कार्ल मार्क्स की 200वीं सालगिरह पर सभा

इस वर्ष 5 मई को वैज्ञानिक समाजवाद के जनक कार्ल मार्क्स के जन्म की 200वीं सालगिरह के रूप में मनाया गया। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी ने इस अवसर पर दिल्ली में सभा का आयोजन किया।

Marx Engels among worker

मार्क्स और एंगेल्स मज़दूरों के साथ विचार-विमर्श करते हुये

सभा की शुरुआत कार्ल मार्क्स की शिक्षाओं पर एक प्रस्तुति के साथ हुई। हम उस प्रस्तुति को संक्षिप्त में यहां पेश कर रहे हैं।

कार्ल मार्क्सदुनिया में वह पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने समाजवाद और मज़दूर वर्ग आन्दोलन को एक वैज्ञानिक बुनियाद प्रदान की। कार्ल मार्क्स और उनके साथी फ्रेडरिक एंगेल्स ने 1848 में कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र प्रकाशित किया, जो उस समय से लेकर आज तक का सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दस्तावेज़ साबित हुआ है।

कार्ल मार्क्स ने समाज के विकास के आम नियम और पूंजीवादी समाज की गति के खास नियम की खोज की। उनके बेशी मूल्य के सिद्धांत ने यह साबित किया कि मज़दूर का शोषण ही पूंजीवादी मुनाफे़ का स्रोत है। उन्होंने यह साबित किया कि पूंजीवादी समाज वर्ग-समाज का सबसे अंतिम पड़ाव है, जो समाज के अगले उच्चतर पड़ाव के लिए राह खोल देगा, एक ऐसा समाज जहां कोई वर्ग भेद नहीं होगा - एक आधुनिक कम्युनिस्ट समाज, जिसका पहला पड़ाव समाजवाद है।

माक्र्स ने श्रमजीवी वर्ग को एक ऐसे वर्ग के रूप में पहचाना, जो एकमात्र क्रांतिकारी शक्ति है जिसके पास समाज को पूंजीवाद से कम्युनिज़्म में परिवर्तित करने की दिलचस्पी और क़ाबिलीयत भी है। उन्होंने बताया कि समाज के सभी वर्गों और तबकों में केवल श्रमजीवी वर्ग ही एकमात्र वर्ग है जो पूंजी के बढ़ते संकेंद्रीकरण के साथ बढ़ता जाता है। किसान और अन्य छोटे उत्पादक तबकों का समय के साथ विघटन होता जाता है और इनमें से अधिकांश लोग अपनी संपत्ति खोकर मज़दूरों की कतारों में जुड़ते जाते हैं। उन्होंने बताया कि बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए मज़दूरों को इकट्ठा करते हुए पूंजीपति वर्ग खुद उसकी कब्र खोदने वाले वर्ग, आधुनिक श्रमजीवी वर्ग को जन्म देता है।

कार्ल माक्र्स ने इस बात को स्वीकार किया कि उनसे पहले आये कई विचारकों ने वर्ग संघर्ष को समाज के विकास की चालक शक्ति के रूप में पहचाना था और उन्होंने इसमें अपना विशेष योगदान देते हुए यह निष्कर्ष निकाला था कि आधुनिक समाज में वर्ग संघर्ष का नतीजा अनिवार्य रूप से श्रमजीवी वर्ग के अधिनायकत्व के रूप में होगा।

सरमायदार लगातार यह झूठा प्रचार करते रहते हैं कि माक्र्स की शिक्षा अब पुरानी हो गयी है और अब उसका कोई औचित्य नहीं रहा। ऐसा करने में उनका मकसद इस आदमखोर पूंजीवादी साम्राज्यवादी समाज की ज़िन्दगी को थोड़ा और लंबा करना है। वे नहीं चाहते कि मज़दूर वर्ग मार्क्सके क्रांतिकारी सिद्धांत से लैस हो जाये, जो सिद्धांत उनको पूंजीवाद का तख्ता पलटने और एक नये समाजवादी समाज का निर्माण करने में पथ-प्रदर्शक का काम करेगा।

इस प्रस्तुति में यह निष्कर्ष निकाला गया कि पिछले 170 वर्षों में दुनिया में हुई घटनाओं से मार्क्सकी वैज्ञानिक शिक्षाओं की वैधता की पुष्टि होती है। हम सभी को अपना ध्यान मज़दूर वर्ग को उसकी अपनी ताक़त और अपने ऐतिहासिक लक्ष्य के बारे में जागरुक करने की ओर केन्द्रित करना चाहिए।

इस प्रस्तुति के बाद “मज़दूर कौन है?” इस सवाल पर एक प्रस्तुति की गयी और उस पर चर्चा चलायी गयी। आज जब दुनियाभर में मज़दूर वर्ग की पहचान पर ही हमले किये जा रहे हैं, ऐसे माहौल में यह महसूस किया गया कि इस सवाल पर चर्चा करना बेहद ज़रूरी और उचित होगा, जिससे हम पूरे मज़दूर वर्ग को पूंजीवाद का तख़्ता पलट करने और एक नए समाजवादी समाज का निर्माण करने के उसके ऐतिहासिक लक्ष्य की दिशा में एकजुट करने के क़ाबिल बन सकें।

“मज़दूर कौन है?” इस सवाल पर प्रस्तुति में बताया गया कि किस तरह से कार्ल मार्क्सऔर एंगेल्स ने 1848 में प्रकाशित कम्युनिस्ट घोषणापत्र में यह थीसिस पेश की कि समाज बढ़ते पैमाने पर लगातार दो महान वर्गों में बंटता जा रहा है, जिनके आर्थिक हित एक दूसरे के खि़लाफ़ हैं - ये दो महान वर्ग हैं, पूंजीपति वर्ग और श्रमजीवी वर्ग। जैसे-जैसे पूंजीपतियों की संपत्ति बढ़ती जाती है और ज्यादा से ज्यादा संकेंद्रित होती जाती है, वैसे-वैसे श्रमजीवी वर्ग की तादाद बढ़ती जाती है और उसका शोषण और गरीबी बढ़ती जाती है। माक्र्सवाद ने श्रमजीवी वर्ग को एक ऐसे वर्ग के रूप में पहचाना जो पूंजीवाद का तख्ता पलट करने और समाजवाद का निर्माण करते हुए समाज को वर्ग भेद से मुक्त करने और एक वर्गहीन समाज, कम्युनिस्ट समाज का निर्माण करने में दिलचस्पी रखता है और ऐसा करने की क़ाबिलीयत भी रखता है।

आज के दौर में जो सबसे ज्यादा गैर-वैज्ञानिक विचार फैलाया जा रहा है, वो यह है कि आधुनिक समाज में सबसे अधिक तादाद में लोग “मध्यम वर्ग” के होते हैं। ऐसी धारणा पैदा की जाती है कि जिन लोगों को सबसे कम वेतन मिलता है केवल वे ही मज़दूर हैं। इस प्रचार का खास राजनीतिक लक्ष्य है, मज़दूर वर्ग को खुद अपनी ताक़त का एहसास करने से रोकना और उसे एकजुट होकर पूंजीवाद के खि़लाफ़ सामाजिक क्रांति को अगुवाई देने से रोकना।

समाज में आर्थिक वर्गों की वैज्ञानिक परिभाषा सामाजिक उत्पादन के साधनों के साथ वर्ग के संबंधों पर आधारित होती है। पूंजीपति वर्ग या सरमायदार वर्ग में वे लोग आते हैं जो सामाजिक उत्पादन के साधनों के मालिक हैं। श्रमजीवी या मज़दूर वर्ग में वे लोग आते हैं जो सामाजिक उत्पादन के साधनों के मालिक नहीं हैं और जिन्हें आजीविका के लिए वेतन के बदले अपनी श्रम शक्ति को बेचना पड़ता है। पूंजीपति वर्ग मुनाफ़ों के रूप में मज़दूर वर्ग द्वारा पैदा किये गए मूल्य के एक हिस्से को हथिया लेता है और यही उसकी संपत्ति के संचयन का स्रोत है।

सरमायदारों और श्रमजीवियों के बीच कई ऐसे लोग हैं जो उत्पादन के अपने छोटे-छोटे साधनों पर काम करते हैं, जैसे कि किसान, कारीगर, छोटे दुकानदार और अन्य “स्व-रोज़गार” करने वाले लोग, जिनको टटपँूजिया भी कहा जाता है। बीच के इन तबकों के लोगों का भविष्य हमेशा अनिश्चित होता है। इनमें से बेहद कम संख्या में लोग सरमायदार वर्ग की ओर बढ़ पाते हैं जबकि अधिकांश लोग अंत में मज़दूर वर्ग की कतार में जुड़ते जाते हैं।

मज़दूर वर्ग, जिसमें खेत-मज़दूर, खान मज़दूर, फैक्ट्री और निर्माण मज़दूर, रेलवे, एयरलाइन और सड़क परिवहन मज़दूर, बैंक कर्मचारी, आई.टी. और मीडिया मज़दूर, स्कूल और यूनिवर्सिटी के शिक्षक, डॉक्टर, नर्स इत्यादि शामिल हैं और ये मज़दूर हमारे देश की करीब-करीब आधी आबादी हैं। हमारा मज़दूर वर्ग बहु-राष्ट्रीय और बहु-भाषीय है। सबसे संगठित और संभवतः मज़दूरों का सबसे शक्तिशाली यह तबका बड़े-पैमाने के उद्योगों और सेवा क्षेत्रों में काम करता है।

सरमायदार अलग-अलग तबकों के मज़दूरों के बीच वेतन के स्तर में अंतर को मज़दूरों को बांटने के लिए इस्तेमाल करते हैं। लेकिन असलियत यह है कि सभी तबकों के मज़दूरों का शोषण तेज़ी से बढ़ रहा है।

मौजूदा पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में मज़दूरों का वेतन किस तरह से तय किया जाता है, इसको प्रस्तुति के माध्यम से समझाया गया। श्रमशक्ति का मूल्य उन तमाम वस्तुओं के मूल्य का कुल मूल्य है, जो एक मज़दूर को ज़िन्दा रखने और काम करने योग्य स्वस्थ रखने के लिए ज़रूरी है ताकि मज़दूर दिन-प्रतिदिन काम पर जा सके। वेतन का स्तर किसी काम को करने के लिए ज़रूरी हुनर और ट्रेनिंग पर निर्भर करता है। एक ही तरह की श्रमशक्ति और हुनर के स्तर का मूल्य अमरीका और कनाडा के मुकाबले चीन, हिन्दोस्तान और बांग्लादेश में अलग है। इसकी वजह उन देशों के ऐतिहासिक रूप से विकसित जीने के हालत और जीने के लिए ज़रूरी वस्तुओं के मानक हैं। वेतन की दर इस श्रमशक्ति के मूल्य के आस-पास बदलती रहती है।

इस बात को समझना बेहद ज़रूरी है कि श्रम के शोषण की तीव्रता को पूंजीपतियों द्वारा निचोड़े गए बेशी मूल्य के अनुपात में मज़दूरों को वेतन के रूप में दिए गए मूल्य से मापा जाता है। हिन्दोस्तान के मज़दूर वर्ग का एक हिस्सा ऐसा भी है जिसे अन्य मज़दूरों की तुलना में बहुत अधिक वेतन मिलता है, लेकिन विदेशी पूंजीपति कंपनियों द्वारा उनका असाधारण स्तर पर शोषण किया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मज़दूरों के सभी तबकों का शोषण लगातार बढ़ता जा रहा है, और इस वक्त यह शोषण मज़दूरों के सभी तबकों को पूंजीवादी हमलों के खि़लाफ़ सांझे संघर्ष में एकजुट कर रहा है।

प्रस्तुति में इस बात को भी समझाया गया कि हमारे देश में मज़दूरों के अधिकारों से संबंधित श्रम कानूनों की जिस तरह से परिभाषा दी जाती है उससे मज़दूर वर्ग का एक बड़ा हिस्सा किसी भी तरह की कानूनी सुरक्षा से वंचित रहा जाता है। उदाहरण के लिए जो कोई मज़दूर 10,000 रुपये प्रति माह से अधिक वेतन पाता है उसे इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट के दायरे से बाहर रखा गया है। कोई भी व्यक्ति जिसे मैनेजर या प्रबंधन कार्यों के लिये रखा गया है, या अप्रेंटिस के रूप में रखा गया है, उसे मज़दूर नहीं माना जाता है। आई.टी., मीडिया, बैंक जैसे कई अन्य क्षेत्रों में फैक्ट्री एक्ट के तहत लगाई गयी कार्य-दिवस की समय-सीमा लागू नहीं होती है। “अति आवश्यक सेवाओं” में काम कर रहे मज़दूरों को हड़ताल करने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। आधिकारिक तौर से मज़दूरों, कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच बनावटी भेदभाव और ज़रूरी तथा गैर-ज़रूरी कार्यों के बीच भेदभाव के चलते अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त में मज़दूरों के एकजुट सांझे संघर्ष को कमजोर किया जाता है।

प्रस्तुति से यह निष्कर्ष निकाला गया कि मज़दूरों के तमाम तबकों को पूंजीपति वर्ग द्वारा अधिक से अधिक शोषण का सामना करना पड़ रहा है। इसकी वजह से मज़दूरों का एकजुट संघर्ष बढ़ता जा रहा है। हमारे सांझे दुश्मन के खि़लाफ़ यह हमारा सांझा संघर्ष है। हमें मज़दूर वर्ग को इस बारे में जागरुक करने की ज़रूरत है कि उसमें पूंजीवाद के खि़लाफ़ अपने संघर्ष को अंतिम मंजिल तक ले जाने की ताक़त और क़ाबिलीयत है।

प्रस्तुति के पश्चात पार्टी के साथियों और कार्यकर्ताओं ने अपने अनुभव से कई उदाहरण देते हुए बताया कि मज़दूर वर्ग के सभी तबकों का शोषण तेज़ होता जा रहा है। इन साथियों और कार्यकर्ताओं में बड़े पैमाने पर नौजवान और छात्र शामिल थे। उन्होंने बढ़ते पैमाने पर ठेका मज़दूरों और “निर्धारित अवधि के ठेके पर नौकरी” के इस्तेमाल का उदाहरण दिया। उन्होंने एयरलाइन के पायलटों का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह से कुछ क्षेत्रों में चुनिंदा हुनर की श्रमशक्ति का बाज़ार में मूल्य बहुत अधिक होता है। लेकिन ऐसे क्षेत्र के मज़दूर भी तेज़ होते शोषण के खि़लाफ़ संघर्ष में उतर रहे हैं। एक साथी ने उबर और ओला कंपनी के टैक्सी चालकों का उदाहरण देते हुए बताया कि उनका भी बहुत शोषण होता है और उनकी दयनीय हालत है जबकि उनको “बिजनेस पार्टनर” कहा जाता है। इन लोगों को अपनी खुद की कार खरीदने के लिए बैंक से कर्ज़ लेने के लिए मजबूर किया जाता है। अब उनकी आमदनी लगातार कम होती जा रही है और वे अपना कर्ज़ा वापस नहीं कर पा रहे हैं। इसकी वजह से कई लोग पूरी तरह से बर्बाद हो गए हैं। कई साथियों ने मज़दूर एकता लहर के अंक बेचते समय का अपना अनुभव बताते हुए कहा कि कई बार उनका वास्ता ऐसे मज़दूरों से पड़ा है जो खुद को मज़दूर नहीं बल्कि तथाकथित रूप से मैनेजर समझते हैं। साथियों ने उनको समझाया कि असलियत में वे भी मज़दूर ही हैं और किसी भी दिन मालिक उनको भी नौकरी से निकालकर सड़क पर खड़ा कर सकता है। अपनी रोज़ी-रोटी के लिए विदेशों में जाने को मजबूर हिन्दोस्तानी मज़दूरों के बारे में भी चर्चा की गयी। कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी ऐसे अप्रवासी मज़दूरों को अपने ही लोगों का हिस्सा समझती है और यह मानती है कि ये लोग हिन्दोस्तान में क्रांति की ताक़त का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं।

सभा का समापन इस फैसले के साथ किया गया कि हम सभी को मज़दूर वर्ग के व्यापक तबके के बीच “मज़दूर कौन है?” इस सवाल को स्पष्ट करना चाहिए। इस सवाल पर मज़दूरों के बीच विचारों में एकता बनाने से मज़दूर वर्ग को पूंजीवाद की कब्र खोदने वाले वर्ग और समाजवाद के जनक के रूप में उसकी क़ाबिलीयत के बारे में जागरुक करने में कम्युनिस्ट आंदोलन को बहुत मदद मिलेगी।

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200वीं सालगिरह    मार्क्स के जन्म    वैज्ञानिक बुनियाद    May 16-31 2018    Voice of the Party    History    Philosophy    2018   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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