किसानों की मांगें समाज के हित में हैं!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 22 मई, 2018

1 से 10 जून, 2018 को पूरे देश के किसान लंबे समय से उठाई गई अपनी मांगों के लिये विरोध प्रदर्शन करेंगे। इन मांगों में शामिल हैं - सभी कृषि उत्पादों की लाभकारी कीमतों पर सार्वजनिक खरीद तथा बिना किसी शर्त कृषि के लिये कर्ज़ों की माफ़ी। साथ ही, अलग-अलग राज्यों के किसान - बिजली के बिलों की माफ़ी, फसल बीमा से संबधित समस्याओं, जनजातियों व वनवासियों के भूमि अधिकारों, किसानों के लिये पेंशन सहित अपनी-अपनी खास मांगों को उठायेंगे।

आंदोलन की सफलता सुनिश्चित करने के लिये सैकड़ों किसान संगठन राष्ट्रीय किसान महासंघ और किसान एकता मंच के झंडे तले एक साथ आये हैं। इन दस दिनों के दौरान किसान सब्ज़ियों, अनाज और दूध सहित अन्य कृषि उत्पादों को शहरों में नहीं भेजेंगे। 10 जून, 2018 को उन्होंने भारत बंद का आह्वान दिया है।

मार्च 2018 में ऑल इंडिया किसान सभा ने नाशिक से मुंबई तक किसानों का लॉग मार्च आयोजित किया था और अब उसने घोषणा की है कि 1 जून को वह किसानों का एक और जुलूस आयोजित करेगी। इसकी वजह है कि उस वक्त दिये गये आश्वासनों को महाराष्ट्र सरकार ने लागू नहीं किया है। महाराष्ट्र के शेतकारी संघठन और मध्य प्रदेश की आम किसान यूनियन ने भी आंदोलन की अवधि में अपनी गतिविधियों की योजनाओं की घोषणाएं की हैं।

किसानों के सर्व हिन्द आंदोलन की सफलता सुनिश्चित करने के लिये कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी मज़दूरों, महिलाओं और नौजवानों के सभी संगठनों को योगदान देने का बुलावा देती है।

ठीक एक साल पहले 1 जून, 2017 को महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के किसानों ने दूध सहित अपने दूसरे कृषि उत्पादों को महामार्गों पर फेंक कर एक प्रभावशाली आंदोलन किया था और सड़कों को रोक दिया था। इन कार्यवाइयों के ज़रिये उन्होंने केन्द्र व राज्य सरकारों की, किसानों की जीविका के प्रति बेरुख़ी को उजागर किया था। उनके आंदोलन से दूसरे राज्यों में भी आंदोलन उठ खड़े हुए थे। इस आंदोलन से प्रेरित होकर पूरे हिन्दोस्तान में किसानों की एक साथ कार्यवाइयां शुरू हुईं जिनमें शामिल है नवम्बर 2017 में दिल्ली में किसानों की दो-दिवसीय सर्व हिन्द संसद।

देशभर में किसानों के बढ़ते विरोध प्रदर्शनों की प्रतिक्रिया में मोदी सरकार ने एक विशाल प्रचार अभियान शुरू किया जिसमें उसने दावा किया है कि वह किसानों की मांगों को पूरा कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक विधानसभा के चुनावी प्रचार अभियान के दौरान घोषणा की कि उनकी सरकार 2006 की स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट को लागू कर रही है। साल की शुरुआत में, वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में भी ऐसा ही दावा किया था। परन्तु सच्चाई क्या है?

पहला सच है कि केन्द्र में एक के बाद एक आई सरकारों ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) सिर्फ 23 फसलों के लिये ही तय किये हैं। इनमें से भी सिर्फ गेहूं और चावल को एम.एस.पी. पर खरीदा जा रहा है और वह भी सिर्फ कुछ राज्यों में। नहीं तो यह कैसे हो सकता था कि महाराष्ट्र के किसानों ने अपने खेतों में तख़्तियां लगा दी हैं, जिनमें उन्होंने मुफ्त में टमाटर देने की घोषणा की है क्योंकि उन्हें अपने टमाटरों को मात्र एक रुपये प्रति किलो पर बेचने को मज़बूर किया जा रहा है। मध्य प्रदेश व राजस्थान में लहसन उगाने वाले किसानों को एक से दो रुपये प्रति किलो पर अपनी उपज बेचने के लिये मजबूर किया जा रहा है। अरहर दाल के उत्पादकों को कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, आदि मंडियों में एम.एस.पी. से बहुत कम दाम पर अपने उत्पादों को बेचना पड़ रहा है।

दूसरा सच है कि सरकार द्वारा आंकी गयी एम.एस.पी. स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट में दिये गये आकलन के तरीके से अलग है। फर्क इस बात पर है कि उत्पादन के लिये ज़रूरी पारिवारिक श्रम के वेतन की कीमत को शामिल किया जाना चाहिये या नहीं? भूमि का किराया शामिल किया जाना चाहिये या नहीं? स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट के अनुसार ऐसा किया जाना चाहिये। सरकार के अनुसार ऐसा नहीं किया जाना चाहिये। मोदी सरकार का एम.एस.पी. का आकलन का तरीका पिछली सरकारों के तरीके जैसा ही है। उसने पारिवारिक श्रम और भूमि के मूल्य को आकलन में शामिल करने से इनकार किया है।

मोदी सरकार झूठ बोलती है, जब वह कहती है कि उसे किसानों की रोज़ी-रोटी सुनिश्चित करने के बारे में चिंता है। तथ्य उल्टा ही दिखाते हैं।

हम स्वीकार नहीं कर सकते कि किसान, जो अपने श्रम से पूरे समाज का पेट भरते हैं, उन्हें ही सुनियोजित तरीके से बर्बाद किया जाये, उन्हें अपनी ज़मीन बेचनी पड़े और यहां तक कि उन्हें आत्महत्या करनी पड़े। आज कृषि के लिये प्रयोग होने वाली वस्तुओं के बाज़ार पर हिन्दोस्तानी और विदेशी इज़ारेदार पूंजीपतियों का दबदबा है। ये इज़ारेदार पूंजीपति कृषि के लिये प्रयोग होने वाली वस्तुओं को ऊंची कीमतों पर बेचकर और कृषि उत्पादों की क़ीमतों को नीचे रखकर, किसानों के खून की अंतिम बूंद भी चूस ले रहे हैं।

खेती करने वाले सभी लोगों की सुरक्षा और खुशहाली सुनिश्चित करना राज्य का दायित्व है। किसानों की सुरक्षा और खुशहाली सुनिश्चित करने के बारे में गंभीर, किसी भी सरकार के लिये अनिवार्य है कि वह कृषि उत्पादन को एक देशव्यापी योजना के अनुसार आयोजित करे। उसे सिंचाई, अच्छी गुणवत्ता वाले बीज, खाद व कीटनाशक तथा अन्य कृषि के लिये प्रयोग होने वाली वस्तुओं को उचित दामों पर उपलब्ध कराने पर धन लगाना होगा। उसे सभी कृषि उत्पादों की एम.एस.पी. तय करनी होगी ताकि फसल बोने के काफी पहले ही किसानों के लिये लाभकारी दाम सुनिश्चित हो जायें। सरकार को मंडियों के नेटवर्क में विस्तार करना होगा ताकि किसानों से फसलों की खरीद समय पर हो सके। उसे कोल्ड स्टोरों की श्रंृखला स्थापित करनी होगी ताकि कृषि उत्पाद खराब न हों और देश के अलग-अलग इलाकों के लिये कार्यकुशल यातायात व्यवस्था का इंतजाम करना होगा। उसे देशभर में कृषि उत्पादों के लिये सर्वव्यापी आधुनिक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था स्थापित करनी होगी जो सभी मेहनतकश लोगों को अनाज, सब्ज़ियों, दालों व अन्य कृषि उत्पादों को उचित दाम पर हर जगह उपलब्ध करायेगी।

अगर कृषि के लिये प्रयोग होने वाली वस्तुओं तथा कृषि उत्पादों के थोक व्यापार को सामाजिक नियंत्रण में लाया जाता है और अगर एक व्यापक सार्वजनिक खरीदी व्यवस्था के साथ सर्वव्यापी सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को स्थापित किया जाता है तो इससे पूरे समाज को फायदा होगा। किसानों के परिवारों को उनके उत्पादों के सही दाम मिलेंगे; मेहनतकश लोगों को ज़रूरी वस्तुएं कम दामों पर मिलेंगी। व्यापार से राज्य की अतिरिक्त आय भी होगी जिसे ग्रामीण व शहरी मेहनतकश लोगों की खुशहाली बढ़ाने के लिये शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा व दूसरी सामाजिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिये खर्च किया जा सकता है।

ऐसे कदम समाज के हित में होंगे। कृषि के लिये प्रयोग होने वाली वस्तुओं और कृषि उत्पादों के थोक व्यापार में जो हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपति हावी हैं, सिर्फ उन्हें ही किसानों को लूटकर मुनाफ़ा बनाने से वंचित किया जायेगा। इन कदमों को लागू करने के लिये उन सभी पार्टियों और संगठनों को एकजुट होकर लड़ना होगा जो समाज के सब लोगों के कल्याण को सुनिश्चित करना चाहते हैं।

किसानों को रोज़ी-रोटी की गारंटी तभी हो सकती है जब कृषि के लिये प्रयोग होने वाली वस्तुओं और कृषि उत्पादों का थोक व्यापार पूंजीवादी इज़ारेदारों के नियंत्रण और वर्चस्व से निकाल कर सामाजिक नियंत्रण में लाया जायेगा। भाजपा, कांग्रेस पार्टी तथा शासक वर्ग की अन्य पार्टियां इन कदमों को लागू करने से इनकार करती हैं क्योंकि वे इज़ारेदार पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के लिये वचनबद्ध हैं।

पूंजीपति वर्ग के प्रवक्ता यह प्रचार करते हैं कि अगर किसानों को उनके कृषि उत्पादों के लिये लाभकारी दाम दिये जायेंगे तो दुकानों में खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ जायेंगी। किसानों के खि़लाफ़ बाकी मेहनतकश लोगों को भड़काने वाले झूठे प्रचार के सिवाय यह और कुछ नहीं है। सच्चाई तो यह है कि किसानों को मिलने वाले औसत दाम खुदरे में बिकने वाले दामों का एक-चैथाई से भी कम होते हैं। इस बड़े अंतर का कारण है पूंजीवादी व्यापारी कंपनियों का अत्याधिक मुनाफ़ा हड़पना।

किसानों के पूरे कर्ज़े की माफ़ी की मांग एकदम जायज़ है। किसानों को पूंजीपतियों के वर्चस्व वाले कृषि व्यापार से लाखों करोड़ों रुपयों की लूट की गयी है और उनकी मांग यही है कि राज्य उनसे लूटे हुए धन का एक छोटा हिस्सा इस मांग को पूरा करके उन्हें वापस दे। जबकि केन्द्र सरकार कहती है कि वह किसानों की कर्ज़ माफ़ी नहीं कर सकती है जबकि उसी सरकार ने अपने संरक्षण में बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों द्वारा बैंकों से लिये कर्ज़ों को माफ़ होने दिया है।

आज, अपने देश में संघर्ष एकदम दो विपरीत लाइनों के बीच है। एक इज़ारेदार पूंजीपतियों का रास्ता है, जो हमारे देश में राज कर रहे हैं। यह रास्ता है किसानों व मज़दूरों की बरबादी का; यह रास्ता है ये सुनिश्चित करने का कि हिन्दोस्तानी और विदेशी इज़ारेदार पूंजीपतियों के मुनाफे़, व्यापार सहित अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में अधिकतम हों। दूसरा रास्ता है एक ऐसे समाज को बनाने का जिसमें सभी की रोज़ी-रोटी की सुरक्षा व खुशहाली की गारंटी होगी तथा अर्थव्यवस्था पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने की जगह लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में चलाई जायेगी। यही रास्ता है जो मज़दूरों, किसानों व अपने देश के सभी मेहनतकश लोगों को एकजुट होकर अपनाना चाहिये।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी मज़दूरों व किसानों के आंदोलन के सभी कार्यकर्ताओं को बुलावा देती कि इज़ारेदार पूंजीपतियों के राज को हटा कर मज़दूरों और किसानों के राज को लाने के नज़रिये से एकजुट हों और संघर्ष करें। चलो, हम एकता बनाकर एक नये हिन्दोस्तान की रचना करें, जिसमें मेहनतकश लोग समाज का अजेंडा तय करेंगे तथा सभी की सुरक्षा व खुशहाली सुनिश्चित करेंगे।

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किसानों की मांगें    कृषि उत्पादों    Jun 1-15 2018    Struggle for Rights    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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