पूंजीपतियों की लालच और सांप्रदायिक राजनीति के चलते कर्नाटक तबाह हो रहा है!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 9 मई, 2018

12 मई को कर्नाटक की 224 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव होंगे। इन चुनावों में सैकड़ों उम्मीदवार खड़े हो रहे हैं, जिनमें कम्युनिस्ट पार्टियों के उम्मीदवार तथा जन अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले संगठनों के उम्मीदवार भी शामिल हैं। परन्तु बड़े पूंजीपतियों के नियंत्रण में मीडिया इन चुनावों को सिर्फ कांग्रेस पार्टी, भाजपा और जनता दल (सेक्यूलर) के बीच मुकाबले के रूप में पेश कर रही है, जैसे कि सिर्फ इन तीनों पार्टियों पर ही कर्नाटक का भविष्य निर्भर है; किसी और की कोई अहमियत नहीं है।

ये चुनाव ऐसे समय पर हो रहे हैं जब लोग राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण और आतंकी गिरोहों द्वारा फैलाए गए फासीवादी आतंक व सांप्रदायिक नफ़रत की वजह से बहुत परेशान और गुस्से में हैं। पिछड़े रिवाज़ों के खि़लाफ़ आवाज़ उठाने वाले और सच्चाई का खुलासा करने वाले प्रगतिशील विचारकों, कवियों, कलाकारों और पत्रकारों, आदि को हिंसक धमकियों का सामना करना पड़ रहा है। बीते वर्षों में, उनमें से कई लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया है। केंद्र और राज्य सरकारें एक-दूसरे पर आरोप लगाती हैं, जबकि क़ातिलों को अभी तक पकड़ा नहीं गया है, उन्हें सज़ा नहीं दी गयी है। असली क़ातिल कौन हैं, यह भी रहस्य बनकर रह गया है।

चुनाव अभियान के चलते, कर्नाटक में सांप्रदायिक तनाव बहुत बढ़ गया है। तीनों मुख्य स्पर्धाकारी पार्टियों ने हर निर्वाचन क्षेत्र में उम्मीदवारों का चयन, मतदाताओं की जाति और धर्म के आधार पर किया है। झूठ और गाली-गलौच फैलाया जा रहा है। उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के कार्यक्रम से प्रेरित, तेज़ गति से हो रहे पूंजीवादी संवर्धन की वजह से, कर्नाटक में जो तबाही फैल रही है, उससे हमारे हुक्मरान लोगों का ध्यान हटाने की कोशिश कर रहे हैं।

कर्नाटक में तेज़ गति से हो रहे पूंजीवादी संवर्धन के चलते, चन्द लोगों के हाथों में बेशुमार दौलत एकत्रित हो गयी है, जबकि जनसमुदाय की गुरबत बढ़ती जा रही है। हाल के दशकों में, इजारेदार पूंजीपति, खदानों के मालिक, रियेल एस्टेट मालिक और अन्य शोषक, भ्रष्ट नेता और अफ़सर बहुत अमीर बन गए हैं। मज़दूरों और किसानों के जीवन की हालतें साल दर साल, बद से बदतर होती जा रही हैं।

बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है और श्रम का शोषण भी। कृषि में लागत की वस्तुओं और उत्पादों के व्यापार के उदारीकरण की वजह से, तथा सिंचाई के लिए वर्षा पर बढ़ती निर्भरता की वजह से, किसानों की रोज़ी-रोटी बहुत असुरक्षित होती जा रही है। किसानों का कर्ज़भार बढ़ गया है और उनकी खुदकुशियों की संख्या भी।

औद्योगिक मज़दूर कर्नाटक में स्थित रक्षा सामग्रियों के उत्पादन के उद्योगों और दूसरे भारी उद्योगों के निजीकरण को फौरन रोकने के लिए आन्दोलन चला रहे हैं। तमाम क्षेत्रों में मज़दूर श्रम कानूनों के पूंजीवाद-परस्त सुधारों के खि़लाफ़, नियमित नौकरियों की जगह पर सीमित समय के ठेकों, आदि के खि़लाफ़ संघर्ष कर रहे हैं। आई.टी. क्षेत्र, जिसमें हजारों लोगों की नौकरियां चली गयी हैं, उसमें मज़दूर अपने अधिकारों की रक्षा करने के लिए यूनियन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। आंगनवाड़ी और आशा कर्मी तथा अन्य मज़दूर भी ऐसा ही कर रहे हैं।

पूरे राज्य में किसान संगठन अपनी फसलों के लिए राज्य द्वारा स्थाई और लाभदायक दामों पर सुनिश्चित खरीदारी की मांग कर रहे हैं। पूंजीपति वर्ग की हर पार्टी इस मांग को पूरा करने का वादा करती है। परन्तु सत्ता में आकर वे वादाखि़लाफ़ी करती हैं, क्योंकि वे उद्योग के उदारीकरण के कार्यक्रम के प्रति वचनबद्ध हैं। वे कृषि व्यापर से निजी कंपनियों के अधिकतम मुनाफ़ों को सुनिश्चित करने की गुंजाइश बढ़ाना चाहती हैं।

सभी तबकों के लोग राजनीति के अपराधीकरण और सांप्रदायिकीकरण के खि़लाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं। वे राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और आतंक का विरोध कर रहे हैं। वे कर्नाटक में प्राकृतिक और सामाजिक पर्यावरण के विनाश के खि़लाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं। लोग उन पार्टियों और नेताओं की निंदा कर रहे हैं, जो अपने तंग चुनावी फायदों के लिए, कर्नाटक के वीरों और देश भक्तों के नाम का दुरुपयोग कर रहे हैं।

हमारे देश में हर चुनाव में बार-बार यही स्पष्ट होता है कि वर्तमान राजनीतिक प्रक्रिया पूंजीपति वर्ग की प्रतिस्पर्धी पार्टियों के लिए, लोगों को सांप्रदायिक और सामुदायिक आधार पर बांटने और शोषकों के अलग-अलग गुटों के पीछे लामबंध करने के इरादे से बनायी गयी है।

इस व्यवस्था के चलते, सिर्फ उन्हीं उम्मीदवारों के जीतने की संभावना है, जिन्हें बड़े पूंजीपतियों द्वारा समर्थित पार्टियों ने चुना है। जाना जाता है कि कर्नाटक में तीन मुख्य प्रतिस्पर्धी पार्टियों ने जिन-जिन उम्मीदवारों को चुना है, उनमें से अधिकतर खुद ही करोड़पति हैं और उन पर गंभीर अपराधों के आरोप हैं।

पूंजीपति वर्ग की पार्टियां चुनाव प्रक्रिया पर हावी हैं। पूंजीपति अपने धनबल तथा मीडिया पर अपने नियंत्रण का इस्तेमाल करके, यह सुनिश्चित करते हैं कि उनकी पसंद वाली पार्टी चुनाव में जीतती है या विजेता गठबंधन की अगुवाई करती है। वोट डालने के बाद, किसकी सरकार बनेगी और वह सरकार किन नीतिगत कदमों को लागू करेगी, उसे निर्धारित करने में जनता की कोई भूमिका नहीं होती। मतदाताओं के पास, चुने गए प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराने का कोई साधन नहीं है। जो भी सरकार बनती है, वह इजारेदार पूजीपतियों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग के प्रति जवाबदेह होती है।

कांग्रेस पार्टी और भाजपा सबसे बड़े हिदोस्तानी इजारेदार पूंजीपति घरानों के साथ-साथ कर्नाटक के पूंजीपतियों और जमींदारों के अलग-अलग गठबंधनों का प्रतिनिधित्व करती हैं। वे दोनों ही देश के सभी इलाकों में, आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों के हर क्षेत्र में, अधिकतम इजारेदार पूंजीवादी लूट के एक ही हानिकारक और तबाहकारी कार्यक्रम के प्रति वचनबद्ध हैं। वे दोनों सांप्रदायिकता की राजनीति का प्रयोग करती हैं, धर्म और जाति के आधार पर वोट जीतने के प्रयास करती हैं। भाजपा खुले रूप से सांप्रदायिक और बदला लेने की भावना से प्रेरित है जबकि कांग्रेस पार्टी कपटी रूप से सांप्रदायिक है, धर्म निरपेक्षता के नाम पर “सहनशीलता” का प्रचार करती है।

जनता दल (सेक्यूलर) दक्षिण कर्नाटक के स्थानीय पूंजीपतियों व जमींदारों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है। कर्नाटक के पूंजीपति और जमींदार वहां की भूमि और श्रम की लूट को बढ़ाकर, हिन्दोस्तान के सबसे बड़े इजारेदार पूंजीपति घरानों और विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के साथ मिलकर काम करने और इससे अपने मुनाफ़ों को बढ़ाने को बहुत इच्छुक हैं।

संक्षेप में, पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के कदम तथा पूंजीपति वर्ग की प्रमुख पार्टियों की बढ़ती गुनहगार और सांप्रदायिक राजनीति कर्नाटक की तबाही के लिए ज़िम्मेदार है। चंद लालची पूंजीपति न सिर्फ कर्नाटक को बल्कि पूरे हिन्दोस्तान को उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के तबाहकारी रास्ते पर खींचते जा रहे हैं। यह मज़दूरों और किसानों की रोज़ी-रोटी और अधिकारों की बलि चढ़ाकर, हिन्दोस्तानी और विदेशी बड़ी-बड़ी पूंजीवादी कंपनियों के मुनाफ़ों को अधिक से अधिक बढ़ाने का कार्यक्रम है। इन हालतों में, कर्नाटक और पूरे हिन्दोस्तान की सभी प्रगतिशील और जनवादी ताक़तों को, सभी चिंतित लोगों को इस तबाहकारी रास्ते के खि़लाफ़ एकजुट हो जाना चाहिये।

पूंजीपति वर्ग का राजनीतिक कार्यक्रम है मज़दूरों और किसानों को जाति और धर्म के आधार पर, “हिन्दुत्व” और “धर्म निरपेक्षता” की छावनियों में बांट कर रखना। हमारी एकता को तोड़ने की उनकी कोशिशों को नाकामयाब करना होगा। हमें मज़दूरों, किसानों, प्रगतिशील बुद्धिजीवियों और कर्नाटक के भविष्य के बारे में चिंतित सभी लोगों का सांझा राजनीतिक मोर्चा बनाना होगा। हमारा संघर्ष पूंजीपति वर्ग और जनता को सामुदायिक आधार पर बांटने व पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के उसके कार्यक्रम के खि़लाफ़ है।

वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था और राज्य तंत्र को बरतानवी उपनिवेशवादियों ने इस उपमहाद्वीप के विविध लोगों को बांटकर उन पर राज करने के लिए स्थापित किया था। आज इजारेदार घरानों की अगुवाई में, हिन्दोस्तानी पूंजीपति वर्ग इस राज्य तंत्र को चला रहा है और सभी इलाकों के मज़दूरों, किसानों व दूसरे उत्पीड़ित लोगों को बांटकर उन पर शासन कर रहा है। सेना, सुरक्षा बल और अफ़सरशाही को पूंजीवादी शासन के खि़लाफ़ किसी भी विरोध को कुचलने का प्रशिक्षण दिया गया है।

हिन्दोस्तान का संविधान फैसले लेने की सर्वोच्च ताक़त, यानी संप्रभुता संसद में मंत्री मंडल की हाथों में देता है। लोगों की भूमिका सिर्फ वोट डालने तक सीमित रखी जाती है। बहुपार्टीवादी लोकतंत्र की बहुचर्चित राजनीतिक प्रक्रिया जनता को सत्ता से बाहर रखने और बड़े मालदारों की पार्टियों के हाथों में सत्ता को संकेंद्रित करने का काम करती है।

कर्नाटक और पूरे हिन्दोस्तान को संकट से बाहर निकालने के लिए देश के नव-निर्माण की ज़रूरत है। हमें एक ऐसे नए राज्य की स्थापना करनी होगी जिसका कर्तव्य होगा सभी की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करना। उस नए राज्य को एक ऐसे संविधान पर आधारित होना होगा जो जनता के हाथों में संप्रभुता दिलायेगा। राजनीतिक पार्टियों की भूमिका को नयी परिभाषा देनी होगी। जनता के नाम पर शासन करने के बजाय, उनका कर्तव्य होगा जनता को सत्ता में बनाए रखना।

कार्यकारिणी को निर्वाचित विधिपालिका के प्रति जवाबदेह होना होगा और विधिपालिका को उस जनता के प्रति, जिसने उसे चुना है। जनता को यह अधिकार होना चाहिए कि वह उन उम्मीदवारों का चयन करे और उन्हें चुनकर जिताए, जिन पर जनता का भरोसा हो। जनता को यह भी अधिकार होना चाहिए कि चुने गए प्रतिनिधियों को किसी भी समय वापस बुला सके और कानून प्रस्तावित कर सके। राज्य को चयन और चुनाव प्रक्रिया के लिए धन देना चाहिए और धन के किसी अन्य स्रोत की इजाज़त नहीं देनी चाहिए।

नया राज्य अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा देगा, ताकि जनता की ज़रूरतें अधिक से अधिक हद तक पूरी हो सकें। उत्पादन और विनिमय के प्रमुख साधनों को, जो इस समय इजारेदार पूंजीवादी घरानों के नियंत्रण में हैं, जनता की ज़रूरतें पूरी करने के लिए सामाजिक संपत्ति में तब्दील करना होगा।

आज वक्त की मांग है कि इजारेदार घरानों की अगुवाई में पूंजीवादी राज्य के हमले और सांप्रदायिक राजनीति के खि़लाफ़ सभी प्रगतिशील ताक़तें एकजुट हो जाएं। सरकार चाहे किसी भी पार्टी की बने, हमें अपने अधिकारों के संघर्ष को तेज़ करना होगा। हमें नव-निर्माण के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट होना होगा। हमें अपने हाथों में राज्य सत्ता लेने के लिए, सभी को खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित कराने वाले एक नए राज्य और आर्थिक व्यवस्था बनाने के लिए एकजुट होना होगा।

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सांप्रदायिक राजनीति    लालच    कर्नाटक    सेक्यूल    May 16-31 2018    Statements    Political Process     Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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