दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों का संघर्ष : शिक्षकों की भर्ती में नकारात्मक परिवर्तन और उच्च शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ़

दिल्ली विश्वविद्यालय और उसके संबंधित कालेजों के शिक्षकों ने दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) के झंडे तले, 9 मई से 19 जून तक हड़ताल की। शिक्षकों की भर्ती में नकारात्मक परिवर्तन और खास कालेजों को स्वायत्तता देकर उच्च शिक्षा का निजीकरण करने के कदमों का विरोध करने के लिये यह हड़ताल की गई थी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने इन दोनों कदमों की अधिघोषणा की है। शिक्षकों की पदोन्नति के लिये बीते काम का मूल्यांकन तथा सेवानिवृत्त शिक्षकों को पेंशन से वंचित करने के मुद्दे भी हड़ताल के दौरान उठाये गये थे।

Duta Strike

हड़ताल के दौरान शिक्षकों ने परीक्षा पत्रों को जांचने के काम का बहिष्कार किया। उन्होंने यूजीसी मुख्यालय पर, वाइस चांसलर के कार्यालय पर और विभिन्न कालेजों व विभागों में धरने आयोजित किये। उन्होंने संसद पर विरोध प्रदर्शन व जन सभायें आयोजित कीं।

कार्पोरेट मीडिया ने शिक्षकों के संघर्ष के बारे में ढेर सारा झूठा प्रचार फैलाया। उसका मुकाबला करने के लिये आंदोलित शिक्षकों ने छात्रों और उनके अभिभावकों के साथ वार्ताएं आयोजित कीं, जिनमें उन्होंने शिक्षकों के साथ की जा रही नाइंसाफी और अपनी मांगों के औचित्य के बारे में समझाया। उन्होंने यह समझाया कि स्थाई पदों पर नियुक्ति तथा अस्थाई शिक्षकों के काम की निरंतरता बनाये रखने की शिक्षकों की मांग और ‘स्वायत्तता’ दिलाने के नाम पर उच्च शिक्षा के निजीकरण का उनका विरोध सीधे तौर पर शिक्षकों और उनके परिजनों के हित में है। इस अभियान के हिस्सा बतौर डूटा ने 6 जून को दिल्ली के पांच प्रमुख मेट्रो स्टेशनों - विश्वविद्यालय, राजीव चौक, मंडी हाउस, आई.टी.ओ. और केन्द्रीय सचिवालय - के सामने जन संपर्क कार्यक्रम आयोजित किया। विश्वविद्यालय परिसर में सक्रिय छात्र संगठनों के कार्यकर्ताओं ने इन कार्यक्रमों को आयोजित करने में डूटा का साथ दिया।

आंदोलनकारी शिक्षकों ने यह बताया कि बीते दस वर्षां से दिल्ली विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने शिक्षकों को स्थाई पदों पर नियुक्त करने की प्रक्रिया को पूरी तरह रोक दिया है। इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय में 4000 से अधिक शिक्षक अस्थाई तौर पर काम कर रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय व उसके कालेजों में हजारों की संख्या में शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं, जिससे छात्रों को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

शिक्षकों ने समझाया कि अस्थाई शिक्षकों को भारी शोषण की हालतों में काम करना पड़ता है। समय-समय पर उन्हें एक जगह की नौकरी छोड़कर दूसरी जगह नौकरी करने जाना पड़ता है। उन्हें पूरा वेतन व अन्य भत्ते नहीं दिये जाते हैं और उनके कोई अधिकार नहीं होते हैं।

यूजीसी ने हाल में शिक्षकों के पदों को भरने के लिये आरक्षण लागू करने का जो नया तरीका घोषित किया है, उसका शिक्षकों ने जमकर विरोध किया है और उसे शिक्षकों की संघर्षरत एकता को तोड़ने का एक सोचा-समझा कदम बताया है। नये तरीके का मकसद है कि हर कालेज के हर विभाग के हर पद के लिये शिक्षकों को आपस में भिड़ाया जाये और कालेज व विश्वविद्यालय के अधिकारियों को यह फैसला लेने की पूरी ताक़त दी जाये कि किसी भी पद पर शिक्षक की नियुक्ति आरक्षित कैटेगरी से की जायेगी या जनरल कैटेगरी से। इसका मकसद है शिक्षकों को स्थाई पदों पर नियुक्त करने की प्रक्रिया को शुरू करने में और देर करना।

दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने चुनिन्दा कालेजों को स्वायत्तता दिलाने की यूजीसी के योजना का भी खूब विरोध किया है। यह उच्च शिक्षा का निजीकरण करने तथा दिल्ली विश्वविद्यालय को कई टुकड़ों में बांट देने का कदम है। “स्वायत्तता प्राप्त” कालेजों पर अपने धन-संसाधन जुटाने का दबाव होगा, जिसके लिये वे छात्रों से ऊंची फीस लेंगे और इस तरह उच्च शिक्षा अधिकतम नौजवानों की पहुंच से बाहर हो जायेगी। “स्वायत्तता प्राप्त” कालेजों के शिक्षकों और कर्मचारियों को अपने अधिकारों पर कई पाबंदियों तथा ज्यादा शोषक हालतों का सामना करना पड़ेगा।

डूटा जनरल बॉडी ने 18 जून को एक सभा बुलाकर, परीक्षा पत्रों की जांच के बहिष्कार के अभियान को समाप्त करने की घोषणा की। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने उन्हें यह आश्वासन दिया कि आगामी सत्र में अस्थाई शिक्षकों का स्थानांतरण नहीं किया जायेगा और उनकी बाकी मांगों पर विचार किया जायेगा। इस आश्वासन के बाद ही डूटा ने यह घोषणा की। डूटा ने “हजारों-हजारों छात्रों के हित को ध्यान में रखते हुये, वैकल्पिक तरीकों से आंदोलन को जारी रखने” के अपने फैसले की भी घोषणा की। डूटा ने अपना आंदोलन जारी रखते हुए 2 जुलाई को संसद पर विरोध प्रदर्शन किया।

बीते कई दशकों से डूटा शिक्षकों का एक संघर्षशील संघ बनकर आगे आता रहा है। उसने उच्च शिक्षा का निजीकरण करने के सरकार के कदमों का लगातार पर्दाफाश और विरोध किया है। हजारों शिक्षक पदों को खाली रखना और शिक्षकों को रोज़गार की सुरक्षा से वंचित करके अस्थाई तौर पर रखना, “स्वायत्तता” के नाम पर विश्वविद्यालय के टुकड़े-टुकड़े कर देना, इस प्रकार के कदमों का मकसद है शिक्षकों की एकता और उनके संगठन को तोड़ना।

दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों का, अपने हितों की हिफ़ाज़त में तथा उच्च शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ़ संघर्ष पूरी तरह जायज़ है।

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DUTA    Jul 1-15 2018    Struggle for Rights    Rights     2018   

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