एम.एस.पी. की घोषणा - एक ढोंग और धोखा

सरकार ने 4 जुलाई, 2018 को 14 खरीफ फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) की घोषणा की। उसने दावा किया कि उत्पादन की क़ीमत से 50 प्रतिशत ज्यादा एम.एस.पी. निर्धारित करके उसने अपना चुनावी वादा पूरा कर दिया है।

Farmers say no confidence in the government

दिल्ली में काला झंडा प्रदर्शन में आये किसान

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Black flag rally of farmers

Black flag rally of farmers

दिल्ली में काला झंडा प्रदर्शन में आये किसान

इस घोषणा के कुछ ही दिनों के अंदर, किसानों की सैकड़ों यूनियनों और संगठनों ने सरकार की इस ढोंगी घोषणा का निन्दा की। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (ए.आई.के.एस.सी.सी.), जो करीब दो सौ किसान संगठनों का निकाय है, उसने सरकार की घोषणा को ”एतिहासिक विश्वासघात“ बताया है। उसने घोषणा की है कि अगले चार महीनों में वह देशभर में सैकड़ों सभाओं को आयोजित करेगी और सरकार के ढोंग का पर्दाफाश करेगी। 20 जुलाई, 2018 को उसने संसद मार्ग तक एक काला-झंडा प्रदर्शन किया जिसमें हजारों की संख्या में किसानों ने हिस्सा लिया। जबकि संसद में सरकार के खि़लाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पर बहस चल रही थी, संसद के बाहर किसानों का सरकार के प्रति अविश्वास साफ प्रकट हो चुका था।

किसानों की मांगों पर जोर देने के लिये दो विधेयक तैयार किये गये हैं - “किसान कर्ज़ मुक्ति विधेयक-2018” और “कृषि उत्पाद न्यूनतम समर्थन मूल्य किसान अधिकार विधेयक”। इन विधेयकों को निजी सांसद विधेयक बतौर संसद में रखा गया है और किसानों की मांग है कि संसद का एक विशेष सत्र बुलाया जाये ताकि गारंटी के साथ लाभकारी क़ीमतों और व्यापक कर्ज़ मुक्ति की किसानों की मांगों पर संसद में चर्चा हो सके। इन विधेयकों को पारित कराने के लिये किसानों ने दिल्ली में 31 अक्तूबर और 1 नवम्बर को विशाल प्रदर्शन करने की घोषणा की है।

किसान चाहते हैं कि व्यापक उत्पादन खर्च (जिसे सी-2 कहते हैं) उससे 50 प्रतिशत ज्यादा पर एम.एस.पी. तय की जाये। एम.एस.पी. को सभी खर्चों और पारिवारिक श्रम के अनुमानित खर्च (जिसे ए2$एफ.एल. कहते हैं), जो व्यापक उत्पादन खर्च से काफी कम होता है, सरकार उस पर आधारित एम.एस.पी. देना चाहती है। इन दोनों का मुख्य अंतर यह है कि सी2 में ज़मीन का किराया, मशीनों का अवमूल्यन और कर्ज़ पर होने वाला खर्च शामिल किये जाते हैं। नरेन्द्र मोदी व भाजपा के अन्य नेताओं ने यह वादा किया था कि वे स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट को लागू करेंगे जिसमें सिफ़ारिश की गयी है कि खरीदी सी2 से डेढ़ गुने पर की जानी चाहिये। नीचे दी गयी तालिका में देखा जा सकता है कि रबी की फसलों के लिये इन दोनों खर्चों में कितना अंतर है।

ध्यान देने योग्य है कि अधिकतर किसान किराये की ज़मीन पर खेती करते हैं और अधिकांश ने कर्ज़ लिये हुए हैं। अतः उनके लिये सिर्फ सी2 ही मायने रखती है। जैसा कि तालिका-1 में देखा जा सकता है, सी2 ए2$एफ.एल. से तकरीबन 50 प्रतिशत अधिक है। जबकि सरकार का वर्तमान प्रचार यह दावा कर रहा है कि उसने चुनावी वादा पूरा कर दिया है, तालिका-2 दिखाती है कि यह दावा झूठा है। बाजरे को छोड़कर बाकी सभी फसलों के लिये हाल में घोषित एम.एस.पी., सी2 से सिर्फ 7 से 19 प्रतिशत ही अधिक है।

किसानों की दूसरी बेचैनी है कि सरकार ने वास्तव में उनकी फसलों की खरीदी की कोई ठोस योजना नहीं बनाई है। यह ध्यान में रखने योग्य है कि पिछली फसल में गेहूं की सरकारी खरीद 30 प्रतिशत से कम और धान की खरीद 35 प्रतिशत से कम थी। दालों की सरकारी खरीद 20 प्रतिशत से कम थी और तिलहन की खरीद मात्र 7 प्रतिशत थी। इतनी कम खरीद की वजह से किसानों को एम.एस.पी. से बहुत कम दाम पर अपने उत्पाद बेचने पड़ते हैं। ऐसा अनुमान लगाया गया है कि देशभर में 90 प्रतिशत से भी अधिक किसानों की फसलें एम.एस.पी. पर नहीं खरीदी जाती हैं।

सरकारी खरीद बहुत विलंब के साथ होती है। बहुत बार किसानों का अनाज मंडियों में सरकारी खरीद होने से पहले ही नमी और बरसात के कारण खराब हो जाता है। किसानों को लगता है कि खरीद में देरी जानबूझकर की जाती है। खरीद में होने वाली देरी से किसानों को हाने वाली परेशानी का फायदा निजी व्यापारी और शराब बनाने वाली कंपनियां उठाती हैं। जब अनाज गीला हो जाता है तब उसका भंडारन नहीं हो सकता और उसे शराब की कंपनियों को कौड़ियों के मोल बेचना पड़ता है। ऐसी भी ख़बरें आयी हैं कि बरसात होने पर मंडियों में रखे अनाज को ढंकने के लिये लगी प्लास्टिक की चादरों को जानबूझकर हटा दिया जाता है ताकि शराब बनाने वाली कंपनियों के लिये पर्याप्त मात्रा में सस्ता अनाज उपलब्ध रहे, जबकि इससे किसान को बेहद घाटा होता है। इस आपराधिक हरकत के लिये किसी को सज़ा नहीं होती क्योंकि मंडी के अधिकारियों की शराब बनाने वाली कंपनियों के साथ सांठ-गांठ होती है।

वर्तमान सरकार यह दावा कर रही है कि वह किसानों के हितों में काम कर रही है। परन्तु किसानों की आत्महत्याओं की चैंकाने वाली संख्या और किसान संगठनों के विशाल प्रदर्शनों के बावजूद, सरकार ने किसानों की चिंताओं पर अपने शासन के पहले चार वर्षों तक कुछ भी क़दम नहीं उठाये।

अब जब चुनाव नज़दीक आ गये हैं, सरकार ने इस साल के बजट में भावान्तर नामक स्कीम की घोषणा की जिसके तहत किसानों को एम.एस.पी. से कम पर बिके अनाज के लिये भरपाई की घोषणा है। मध्य प्रदेश की सरकार ने इस स्कीम को लागू करने की घोषणा की थी। इस स्कीम के तहत, किसानों को प्रोत्साहित किया गया था कि वे अपनी रबी की फसल को निजी व्यापारियों को अविलंब बेचें चाहे कुछ भी क़ीमत क्यों न मिले। किसानों ने तो सस्ते में अपना अनाज बेच दिया परन्तु उन्हें भरपाई नहीं मिली। ऐसा पता चला है कि सरकार ने भरपाई के लिये बजट में कोई बन्दोबस्त ही नहीं किया था। फिर सरकार ने तकनीकी कारणों का हवाला देते हुए अधिकांश किसानों के भरपाई के दावों को खारिज़ कर दिया!

अब बताया जा रहा है कि नीति आयोग भरपाई की तीन योजनाएं तैयार कर रहा है, जिन्हें आम चुनावों के पहले घोषित करने की संभावना है। पहली है, “मार्केट एश्योरेंस स्कीम” जिसके तहत किसानों की एम.एस.पी. पर खरीद का पैसा सीधे उनके बैंकों में जमा किया जायेगा। दूसरी है भावान्तर की तरह की स्कीम (प्राइस डेफिशियेंसी पेमेंट स्कीम या पी.डी.पी.एस.), जिसके तहत बिना सरकारी खरीद के एम.एस.पी. और मंडियों में खरीद मूल्य का अंतर किसानों को भरपाई के रूप में दिया जायेगा। तीसरी स्कीम में निजी क्षेत्र के लिये प्रोत्साहन है कि वे किसानों से एम.एस.पी. पर अनाज खरीदें। किसानों के कड़वे अनुभवों के बाद उन्हें इन सरकारी स्कीमों से कोई आशा नहीं है। वे जानते हैं कि स्कीमों की घोषणा बहुत ज़ोर-शोर से की जाती है परन्तु उनसे किसानों को कुछ फ़ायदा नहीं होता।

सरकार और पूंजीवादी मीडिया अब यह भी बात कर रहा है कि एम.एस.पी. बढ़ाने की वजह से सरकारी खजाने को 15,000 से 45,000 करोड़ रुपयों का घाटा होगा। इस साल मार्च में नीति आयोग के एक दस्तावेज़ जिसका शीर्षक है “किसानों के लिये एम.एस.पी. के फायदे की सुनिश्चिति” (एंश्योरिंग एम.एस.पी. बेनिफिट्स फॉर फार्मर्स), इसमें कहा गया है कि “दो बजटों में की गयी घोषणाओं का कृषि वस्तुओं की कीमतों पर 15 प्रतिशत असर होगा। जिससे थोक और खुदरा स्तर पर उपभोक्ताओं को भारी महंगाई का सामना करना पड़ेगा।” इस तरह के प्रचार का उद्देश्य है कि महंगाई के लिये, जिसका कष्टदायी असर मज़दूरों व अन्य मेहनतकश लोगों पर होगा, उसके लिये किसानों को ज़िम्मेदार ठहराना। इसका मकसद है उन्हें अपने आजीविका और इज़्ज़त का जीवन जीने के अधिकारों के सांझे संघर्ष में एकजुट होने से रोकना। उनका प्रचार इस तथ्य को छुपाता है कि जो क़ीमत किसानों को मंडियों में मिलती है और जिस क़ीमत पर उपभोक्ताओं को दुकानों से अनाज खरीदना पड़ता है, उनमें ज़मीन आसमान का अंतर होता है। इसका कारण है इजारेदार व्यापारी कंपनियों द्वारा अपार मुनाफ़ा बनाना। यह निश्चित तौर पर संभव है कि हिन्दोस्तानी राज्य थोक का व्यापार अपने हाथों में ले ले, किसानों से स्वामीनाथन समिति की सिफारिश के अनुसार एम.एस.पी. पर फसलों को खरीदे और उन्हें तुरंत पैसे का भुगतान करे। राज्य कार्यकुशल तरीके से भंडारन व वितरण करे और उपभोक्ताओं को आज के दामों से भी कम क़ीमतों पर वस्तुओं को उपलब्ध कराए।

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Aug 1-15 2018    Political-Economy    Privatisation    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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