मक्का मस्जिद फैसला : न्याय के लिये राज्य पर भरोसा नहीं कर सकते

16 अप्रैल, 2018 को हैदराबाद में एक एन.आई.ए. अदालत ने 2007 के मक्का मस्जिद बम विस्फोट कांड के पांचों आरोपियों को रिहा कर दिया, जिसमें स्वामी असीमानंद और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर.एस.एस.) के तीन पूर्व कार्यकर्ता शामिल हैं। अदालत ने इस फैसले की सफाई में कहा कि “पर्याप्त सबूत नहीं थे”।

विदित रहे कि 18 मई, 2007 के दिन मक्का मस्जिद में हुये बम विस्फोट में 9 लोगों की मौत हो गई थी और 50 से 60 लोग घायल हुए थे। बम विस्फोट के कुछ ही घंटों बाद हैदराबाद पुलिस ने पुराने हैदराबाद शहर के विभिन्न इलाकों से करीब 90 मुस्लिम नौजवानों को सिर्फ शक के आधार

पर गिरफ्तार कर लिया था। जबकि हैदराबाद पुलिस ने अपनी जांच-पड़ताल शुरू कर दी थी, सी.बी.आई. ने एक और समानांतर जांच-पड़ताल शुरू कर दी। पुलिस ने 21 मुस्लिम नौजवानों के खि़लाफ़ आरोप पत्र दाखिल किये, परन्तु 2009 की जनवरी में इन सबको “पर्याप्त सबूत न होने” के कारण बरी कर दिया गया।

2010 में सी.बी.आई. ने मक्का मस्जिद बम विस्फोट के संबंध में, स्वामी असीमानंद और अभिनव भारत नाम का एक गुट, जिसे आर.एस.एस. से जुड़ा माना जाता है, उसके 6 अन्य सदस्यों को गिरफ्तार किया। इसके साथ संप्रग सरकार और मीडिया ने “भगवा आतंकवाद” का काफी प्रचार किया। मीडिया के अनुसार, स्वामी असीमानंद ने अपने बयान में “मुस्लिमों की आतंकी कार्यवाइयों” के बदले में देशभर में आतंकी घटनाओं को आयोजित करना और उन्हें अंजाम देना कबूल किया था। बाद में, उसने यह कह कर अपने बयान को वापस ले लिया कि उसका बयान “दबाव और यातनाओं” के ज़रिये लिखवाया गया था। यह भी याद होगा कि इससे पहले स्वामी असीमानंद पर, 2006 व 2008 के मालेगांव बम विस्फोट, 2007 में अजमेर दरगाह बम विस्फोट और 2007 में समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट मामलों के लिये आरोप लगाया गया था। समझौता एक्सप्रेस का मामला अभी भी अदालत में है जबकि अन्य मामलों में उसे बरी किया जा चुका है।

राज्य की एजेंसियों द्वारा की गई पिछले 11 वर्षों की गिरफ्तारियां, अदालती कार्यवाइयां और रिहाइयां एकदम निराधार लगती हैं। उनके हरेक कदम इस प्रकार के थे जिससे भयंकर सांप्रदायिक द्वेश और शक भड़काया गया - पहले मुस्लिम नौजवानों को “आतंकवादी” बताकर व गिरफ्तार करके और फिर “भगवा आतंक” का नाम लेकर तथा अंत में उन सभी के खिलाफ़ “पर्याप्त सबूत न पा कर”। इस पूरी की पूरी प्रक्रिया से ऐसा लगता है कि न्याय की खिल्ली उड़ाई गयी है।

सार्वजनिक स्थानों पर अनेक दूसरे आतंकवादी हमलों के मामलों में भी राज्य की एजेंसियों की जांच-पड़तालें इसी तरह से की गयी हैं।

मक्का मस्जिद बम विस्फोट के पीड़ितों के परिजन और वे सभी जिन्हें पिछले वर्षों में बंदी बनाया गया है तथा राजनीतिक व मानवाधिकार कार्यकर्ता जो इन जांच-पड़तालों पर निगरानी रख रहे हैं, सभी यह सवाल उठा रहे हैं कि बम विस्फोटों की सच्चाई को सामने लाने व गुनहगारों को सज़ा देने का, क्या राज्य का कुछ भी गंभीर इरादा है। आतंकवादी हमलों के पीड़ितों में यह विश्वास कम होता जा रहा है कि उन्हें न्याय देने का राज्य का कुछ भी इरादा है।

ऐसा कैसे हो सकता है कि सबसे आधुनिक तकनीकों से लैस राज्य और उसकी जांच एजेंसियां, जिनके पास मानव संसाधनों की कोई कमी नहीं है, गुनहगारों का पता न लगा सकें और उन्हें सज़ा न दे सकें? लोगों के खि़लाफ़ जघन्य अपराधों के असली आयोजक और अंजाम देने वाले इतने वर्षों के बाद भी, क्यों छुपे रह जाते हैं?

यह समझने के लिये हमें यह देखना पड़ेगा कि आतंकवादी हमलों को आयोजित करने से किसको फायदा होता है।

ऐसे हमलों में निर्दोष लोगों की जानें जाती हैं, उनके परिजन मारे जाते हैं, उनके घर उजड़ जाते हैं, उनकी रोज़ी-रोटी व संपत्ति नष्ट होती है। ऐसे हरेक हादसे के साथ सुनियोजित तरीके से मीडिया लोगों के खास समूहों के खि़लाफ जहरीला प्रचार करती है। लोगों के पूरे के पूरे तबकों पर “देशद्रोही” और “पाकिस्तानी एजेंट” का लेबल लगा दिया जाता है। लोगों को पड़ोसियों पर शक करने और उनसे डरने का माहौल बनाया जाता है। पुलिस पीड़ितों को ही आतंकित करती है और लोगों को बिना किसी उचित आधार के सालों-साल बंदी बनाया जाता है व यातनाएं दी जाती हैं। सैकड़ों जेलों में ही मर जाते हैं। बहुतों को बाद में अदालत बरी कर देती है परन्तु जेल में सालों-साल सड़ने से उनके जीवन के सबसे अच्छे साल व रोज़ी-रोटी बर्बाद हो जाते हैं तथा उनका शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य खराब हो जाता है। जनसमूह के तुष्टीकरण के नाम पर, अपराध के पुख्ता सबूतों के बिना ही लोगों को फांसी दी जा चुकी है। यह साफ़ है कि इन आतंकवादी हमलों से मेहनतकश लोगों के किसी भी तबके को फायदा नहीं होता है।

परन्तु इससे अपने शासकों के निश्चित राजनीतिक लक्ष्य हासिल होते हैं। इससे सांझी समस्याओं के समाधान के लिये संघर्ष में लोगों की एकता टूटती है। इससे गरीबी व रोज़ी-रोटी की अनिश्चितता के असली कारण, यानी कि मुट्ठीभर इजारेदार पूंजीपति शोषकों के राज व उनके राज की सुरक्षा करने वाले राज्य से लोगों का ध्यान हटता है। इससे सभी की रोज़ी-रोटी व सुरक्षा सुनिश्चित करने में राज्य की नाकामी से लोगों का ध्यान हटता है। मीडिया एक या दूसरे समूह के लोगों को सांप्रदायिक व पिछड़ा बताकर हमलों के लिये उनपर दोष लगाने का लगातार दुष्ट प्रचार करता है। राज्य को सांप्रदायिक सद्भावना का रक्षक दिखाता जाता है।

यह साफ़ है कि बम धमाकों व आतंकवादी हत्याओं से इजारेदार पूंजीपति शासक वर्ग को फायदा होता है। इनसे शासक वर्ग को अपने राज को मज़बूत करने में, लोगों में फूट डालने में और जनसमूह के संघर्ष को कुचलने में मदद मिलती है। राजकीय आतंकवाद को इजारेदार पूंजीपति शासक वर्ग के एक पसंदीदे हथियार बतौर, सत्ता में बैठी सभी राजनीतिक पार्टियों ने परिष्कृत किया है। राजकीय आतंकवाद का मतलब है बेकसूर लोगों पर आतंकवादी हमले आयोजित करना और फिर बेकसूर लोगों को बंदी बनाना, यातनाएं देना और उनकी हत्या करना, फर्ज़ी मुठभेड़ों में लोगों को मार डालना, सांप्रदायिक कत्लेआम आयोजित करना, इत्यादि।

राजकीय आतंकवाद, जिसमें राज्य द्वारा आयोजित साम्प्रदायिक हिंसा शामिल है, इसके आयोजन में राज्य की एजेंसियां तो शामिल हैं ही, साथ में अनेक ऐसे गुट भी शामिल हैं जिनको राज्य जन्म देता है, उन्हें प्रायोजित करता है, वित्त पोषण करता है और उनकी रक्षा करता है। ऐसे गुटों को आज़ादी से घूमने की, सांप्रादियक व गुटवादी प्रचार करने की, लोगों के एक हिस्से को दूसरे के खि़लाफ़ उकसाने की, लूट, बलात्कार व हत्या आयोजित करने की पूरी छूट होती है। जब ये गुट ऐसी कार्यवाइयां करते हैं तो पुलिस या तो मूक दर्शक बनी रहती या हत्यारे गुटों की सक्रियता से मदद करती है।

समाज के सभी लोगों को एक साथ आकर मांग करनी होगी कि इन जघन्य अपराधों की पूरी और विस्तृत जांच-पड़ताल होनी चाहिये। हमें मांग करनी होगी कि जांच-पड़ताल कितनी आगे बढ़ी है इसकी जानकारी पाना हमारा अधिकार है। हमें मांग करनी होगी कि गुनहगारों का दोष साबित हो और उन्हें सज़ा दी जाये।

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मक्का मस्जिद    May 16-31 2018    Political-Economy    Communalism     Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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