निजीकरण से बैंकों के संकट का कोई हल नहीं है

देश के सबसे बड़े बैंकों की गैर- निष्पादित संपत्ति (एन.पी.ए.) यानी न चुकाये गये कर्ज़ों का आंकड़ा 1 लाख करोड़ रुपये के आगे बढ़ जाने के संदर्भ में पूंजीपति वर्ग के तमाम प्रवक्ताओं ने ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया है कि बैंकों के इस संकट का एकमात्र उपाय निजीकरण ही है। लेकिन पिछले कुछ दिनों की घटनाओं ने इस धोखे का पर्दाफाश कर दिया है।

एक्सिस बैंक जिसने जनवरी-मार्च 2017 की तिमाही में 1225 करोड़ रुपये का मुनाफ़ा दिखाया था, उसने 2018 की इसी तिमाही में 2188 करोड़ रुपये का घाटा दिखाया है। इससे उस झूठ का पर्दाफाश हो गया है कि निजी बैंक हमेशा मुनाफ़े ही बनाते हैं।

देश का सबसे पुराना और सबसे बड़ा निजी बैंक आई.सी.आई.सी.आई. बैंक का प्रबंधन सबसे ऊंचे स्तर की धोखेबाजी के आरोपों से हिल गया है। यह घटना इस झूठ का पर्दाफाश करती है कि केवल सार्वजनिक बैंक ही भ्रष्ट हैं।

एन.पी.ए. की मूल वजह इजारेदार पूंजीवादी व्यवस्था में निहित है, जहां बैंक पूंजीपतियों द्वारा अधिकतम लूट का ज़रिया बन जाते हैं। निजीकरण, उदारीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के झंडे तले राज्य ने जबसे अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्र अधिकतम पूंजीवादी लूट के लिए खोल दिए हैं तब से यह संकट और भी गहरा होता जा रहा है।

सार्वजनिक बैंकों सहित सभी व्यवसायिक बैंकों पर यह दबाव डाला जा रहा है कि अधिकतम मुनाफे़ की दर हासिल करने के लिए, जितना हो सके उतनी तेज़ी से कर्ज़ दें और आपस में होड़ करें। इजारेदार पूंजीपति घरानों की अगुवाई में पूंजीपतियों की तमाम मुनाफ़ाखोर कार्यवाहियों के लिए भारी कर्ज़ दिए गए हैं।

एन.पी.ए. के संकट का हल करने के नाम पर जो कदम उठाये गए हैं वे दरअसल बड़े पूंजीपतियों के फायदे के लिये उठाये गए हैं, जबकि पूंजीपति ही इस संकट का कारण हैं। 

आल इंडिया बैंक एम्प्लाइज एसोसिएशन (ए.आई.बी.ई.ए.) के महासचिव कामरेड ए.एच. वेंकटचलम के हाल में दिये एक इंटरव्यू में बताया कि वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में लाया गया ‘इन्सोल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड’ (आई.बी.सी.) दरअसल बैंकों और अन्य लेनदारों को अपने डूबते कर्ज़ों के लिये बड़ी कुरबानी देने को तैयार करने का एक ज़रिया है, जिसे “हेअरकट” कहा जाता है। इस कानून के ज़रिये बड़े पूंजीपति कर्ज़दारों के पास बकाया कर्ज़ों के 75 प्रतिशत हिस्से की कुरबानी देने के लिए सार्वजनिक बैंकों को मजबूर किया जा रहा है। आई.बी.सी. के पास ऐसा एक बड़ा मामला है टाटा स्टील द्वारा भूषण पॉवर एंड स्टील का अधिग्रहण, जिसके तहत लेनदार बैंकों के 23 हजार करोड़ रुपये की बकाया रकम की कर्ज़ माफ़ी दी जा रही है।

हमारे देश के करोड़ों लोगों के लिये सबसे बड़ी चिंता का विषय है, बैंकों के पास जमा किये गए उनके पैसों की सुरक्षा। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मालिक बतौर और लोक प्राधिकारी होने के नाते बैंकों में जमा लोगों के पैसों की हिफ़ाज़त करने की राज्य की ज़िम्मेदारी है। अब लोगों को यह चिंता सता रही है कि हिन्दोस्तानी राज्य लोगों के हितों की हिफ़ाज़त नहीं कर रहा है। हिन्दोस्तानी राज्य 150 इजारेदार घरानों की अगुवाई में अल्पसंख्यक पूंजीपतियों के हितों की हिफ़ाज़त कर रहा है।

कामरेड वेंकटचलम ने अपने इंटरव्यू में लोगों की जमा पूंजी को जोखिम में डालने के लिए सरकार की निंदा की है। फाइनेंसियल रेजोलुशन एंड डिपॉजिट इन्श्योरेंस (एफ.आर.डी.आई.) विधेयक के बारे में बात करते हुए उन्होंने बताया कि :

“इए विधेयक में एक प्रावधान है जिसके मुताबिक यदि बैंक को दिवालिया हो जाने का ख़तरा है, तो ऐसी हालत में सरकार बैंक को नहीं बचाएगी, लेकिन बैंक अपने को डूबने से बचाने के लिए जमाकर्ताओं के पैसों का इस्तेमाल कर सकता है। इस प्रावधान से जमाकर्ताओं में हड़कंप मचा हुआ है।” (बिजनस स्टैण्डर्ड, 29 अप्रैल, 2018)

इस बात को ध्यान में रखा जाना चाहिए कि 1947 और 1955 के बीच जब 361 बैंक डूबे थे, उस समय लोगों ने अपनी जीवनभर की जमा पूंजी खो दी थी।

निजीकरण के कार्यक्रम का लक्ष्य इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करना है। ये पूंजीपति बैंकों में जमा लोगों के लाखों करोड़ों रुपये पर नियंत्रण करना चाहते हैं। बैंक व्यवस्था के संकट का समाधान होना तो दूर, दरअसल निजीकरण बैंकों को और गहरे संकट में धकेलने का रास्ता है।

इस संकट का केवल एक ही समाधान है। इजारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की दिशा में अर्थव्यवस्था को चलाने की बजाय, पूरी अर्थव्यवस्था को लोगों की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में मोड़ना होगा। बैंकों सहित बड़े पैमाने पर उत्पादन और विनिमय के साधनों को इजारेदार पूंजीपतियों के हाथों से छीनकर उन्हें सामाजिक संपत्ति के रूप में सामाजिक नियंत्रण के लाना होगा। ऐसा करने से बैंकों द्वारा दिये जाने वाले कर्जे़ का वितरण एक व्यापक आर्थिक योजना के आधार पर किया जायेगा न कि इजारेदार पूंजीपतियों और उनके नुमाइंदों के मुनाफ़ों के गणित के भरोसे छोड़ दिया जायेगा। 

इस तरह के क्रांतिकारी परिवर्तन को लागू करने के लिए मज़दूर वर्ग को किसानों और तमाम दबे-कुचले लोगों के साथ गठबंधन में राजनीतिक सत्ता को अपने हाथों में लेना होगा। केवल ऐसा करने से अर्थव्यवस्था की दिशा को मोड़ा जा सकता है। केवल ऐसा करने से सभी के लिए रोज़गार और खुशहाली की गारंटी दी जा सकती है। इस क्रांतिकारी नज़रिये के साथ हमें निजीकरण के खि़लाफ़ संघर्ष को तेज़ करना होगा।

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बैंकों के संकट    गैर- निष्पादित    Jun 1-15 2018    Political-Economy    Privatisation    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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