा थे, इस झूठे दावे को साबित करने के लिए और खास तौर से इन इलाकों को हिन्दू पहचान देने के लिए, तमाम तरह के झूठ फैलाये जा रहे हैं, इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है व झूठी कहानियां गढ़ी जा रही हैं। मणिपुर के विशिष्ट इतिहास व पहचान को मिटाने और उसे एक सर्व-हिन्द “राष्ट्रीय पहचान” और हिन्दू पहचान देने की यह कोशिश कोई नयी बात नहीं है। लेकिन इस वक्त केंद्र और राज्य में बैठी भाजपा की सरकार के तहत इसे पूरे जोर-शोर के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। मणिपुरी छात्रों के बयान में कहा गया है कि “प्रख्यात विद्वानों ने बार-बार और हर बार इस दावे को ठुकराया है कि मणिपुर के मैती लोगों का आर्य सभ्यता के साथ कोई संबंध है”, और मुख्यमंत्री ने बड़ी बेशर्मी के साथ “यह दावा करते हुए मणिपुर के लोगों की संवेदनाओं को नज़रंदाज किया है”।

जबकि मुख्यमंत्री के समर्थकों ने गुजरात में दिए गए बयानों को बड़ी बेशर्मी के साथ एक “मजाक” (फागी) करार देते हुए इससे अपना पल्ला झाड़़ने की कोशिश की है लेकिन मणिपुर के नौजवान और छात्र मांग कर रहे हैं कि एन. बिरेन सिंह को इन झूठे दावों के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए। उन्होंने मुख्यमंत्री को चेतावनी दी है कि “वे इस बात को याद रखें कि मणिपुर के लोग बेवकूफ नहीं हैं, जिनके साथ ऐसा खिलवाड़ किया जा सकता है और जिनके इतिहास, हितों और आकांक्षाओं को अपनी राजनीतिक सत्ता को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।” देशभर के 19 प्रमुख विश्वविद्यालयों के मणिपुरी छात्रों ने इस बयान पर दस्तखत किये हैं।

मजदूर एकता लहर मणिपुर के आजादी पसंद नौजवानों और लोगों के साथ मिलकर हिन्दोस्तानी राज्य, हिन्दोस्तानी हुक्मरानों और उनके राजनेताओं द्वारा मणिपुर के लोगों के इतिहास और पहचान को नकारने और झुठलाने व उनको राष्ट्रीय, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों से वंचित करने की कोशिशों की घोर निंदा करती है। मणिपुर पर किये गए सशस्त्र कब्जे़ को और वहां पर बड़े पैमाने पर चलाये जा रहे राजकीय आतंकवाद को ख़त्म करना होगा और वहां के लोगों के राष्ट्रीय, राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों को पुनःस्थापित करना होगा। हिन्दोस्तान के सभी लोगों को एकजुट होकर देश के तमाम इलाकों के लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों और राजनीतिक अधिकारों के दमन के आधार पर बनाये गए इस मौजूदा हिन्दोस्तानी संघ राज्य को ख़त्म करना होगा और उसकी जगह पर इलाके के तमाम राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और जनजातिय लोगों की स्वेच्छा पर आधारित एक सच्चे संघ राज्य का निर्माण करना होगा।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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