कैम्ब्रिज एनालिटिका विवाद : इजारेदार पूंजीपति वर्ग के हित में चुनावों के नतीजे सुनिश्चित करना

मीडिया चैबीसों घंटे एक बर्तानवी कंपनी, कैम्ब्रिज एनालिटिका के बारे में बता रहा है कि कैसे इस कंपनी ने फेसबुक का इस्तेमाल करने वाले लाखों व्यक्तियों की निजी जानकारी का इस्तेमाल उन राजनीतिक पार्टियों को चुनावों में फायदा पहुंचाने के लिये किया जो उनकी सेवाओं को खरीदते हैं।

ख़बरों के अनुसार, कैम्ब्रिज एनालिटिका ने फेसबुक का इस्तेमाल करने वालों के व्यक्तित्व का विश्लेषण किया और उनके व्यक्तित्व का संबंध उनके द्वारा फेसबुक पर “लाइकों” से स्थापित किया। इससे कंपनी ने अलग-अलग समूहों के लोगों को उनके “लाइकों” के आधार पर प्रचार सामग्री के लिये निशाना बनाया, जिससे प्रचार सामग्री को इस तरह तैयार किया जा सकता था कि लोगों का कोई समूह किसी खास राजनीतिक पार्टी को अपना वोट दे या किसी खास पार्टी का वोट न दे।

कैम्ब्रिज एनालिटिका ने अंतर्राष्ट्रीय तौर पर अपनी सेवाओं को आक्रमकता से बेचा। उसकी सेवाओं को खरीदने वाले चुनावी अभियानों में शामिल हैं अमरीका में ट्रम्प का चुनावी अभियान और ब्रिटेन के यूरोपीय संघ से बाहर निकलने (ब्रेक्सिड) का अभियान। अपने व्यापार को बढ़ावा देने की रणनीति के एक हिस्से बतौर, कैम्ब्रिज एनालिटिका शेखी बघारता आया है कि अनेक देशों में उसने चुनावी नतीजों को अलग-अलग तरीके से प्रभावित किया है। हिन्दोस्तान में भाजपा और कांग्रेस पार्टियां एक दूसरे पर इस कंपनी की सेवाएं लेने का आरोप लगा रही हैं। अब जब इस कंपनी पर और उसकी कार्यवाइयों पर अमरीका व ब्रिटेन में प्रश्न उठाये जा रहे हैं, हिन्दोस्तान में शासक वर्ग की पार्टियां हड़बड़ी में अपने आप को इस कंपनी से अलग दिखाने की कोशिश कर रही हैं।

एक बड़ा मुद्दा उठाया जा रहा है कि हिन्दोस्तान में विदेशी कंपनियों सहित, निजी कंपनियां चुनावों को प्रभावित करती हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि हिन्दोस्तानी चुनावों में दखलंदाज़ी का ख़तरा चीन या पाकिस्तान से है। परन्तु यह प्रचार अमरीका और ब्रिटेन के बारे में चुप है, जिन्होंने हमेशा ही हिन्दोस्तानी चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश की है। यह प्रचार इस तथ्य को भी छिपाता है कि सबसे बड़े पूंजीपति इजारेदार हमेशा ही चालाकी से मतदाताओं के मन को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं ताकि उनका हित चुनावों के नतीजों से सबसे अच्छी तरह से पूरा हो सके।

सबसे बड़े पूंजीवादी इजारेदार नियमित तौर पर भाजपा और कांग्रेस पार्टी जैसी पार्टियों को चंदा देते हैं। इन पार्टियों के चुनावी अभियान हजारों करोड़ों रुपयों में चलते हैं। उन्हें कार्पोरेट विज्ञापन अभियानों के जैसे चलाया जाता है। अन्य तरीकों के साथ-साथ, ये पार्टियां विभिन्न हिन्दोस्तानी और विदेशी अभियान चलाने वाली कंपनियों को अभियान का अलग-अलग काम देती हैं जिनमें कैम्ब्रिज एनालिटिका जैसी कंपनियों की हिन्दोस्तानी शाखाएं भी शामिल हैं।

अंतरराष्ट्रीय तौर पर, राजनीतिक पार्टियों को चुनावों में आगे लाने का एक बड़ा और बढ़ता, अरबों डॉलरों का कारोबार है। कैम्ब्रिज एनालिटिका ऐसी ही एक कंपनी है। अलग-अलग देशों में अपने ग्राहक ढूढ़ने के लिये इन कंपनियों के बीच गलाकाट होड़ है। साथ ही फेसबुक और गूगल जैसी कंपनियों ने अपने उपयोगकर्ताओं की जानकारी को जमा करके और उसको बहुत सही निशाने पर पहुंचाने वाले आंकड़े दूसरी कंपनियों को बेचकर अरबों डॉलर कमाए हैं।

इस पर भी बहुत चर्चा हो रही है कि कैसे फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया कंपनियों ने निजता के अधिकार का हनन किया है। सच तो यह है कि फेसबुक, गूगल और अन्य ऐसी कंपनियों के मालिक उपयोगकर्ताओं के आंकड़ों को जमा करके, दूसरी कंपनियों को उनके लक्षित व्यापार के लिये बेचने से ही सबसे अमीरों की गिनती में आये हैं। जिसने भी इंटरनेट पर किसी वस्तु को खोजने व खरीदने के लिये इन एप्स का इस्तेमाल किया है, वह जानता है कि इसके बाद उसे किस तरह से वही या उसी के जैसी वस्तु को बेचने वाली कंपनियों के विज्ञापनों का निशाना बनाया जाता है।

अब फेसबुक के मालिक ऐसा दिखावा कर रहे हैं कि उन्हें मालूम नहीं था कि उनके आंकड़ों का “दुरुपयोग” हो रहा था। वे अब माफ़ी मांग रहे हैं और उपयोगकर्ताओं की जानकारी को सुरक्षित करने के और गंभीर कदम लेने का वादा कर रहे हैं। यह एक फरेब है क्योंकि योजनाबद्ध तरीके से विज्ञापनों को सही निशाने पर पहुंचाने योग्य इस तरह के आंकड़े उपलब्ध कराना ही उनका उद्देश्य है - चाहे वे बड़ी कंपनियों के माल बेचने के विज्ञापन हों या राजनीतिक पार्टियों के वोट पाने के विज्ञापन हों। वे यह सब पूंजीपति वर्ग के हित में करते हैं, ताकि मज़दूर वर्ग के हित के विरुद्ध सबसे बड़े इज़ारेदारों के राज को और मजबूत किया जा सके।

राजनीतिक पार्टियां पहले से ही टीवी और प्रिंट मीडिया का इस्तेमाल करती आयी हैं और वर्तमान में उनके मकसद के लिये सोशल मीडिया एक अहम माध्यम बन गया है। उदाहरण के लिये यह सभी को पता है कि 2014 के चुनावों में भाजपा ने न केवल टीवी व प्रिंट मीडिया का इस्तेमाल किया था बल्कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी बहुत आक्रमक तरीके से किया था। कांग्रेस पार्टी भी निशाने पर लगने वाले चुनावी अभियान के लिये सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रही है। चुनावों में राजनीतिक पार्टियों के लिये काम करने वाली कंपनियां फेसबुक, वॉट्सएप, गूगल, इत्यादि के उपयोगकर्ताओं के निजी आंकड़ों का इस्तेमाल कर रही हैं, यह बात नयी नहीं है। वे इसका इस्तेमाल लंबे समय से करती आयी हैं और जैसे-जैसे सोशल मीडिया की पहुंच और विकसित होती है, इसे उसी उद्देश्य के लिये और भी ज्यादा इस्तेमाल किया जायेगा।

प्रतिद्वंद्वियों के बीच होड़ में आगे होने का सबूत देने के लिये कैम्ब्रिज एनालिटिका जैसी कंपनियां अपनी उपलब्धियों और सफलताओं को बढ़ा-चढ़ाकर बताती हैं। वे अपने प्रतिद्वंद्वियों का पर्दाफाश करके नीचे गिराने में हिचकिचाती नहीं हैं। इस मामले में भी कैम्ब्रिज एनालिटिका व फेसबुक का पर्दाफाश इसीलिये हुआ है क्योंकि प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच द्वेशपूर्ण संघर्ष है जैसा कि अमरीका में ट्रम्प के राष्ट्रपति चुनाव और बर्तानिया में ब्रेक्सिट वोट में देखा गया था।

चुनाव अभियानों और चालाकी से नतीजों को पाने के लिये व्यक्तियों के आंकड़ों के उपयोग व दुरुपयोग पर चल रही पूरी की पूरी चर्चा, पूंजीवादी बहुपार्टीवादी लोकतंत्र के चुनाव व राजनीतिक प्रक्रिया के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे को छुपाती है। यह मुद्दा है कि इस व्यवस्था में नागरिकों की वोट देने के अलावा और कोई भूमिका नहीं होती। लोगों के पास उम्मीदवारों का चयन करने का कोई तंत्र नहीं है। वे अपने निर्वाचित प्रतिनिधि को जवाबदेह नहीं ठहरा सकते और न ही वे उसे वापस बुला सकते हैं। लोगों के पास कानून प्रस्तावित करने का कोई साधन नहीं है। लोगों के पास समाज के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर फैसले लेने का कोई तंत्र नहीं है। समाज का एजेंडा कुछ 150 सबसे बड़े इजारेदारों के नेतृत्व में शासक वर्ग लेता है। चुनाव मात्र एक तरीका है, शासक वर्ग के अंतर्विरोधों का अस्थाई समाधान करने के लिये और उनकी उस पार्टी को सत्ता में लाने के लिये, जो लोगों को गुमराह करते हुए इजारेदार पूंजीपतियों के एजेंडे को सबसे अच्छी तरह लागू कर सकती हो। इसके लिये हर तरीके से मेहनतकश लोगों को बुद्धू बनाया जाता है। इसके लिये अपराधी

से अपराधी तरीके को नियमित तौर से इस्तेमाल किया जाता है। इन में शामिल हैं - साम्प्रदायिक कत्लेआम आयोजित करना, गुटवादी और जातिवादी विभाजनों को और गहरा करना, दूसरे देशों व लोगों के ख़िलाफ़ उग्रराष्ट्रवाद और उन्माद भड़काना, चुनावी सूचियों को चालाकी से तैयार करना, वोटिंग मशीनों में हेर-फेर करना और अब सोशल मीडिया के आंकड़ों का इस्तेमाल करके व्यक्तियों और समूहों को निशाना बनाना, आदि।

वर्तमान में अमरीका और ब्रिटेन जैसे विकसित पूंजीवादी देशों के शासक वर्ग के बीच अंतर्विरोध इतने तीखे हो गये हैं कि उनकी राज करने की व्यवस्था बढ़ते तौर पर बदनाम होती जा रही है। मौजूदा पूंजीवादी बहुपार्टीवादी लोकतंत्र की व्यवस्था की असली समस्या - पूरी तरह से लोगों की सत्ताहीनता - इसको छुपाने के लिये और इन देशों में सत्ता में बैठे गुट की विश्वसीनयता कुछ हद तक बचा कर रखने के लिये कैम्ब्रिज एनालिटिका जैसी कुछेक कंपनियों को बली का बकरा बनाया जा रहा है। उनपर “भ्रष्ट आचरण”, “मतदाताओं को चालाकी से फंसाने”, इत्यादि आरोप लगाये जा रहे हैं जैसे कि एक अच्छे “लोकतंत्र” को इन “पथभ्रष्ट” कंपनियों ने ही बिगाड़ा है। उनके प्रचार के अनुसार, इसे ठीक करने के लिये कुछ संस्थागत बदलाव और निजता के कुछ सख़्त कानूनों की ही ज़रूरत है।

हिन्दोस्तान में भी, शासकों के बीच अंतर्विरोध इतने तीखे हो गये हैं कि वे इन्हें शांतिपूर्ण तरीके से चुनावों के ज़रिये सुलझा नहीं पा रहे हैं। न ही वे चुनावों के ज़रिये लोगों को भटकाने में कामयाब हो रहे हैं। लोग मौजूदा व्यवस्था में बढ़ते तौर पर अपनी सत्ताहीनता महसूस कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में हिन्दोस्तानी शासक वर्ग भी अमरीका और ब्रिटेन के शासकों की भांति शोर मचा रहा है और यह कहने की कोशिश कर रहा है कि कैम्ब्रिज एनालिटिका जैसी कंपनियां ही समस्या हैं। भाजपा और कांग्रेस पार्टी एक दूसरे पर आरोप लगा रही हैं कि दूसरे ने ऐसी कंपनियों की सेवाएं इस्तेमाल की हैं और कितने हद तक की हैं। वे भी निजता के कानूनों में सख़्ती लाने का बुलावा दे रहे हैं। वे इस बात को पूरी तरह से छुपाने की कोशिश कर रहे हैं कि मतदान को कितनी भी चालाकी से क्यों न इस्तेमाल किया जाये, समाज के एजेंडा को तय करने में लोगों की भूमिका तो शून्य की शून्य ही रहेगी।

अमरीका, ब्रिटेन और हिन्दोस्तान जैसे दुनिया के “महान लोकतंत्रों” में पूंजीवादी लोकतंत्र की असलियत का यह एक और पर्दाफाश है। यह दिखाता है कि “लोकतंत्र” में स्वतंत्र चुनाव के दिखावे और दूसरे दावों के बावजूद, अर्थव्यवस्था और राजनीतिक व्यवस्था किस हद तक अल्पसंख्यकों के हाथों में संकेद्रित है। आज समय की मांग है कि लोगों को सचेत किया जाये कि इस पूरे दिखावे के पीछे कौन है और वास्तव में कौन राज करता है तथा लोगों की सत्ताहीनता को खत्म करने के लिये राजनीतिक व्यवस्था व प्रक्रिया में किस तरह के बदलाव की ज़रूरत है।

इस व्यवस्था में पूंजीपतियों के विभिन्न गुटों के बीच अंतर्विरोधों का गहराना, मज़दूर वर्ग व मेहनतकशों के लिये लोगों को सत्ता में लाने के संघर्ष को आगे बढ़ाने की संभावना को दिखलाता है।

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कैम्ब्रिज एनालिटिका    लाइकों    कार्पोरेट विज्ञापन    Apr 16-30 2018    Political-Economy    Privatisation    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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