1-10 जून के बीच कोई कृषि उत्पाद शहरों को नहीं पहुंचेगा

देशभर के किसानों ने फैसला किया है कि अपनी जायज़ मांगों के प्रति हुक्मरानों की उदासीनता के खि़लाफ़ संघर्ष तेज़ करेंगे। बीते डेढ़ साल से, किसान बार-बार अपनी मांगों को हासिल करने के लिये सड़कों पर उतरे हैं। किसानों ने बार-बार अपने उत्पादों - दूध, आलू, टमाटर और दूसरी सब्जियों - को सड़कों पर फेंका है, क्योंकि इन उत्पादों के लिए जो कीमत किसानों को मिल रही है, उससे उत्पादन का खर्च भी पूरा नहीं होता। परन्तु सरकार ने लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं दिया है।

30 अप्रैल, 2018 को राष्ट्रीय किसान महासंघ - 110 किसान संगठनों का गठबंधन - ने घोषणा की कि केंद्र सरकार की किसान-विरोधी नीतियों के खि़लाफ़, उत्तरी और मध्य हिन्दोस्तान के किसान 1 जून से लेकर, अगले दस दिन तक अपने उत्पादों - सब्जी, अनाज और दूध - की सप्लाई शहरों में नहीं करेंगे। न्यूनतम आमदनी गारंटी योजना के लिए, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू कराने के लिए और कर्ज़ों को माफ़ कराने के लिए किसानों की मांगों के समर्थन में, 10 जून को सुबह से 2 बजे तक देशभर में भारत बंद आयोजित किया जायेगा।

इसके अलावा, 3 मई, 2018 को दो किसान संघों - राष्ट्रीय किसान महासंघ और किसान एकता मंच (62 किसान संगठनों का निकाय) की समन्वय समिति ने चंडीगढ़ में एक सभा की, जिसमें उस आह्वान के लिए सहमति बनी। उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश से आये किसानों ने उसमें भाग लिया। कई और किसान संगठनों को विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए लामबंध करने की कोशिश जारी है।

20-21 नवम्बर, 2017 को देशभर के किसानों ने दिल्ली में संसद के सामने धरना दिया था। उन्होंने सरकार से यह मांग की थी कि उनकी रोज़ी-रोटी सुनिश्चित की जाए। लाभदायक दामों पर उनके उत्पादों की राज्य द्वारा सुनिश्चित खरीदारी न होना, कृषि के लिये ज़रूरी वस्तुओं के बढ़ते दाम, हजारों-हजारों किसानों को आत्महत्या करने को मजबूर करने वाला असहनीय क़र्ज़भार - इन सभी समस्याओं पर किसान नेताओं ने बड़ी भावुकता के साथ बात की। 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने कई हफ्तों तक अपना विरोध कार्यक्रम जारी रखा था। उन्होंने अपनी दुर्दशा की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने की बहुत कोशिश की थी। इसी वर्ष मार्च में, महाराष्ट्र के किसानों ने कड़ाके की धूप में लगभग 200 किमी चलकर, यह ऐलान किया था कि वे लड़ते हुए मरेंगे पर अपने खेतों में भूखे नहीं मरेंगे।

हिन्दोस्तान का शासक वर्ग किसानों की हालतों और मांगों की ओर पूरी तरह लापरवाह है। इन्साफ के लिए किसानों के लम्बे संघर्ष के दौरान, शहरों को सप्लाई रोक देना एक और कदम है।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी किसानों की क़र्ज़ माफ़ी और सरकारी खरीदारी की जायज़ मांगों का पूरा-पूरा समर्थन करती है। किसानों की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का फ़र्ज़ है। किसान कोई भीख नहीं मांग रहे हैं। सुनिश्चित रोज़गार उनका बुनियादी अधिकार है!

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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