जन एकता जन अधिकार आन्दोलन : रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर बढ़ते हमलों के खि़लाफ़ हजारों ने प्रदर्शन किया

“हमारी रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर हमले बंद करो!”, “मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों की एकता ज़िंदाबाद!”, “मेहनतकशों को लूटना बंद करो!”, “बड़े पूंजीपतियों की तिजोरियों को भरना बंद करो!”, “देश और जनता के संसाधनों को बेचना बंद करो!”, “महिलाओं पर बढ़ता अत्याचार नहीं चलेगा!”, “सरकार महिलाओं को सुरक्षा दे!”, “सांप्रदायिक हिंसा और जातिवादी हमले मुर्दाबाद!”, “हमें चाहिए नौकरी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा!”, आदि जोशीले नारों से नयी दिल्ली की सड़कें 23 मई को गूंज उठीं।

Jan Ekta Jan Adhikar andolan meeting
Jan Ekta Jan Adhikar andolan march

हजारों लोगों, नौजवानों और बुजुर्गों, ने “जन एकता जन अधिकार आन्दोलन” के झंडे तले, मंडी हाउस से जंतर-मंतर तक प्रदर्शन किया। उनके हाथों में प्लेकार्ड और बैनर थे, जिन पर उनकी मांगों के नारे लिखे थे। इनमें कुछ मुख्य थे -  ठेका मज़दूरी को खत्म करना, महिला मज़दूरों के लिए समान वेतन, मज़दूरों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए श्रम कानूनों को लागू करना, किसानों के लिए कर्ज़ माफ़ी और लाभदायक दाम पर फसल की खरीदारी, महिलाओं के लिए सुरक्षा, सांप्रदायिक और जातिवादी नफ़रत फैलाने वालों को कड़ी सज़ा, शिक्षा के निजीकरण को वापस लेना, इत्यादि। 

जन एकता जन अधिकार आन्दोलन को मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों, उत्पीड़ित जातियों व राष्ट्रीयताओं के लोगों की रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर बढ़ते हमलों पर रोशनी डालने के लिये आयोजित किया जा रहा है। ट्रेड यूनियन और मज़दूर संगठन, किसान संगठन, महिला संगठन, युवा और छात्र संगठन तथा अनेक और जन संगठन जो मानवीय, जनवादी और राष्ट्रीय अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, आदिवासी अधिकार संगठन, इत्यादि, सब अपने अधिकारों की आवाज़ उठाने के लिए इस झंडे तले इकट्ठे हुए हैं। देश के अनेक इलाकों में कई विरोध कार्यक्रम आयोजित किये गए हैं और किये जा रहे हैं तथा 2019 में होने वाले लोक सभा चुनावों तक, आगामी महीनों में कई ऐसे कार्यक्रमों की योजना बनायी जा रही है। जाना जाता है कि 23 मई के दिन ही, हिन्दोस्तान की अलग-अलग जगहों पर, लगभग 6,000 ऐसे विरोध प्रदर्शन हुए थे।

जंतर-मंतर पर एक विशाल जनसभा हुई। “राजग सरकार के चार साल: पोल खोल, हल्ला बोल!”, यह बड़ा सा बैनर मंच के पीछे लगा हुआ था। सहभागी संगठनों के नेताओं ने मंच पर अपने स्थान लिए। संगवारी नाट्य मंच के नौजवानों ने दो गीत प्रस्तुत किये, जिनमें उत्पीड़ित लोगों की मांगों और उन पर हो रहे हमलों का विरोध करने के उनके संकल्प का वर्णन किया गया। विभिन्न सहभागी संगठनों के वक्ताओं ने सभा को संबोधित किया।

भूतपूर्व लोकसभा सदस्य और अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष, कामरेड हन्नन मोल्लाह ने सभा के संचालक बतौर, सभी को संबोधित किया। उन्होंने आरम्भ में, सभी उपस्थित लोगों से अनुरोध किया कि देश के विभिन्न इलाकों में राजकीय आतंकवाद के शिकार बने लोगों की याद में एक मिनट मौन खड़ा हुआ जाए। जनसभा को संबोधित करने वाले अन्य वक्ताओं में शामिल थे एटक से कामरेड अतुल कुमार अनजान, ए.आई.यू.टी.यू.सी. से कामरेड सत्यवान, ए.आई.सी.सी.टी.यू. से कामरेड संतोष राय, यू.टी.यू.सी. से कामरेड मनोज भट्टाचार्य, ऑल इंडिया अग्रगामी किसान सभा से कामरेड एस.एम. चैहान, ऑल इंडिया महिला सांस्कृतिक संगठन से कामरेड रितु कौशिक, दलित शोषण मुक्ति मंच से कामरेड नाथू प्रसाद और मज़दूर एकता कमेटी से कामरेड सुचरिता। 

वक्ताओं ने बीते 4 वर्षों में मोदी सरकार के शासन की जमकर निंदा की। उन्होंने “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” के नाम से श्रम कानूनों में किये जा रहे पूंजीपति-परस्त परिवर्तनों और मज़दूरों के अधिकारों पर बढ़ते हमलों का विवरण दिया। जबकि देशभर में किसान अपनी मांगों - लाभदायक दामों पर फसल की खरीदारी की गारंटी, कर्ज़ माफ़ी व फसल बीमा - के इर्द-गिर्द इकट्टा हो रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी आवाज़ सुनने से इनकार कर रही है। वक्ताओं ने महिलाओं पर बढ़ती हिंसा की निंदा की और राज्य के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा महिलाओं पर अपराधों के समर्थन, जैसा कि कठुआ और उन्नाव कांडों में देखा गया था, इसकी कड़ी आलोचना की। उन्होंने पी.पी.पी. मॉडल के ज़रिये और “उच्च शिक्षा संस्थानों को स्वायत्तता देने” के नाम पर, शिक्षा के बढ़ते निजीकरण और छात्रों व युवाओं पर बढ़ते हमलों की निंदा की। विभिन्न रणनैतिक महत्व वाले क्षेत्रों को प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश के लिए खोल देने के कदमों तथा अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ हमारी सरकार के बढ़ते सहकार्यों के बारे में वक्ताओं ने चेतावनी दी। उन्होंने बढ़ती फासीवादी धारा और बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा, जातिवादी हिंसा व राजकीय आतंकवाद पर बात की। रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर हो रहे इन सभी हमलों का मुकाबला करने के लिए, वक्ताओं ने सभी से आह्वान किया कि एकजुट होकर, एक प्रबल ताक़त बनकर, संघर्ष में आगे आयें।

मज़दूर एकता कमेटी के प्रतिनिधि ने कहा कि जो भी सरकार सत्ता में आती है, चाहे धर्म निरपेक्षता के झंडे के साथ या साम्प्रदायिकता के झंडे के साथ, वह पिछली सरकार से कहीं अधिक क्रूरता के साथ मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों पर हमले करती है। जो भी सरकार आती है, वह सांप्रदायिक और जातिवादी आधार पर लोगों को और ज्यादा बांटती है, राजकीय आतंकवाद के और ज्यादा वहशी तौर तरीके इस्तेमाल करती है। इसकी वजह यह है कि हर तात्कालिक सरकार के पीछे वही शासक वर्ग खड़ा है - लगभग 150 इजारेदार पूंजीपति घरानों की अगुवाई में इजारेदार पूंजीपति वर्ग। यही शासक वर्ग समाज का कार्यक्रम निर्धारित करता है। यही शासक वर्ग यह फैसला करता है कि कौन-सी सरकार उसके कार्यक्रम को सबसे बेहतर तरीके से लागू कर सकेगी। मीडिया, जो कि पूरी तरह से इजारेदार पूंजीपति शासक वर्ग के नियंत्रण में है, वह लोगों के दिमाग को घुमाने के लिये दिन-रात प्रचार करती रहती है और इस तरह वही चुनावी नतीजा हासिल किया जाता है जो शासक वर्ग के हितों के लिए सबसे बेहतर हो। वर्तमान बहुपार्टीवादी, प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र की व्यवस्था की कड़ी आलोचना करते हुए, उन्होंने हाल में कर्नाटक में हुए चुनावों की गतिविधियों की ओर इशारा किया। इससे साफ दिखता है कि जनादेश और जनमत की सारी बातें खोखली हैं, क्योंकि यहां तो सिर्फ धनादेश (बड़े इजारेदार पूंजीपतियों का आदेश) और धनमत (बड़े इजारेदार पूंजीपतियों का मत) दिखाई देता है। यह कहना कि “लोग अपनी सरकार चुनते हैं”, यह सबसे बड़ा धोखा है। हम न तो अपने उम्मीदवारों का चयन कर सकते हैं, न चुने गए प्रतिनिधियों से जवाब मांग सकते हैं। हम चुने गए प्रतिनिधियों को वापस नहीं बुला सकते हैं, हालांकि वे इजारेदार पूंजीपतियों के हित में काम करते हैं। हम अपने हित में कानून नहीं बना सकते हैं। सभी मुख्य राजनीतिक पार्टियां एक ही शासक वर्ग का काम करती हैं, इसलिए उनके कार्यकर्ता सत्ता की लालच में कभी इस पार्टी तो कभी उस पार्टी में भटकते रहते हैं। वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था और प्रक्रिया इजारेदार पूंजीपति वर्ग के शासन को बरकरार रखने का काम करती है। हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि यह व्यवस्था मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों के हित में नीतियां और कानून बनाएगी। हम सब जो आज यहां 46 डिग्री तापमान को झेलते हुए इकट्ठे हुए हैं, हमें मज़दूरों और किसानों का शासन स्थापित करने के उद्देश्य के साथ अपने एकजुट संघर्ष को आगे बढ़ाना होगा। सिर्फ मज़दूर-किसान का राज ही अर्थव्यवस्था को मज़दूरों और किसानों के हित में चलाएगा और एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया लागू करेगा जिसमें यह सुनिश्चित होगा कि मज़दूर-किसान ही फैसले लेंगे। “हम हैं इसके मालिक, हम हैं हिन्दोस्तान, मजदूर-किसान, औरत और जवान!”, इस जोशभरे नारे के साथ उन्होंने अपनी बातें समाप्त कीं।

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जन एकता    जन अधिकार आन्दोलन    Jun 1-15 2018    Struggle for Rights    Privatisation    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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