आज लेनिन की शिक्षाओं की प्रासंगिकता

इस वर्ष 22 अप्रैल को महान क्रांतिकारी नेता और मज़दूर वर्ग के शिक्षक वी.आई. लेनिन के जन्मदिन की 148वीं सालगिरह है।

आज के दौर में लेनिन की शिक्षाओं की जो प्रासंगिकता है वह पहले से भी ज्यादा है। पूंजीवादी इजारेदार घरानों की अगुवाई में प्रतिक्रियावादी ताक़तों को हराने, समाज को संकट से उबारने और उसे सब-तरफा प्रगति के रास्ते पर ले जाने के लिए, मज़दूर वर्ग की अगुवाई में सभी क्रांतिकारी ताक़तों के लिए लेनिन द्वारा दी गई शिक्षा बेहद ज़रूरी है।

भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के अपने कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए हिन्दोस्तान के पूंजीवादी इजारेदार घराने पिछले कुछ वर्षों से नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन (राजग) पर निर्भर रहे हैं। मेहनतकश जनसमुदाय की सुख और सुरक्षा को दाव पर लगाकर इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के लक्ष्य के साथ संसद अनेक कानून पारित कर रही है और सरकार इन नीतिगत कदमों को लागू कर रही है। लोगों को बहलाने के लिए यह समाज-विरोधी कार्यक्रम “सबका साथ सबका विकास” के नाम पर चलाया जा रहा है।

मज़दूर विरोधी, किसान विरोधी आर्थिक हमलों के साथ-साथ राज करने के लिए ज्यादा से ज्यादा फासीवादी तरीके अपनाये जा रहे हैं। खास जाति और धर्म के लोगों को बार-बार गुटवादी हमलों का निशाना बनाया जा रहा है। बेगुनाह लोगों पर कातिलाना हमले किये जा रहे हैं और इसके लिए किसी को भी सज़ा नहीं मिलती है। लोगों की ज़िन्दगी और उनके बुनियादी अधिकारों की रक्षा करना तो दूर, मौजूदा राज्य का एक ऐसे हथियार के रूप में पर्दाफाश हो रहा है, जिसका इस्तेमाल लोगों को आतंकित करने और उनको एक दूसरे के ख़िलाफ़ लड़वाने के लिए किया जा रहा है।

इन सभी हमलों के ख़िलाफ़ मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों का क्या जवाब होना चाहिए? मौजूदा हालात में हमें किस राजनीतिक लक्ष्य के लिए लड़ना चाहिए?

सत्ता में बैठा पूंजीपति वर्ग चाहता है कि हमारा दिमाग हमेशा के लिए इस बहकावे में फंसा रहे कि हमें मौजूदा संसदीय जनतंत्र की व्यवस्था के भीतर ही किसी तरह के विकल्प की खोज करनी चाहिए। लेनिनवाद मज़दूर वर्ग और तमाम प्रगतिशील लोगों को यह सिखाता है कि शोषण, दमन और नाजायज़ जंग को खत्म करने के लिए हमें सरमायदारी संसदीय जनतंत्र के जाल को तोड़ना होगा। हमें एक नयी राज्य व्यवस्था और श्रमजीवी जनतंत्र की राजनीतिक प्रक्रिया का निर्माण करना होगा। एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी को सत्ता में लाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि हमें पूंजीपतियों के राज को उखाड़़कर फेंकना होगा और उसकी जगह पर मज़दूरों और किसानों का राज स्थापित करना होगा।

लेनिन ने मार्क्सवादी राजनीतिक सिद्धांत का विश्लेषण करते हुए दिखाया कि राज्य एक वर्ग की हुकूमत का साधन है। आम तौर से यह राज्य के सबसे ताक़तवर, आर्थिक रूप से हावी वर्ग की हुकूमत का साधन है, जो वर्ग राज्य को इस्तेमाल करके राजनीतिक तौर पर भी हावी वर्ग बन जाता है, और तमाम शोषितों और दबे-कुचले लोगों को और ज्यादा दबाने के नए हथियारों को हासिल कर लेता है।

अपने समय के पूंजीवादी राज्यों के उदाहरण के साथ लेनिन ने दिखाया कि किस तरह से अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस और अन्य पूंजीवादी जनतांत्रिक देशों में राज्य और राजनीतिक प्रक्रिया पर पूंजी के मालिकों का दबदबा है। उन्होंने राज्य के अधिकारियों के भ्रष्टाचार, सरकार और सट्टा बाज़ार के बीच के करीबी संबंधों के बारे में बताया। पिछले 100 वर्षों में पूँजी के सकेंद्रण और इजारेदार पूंजी के दबदबे का पैमाना, वित्त पूंजी की परजीविता का पैमाना, अप्रत्याशित स्तर पर पहुंच गया है। हमारे देश में पूंजीवादी इजारेदार घरानों का अधिकांश बाज़ारों, राज्य के सभी अंगों - कार्यपालिका, विधानपालिका और न्यायपालिका, इन सभी पर दबदबा है। “सबसे बड़ी आबादी वाले इस जनतंत्र” के 125 करोड़ हिन्दोस्तानियों की किस्मत का फैसला केवल 150 इजारेदार पूंजीपतियों के हाथों में है।

लेनिन ने समझाया कि पूंजीवाद के लिए सरमायदारी जनतांत्रिक गणतंत्र संभवतः सबसे बढ़िया राजनीतिक आवरण है। उन्होंने लिखा कि :

“इस श्रेष्ठतम खोल पर अधिकार करके पूंजी अपनी सत्ता को इतने विश्वसनीय ढंग से, इतने यकीनी तौर से जमा लेती है कि बुर्जुआ-जनवादी जनतंत्र में व्यक्तियों, संस्थाओं या पार्टियों की कोई भी अदला-बदली उस सत्ता को नहीं हिला सकती।”  (लेनिन संकलित रचनायें (चार खंडों में) खंड-2, पृष्ठ 174)  

हमारे देश के लोगों का 70 वर्ष का अनुभव लेनिन की इस सिद्धांत की पुष्टि करता है। सत्ता में बैठे व्यक्ति बदले गए, पार्टियां बदली गयीं लेकिन शोषण और दमन की व्यवस्था में तथा बांटो और राज करो की राजनीति में कोई बदलाव नहीं आया है।

2004 में जब वाजपेयी की अगुवाई में भाजपा-नीत सरकार के “इंडिया शाइनिंग” के दावों का पर्दाफाश हो गया तब हिन्दोस्तान के पूंजीवादी इजारेदार घरानों ने कांग्रेस पार्टी को बढ़ावा दिया और दावा किया कि कांग्रेस पार्टी सभी वर्गों के लिए हिन्दोस्तान का उदय करेगी। मनमोहन सिंह की अगुवाई में कांग्रेस-नीत सरकार ने वादा किया कि वह पूंजीवादी सुधारों को “मानवीय चेहरे” के साथ लागू करेगी। जब कांग्रेस-नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) का पर्दाफाश हो गया कि वह तो सबसे बड़े पूंजीवादी लुटेरों के साथ मिली हुई है तब हिन्दोस्तान के हुक्मरानों ने नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को बढ़ावा दिया और उसे “साफ-सुथरे” विकल्प के रूप में पेश किया। मोदी ने सभी के लिए विकास का वादा किया। अब जब पूरे देश में मज़दूर, किसान और प्रगतिशील बुद्धिजीवी भाजपा नीत सरकार का विरोध कर रहे हैं तो पूंजीवादी मीडिया ने कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी को “धर्मनिरपेक्ष” विकल्प के रूप में बढ़ावा देना शुरू कर दिया है। 

ये सारी घटनायें क्या दिखाती हैं? ये घटनायें यह साफ तौर पर दिखा रही हैं कि समय-समय पर चुनाव आयोजित करने की यह राजनीतिक प्रक्रिया दरअसल सबसे ताक़तवर पूंजीवादी इजारेदार घरानों की सेवा करती है, जो ज़रूरत पड़ने पर पूंजीपतियों की प्रबंधन टीम (सरकार) को बदलती रहती है। ताकि उसका समाज-विरोधी कार्यक्रम लगातार आगे बढ़ता रहे।

इसलिए मज़दूरों और किसानों को इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि, 2019 में अगर भाजपा नीत राजग को सत्ता से हटाकर किसी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष गठबंधन को सत्ता पर बिठाया गया, तो हालात सुधर जायेंगे।

हमें मौजूदा सरमायदारी जनतंत्र और उसकी चुनावी प्रक्रिया की सीमाओं के परे सोचना होगा। लेनिन की अगुवाई में बोल्शेविक पार्टी ने रूस के मज़दूरों और किसानों को सबसे महत्वपूर्ण सीख दी और 1917 में उन्हें राजनीतिक सत्ता पर कब्ज़ा करने के लिए तैयार किया। उनकी यह सीख इन नारों के रूप में लोगों के बीच गूंज उठी: “तात्कालिक सरमायदारी सरकार को कोई समर्थन नहीं!” और “सारी सत्ता सोवियतों के हाथों में दो”!

रूस में श्रमजीवी क्रांति इसलिए कामयाब हुई क्योंकि बोल्शेविक पार्टी में मज़दूरों और किसानों के दिमाग से सरमायदारी संसदीय जनतंत्र के बारे में सभी प्रकार के भ्रम दूर कर दिए गये थे। बोल्शेविक पार्टी ने मज़दूर वर्ग को सोवियत जनतंत्र का निर्माण करने में अगुवाई दी। सोवियत जनतंत्र श्रमजीवी जनतंत्र का एक स्वरूप है।

अक्तूबर क्रांति ने पुराने सरमायदारी राज्य के तंत्रों को नष्ट कर दिया और उसकी जगह पर नए सोवियत राज्य का निर्माण किया। यह मज़दूर वर्ग का राज्य किसानों और तमाम मेहनतकशों के साथ गठबंधन में श्रमजीवियों की हुकूमत का साधन था। विशेषाधिकार प्राप्त और ऊंची तनख़्वाह पाने वाले नौकरशाहों को हटाकर उनकी जगह पर जन-सेवकों को नियुक्त किया गया, जिनको किसी भी वक्त उनके पद से वापस बुलाया जा सकता था और उनको किसी कुशल मज़दूर के बराबर ही तनख़्वाह मिलती थी। परजीवी ज़ारवादी सेना को हटाकर उसकी जगह पर लाल-सेना को तैनात किया गया, जो शोषकों के राज को उखाड़ फेंकने के क्रांतिकारी संघर्ष के दौरान उभर कर आई और मजबूत हुई। सोवियत राज्य ने तमाम बड़े पूंजीपतियों की जायदाद उनसे छीन ली और बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाले कारखानों, यातायात के साधनों, बैंक और व्यापार को सामाजिक उद्यमों में बदल दिया जो समाज की संपत्ति बन गये। सोवियत राज्य ने सभी गरीब किसानों को स्वेच्छा से अपनी ज़मीन का एकत्रीकरण करने के लिए प्रेरित किया। सामाजिक उत्पादन की व्यवस्था को एक एकीकृत योजना के तहत लाया गया ताकि पूरी आबादी की ज़रूरतों को पूरा किया जा सके।

क्रांति और श्रमजीवी राज्य व आत्मनिर्भर समाजवादी अर्थव्यवस्था के निर्माण के जो सिद्धांत और दावपेंच सोवियत अनुभव से उभर कर आये, वे 20वीं सदी में सभी देशों के कम्युनिस्टों के लिए मार्गदर्शक बन गए। यह रणनीति लेनिन की उस सबसे महत्वपूर्ण सीख पर आधारित थी कि पूंजीवाद के सर्वोच्च और अंतिम पड़ाव, साम्राज्यवाद के युग में, दुनिया के स्तर पर सरमायदार पूरी तरह से प्रतिक्रियावादी ताक़त बन गए हैं। ऐसे हालात में श्रमजीवी वर्ग को समाजवाद और कम्युनिज़्म के अपने संघर्ष के एक ज़रूरी हिस्से बतौर जनतंत्र और राष्ट्रीय आज़ादी का झंडा उठाना होगा। इसी निष्कर्ष को मार्गदर्शक मानते हुए तीसरे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने दुनिया के सभी देशों के कम्युनिस्टों को बुलावा दिया कि वे सरमायदारी जनतंत्र के भ्रमों को दूर भगाकर अपने देश के हालातों के अनुसार श्रमजीवी जनतंत्र के राज्य का निर्माण करें, जो कि मुट्ठीभर शोषकों पर बहुसंख्य जनसमुदाय का राज होगा।

आज हिन्दोस्तानी कम्युनिस्ट आंदोलन में ऐसी पार्टियां और व्यक्ति हैं जो मौजूदा राज्य और संसदीय जनतंत्र की व्यवस्था के बारे में भ्रम फैलाते रहते हैं। वे इस बेहद हानिकारक भ्रम को फैलाते हैं कि संसदीय जनतंत्र को मज़दूरों और किसानों के हितों में इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसा करते हुए वे सरमायदारों द्वारा फैलाई जा रही झूठी चेतना को ही बल दे रहे हैं, जैसे कि मौजूदा जनतंत्र सभी वर्गों के हितों की सेवा करता है।

हक़ीक़त तो यह है कि एक समाज जो दो वर्गों में बंटा है, जिनके हित परस्पर विरोधी हैं, ऐसे समाज में जो व्यवस्था एक वर्ग के लिए जनतंत्र है वह उस वर्ग के वर्ग-दुश्मनों के लिए निश्चित तौर पर हुकूमशाही होगी। सरमायदारी राज्य शोषित जनसमुदाय पर बर्बर हुकूमशाही थोपकर, शोषकों के लिए संपत्ति इकट्ठा करने की आज़ादी सुनिश्चित करता है। एक श्रमजीवी राज्य मुट्ठीभर शोषकों पर हुकूमशाही चलाते हुए, मेहनतकश बहुसंख्य जनसमुदाय के लिए शोषण से आज़ादी सुनिश्चित करता है।

लेनिन ने हमको सिखाया कि: “पूंजीवाद के तहत जो जनतंत्र है वह पूंजीवादी जनतंत्र होता है। वह मुट्ठीभर शोषकों का जनतंत्र है, जो बहुसंख्य शोषितों के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने पर आधारित है और बहुसंख्य शोषित जनसमुदाय के हितों के ख़िलाफ़ है। केवल श्रमजीवी जनतंत्र के तहत ही शोषितों के लिए असली आज़ादी और देश को चलाने में मज़दूरों और किसानों की असली भागीदारी संभव है।”

इस बात को समझना बेहद ज़रूरी है कि हिन्दोस्तान में बढ़ते फासीवाद के लिए पूंजीवादी इजारेदार घराने और उनका साम्राज्यवादी एजेंडा ही ज़िम्मेदार है। यह फासीवाद, राजकीय आतंकवाद, सांप्रदायिक हिंसा और मतभेदों को अपराध मानने के रूप में सामने आता है। भाजपा पूंजीवादी इजारेदार घरानों की प्रमुख पार्टियों में से एक है और उनकी दूसरी प्रमुख पार्टी कांग्रेस पार्टी है। इन दोनों ही पार्टियों ने अपने कर्मों से दिखा दिया है कि वह मुट्ठीभर शोषकों के हाथों में एक हथियार है, जिसका इस्तेमाल मज़दूरों और किसानों को बांटने और उनपर राज करने के लिए किया जाता है। ये दोनों ही पार्टियां इस सांप्रदायिक राज्य का हथियार हैं और एक ही वर्ग के हितों की, पूंजीपति वर्ग के हितों की सेवा करती हैं। हमारे देश में और भी कई पार्टियां हैं जो भविष्य में इजारेदार सरमायदारों की पसंदीदा पार्टी बनने की होड़ में लगी हुई हैं।

हिन्दोस्तान को और अधिक बर्बादी से बचाने का एक ही रास्ता है। किसानों और तमाम दबे-कुचले लोगों के साथ गठबंधन में मज़दूर वर्ग द्वारा सत्ता पर कब्ज़ा करने के लिए कम्युनिस्टों को मज़दूर वर्ग को अगुवाई देनी होगी। केवल ऐसी राजनीतिक ताक़त ही हमारे समाज के लिये ज़रूरी क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है। कम्युनिस्टों को चुनाव में हिस्सा लेने सहित अपने सभी कार्य इस लक्ष्य के साथ करने होंगे जिससे कि मज़दूर वर्ग और उसके मित्र वर्ग राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में लें और एक ऐसे राज्य का निर्माण करें जो सभी के लिए सुख और सुरक्षा की गारंटी देगा।

1924 में लेनिन के निधन के अवसर पर जे.वी. स्टालिन ने कहा कि: “लेनिन की महानता इस बात में है कि उन्होंने सोवियत गणराज्य की स्थापना करके दुनियाभर के सभी दबे-कुचले लोगों को एक जीता-जागता उदाहरण दिया और यह दिखा दिया कि मुक्ति की उम्मीद ख़त्म नहीं हुई है, कि ज़मींदारों और पूंजीपतियों का राज ज्यादा लम्बा नहीं चलने वाला है, कि मज़दूर जनसमुदाय खुद अपने बल पर श्रम के राज का निर्माण कर सकता है, और इस राज का निर्माण कहीं स्वर्ग में नहीं बल्कि इसी धरती पर करना होगा। इस तरह से लेनिन ने दुनियाभर के मज़दूरों और किसानों के दिलों में मुक्ति की उम्मीद को जगाया है”।

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लेनिन की शिक्षाओं    क्रांतिकारी नेता    सबका साथ    सबका विकास    Apr 16-30 2018    Voice of the Party    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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