2 अप्रैल, 2018 को हल्ला बोल धरना : डाक्टरों और मेडिकल छात्रों के जायज़ संघर्ष का समर्थन करें!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी का आह्वान, 1 अप्रैल, 2018

देशभर के डाक्टर और मेडिकल छात्र 2 अप्रैल को अपने-अपने अस्पतालों और मेडिकल कालेजों में धरने आयोजित कर रहे हैं। वे मेडिकोस यूथ नेशनल एक्शन कौंसिल (एम.वाई.एन.ए.सी.) के झंडे तले संगठित हो रहे हैं, जिसमें मेडिकल छात्र संगठन और रेजिडेंट डाक्टर संगठन शामिल हैं।

डाक्टर और मेडिकल छात्र मेडिकल शिक्षा और अस्पताल सेवाओं के निजीकरण के ख़िलाफ़ आन्दोलन कर रहे हैं। वे सरकारी अस्पतालों में भीड़-भाड़, टूटी-फूटी दीवारों और काम की जघन्य हालतों का विरोध कर रहे हैं, जिनमें जवान डाक्टरों को बिना अवकाश, लम्बे घंटों तक काम करने को मजबूर किया जाता है, जहां उन्हें मरीजों की लम्बी-लम्बी कतारों का हर रोज सामना करना पड़ता है।

Hall Bol Dharna on AIIMS
Protest action at AIIMS, Delhi as part of the all India protest by doctors and medical students on April 2. This statement was distributed at the protest

सरकार ने डाक्टरों की इन समस्याओं की पूरी-पूरी उपेक्षा की है। बल्कि सरकार मेडिकल शिक्षा और सरकारी अस्पतालों को और ज्यादा नष्ट करने के कार्यक्रम को तेज़ी से आगे बढ़ा रही है।

सरकार के इस विनाशकारी कार्यक्रम का मकसद है मेडिकल शिक्षा और अस्पताल सेवाओं को एक पूर्णतया ‘मुनाफ़ेदार धंधे’ में बदल देना। नीति आयोग द्वारा प्रस्तावित इस कार्यक्रम को लागू करने के लिए सरकार एक नया नेशनल मेडिकल कमीशन (एन.एम.सी.) गठित करने जा रही है। स्वास्थ्य सेवा को पहले से ही एक ‘मुनाफे़दार धंधा’ बना दिया गया है। निजी अस्पताल शहरों और गांवों के लोगों को बेरहमी से लूटते हैं। सरकार का कहना है कि मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया (एम.सी.आई.) की जगह पर, एन.एम.सी. नामक यह नया आयोग गठित किया जाएगा, जो “मेडिकल शिक्षा और अभ्यास” का नियमन करेगा। परन्तु वास्तव में, एन.एम.सी. का काम होगा मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के सम्पूर्ण निजीकरण की निगरानी करना।

देशभर के छात्रों की यह मांग बिलकुल जायज़ है कि मेडिकल कालेजों में फीस पर नियंत्रण हो। निजी मेडिकल कालेजों की फीस पर से सरकार किसी भी प्रकार के नियंत्रण को हटा देना चाहती है। सरकार कह रही है कि निजी मेडिकल कालेजों में ज्यादा से ज्यादा 50 प्रतिशत सीटों की फीस को “नियंत्रित” किया जा सकता है। बाकी सीटों के लिए प्रबंधक मनमर्जी से फीस मांग सकते हैं। हाल ही में, उत्तराखंड की सरकार ने राज्य के निजी मेडिकल कालेजों को जितनी भी चाहे फीस वसूलने की हरी झंडी दे दी है। एक कालेज में, सालाना फीस को 5 लाख रुपये से बढ़ाकर, 19.7 लाख रुपये कर दिया गया है! सेकेंड इयर के छात्रों को, इसके अलावा, बीते वर्ष के एरियर भी भरने होंगे। उस कालेज के छात्र अब इस कदम के विरोध में धरने पर बैठे हैं।

एन.एम.सी. बिल में प्रस्ताव किया गया है कि डाक्टर को प्रेक्टिस करने के योग्य माने जाने के लिए, स्नातक की परीक्षा के बाद, एन.ई.एक्स.टी. नामक एक और बाध्यकारी परीक्षा पास करनी होगी, छात्र जिसका विरोध कर रहे हैं। ऐसी परीक्षा का कोई औचित्य नहीं है। मेडिकल छात्र पहले ही, कालेज की परीक्षाओं को पास करने के लिए बहुत पढ़ाई करते हैं।

अगर किसी ने सरकारी अस्पतालों की ओ.पी.डी. या आपातकालीन सेवाओं को देखा है, तो उसके मन में, सैकड़ों-हजारों मरीजों की सेवा करने के दबाव की हालतों में काम करने वाले डाक्टरों और नर्सों के प्रति बहुत सम्मान होगा। हमारे अधिकतम लोग डाक्टरों पर बहुत भरोसा करते हैं। अधिकतम डाक्टर बड़ी निष्ठा के साथ अपना काम करते हैं। पर जब किसी मरीज की मौत हो जाती है, तो उसके परिजन कभी-कभी अस्पतालों की दुर्दशा को दोषी ठहराने के बजाय, डाक्टरों पर अपना गुस्सा निकालते हैं। सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों पर शारीरिक हमलों के कई हादसे हो चुके हैं।

डाक्टर लम्बे समय से मांग करते आ रहे हैं कि सरकारी अस्पतालों में काम करने की हालतें सुधारी जाएं, डाक्टरों और नर्सों की संख्या बढ़ाई जाए, कि मरीजों की बढ़ती संख्या की सेवा करने के लिए और सरकारी अस्पताल खोले जाएं। परन्तु डाक्टरों की इन समस्याओं को हल करने के बजाय, एन.एम.सी. बिल में यह प्रस्तावित किया गया है कि डाक्टरों पर “इलाज करने में गलतियों” के लिए आपराधिक कार्यवाही की जायेगी।

डाक्टर और मेडिकल छात्र जनता को अपनी समस्याओं के बारे में जानकारी देने के लिए, महीने भर से अभियान चला रहे हैं। आंदोलित डाक्टरों ने कन्याकुमारी से एक पदयात्रा शुरू की थी, जिसके अंत में, 25 मार्च को, नयी दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में एक महापंचायत हुयी थी। 25,000 डाक्टरों ने उसमें भाग लिया था और सभी ने एन.एम.सी. बिल का विरोध किया था। उससे पहले, दिल्ली में 6 फरवरी को 10,000 डाक्टरों ने एम्स (ए.आई.आई.एम.एस.) से संसद तक, एन.एम.सी. बिल के खिलाफ़ एक विरोध प्रदर्शन किया था। एम्स-दिल्ली, सफदरजंग अस्पताल, पी.जी.आई.-चंडीगढ़, अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी और कई अन्य संस्थानों के रेजिडेंट डाक्टरों और वरिष्ठ डाक्टरों ने उसमें भाग लिया था।

देशभर के डाक्टरों के विरोध के दबाव में आकर, केन्द्रीय मंत्रीमंडल एन.एम.सी. बिल के कुछ प्रावधानों को बदलने का ढोंग कर रहा है। परन्तु मेडिकल शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा का और ज्यादा निजीकरण करना ही इस बिल का मूल सार है।

हिन्दोस्तान में प्रति 2000 लोगों के लिए एक डाक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मापदंडों के अनुसार, प्रति 1000 लोगों के लिए एक डाक्टर होना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों और कम विकसित राज्यों में डाक्टरों की बहुत कमी है।

यह सुनिश्चित करना समाज की ज़िम्मेदारी है कि हमारे भावी डाक्टरों को सबसे अच्छे संस्थानों में पढ़ने का मौका मिले। समाज का फर्ज़ है यह सुनिश्चित करना कि मेहनतकश परिवारों के बच्चे डाक्टर बनने के मौके से इसलिए वंचित न किये जाएं, कि निजी मेडिकल कालेजों की फीस उनकी क्षमता से बाहर हो। विदित है कि निजी मेडिकल कालेजों की फीस सरकारी मेडिकल कालेजों की फीस से 30-40 गुना ज्यादा है।

राज्य का फर्ज़ है जनता के लिए मुनासिब दाम पर, अच्छी और पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना। परन्तु हिन्दोस्तानी राज्य ने स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को सबसे बड़ी विदेशी और हिन्दोस्तानी इजारेदार कंपनियों के लिए खोल रखा है, ताकि ये कंपनियां हमारी जनता की सेहत की दुःखद स्थिति का फायदा उठाकर, अधिक से अधिक मुनाफे़ कमा सकें। हमारे देश के हुक्मरानों को न तो हमारी जनता के स्वास्थ्य की चिंता है, न ही सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले डाक्टरों की हालतों की।

स्वास्थ्य सेवा के निजीकरण के समाज-विरोधी कार्यक्रम को रोकना होगा, वापस लेना होगा। सरकार को और मेडिकल कालेज खोलने चाहियें, ताकि वे सारे नौजवान जो डाक्टर बनकर समाज की सेवा करना चाहते हैं, मुनासिब दाम पर अच्छी मेडिकल शिक्षा पा सकें। राज्य को यह सुनिश्चत करना होगा कि देश के हर कोने में, पर्याप्त संख्या में तथा सभी सुविधाओं से युक्त सरकारी अस्पताल हों। राज्य को सुनिश्चित करना होगा कि उन अस्पतालों में पर्याप्त संख्या में डाक्टर, नर्स और अन्य कर्मचारी मौजूद हों, जो लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं को हल कर सकें। राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि डाक्टर आपराधिक कार्यवाही और शारीरिक हमलों के डर से मुक्त होकर अपना काम कर सकें।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी डाक्टरों के जायज़ संघर्ष का पूरा-पूरा समर्थन करती है। हम देश के सभी लोगों से आह्वान करते हैं कि एक ऐसी स्वास्थ्य सेवा की व्यवस्था के लिए मिलकर संघर्ष करें, जो लोगों की सेवा में काम करेगी, न कि मुट्ठीभर पूंजीपति करोड़पतियों के लिए।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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