इज़राइल द्वारा फिलिस्तीनी लोगों पर बर्बर हिंसा की निंदा करें!

14 मई को अमरीकी और इज़राइली सरकार के प्रतिनिधि जब येरुशलम में नए अमरीकी दूतावास का उद्घाटन कर रहे थे, उस वक्त वहां से केवल 100 किलोमीटर दूर गाज़ा में इज़राइली सेना इज़राइल-गाज़ा सीमा पर इकट्ठा हजारों फिलिस्तीनी लागों पर गोलियों से बर्बर हमला कर रही थी, ये लोग येरुशलम में नए अमरीकी दूतावास का विरोध करने के लिए इकट्ठा हुए थे। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इज़राइली सेना ने प्रदर्शनकारियों पर सुनियोजित तरीके से जान लेने के इरादे से गोलियां चलायीं, ताकि फिलिस्तीनी लोगों का अधिक से अधिक नुकसान हो। इस हमले में 60 से अधिक लोगों की जानें गयी हैं और 3000 से अधिक लोग जख़्मी हुए हैं। रबड़ की गोलियों से बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे घायल हुए हैं और आंसू गैस से दम घुटने की वजह से कई बच्चों की जानें गयी हैं। इज़राइली सेना ने जख़्मी लोगों का उपचार कर रहे स्वास्थ्य कर्मियों को खास तौर से निशाना बनाया। ख़बरों के मुताबिक, इन हमलों में मारे गए लोगों के जनाज़ों में सैकड़ों लोगों के हिस्सा लिया।

इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि 15 मई को अल नकबा (तबाही) की 70वीं सालगिरह थी। 15 मई, 1948 को फिलिस्तीनी लोगों को उनकी ज़मीन से बेदखल करके और उनको अपने वतन से बड़े पैमाने पर विस्थपित करके ज़ाउनवादी इज़राइली राज्य की स्थापना की गयी थी। हर साल इस दिन को “वापसी के महान सफर” के रूप में मनाया जाता है, जब फिलिस्तीनी लोग हजारों की संख्या में गाज़ा की सीमा पर इकट्ठे होते हैं और अपने वतन को वापस किये जाने की मांग करते हैं। ठीक उसी दिन येरुशलम में अमरीकी दूतावास का उद्घाटन, गाज़ा की सीमा पर इकट्ठा हुये प्रदर्शनकारियों पर अमानवीय हमले, अमरीकी और इज़राइली हुक्मरानों ने फिलिस्तीनी लोगों को भड़काने के इरादे से ऐसा किया। क्योंकि यह दिन फिलिस्तीनी लोगों के साथ हुई ऐतिहासिक नाइंसाफी की निशानी है। ऐसा करते हुए अमरीकी समर्थन के साथ इज़राइली ज़ाउनवादी यह जताना चाहते हैं कि वे हथियारों के बल पर फिलिस्तीनी लोगों के वतन पर अपना गैर कानूनी कब्ज़ा बनाये रखेंगे।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी इज़राइली सेना द्वारा फिलिस्तीनी लोगों पर बर्बर हमले की घोर निंदा करती है।

येरुशलम में अमरीकी दूतावास की स्थापना जानबूझकर फिलिस्तीनी लोगों को भड़काने और पूरे पश्चिम एशिया में तनाव पैदा करने के नापाक इरादों के साथ की गयी है। जबकि अमरीकी राज्य के प्रतिनिधियों ने येरुशलम में अपने दूतावास के खोले जाने का स्वागत किया है और इज़राइली प्रधानमंत्री ने फिलिस्तीनी लोगों पर किये गए हमले को “आत्मरक्षा” की कार्यवाही बताया है। दुनियाभर में कई देशों और लोगों तथा अन्तर्राष्ट्रीय मंचों सहित संयुक्त राष्ट्र संघ ने इज़राइली सैनिकों द्वारा फिलिस्तीनी लोगों पर किये गए बर्बर हमले की निंदा की है। संयुक्त राष्ट्र संघ के कई सदस्य देशों ने मिलकर 14-15 मई को फिलिस्तीनी लोगों पर इज़राइल द्वारा आयोजित गोलीबारी की निंदा करने के लिए एक प्रस्ताव पारित करने की कोशिश की लेकिन अमरीका ने इस प्रस्ताव के ख़िलाफ़ अपने वीटो का इस्तेमाल किया और इसे पारित होने से रोक दिया।

मौजूदा इज़राइली राज्य की स्थापना, फिलिस्तीनी लोगों पर आक्रमक हमले, कत्लेआम, जाति संहार और 75,000 लोगों को अपने ही वतन से बर्बर तरीके से निष्कासित करके की गयी थी। 

प्रथम विश्व युद्ध के अंत में लीग ऑफ नेशन ने तुर्की साम्राज्य के पुनः बंटवारे में फिलिस्तीन को बर्तानवी साम्राज्यवादियों के हवाले किया था। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में संयुक्त राष्ट्र संघ ने फिलिस्तीन को दो राज्यों में बांटने का प्रस्ताव रखा - इज़राइल और फिलिस्तीन। इस योजना के तहत येरुषलम को एक “अलग निकाय” के रूप में विशेष दर्ज़ा दिया गया, जिसका प्रशासन संयुक्त राष्ट्र संघ के हाथों में होगा।

येरुशलम शहर पर इज़राइली राज्य का कब्ज़ा पूरी तरह से गैरकानूनी है। 14 मई, 1948 में इज़राइली राज्य की स्थापना के तुरंत बाद इज़राइल ने फिलिस्तीनी लोगों पर “10 महीने की जंग” चलायी और येरुशलम के पश्चिमी हिस्से और फिलिस्तीनी लोगों के कई अन्य इलाकों पर कब्ज़ा जमाया। इस दौरान लाखों की संख्या में फिलिस्तीनी लोगों को अपने वतन से बाहर खदेड़ा गया और शरणार्थी बना दिया गया। फिलिस्तीनी लोगों के अन्य इलाकों और येरुशलम के पूर्वी हिस्से को जॉर्डन राज्य में शामिल कर दिया गया।

जून 1967 में “6 दिवसीय जंग” में इज़राइल ने पूरे येरुशलम के साथ-साथ पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) इलाके को अपने कब्जे़ में कर लिया। 1980 में इज़राइल ने येरुशलम को अपने राज्य की राजधानी

घोषित करते हुए एक कानून पारित किया। संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्ताव 478 के कानून को गैर-कानूनी करार दिया। आधिकारिक तौर पर संयुक्त राष्ट्र संघ पूरे शहर पर इज़राइली संप्रभुता को स्वीकार नहीं करता है, जिस शहर में इस्लाम, यहूदी और ईसाई धर्म से जुड़े कई पवित्र स्थल हैं। अन्तर्राष्ट्रीय तौर पर तेल अवीव को ही इज़राइल की राजधानी के रूप में स्वीकार किया गया है, लेकिन देश की सरकार येरुशलम में स्थित है। येरुषलम में किसी भी अन्य देश का दूतावास नहीं है।

अमरीकी साम्राज्यवादियों के पूरे समर्थन के साथ इज़राइल, फिलिस्तीन विरोधी और अरब विरोधी नीति चलाता आया है और फिलिस्तीनी लोगों को अपने वतन पर उनके अधिकार से वंचित करता आया है। पश्चिम एशिया में अपने रणनैतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए अमरीकी साम्राज्यवाद ने इज़राइल को अपना रणनैतिक सांझेदार बनाया है और उसे आधुनिक हथियारों से लैस किया है। अमरीका और इज़राइल ने मिलकर यह सुनिश्चित किया है कि फिलिस्तीनी लोग अपने राष्ट्रीय अधिकार से वंचित रहें। येरुषलम में अमरीकी दूतावास के उद्घाटन के दौरान इज़राइली सेना द्वारा फिलिस्तीनी लोगों पर की गई गोलीबारी एक बार फिर यही दिखाती है कि अमरीका इज़राइल द्वारा फिलिस्तीनी लोगों के जनसंहार और फिलिस्तीनी राष्ट्र पर गैरकानूनी कब्जे़ की नीति का समर्थन करता है। 

दुनियाभर के सभी इंसाफ और आज़ादी पसंद लोगों को इज़राइल द्वारा फिलिस्तीनी लोगों की ज़मीन पर गैर कानूनी कब्जे़, ज़बरदस्ती उनको विस्थापित किये जाने और इज़राइल और उसके समर्थक अमरीकी राज्य द्वारा उनपर बर्बर आतंक फैलाने का विरोध और तेज़ करना होगा।

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बर्बर हिंसा    येरुशलम    Jun 1-15 2018    World/Geopolitics    Rights     War & Peace     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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