कर्नाटक सरकार के गठन में लोगों की भूमिका नहीं

मौजूदा लोकतंत्र की व्यवस्था में लोग संप्रभु नहीं

सभी यह देख सकते हैं कि कर्नाटक के चुनाव में लोगों की भूमिका मतदान के दिन 12 मई को शुरू होकर उसी दिन ख़त्म भी हो गई। एक बार मतगणना हो गयी और किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, इसके बाद, सब कुछ राज्यपाल के निर्णय पर निर्भर था। कर्नाटक का भविष्य इस पर निर्भर था कि राज्यपाल क्या करता है - बहुमत साबित करने के लिये वह किस पार्टी को मौका देता है और इसके लिये कितना समय तय करता है।

मीडिया में और स्कूलों की पाठ्य पुस्तकों में प्रचारित सरकारी मत है कि हिन्दोस्तान एक लोकतंत्र है जहां लोग अपनी पसंद की सरकार को चुनते हैं। संविधान की प्रस्तावना को भी इस तरह लिखा गया है जिससे ऐसा आभास होता है कि हिन्दोस्तान के लोग संप्रभु हैं, कि उनके पास फैसले लेने की सर्वोच्च ताक़त है। परन्तु जीवन का अनुभव बार-बार दिखाता है कि लोगों के हाथ में कोई ताक़त नहीं है, अपनी ज़िन्दगी के लिये महत्वपूर्ण निर्णय लेने में उनकी कोई भूमिका नहीं है।

कर्नाटक के लोग, जिनमें से बहुतों ने 12 मई, 2018 को लाइनों में लगकर अपना वोट दिया, उनकी भागीदारी उस दिन के बाद पूरी तरह से ख़त्म हो गयी। संप्रभुता, यानी कि कर्नाटक में विकास को दिशा देने की सर्वोच्च ताक़त राज्यपाल के पास आ गयी जो लोगों द्वारा नहीं चुना गया होता और जिसे केन्द्र में सत्ताधारी पार्टी द्वारा नियुक्त किया जाता है। विधानसभा में किसी भी पार्टी को बहुमत न मिलने की हालत में संविधान इस गैर-निर्वाचित, केन्द्र सरकार द्वारा मनोनित व्यक्ति को अपनी मर्जी से यह फैसला लेने की ताक़त देता है कि वह किसे सरकार बनाने का आमंत्रण देता है।

सवाल यह नहीं है कि कर्नाटक के राज्यपाल का फैसला इस बार अच्छा था या बुरा। सवाल यह है कि केन्द्र सरकार द्वारा मनोनित व्यक्ति को कर्नाटक या हिन्दोस्तानी संघ के किसी भी घटक का राजनीतिक भाग्य तय करने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है।

किसी भी प्रांत में राज्यपाल द्वारा सरकार बनाने का पहला मौका देने का प्रावधान 1935 के उपनिवेशवादी भारत सरकार अधिनियम (गवर्मेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935) में था। उस अधिनियम में कहा गया था कि प्रांतों की सरकारें अलग-अलग पार्टियों की चुनावी होड़ से चुनी जायेंगी, परन्तु वे सत्ता में तब तक ही रह सकेंगी जब तक राज्यपाल चाहेगा। राज्यपाल की नियुक्ति तब लंदन में बैठे बर्तानवी शासक करते थे।

उपनिवेशवादी काल में किसी भी प्रांत के राज्यपाल को अपनी मर्जी से किसी को भी सरकार बनाने का निमंत्रण देने की ताक़त थी। इसके साथ ही, 1935 के अधिनियम के अनुच्छेद 93 के अनुसार, उसके पास किसी भी निर्वाचित प्रांतीय सरकार को भंग करने की भी ताक़त थी। ऐसी ताक़त आज तक मौजूद है। 1950 के हिन्दोस्तानी संविधान के अनुच्छेद 356 में हिन्दोस्तानी संघ के किसी भी प्रांत की सरकार को भंग करके राष्ट्रपति शासन लगाने की ताक़त केन्द्रीय मंत्रीमंडल के पास है। पिछले 68 वर्षों में अनेक प्रांतीय सरकारों को राज्यपाल द्वारा कानून व व्यवस्था के तथाकथित ख़तरे की रिपोर्ट व सिफारिश के आधार पर इस प्रावधान के तहत भंग किया जा चुका है।

राज्यपाल के पास निर्वाचित राज्य विधानसभाओं पर असाधारण व मनमानी ताक़त इस सच्चाई को दिखाती है कि हिन्दोस्तानी संघ अपने हरेक घटक के अधिकारों को मान्यता नहीं देता और उनकी रक्षा नहीं करता है। यह दिखाता है कि निर्वाचित प्रांतीय विधानसभाओं को भंग करने की ताक़त से लैस, एक अति महत्वपूर्ण केन्द्रीय राज्य की उपनिवेशवादी विरासत को आज़ाद हिन्दोस्तान में जारी रखा गया है।

उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष के दौरान अपने देश की सभी राजनीतिक पार्टियों ने बर्तानवी शासकों द्वारा राज्यपाल को निर्वाचित प्रांतीय विधानसभाओं को भंग करने की ताक़त दिये जाने का विरोध किया था। इस मुद्दे पर 1947 के बाद, कांग्रेस पार्टी व उसके नेता पूरी तरह से पलट गये। राज्यपाल द्वारा अपनी ताक़त को कायम रखने के कड़े विरोधक होने की जगह वे इसे कायम रखने के कड़े समर्थक बन गये। वे राजनीतिक सत्ता के पूरे के पूरे उपनिवेशवादी ढांचे को कायम रखने के लिये आतुर थे।

हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों व ज़मीनदारों, जिन्होंने बर्तानवी उपनिवेशवादियों से सत्ता पाई थी, उन्होंने शोषण व लूट की व्यवस्था की रक्षा करने वाली उपनिवेशवादी सेना और केन्द्रीय नौकरशाही को कायम रखने का निर्णय किया। संविधान सभा में बड़े पूंजीपतियों व बड़े ज़मीनदारों के प्रतिनिधि हावी थे। उन्होंने एक ऐसे संविधान को अपनाया जो अधिकांश रूप से बर्तानवी संसद द्वारा पारित 1935 के भारत सरकार अधिनियम की ही कापी था। उपनिवेशवादी ढांचा कायम रहा, यानी कि हमारी भूमि और श्रम की लूट को बनाये रखने की “कानून की व्यवस्था”।

मौजूदा राज्य व्यवस्था, संविधान और राजनीतिक प्रक्रिया का बुनियादी सिद्धांत है कि हिन्दोस्तान के लोग खुद राज चलाने के काबिल नहीं है। उपनिवेशवादी काल में ऐसा खुले तौर पर उद्घोषित था कि हिन्दोस्तानी उपमहाद्वीप पर बर्तानवी शाही परिवार का राज भगवान की मर्जी से था। उपनिवेशवाद के बाद के हिन्दोस्तानी गणतंत्र का आधार भी कुछ बदलाव के साथ इसी “शाही परमाधिकार” में ही है। कांग्रेस पार्टी व भाजपा के नेतृत्व में पूंजीपति वर्ग की प्रतिस्पर्धी पार्टियां अधिकांश मेहनतकश लोगों पर फूट डालकर राज करना अपना परमाधिकार समझती हैं।

1947 में हुए सत्ता के हस्तांतरण से राजनीतिक सत्ता का चरित्र नहीं बदला। सत्ता को लंदन से नई दिल्ली और कराची में, बड़े पूंजीपतियों व ज़मीनदारों तथा उनके राजनीतिक प्रतिनिधि कांग्रेस पार्टी व मुस्लिम लीग में हस्तांतरित किया गया। बंटवारे के बाद, संविधान के बनने और राष्ट्रपति के चुनाव होने तक, सर्वोच्च सत्ता को बर्तानवी सरकार द्वारा नियुक्त गवर्नर जनरल के साथ नेहरू के नेतृत्व वाली एक अंतरिम सरकार को सौंपा गया। इसके बाद संप्रभु सत्ता राष्ट्रपति के हाथ में आई, परन्तु संविधान उसे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रीमंडल की सलाह पर चलने के लिये बाध्य करता है।

परदेशी और बीते जमाने के शाही परमाधिकार के विचार को जारी रखते हुए, 1950 का हिन्दोस्तानी संविधान एक धारणा पैदा करता है कि न्यासी (ट्रस्टी) के रूप में राज्य लोगों से परे है। राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत सभी के भरण-पोषण के लक्ष्य का उद्घोष करते हैं। परन्तु संविधान के मुख्य भाग सर्वोच्च सत्ता को केन्द्रीय संसद को प्रदान करते हैं। संसद के अंदर यह सत्ता प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रीमंडल में संकेद्रित है। केन्द्र में राष्ट्रपति और प्रांतों में राज्यपाल, ये सभी केन्द्रीय मंत्रीमंडल की सलाह पर चलते हैं। जिनके पास भी केन्द्रीय मंत्रीमंडल का नियंत्रण है, उनके पास विधानसभाओं और पूरे देश के भाग्य का निर्धारण करने की ताक़त है।

संसद व विधानसभाओं के सदस्यों का चुनाव तथा पूरी की पूरी राजनीतिक प्रक्रिया, सरमायदारी संसदीय लोकतंत्र के वेस्टमिंस्टर मॉडल की निरंतरता व उसका रूपांतरण है। उपनिवेशवादी काल की तुलना में जो तरक्की हुई है वह है सर्वव्यापी मताधिकार का अपनाया जाना। परन्तु अपने आप में इससे यह सच्चाई नहीं बदलती कि राजनीतिक प्रक्रिया, सर्वोच्च सत्ता को मजबूती से मुट्ठीभर शोषकों के हाथों में रखने का काम करती है।

राजनीतिक प्रक्रिया में मतदान के दिन वोट डालने के सिवाय लोगों की कोई भूमिका नहीं है। फैसले लेने का अधिकार पूंजीवादी शोषण व साम्राज्यवादी लूट को जारी रखने के लिये प्रशिक्षित विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्या के हाथों तक सीमित है। समय-समय पर चुनाव सबसे ताक़तवर इज़ारेदार पूंजीपतियों को अपनी प्रबंधन टोली को बदलने का मौका देते हैं ताकि उनके हितों की और अच्छी तरह से रक्षा हो सके। इनसे शोषकों के बीच के परस्पर विरोधों को सुलझाने तथा लोगों में और फूट डालने का मौका मिलता है, जबकि दिखावा होता है कि लोग अपनी संप्रभुता का इस्तेमाल कर रहे हैं।

इस तथाकथित सबसे बड़े लोकतंत्र में लोग सत्ता से पूरी तरह से वंचित हैं, इस सच्चाई का पर्दाफाश तब होता है जब, हाल में हुए कर्नाटक चुनाव की तरह “त्रिशंकू नतीजा” निकलता है। तब लोग देख सकते हैं कि उनका भविष्य एक बहुत ही छोटे से गुट के हाथों में है।

हम, कम्युनिस्टों को और सभी प्रगतिशील ताक़तों को इस राजनीतिक सिद्धांत व मौजूदा पार्टीवादी राजनीतिक प्रक्रिया को चुनौती देनी होगी। हमें लोगों के हाथों में सत्ता के अभाव को चुनौती देनी होगी।

हमें एक ऐसे संविधान की मांग करनी होगी जो लोगों को संप्रभुता प्रदान करता हो। हमें एक नयी राजनीतिक प्रक्रिया के लिये लड़ना होगा जो इस सिद्धांत पर आधारित हो कि संप्रभुता लोगों के हाथों में होनी चाहिये।

लोगों के पास यह अधिकार होना चाहिये कि वे अपने बीच से सबसे अच्छे लोगों को चुनाव के लिये नामांकित कर सकें। उम्मीदवारों के चयन का अधिकार सभी लोगों के संगठनों के पास होना चाहिये, न कि सिर्फ राजनीतिक पार्टियों के पास। नामांकित किये गये लोगों में से हरेक चुनाव क्षेत्र में चुनाव होने के पहले, उम्मीदवारों की अंतिम सूची तैयार करने का अधिकार भी मतदाताओं को इस्तेमाल करना चाहिये।

लोगों को फैसले लेने की अपनी ताक़त का सिर्फ एक अंश ही निर्वाचित प्रतिनिधि को देना चाहिये। उनके पास प्रतिनिधियों से हिसाब लेने और अपने द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि को किसी भी समय वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिये। उनके पास कानूनों व नीतियों में बदलाव लाने की प्रक्रिया की शुरुव्आत करने का अधिकार होना चाहिये। उनके पास संविधान में बदलाव लाने या संविधान को दोबारा लिखने का अधिकार होना चाहिये।

राजनीतिक पार्टियों की भूमिका को दोबारा परिभाषित करना होगा। ये चुनावी मशीनें नहीं हो सकती जो सत्ता अपने हाथों में लें। इसकी जगह, उनकी भूमिका समाज के लिये नज़रिया और कार्यक्रम पेश करने की होनी चाहिये। लोगों द्वारा उम्मीदवारों के चयन में, अजेंडा तय करने में व अपने प्रतिनिधियों से जवाबदेही पाने में मदद देने की भूमिका भी पार्टियों को प्रदान करनी चाहिये। तब राजनेता लोगों द्वारा चयनित व निर्वाचित होंगे जिन्हें वापस बुलाया जा सकता है, न कि ऐसे, जो पैसों के पीछे भागते हैं या जिनके पीछे धनबल होता है। चयन करने और चुनाव की पूरी प्रक्रिया का खर्च राज्य को उठाना चाहिये ताकि सभी उम्मीदवारों को प्रचार के लिये बराबरी का समय मिले।

मौजूदा व्यवस्था में मानव व लोकतांत्रिक अधिकारों की संवैधानिक गारंटी न होने को हमें चुनौती देनी होगी। मौजूदा संविधान में ऐसा माना जाता है कि राज्य कभी अधिकारों को दे सकता है और कभी वापस ले सकता है। हमें आधुनिक परिभाषाओं पर आधारित संविधान की ज़रूरत है, जिनके अनुसार मानव होने के नाते लोगों के अधिकार होते हैं और राज्य का दायित्व है कि सभी के मानव अधिकारों की सुनिश्चिति हो और किसी भी बहाने उनका उल्लंघन न हो। सभी नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकार भी होते हैं और मज़दूरों, किसानों, महिलाओं, नौजवानों और राष्ट्रों व राष्ट्रीयताओं, इत्यादि जैसे खास समूहों के सामूहिक अधिकार भी होते हैं। संविधान को इन सभी के अधिकारों को मान्यता देनी होगी और उनकी रक्षा करनी होगी।

हमें एक नव-निर्माण के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द मज़दूरों, किसानों, महिलाओं व नौजवानों के जनसमूहों को एकजुट करना होगा। यानी कि, एक नई राजनीतिक सत्ता व राजनीतिक प्रक्रिया का निर्माण करना होगा, जो संप्रभुता लोगों के हाथों में दे और सभी के लिये सुरक्षा और खुशहाली सुनिश्चित करे।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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