दिल्ली सचिवालय पर मज़दूर संगठनों का विरोध कार्यक्रम : दिल्ली के मज़दूरों ने अपनी मांगों के लिये संघर्ष को तेज़ करने का ऐलान किया

दिल्ली में 20 जुलाई को होने वाली मज़दूरों की हड़ताल की तैयारी के हिस्सा बतौर, 27 जून को एक विरोध कार्यक्रम आयोजित किया गया। सैकड़ों मज़दूर दिल्ली सरकार के मुख्यालय पर प्रदर्शन करने के लिये शहीद पार्क पर एकत्रित हुये। अलग-अलग मज़दूर यूनियनों और संगठनों के झंडे तथा मज़दूरों की मांगों को घोषित करते हुये बैनर व प्लाकार्ड पूरे पार्क में, हरेक पेड़, पिलर और खंभे पर नज़र आ रहे थे।

Workers demonstration on 27 June 2018

मज़दूरों को दिल्ली सचिवालय की ओर बढ़ने से रोकने के लिये प्रशासन ने भारी पुलिस बंदोबस्त किया था। अंत में एक जुझारू जनसभा हुई जिसे सभी सहभागी संगठनों के नेताओं ने संबोधित किया।

मज़दूरों को संबोधित करने वाले नेताओं में शामिल थे मज़दूर एकता कमेटी के संतोष कुमार, सीटू के विरेन्द्र गौड, एक्टू के संतोष राय, एटक के धीरेन्द्र शर्मा, इंटक के ऋषिपाल, सेवा की लता, ए.आई.यू.टी.यू.सी. के हरीश त्यागी,  एच.एम.एस. से नारायण सिंह, यू.टी.यू.सी. के शत्रुजीत सिंह, एल.पी.एफ. के जवाहर तथा निर्माण मज़दूरों की ओर से आज़ाद।

वक्ताओं ने मज़दूरों के अधिकारों पर बढ़ते हमलों के लिये केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों की निन्दा की। “ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस” और “इंस्पेक्टर राज खत्म करने” के नाम पर मज़दूरों को बेहद खराब हालतों में, न्यूनतम सुरक्षा साधनों के बिना, काम करने को मजबूर किया जा रहा है। दिल्ली की फैक्ट्रियों में आग लगने से सैकड़ों मजदूर मर चुके हैं। सरकार अनेक प्रकार के आवश्यक और स्थाई काम को ठेके पर करवा रही है।

मज़दूर संगठनों ने 20,000 रुपये के न्यूनतम वेतन की मांग की और “फिक्स टर्म कांट्रेक्ट” जैसे मज़दूर-विरोधी कानूनों को वापस लेने की मांग की। वक्ताओं ने बिजली, पानी, परिवहन व नगर-निगम सेवाओं समेत सभी आवश्यक सेवाओं के निजीकरण की निन्दा की। उन्होंने खाद्य पदार्थां और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती महंगाई तथा सार्वजनिक वितरण व्यवस्था के सुनियोजित विनाश पर अपना गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने मज़दूरों को पेंशन व पीएफ से वंचित किये जाने की बात रखी। उन्होंने प्रबंधकों द्वारा मज़दूरों पर, अपना यूनियन बनाने के लिये किये जा रहे हमलों की निन्दा की।

वक्ताओं ने मांग की कि आंगनवाड़ी कर्मियों, आशा कर्मियों व मिड-डे-मील कर्मियों को सरकारी कर्मचारियों की मान्यता दी जाये और साथ-साथ पूरे अधिकार व भत्ते दिये जायें। उन्होंने महिला मज़दूरों के लिये, समान काम के लिये समान वेतन, संपूर्ण प्रसूति सुविधाओं व कार्यस्थल पर क्रेच सुविधाओं की मांग की। उन्होंने निर्माण मज़दूरों, मेट्रो रेल के मज़दूरों, होटल मज़दूरों, घरेलू कामगारों, आदि के अधिकारों को भी उठाया। उन्होंने रेहड़ी-पटरी बिक्रेताओं के लिये पुलिस और निगम अधिकारियों द्वारा उत्पीड़न से सुरक्षा की मांग की।

राज्य और इजारेदार पूंजीपतियों के नियंत्रण में मीडिया मज़दूरों को जाति और संप्रदाय के आधार पर बांटने के लिये जो सुनियोजित प्रयास करती हैं, मज़दूरों की एकता को तोड़ने के लिये राज्य प्रशासन सोच-समझकर जो सांप्रदायिक हिंसा भड़काता है, उनकी भी सभी वक्ताओं ने जमकर निन्दा की।

मज़दूर एकता कमेटी के वक्ता ने समझाया कि सत्ता में चाहे काई भी पार्टी हो, परन्तु हमारे देश पर शासन करने वाले मुट्ठीभर बड़े इजारेदार पूंजीपतियों का अजेंडा ही हमेशा लागू होता है। यह उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडीकरण का अजेंडा है, मज़दूरों और उनके अधिकारों पर हमलों को बढ़ाने का अजेंडा है, ताकि इजारेदार पूंजीवादी शासकों के अधिकतम मुनाफे़ सुनिश्चित हों। मेहनतकश जनसमुदाय के लिये यहां कोई लोकतंत्र नहीं है, जैसा कि पुलिस द्वारा आंदोलित मज़दूरों को अपनी मांगों को लेकर दिल्ली सचिवालय तक जाने से रोकने का आज का हादसा साफ दिखाता है। सभी कानून और नीतियां बड़े इजारेदार पूंजीपतियों के हितों के लिये बनाई जाती हैं। बड़े इजारेदार पूंजीपति ही सभी फैसले करते हैं। सत्तारूढ़ पार्टी बड़े इजारेदार पूंजीपतियों के हितों के लिये इस व्यवस्था को चलाने वाला प्रबंधक मात्र है। चुनावों से सत्ता पर बैठी पार्टियां और सरकारें तो बदल जाती हैं परन्तु शासक वर्ग नहीं बदलता है। जो भी सरकार आती है, वह पिछली सरकार से कहीं ज्यादा तीव्रता के साथ मज़दूरों के अधिकारों पर हमले करती है। हमारे सामने एक ही असली विकल्प है, इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में सरमायेदारों के शासन को ख़त्म करना और मज़़दूर-किसान का राज लाना। मज़़दूर-किसान का राज ही हमारे अधिकारों और खुशहाली को सुनिश्चित कर सकता है, इन विचारों के साथ उन्होंने अपनी बात समाप्त की।

पांच सदस्यों के एक प्रतिनिधिमंडल ने दिल्ली सचिवालय को जाकर मज़दूरों की ओर से एक मांगपत्र सौंपा।
सांगवारी नाट्य मंच के नौजवान कलाकारों ने मज़दूरों की दर्दनाक हालतों और अपनी मांगों के लिये संघर्ष करने के संकल्प को प्रकट करते हुये, कई जोशीले गीत प्रस्तुत किये।

अंत में 20 जुलाई की हड़ताल को सफल बनाने के लिये दिल्ली के मज़दूरों को आह्वान दिया गया।

Tag:   

Share Everywhere

Jul 1-15 2018    Struggle for Rights    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

thumbnail

इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)