निजीकरण और उदारीकरण के जरिए भूमंडलीकरण के कार्यक्रम के खिलाफ़ संघर्ष को तेज़ करें! एक ऐसा नया हिन्दोस्तान बनाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों, जिसमें सभी की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित हो!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 1 मई, 2018

मज़दूर साथियों!

मई दिवस 2018 के अवसर पर, कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सभी देशों के मज़दूर वर्ग और लोगों को सलाम करती है, जो अपनी रोजी-रोटी और अधिकारों पर पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकारों के हमलों के खिलाफ़ दिलेर संघर्ष कर रहे हैं। हम उन सभी राष्ट्रों और लोगों को सलाम करते हैं जो साम्राज्यवादियों और इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों द्वारा छेड़े जा रहे अपराधी जंग, आर्थिक घेराबंदी और गुलामकारी संधियों का विरोध कर रहे हैं।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी देश के सभी मज़दूरों, जो अपने अधिकारों की हिफाज़त में संघर्ष कर रहे हैं, को सलाम करती है। हम भारतीय रेल, एयर इंडिया, बैंकों, डिफेंस फैक्ट्रियों के मज़दूरों, कालेजों और स्कूलों के शिक्षकों, रेसिडेंट डाक्टरों, नर्सों और मज़दूर वर्ग के अन्य तबकों को सलाम करते हैं, जो हर प्रकार के निजीकरण के खिलाफ़ डटकर संघर्ष कर रहे हैं। हम आॅटोमोबील, आई.टी. और अन्य तेजी से आगे बढ़ने वाले क्षेत्रों के मज़दूरों के यूनियन बनाने के अधिकार के लिए संघर्ष को सलाम करते हैं। हम आंगनवाड़ी और आशा कर्मियों के, मज़दूर बतौर मान्यता के लिए चल रहे बहादुर संघर्ष को सलाम करते हैं।

मज़दूर साथियों!

बीते चार वर्षों में नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा सरकार लगातार मज़दूरों के अधिकारों पर चैतरफा हमले करती जा रही है। वह ‘श्रमेव जयते!’ का नारा देती है परंतु ऐसे कानून बना रही है तथा नीतिगत तब्दीलियां लागू कर रही है, जिनकी वजह से ज्यादा से ज्यादा हद तक नियमित मज़दूरों की जगह पर अस्थायी ठेका मज़दूरों से काम करवाया जा रहा है। इस सरकार ने अप्रेंटिस एक्ट को बदल दिया है जिससे जवान मज़दूरों को पक्की नौकरी दिए बिना उनका अतिशोषण किया जा रहा है। इस सरकार ने सभी क्षेत्रों में ‘फिक्स टर्म’ ठेका शुरू किया है, जिसकी वजह से मज़दूरों का अतिशोषण हो रहा है और पक्की नौकरी का नाम ही नहीं है। ट्रेड यूनियन नेताओं को मज़दूरों के जायज़ अधिकारों की मांग करने की जुर्रत के लिए आजीवन जेल की सज़ा सुनाई गई है। यह सब हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीवादी कंपनियों के ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ को सुनिश्चित करने के नाम पर किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी एक नया हिन्दोस्तान बनाने का दावा कर रहे हैं, परंतु उनकी सरकार उदारीकरण और निजीकरण के उसी कार्यक्रम को बढ़ावा दे रही है, जिसे भूतपूर्व कांग्रेस सरकार लागू कर रही थी। यह सरकार भारतीय रेल को टुकड़े-टुकड़े करके, एक-एक टुकड़े का निजीकरण करने के कार्यक्रम को और तेजी से आगे बढ़ा रही है, जबकि बार-बार यह झूठ दोहराती है कि रेलवे का निजीकरण कभी नहीं किया जाएगा। यह सरकार एयर इंडिया के निजीकरण तथा चुनिंदा सरकारी बैंकों के निजीकरण को और तेजी से लागू करने जा रही है। यह सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य तथा दूसरी आवश्यक जनसेवाओं को ‘पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशीप’ के नाम से, निजीकरण को और तेजी से लागू करने लगी है। इस सरकार ने जीएसटी लागू किया है, जिसकी वजह से बड़े पूंजीपतियों के मुनाफे खूब बढ़ गए हैं, जबकि छोटे और मध्यम दर्जे के उद्योग-धंधों की आमदनी बहुत घट गयी है।

‘मेक इन इंडिया!’ के नाम से सभी क्षेत्रों को विदेशी पूंजी के प्रवेश के लिए खोल दिया गया है और यह प्रचार किया जा रहा है कि सभी को नौकरी दिलाने का यह तथाकथित ‘स्मार्ट’ तरीका है। पर सच्चाई यह है कि ज्यादा संख्या में पुरानी नौकरियां नष्ट हो रही हैं तथा बहुत कम नयी नौकरियां पैदा हो रही हैं। आई.टी. क्षेत्र, जो अन्य क्षेत्रों की तुलना में नया है, उसमें भी हर साल हजारों-हजारों मज़दूर काम से निकाले जा रहे हैं।

कृषि लागत और उत्पाद के बाजारों को विदेशी और हिन्दोस्तानी पूंजीवादी कंपनियों के लिए और ज्यादा हद तक खोल दिया गया है। इसकी वजह से किसानों की आमदनी अप्रत्याशित हद तक असुरक्षित हो गयी है और अधिक से अधिक किसान कर्ज में डूबते जा रहे हैं।

अगले दो वर्षों में बैंकों के पुनः पूंजीकरण के नाम से, केन्द्रीय बजट में 2 लाख करोड़ रुपए निर्धारित किए गए हैं। जनता के धन का यह विशाल हिस्सा बड़े व्यवसायिक बैंकों को सौंपा जा रहा है, ताकि बड़े-बड़े पूंजीपतियों के कर्जे न चुकाने की वजह से हुए नुकसान की भरपायी की जा सके। कर्जें न चुकाने वाले बड़े पूंजीपतियों के अपराधों के लिए लोगों को सज़ा भुगतना पड़ रहा है।

टाटा, बिरला, अंबानी तथा दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घराने बड़ी तेज गति से अपनी दौलत को बढ़ा रहे हैं और यूरोप व उत्तरी अमरीका के सबसे अमीर पूंजीपतियों के साथ बराबरी करने में लगे हुए हैं। दूसरी ओर, हमारे देश के मज़दूर और किसान, दुनिया के सबसे गरीबों में गिने जाते हैं। वास्तव में, उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण का कार्यक्रम लागू करने के पीछे इजारेदार पूंजीपतियों का यही इरादा रहा है।

मज़दूर साथियों!

दुनियाभर में पूंजीवादी व्यवस्था के संकट का अंत कहीं नज़र नहीं आ रहा है। दुनिया के पूंजीपति 2008-09 के संकट से पूर्व के अपने मुनाफा दरों को फिर से हासिल करने की बढ़-चढ़कर कोशिशें कर रहे हैं। पूंजीपति वर्ग की सेवा में काम करने वाली सरकारें अधिक से अधिक हद तक नस्लवादी, सांप्रदायिक और फासीवादी हमलों का सहारा ले रही हैं, ताकि मज़दूर वर्ग और लोगों की बढ़ती एकता और बढ़ते विरोध संघर्षों को कुचल दिया जाए।

हमारे देश में पूंजीवादी विकास ऐसे पड़ाव पर पहुंच गया है, जहां इज़ारेदार पूंजीवादी घराने बड़े हमलावर तरीके से दुनियाभर में अपने पैर जमाने में लगे हुए हैं। वे दूसरे देशों के पूंजीपतियों के साथ दौड़ लगा रहे हैं। वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि एक-एक रुपए के पूंजी निवेश पर उन्हें ज्यादा से ज्यादा मुनाफे मिलें। जो भी सरकार सत्ता में आती है, वह मेहनतकश जनसमुदाय को दबा कर, इजारेदार पूंजीवादी घरानों की लालच को पूरा करने के लिए नीतिगत सुधारों को लागू करने तथा नए-नए कानून बनाने में लग जाती हैं।

आर्थिक हमले के साथ-साथ, ‘बांटो और राज करो’ की कार्यनीति लागू की जा रही है। जाति और धर्म के आधार पर लोगों की भावनाएं भड़कायीं जा रही हैं, ताकि शोषित और उत्पीड़ित जनसमुदाय की एकता को तोड़ा जा सके। राजकीय आतंकवाद को बढ़ाया जा रहा है और इसके साथ-साथ मुस्लिम विरोधी व पाकिस्तान विरोधी उन्माद भी तेज किया जा रहा है। जो भी शोषण, जातिवादी भेदभाव या राष्ट्रीय दमन से मुक्ति की मांग करता है, उसे ‘राष्ट्र-विरोधी’ करार दिया जाता है।

भाजपा का ‘राष्ट्रवाद’ उतना ही फरेबी है, जितना कि कांगे्रस पार्टी का ‘राष्ट्रवाद’। यह ‘राष्ट्रवाद’ इजारेदार पूंजीवादी घरानों के खुदगर्ज हितों को छिपाने के लिए एक पर्दा है। इजारेदार पूंजीवादी घरानों को अपनी तिजौरियों को भरने के बारे में ही चिंता है, न कि किसी राष्ट्र के हित की।

पूंजीपति वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाली प्रतिस्पर्धी पार्टियां राज्य सत्ता पर कब्जा करने के लिए आपस में लड़ती हैं। इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों के नियंत्रण में काम करने वाली मीडिया यह झूठी धारणा फैलाती है कि खुद को ‘राष्ट्रवादी’, ‘धर्म-निरपेक्ष’, आदि कहलाने वाली इन प्रतिस्पर्धी पार्टियों के बीच में, संसद में जो चल रहा है, वही देश में मुख्य संघर्ष है। इस प्रचार का मकसद है मज़दूरों को बांटना और उन्हें पूंजीपति वर्ग की अलग-अलग पार्टियों के पीछे लामबंध कर देना। इसका मकसद है शासक वर्ग के साम्राज्यवादी और राष्ट्र-विरोधी चरित्र तथा पूरे राज्य के सांप्रदायिक चरित्र पर पर्दा डालना।

हमारा संघर्ष इस या उस खास पार्टी के खिलाफ़ नहीं है। हमारा संघर्ष इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग के खिलाफ़ है। हमें इस वर्ग को सत्ता से हटाना होगा और किसानों के साथ गठबंधन बनाकर, राज्य सत्ता को अपने हाथों में लेना होगा। हिन्दोस्तान की दिशा को बदलने का यही एकमात्र रास्ता है।

हमें पूंजीपति वर्ग के संसदीय लोकतंत्र की मौजूदा व्यवस्था की जगह पर श्रमजीवी वर्ग के लोकतंत्र की एक नयी व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य के साथ, संघर्ष करना होगा। श्रमजीवी वर्ग का लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था होगी, जो मेहनतकश बहुसंख्या की इच्छा के अनुसार चलायी जाएगी, न कि शोषक अल्पसंख्यक वर्ग की इच्छा के अनुसार। हमें टाटा, बिरला, अंबानी और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घरानों को उत्पादन और विनिमय के प्रमुख साधनों पर मालिकी और नियंत्रण से हटाने के लिए संघर्ष करना होगा। अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलानी होगी, जिसका मकसद होगा पूरी आबादी की जरूरतों को अधिक से अधिक हद तक पूरा करना, न कि निजी पूंजीवादी मुनाफों को।

हमें जनता की जरूरतें पूरी करने की दिशा में फौरी कदम लेने होंगे। इसमें अहम कदम होगा, एक आधुनिक सर्वव्यापक सार्वजनिक खरीदी और वितरण व्यवस्था की स्थापना करना। ऐसा करके ही किसानों को स्थायी और लाभदायक दाम सुनिश्चित किए जा सकेंगे तथा उपभोग की आवश्यक वस्तुओं को सभी को मुनासिब दामों पर मुहैया कराया जा सकेगा।।

हमें निजीकरण कार्यक्रम को फौरन रोकने और वापस लेने की मांग के साथ-साथ, यह भी मांग करनी होगी कि बीते दिनों में जनता के धन से जो लाभदायक सामाजिक संसाधन बनाए गए थे, उनकी हिफाज़त की जाए तथा उन्हें मजबूत किया जाए। मिसाल के तौर पर, भारतीय रेल के संबंध में हमें यह मांग करनी होगी कि केन्द्र सरकार आवश्यक निवेश करे ताकि सभी लोगों को सुरक्षित, सक्षम और सस्ते दाम पर रेल यात्रा उपलब्ध हो। हमें वित्त मंत्रालय के झूठे दावे, कि इसके लिए धन नहीं है, का खंडन करना होगा।

मज़दूर साथियों!

हमारे सामने सबसे अहम और फौरी काम है पूंजीपतियों के इस कार्यक्रम के खिलाफ़ तथा अर्थव्यवस्था को समाजवादी दिशा में चलाने के वैकल्पिक कार्यक्रम के इर्द-गिर्द अपनी राजनीतिक एकता बनाना व मजबूत करना।

हमें औद्योगिक क्षेत्रों और सेवा क्षेत्र के केन्द्रों में मज़दूर एकता समितियां बनानी व मजबूत करनी होंगी। मज़दूरों के अधिकारों की हिफाज़त करने के लिए, अलग-अलग यूनियनों और कम्युनिस्ट पार्टियों के कार्यकर्ताओं को इन समितियों में एक साथ काम करने की कोशिशों को आगे बढ़ाना होगा।

मई दिवस, 2018 के अवसर पर कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सभी कम्युनिस्टों तथा मज़दूर वर्ग को संगठित करने वाले सभी कार्यकर्ताओं को आह्वान करती है कि पूंजीपतियों के हमलों के खिलाफ़, मज़दूर वर्ग की एकता तथा मज़दूर-किसान गठबंधन को मजबूत करने पर अपनी पूरी ताकत लगाएं।

आइए, धर्म, जाति, पार्टी सदस्यता, आदि किसी भी आधार पर हमें बांटने की पूंजीपति वर्ग की सारी कोशिशों को नाकाम करें। आइए, पूंजीपति वर्ग के शोषण की इस हुकूमत को बदलकर मज़दूरों और किसानों की हुकूमत स्थापित करने के लक्ष्य के साथ, संघर्ष में आगे बढ़ें!

इंकलाब जिंदाबाद!

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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