प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना : किसानों की सुरक्षा या बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचाने का षड्यंत्र?

देश के दूसरे इलाकों के किसानों की तरह तमिलनाडु के किसान भी संघर्ष कर रहे हैं। पिछले वर्ष राज्य में सूखा पड़ा था, जो पिछले 140 वर्षों का सबसे भयंकर सूखा है। कावेरी नदी का पानी सूख गया है। रखरखाव के अभाव और अतिक्रमण की वजह से हजारों तालाबों और सिंचाई के लिए बनायीं गयी टंकियां भी सूख गयी हैं। किसानों की हालत बहुत बुरी हो गई है। पिछले 10 वर्ष तक बेहद कम बरसात होने के बाद यह सूखा पड़ा है। ठीक ऐसे हालात, में फसल बीमा योजना की नाकामी की वजह से अपनी बर्बाद हुई फसल के लिए कुछ मुआवज़ा मिलने की उम्मीदों पर भी पानी फिर गया है।

पी.एम.एफ.बी.वाई. योजना की बीमा कंपनियां

1.       एग्रीकल्चरल इंशोरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड

2.       आई.सी.आई.सी.आई-लोम्बार्ड जनरल इंशोरेंस कंपनी लिमिटेड

3.       एच.डी.एफ.सी.-इ.आर.जी.ओ. जनरल इंशोरेंस कंपनी लिमिटेड

4.       इफ्फको-टोकियो जनरल इंशोरेंस कंपनी लिमिटेड

5.       चोलामंडलम एम.एस. जनरल इंशोरेंस कंपनी लिमिटेड

6.       बजाज एलाएंस जनरल इंशोरेंस कंपनी लिमिटेड

7.       रिलांयस जनरल इंशोरेंस कंपनी लिमिटेड

8.       फ्यूचर जनराली इंडिया जनरल इंशोरेंस कंपनी लिमिटेड

9.       टाटा-ए.आई.जी. जनरल इंशोरेंस कंपनी लिमिटेड

10.     एस.बी.आई. जनरल इंशोरेंस कंपनी लिमिटेड

11.     यूनिवर्सल सोम्पो जनरल इंशोरेंस कंपनी लिमिटेड

2016 में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पी.एम.एफ.बी.वाई.) को शुरू किया गया। यह योजना ऐसी ही पुरानी योजना की जगह पर लायी गयी थी। प्रमुख फसलों के लिए बीमे की राशि तय करने के लिए गांव या पंचायत के क्षेत्र को एक बीमा इकाई माना जाता है। अन्य फसलों के लिए इससे भी बड़ा क्षेत्र इकाई के रूप में लिया जाता है। इसका मतलब है कि यदि कीड़ों या ओलों की वजह से किसी किसान की फसल बर्बाद हो जाती है तो उसको बीमे की रकम तब तक नहीं मिलेगी जब तक इकाई माने गए पूरे क्षेत्र को अधिकारी ‘प्रभावित क्षेत्र’ घोषित नहीं करते हैं। जब अधिकारी किसी क्षेत्र को ‘प्रभावित क्षेत्र’ घोषित करते हैं तब जाकर किसानों को मुआवज़ा दिया जाता। किसी भी इकाई में औसतन अनुमानित नुकसान के आधार पर मुआवजे़ की रकम तय की जाती है।

एक किसान ने सवाल उठाते हुए कहा कि “यदि किसी बस दुर्घटना में 10 में 2 व्यक्ति मारे जाते हैं, तो क्या यह कहा जाता है कि जब तक 50 प्रतिशत लोगों की मौत नहीं हो जाती तब तक किसी को बीमे की रकम नहीं मिलेगी? फिर गरीब किसानों के साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया जाता है?”

पी.एम.एफ.बी.वाई. के तहत खाद्यान, दालें, तिलहन, कपास और बागवानी की फसलों को शामिल किया गया है। यह योजना मौसम के आधार पर उगाई गयी फसलों पर लागू है (जैसे रबी और खरीफ), और अन्य फसलों के लिए वार्षिक आधार लिया गया है। इस योजना के तहत आम, इमली, नींबू और ताड़ के पेड़ के बगीचों को शामिल नहीं किया गया है। इसमें कॉफी, चाय और रबर के बागान के साथ काजू और सूरन के बगीचे भी शामिल नहीं हैं। इस योजना के तहत हाथियों, सूअरों और नीलगायों की वजह से होने वाले नुकसान को भी शामिल नहीं किया गया है, जबकि कुछ राज्यों में यह एक गंभीर समस्या है।

हिन्दोस्तानी राज्य ने किसानों के प्रति अपने फर्ज़ से मुंह मोड़ लिया है

सबसे पहला मसला यह है कि किसानों के सबसे कमजोर तबके को इस योजना से बाहर रखा गया है। जिन किसानों ने कर्ज़ा लिया है उनके लिए कर्जे़ की रकम के बराबर बीमे की किश्त भरना अनिवार्य है। जिन किसानों ने कर्ज़ा नहीं लिया है उनको इस योजना से जुड़ने के लिए ज़मीन के कागज़ात सबूत के रूप में जमा करने पड़ते हैं। राज्य के ज़मीन-संबंधी कानून के तहत बटाई या किराये से ज़मीन लेकर खेती करने वाले किसानों के लिए सबूत के तौर पर ज़मीन के दस्तावेज़ पेश करना बेहद मुश्किल है। सेन्टर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सी.एस.ई.) द्वारा किये गए आकलन के अनुसार 2016 और 2015 में खरीफ फसल के दौरान बीमा लेने वाले किसानों में कर्ज़ा न उठाने वाले किसानों की तादाद 5 प्रतिशत से भी कम है।

दूसरा मसला ऐसा है जो कि पी.एम.एफ.बी.वाई. को एक मजाक बनाकर रख देता है। इस योजना के तहत बीमे से निश्चित तौर पर मिलने वाली रकम को न्यूनतम स्तर पर रखा गया है। सी.एस.ई. द्वारा किये गए आकलन के अनुसार राजस्थान के बुन्दली जिले में सोयाबीन के किसानों को फसल का अधिकतम बीमा 16,539 रुपये का किया गया जबकि उसकी संभावित कीमत 50,000 रुपये थी। इसी तरह से धान की फसल का 17096 रुपये प्रति हेक्टेयर का बीमा किया गया जबकि धान की फसल की संभावित कीमत 65000 प्रति हेक्टेयर थी।

महाराष्ट्र के बीड जिले में जबकि कपास की उत्पादन कीमत 34147 रुपये प्रति हेक्टेयर थी, उसका बीमा केवल 18000 रुपये प्रति हेक्टेयर की अधिकतम दर पर किया गया। इसका मतलब है कि यदि किसान को 50 प्रतिषत से अधिक फसल का नुकसान होता है तो भी उसको शायद ही कुछ मुआवज़ा मिले।

निश्चित तौर पर मिलने वाली बीमे की रकम को सबसे न्यूनतम स्तर पर रखने से बीमा कंपनियों को अधिकतम मुनाफ़ा प्राप्त होता है। सी.एस.ई. की रिपोर्ट यह दिखाती है कि सोयाबीन की फसल के लिए हानि से सुरक्षा के स्तर को 90 प्रतिशत रखने से उत्पादन कीमत की केवल 25 प्रतिशत का ही दावा किया जा सकता है। धान के लिए भी यह केवल 25 प्रतिशत होगा।

संक्षिप्त में कहा जा सकता है कि जो किसान फसल बीमा लेते हैं उनको फसल बर्बाद होने की हालत में असली नुकसान का बहुत ही छोटा सा हिस्सा मुआवज़े के रूप में दिया जाता है। नुकसान का आकलन करने वाले अधिकारी नुकसान का अनुमान उस मौसम में गांव या ग्राम पंचायत इकाई में होने वाले औसतन नुकसान के आधार पर करते हैं। यह औसतन नुकसान पिछले 7 वर्षों में हुए औसत उत्पादन और इस मौसम में हुए असली उत्पादन की मात्रा के बीच अंतर के रूप में तय किया जाता है। बीमे की रकम को न्यूनतम स्तर पर रखे जाने से किसानों को मिलने वाली मुआवजे़ की रकम उत्पादन की क़ीमत का एक बहुत ही छोटा हिस्सा होती है।

पी.एम.एफ.बी.वाई. को बेहतर तरीके और समय पर लागू करने के लिए कोई भी नया तंत्र स्थापित नहीं किया गया है। इसको भी उसी पुराने तंत्र, फसल बीमा के लिए राज्य स्तरीय समन्वय समिति (एस.एल.सी.सी.आई.) के द्वारा लागू किया जा रहा है, जो पहले राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एन.ए.आई.एस) और मौसम आधारित बीमा योजना (डब्ल्यू.बी.सी.आई.एस.) का प्रबंधन किया करती थी। इससे पहले की सारी योजनायें पूरी तरह से नाकामयाब रही हैं। उसी तंत्र के माध्यम से इस नयी योजना को लागू करने का फैसला यही दिखाता है की केंद्र सरकार किसानों के प्रति कितनी लापरवाह है।

इस योजना के तहत किसानों द्वारा दिए जाने वाले बीमे की किश्त को खरीफ के लिए 2 प्रतिशत, रबी के लिए 1.5 प्रतिशत और अन्य वार्षिक व्यावसायिक फसलों के लिए 5 प्रतिशत पर तय किया गया है। किश्त की बकाया राशि केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच बराबर-बराबर बांटी जाती है। लेकिन किसी भी जिले या संकुल में किसी फसल के लिए मिलने वाली बीमे की रकम को बीमा कंपनियों द्वारा लगायी गयी सबसे कम दर की बोली के आधार पर तय किया जाता है। बीमे की रकम को सबसे न्यूनतम स्तर पर रखते हुए बीमा कंपनियां अपने लिए अधिकतम मुनाफे़ सुनिश्चित करती हैं और किसानों को सबसे कम रकम मुआवजे़ के रूप में देती है।

किसानों के दुख-दर्द और संकट से इजारेदार बीमा कंपनियां बहुत ज्यादा मुनाफ़े बनाती हैं

पी.एम.एफ.बी.वाई. योजना ने बीमा कंपनियों की तिजोरियों को भरने का काम किया है, और इनमें से अधिकांश कंपनियां निजी क्षेत्र की पूंजीवादी इजारेदार कंपनियां हैं (बॉक्स में देखिये बीमा कंपनियों की सूची)।

इंडियन एक्सप्रेस द्वारा दायर की गई आर.टी.आई. के जवाब में यह पता चला है कि 2016-17 के फसल वर्ष में बीमा कंपनियों को कुल 22,437 करोड़ रुपये बीमे की किश्तों के रूप में अदा किये गए थे। इस भारी किश्त की तुलना में इन सभी बीमा कंपनियों ने तमाम तरह की फसल के नुकसान के लिए केवल 8,088 करोड़ रुपये बीमे की रकम का भुगतान किया है। इन बीमा कंपनियों ने 14,439 करोड़ रुपयों का भारी मुनाफ़ा बनाया है।

सी.एस.ई. के आकलन से इस बात का पर्दाफाश हो गया कि पी.एम.एफ.बी.वाई. योजना से बीमा कंपनियों को भारी मुनाफ़ा हो रहा है। एग्रीकल्चर इन्शोंरेंस कंपनी, जो कि एक सार्वजनिक कंपनी है और 17 अन्य निजी कंपनियां इनमें शामिल हैं। इन सभी कंपनियों ने करदाताओं के पैसे से हजारों करोड़ों रुपये का मुनाफ़ा बनाया है लेकिन प्राकृतिक आपदा से होने वाले नुकसान से किसानों को सुरक्षित करने के लिए कुछ भी नहीं किया है। वर्ष 2015-16 के दौरान पी.एम.एफ.बी.वाई. ने गैर-जीवन बीमा उद्योग में बढ़ोतरी करने में एक बड़ी भूमिका निभाई है। इस दौरान जनरल इन्शोंरेंस कंपनियों द्वारा इकट्ठा की गयी किश्तों में 32 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है और 2015-16 में 96,376 करोड़ रुपये से बढ़कर 1.27 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गयी है। इसमें से आधे से अधिक रकम फसल बीमा से आई है।

तमिलनाडु का उदाहरण

तमिलनाडु के तुथुकुड़ी जिले (इस जिले में खूब बारिश होती है) के कीलामंगम गांव के 230 किसानों ने पी.एम.एफ.बी.वाई. योजना के तहत अपनी किश्त भरी। लेकिन इनमें से उड़द दाल पैदा करने वाले केवल 20 किसानों को और मूंग दाल पैदा करने वाले 8 किसानों को मुआवज़ा मिला है। जिन लोगों को मुआवज़ा नहीं मिला है उन लोगों को इसके लिए कोई भी कारण नहीं बताया गया है। इसी तरह से चिल्लनगुलम गांव में 100 किसानों ने बीमे की किश्त भरी लेकिन केवल 25 किसानों को मुआवज़ा मिला है। इसका नतीजा यह हुआ है कि जिन किसानों को मुआवज़ा नहीं मिला है उनके पास अपनी अगली फसल लगाने के लिए भी पैसे नहीं हैं। वे बुरी तरह से कर्ज़ के चक्र में फंस चुके हैं। बीमे से संबंधित कई घोटाले भी सामने आये हैं। कुछ ज़मीनदार जो ज़मीन को खाली छोड़ शहरों में जा बसे हैं उनको भी भ्रष्ट अधिकारियों के साथ सांठ-गांठ में फर्ज़ी बीमा दावों और दस्तावेज़ों के आधार पर मुआवजे़ दिए गए हैं।

मदुरई, रामनाथपुरम, सिवगंगाई, पुदुकोठाई, विरुदूनगर और तिरूनेलवेली जिलों के किसानों का भी यही हाल है। कावेरी नदी के क्षेत्र में आने वाली तंजावुर तिरुवरुर, और नागापट्टिनम जिलों में करोड़ों रुपयों की बीमा राशि का भुगतान अभी बाकी है, जिसे 2015-16 और 2016-17 के दौरान दिया जाना था।

तमिलनाडु के तुथुकुड़ी जिले में थामिलगा विवासाईगल संगम और अन्य संगठनों ने मिलकर सभी किसानों को बीमा के तहत लाने और योजना को अच्छी तरह से लागू करने की मांग की है। उन्होंने इस बात पर ध्यान आकर्षित किया कि जबकि सभी किसान बीमे की किश्तें भरते हैं, लेकिन केवल 10 प्रतिशत किसानों को ही मुआवज़ा मिलता है। जिन किसानों को मुआवज़ा नहीं मिला है उनको इसका कारण नहीं बताया जाता है। इसके अलावा किसानों को मुआवज़ा समय पर नहीं मिलता है, जिसका नतीजा यह होता है कि जिन किसानों की फसल बर्बाद हुई है उनके पास अगले मौसम में फसल लगाने के लिए पैसा नहीं होता है। इन सभी कारणों से किसान बहुत गुस्से में हैं और बार-बार प्रदर्शन और आंदोलन करने के लिए मजबूर हैं। बड़े संघर्षों और कई प्रदर्शनों के बाद किसान कुछ मांगों पर जीत हासिल करने में कामयाब हो गए हैं और अब केला, मिर्ची और नारियल की फसल को भी पी.एम.एफ.बी.वाई. में शामिल किया गया है।

सितम्बर 2017 में आई.सी.आई.सी.ई. लोम्बार्ड बीमा कंपनी द्वारा फसल बीमा की रकम के भुगतान में देरी की निंदा करते हुए हजारों किसानों ने अंबासमुद्रम, तेनकासी, शिवगिरी, संकरणकोविल नगर और थिरुवेंकटम में चक्का जाम किया। पुलिस ने 459 किसान कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया, जिनमें 153 किसान महिलायें थीं। तुथुकोड़ी जिले में कोविलपट्टी, ओत्तापीदारम, श्रीवैकुम्दम और नालात्तींपुधुर में किसानों ने रास्ता रोको आंदोलन आयोजित किया जहां पुलिस ने 275 किसानों को गिरफ्तार किया, जिनमें 60 महिलाएं थीं। कन्याकुमारी जिले में पुलिस ने 87 किसानों को गिरफ्तार किया जब किसान थुक्काले में चक्का जाम आयोजित कर रहे थे।

निष्कर्ष

फसल बीमा हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा हमारे देश के किसानों और आम मेहनतकशों के साथ किया गया एक बड़ा धोखा है। अपनी फसल की बर्बादी के बाद किसान बड़ी उम्मीद के साथ बीमा कंपनियों के पास जाते हैं कि उन्हें अपने नुकसान का कुछ तो मुआवज़ा मिलेगा और वे अपने परिवार का पेट भर सकेंगे। लेकिन पूंजीवादी बीमा कंपनियों की अधिकतम मुनाफे़ की लालच के चलते उन्हें अपने अधिकार से वंचित रखा जाता है और फिर वे आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं।

पिछले 117 वर्षों के मौसम के आंकड़े यह दिखाते हैं कि हिन्दोस्तान में असाधारण मौसम की घटनायें लगातार बढ़ती जा रही हैं। हमारे देश के किसान जो पूरे देश का पेट भरते हैं, उनके लिए ऐसे असाधारण हालातों का सामना करने के लिए मददगार तंत्र बनाने की ज़रूरत है। किसानों की खुशहाली सुनिश्चित करना राज्य की ज़िम्मेदारी है। इसके लिए मजबूत सिंचाई व्यवस्था का तानाबाना तैयार करना, कृषि के लिए ढांचागत सुधार करना, अलग-अलग तरह की फसल उगाने के लिए तकनीक मुहैया कराना, बहु-फसलीय खेती के लिए ज़रूरी चीज़ों का इंतजाम करना, फसलों के लिए बकायदा भुगतान सुनिश्चित करना, एक सार्वजनिक खरीदी व्यवस्था के तहत सभी फसलों की खरीदी की गारंटी देना, यह सब करना राज्य का फर्ज़ है। इन सब सुविधाओं को सुनिष्चित करना पहला कदम है और फसल बीमा आखिरी उपाय होना चाहिए। लेकिन हिन्दोस्तानी राज्य ने किसानों को बर्बादी के कगार पर खड़ा कर दिया है। इजारेदार बीमा कंपनियां भेड़ियों की तरह किसानों की लाचारी का फायदा उठाने के लिए मैदान में आ चुकी हैं।

हिन्दोस्तान के सभी इलाकों के किसानों का अनुभव यही साबित करता है कि हिन्दोस्तानी राज्य केवल इजारेदार पूंजीपतियों के हितों की रक्षा करता है। हिन्दोस्तानी राज्य कतई भी किसानों की हिफ़ाज़त नहीं करता है। किसानों के गुस्से को शांत करने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य एक के बाद एक नयी योजनाओं का ऐलान करता है, लेकिन पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था हर रोज़ हमारे देश के किसानों को गरीबी की खाई में धकेलती रहती है।

देश के सभी किसानों के सामने केवल एक ही रास्ता है, कि किसान बड़े पूंजीपतियों तथा केंद्र और राज्य में बैठी सरकारों के ख़िलाफ़ अपना संघर्ष जारी रखें और उसे और भी तेज़ करें। आगे बढ़ने का एक ही रास्ता है - किसान, मज़दूर वर्ग के साथ एकजुट होकर खड़े रहें और परजीवी पूंजीपति वर्ग के राज का अंत करने और उसकी जगह पर मज़दूरों और किसानों का राज कायम करने के मकसद के साथ मिलकर लड़ें!

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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