20 जुलाई को दिल्ली के मज़दूरों की सफल हड़ताल : हक़ और सम्मान के लिए सड़कों पर उतरे दिल्ली के मज़दूर

ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर दिल्ली के मज़दूरों ने अपनी मांगों को लेकर 20 जुलाई, 2018 की हड़ताल को क़ामयाब किया। हड़ताल में हजारों मज़दूर सड़कों पर उतरे। औद्योगिक क्षेत्रों में कामकाज ठप्प रहा। एटक, सी.आई.टी.यू., इंटक, हिन्द मज़दूर सभा, मज़दूर एकता कमेटी, टी.यू.सी.सी., ए.आई.सी.सी.टी.यू., सेवा, ए.आई.यू.टी.यू.सी., यू.टी.यू.सी. और एल.पी.एफ. की संयुक्त कमेटी ने हड़ताल का बुलावा दिया था। दिल्ली की कई अन्य ट्रेड यूनियनों ने हड़ताल को कामयाब करने में योगदान दिया।

Strike of Delhi workers in Okhla Industrial Area Strike of Delhi workers in Okhla Industrial Area
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यह हड़ताल मज़दूरों की भयंकर लूट और शोषण के खिलाफ़ थी। दिल्ली सरकार ने एक साल पहले जो न्यूनतम वेतन घोषित किया था, वह आज तक लागू नहीं हो रहा है। घोषणा के अनुसार, न्यूनतम वेतन 13,896 रुपए होना चाहिए, लेकिन मज़दूरों को 5 से लेकर 10 हजार रुपए महीना ही वेतन मिलता है। पक्के श्रमिकों को काम से बाहर करके, उनकी जगह पर बहुत ही मामूली वेतन देकर ठेके पर काम कराया जा रहा है। समान काम के लिए महिला श्रमिकों को पुरुष श्रमिकों की अपेक्षा कम वेतन दिया जा रहा है। मज़दूरों से 12-12 घंटे काम करवाया जा रहा है। सामाजिक सुरक्षा देने से मालिक इनकार कर रहे हैं।

Strike of Delhi workers in Okhla Industrial Area
Strike of Delhi workers in Okhla Industrial Area
​Strike of Delhi workers in Okhla Industrial Area
Strike of Delhi workers in Okhla Industrial Area

अनाधिकृत कारख़ानों में ख़तरनाक हालातों में काम करने के चलते कई मज़दूरों की मौत हुई है। बवाना, नरेला, सुल्तानपुरी, नवादा आदि क्षेत्रों में, हाल में हुई दुर्घटनायें इसका ताज़ा उदाहरण हैं। न सिर्फ मालिक बल्कि सरकार और उसकी एजेंसियां, इन दुर्घटनाओं के लिए ज़िम्मेदार हैं। जिनका काम था मज़दूरों के काम करने की जगहों और हालातों का जायज़ा लेना और सुरक्षा सुनिश्चित करना।

इन समस्याओं को दिल्ली की ट्रेड यूनियनों ने लगातार उजागर किया है और दिल्ली सरकार से इनको हल करने की मांग की है। लेकिन दिल्ली सरकार अनसुना करती आ रही है।

हड़ताल का प्रस्ताव 7 मई, 2018 को 11 ट्रेड यूनियनों की संयुक्त गोष्ठी में किया गया था। 2 जून 2018 को एटक भवन में हुए सम्मेलन में इन ट्रेड यूनियनों ने हड़ताल पर जाने का फैसला लिया था।

इसके बाद, दिल्ली के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में, हड़ताल की सफलता सुनिश्चित करने के लिए ट्रेड यूनियनों ने जोरदार अभियान चलाया। दिल्ली के चार क्षेत्रों में अलग-अलग टेªड यूनियनों ने अभियान को सफल करने की ज़िम्मेदारी ली थी। दक्षिणी दिल्ली में मज़दूर एकता कमेटी और एटक, पूर्वी दिल्ली में ए.आई.सी.सी.टी.यू., पश्चिमी दिल्ली में एच.एम.एस. और ए.आई.यू.टी.यू.सी. और उत्तरी दिल्ली में सी.आई.टी.यू. ने ज़िम्मेदारी ली। हर क्षेत्र में यह प्रयास था कि वहां काम करने वाली विभिन्न ट्रेड यूनियनों को संघर्ष में शामिल किया जाए और संयुक्त समिति बनायी जाए। अभियान के तहत, रोज़-ब-रोज़ की योजनाएं बनाकर उसे लागू किया गया। लाखों की संख्या में पर्चे बांटे गए। हजारों की संख्या में पोस्टर लगाए लगाए। सैकड़ों की संख्या में नुक्कड़ सभाएं की गईं। टैंपो के ज़रिए प्रचार किया गया। इस अभियान में हजारों मज़दूरों ने बड़े उत्साह के साथ हिस्सा लिया।

हड़ताल के दिन विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में, संयुक्त ट्रेड यूनियनों की अगुवाई में मज़दूरों ने जुलूस निकाला। ओखला, नरेला, बादली, राजस्थानी उद्योग विहार, वजीरपुर, जी.टी. रोड करनाल, मंगोलपुरी, मायापुरी, नारायणा, पटपड़गंज, झिलमिल, फ्रेंड्स कालोनी आदि औद्योगिक क्षेत्रों में ज्यादातर फैक्टरियां बंद थीं। पुलिस ने दो औद्योगिक क्षेत्रों - पटपड़गंज और बादली में कई मज़दूरों को गिरफ्तार किया। पूर्वी दिल्ली के गाजीपुर में स्थित केन्द्रीय वायरहाउसिंग कारपोरेशन बंद रहा। हड़ताल के समर्थन में अंतर्राष्ट्रीय इंदिरा गांधी एयरपोर्ट के ठेका मज़दूरों ने महिपालपुर में धरना दिया। दिल्ली जल बोर्ड के मुख्यालय वरूणालय पर सैकड़ों कर्मचारियों ने धरना दिया। निर्माण मज़दूरों ने 16 जगहों पर धरना दिया। डीटीसी, सफाई कर्मचारी, रेहड़ी-पटरी दुकानदार, घरेलू कामगार और आंगनवाड़ी मज़दूरों ने सिविक सेंटर से लेकर दिल्ली सचिवालय तक जुलूस निकाला और सभा की। इसी तरह से नोएडा, गाजियाबाद के मज़दूर भी हड़ताल में शामिल हुए।

ओखला औद्योगिक क्षेत्र में 4 जगहों से जुलूस निकला - ओखला मेट्रो स्टेशन, तेहखंड चैक, ओखला रेलवे साइडिंग और कालकाजी डिपो। इन जुलूसों में मज़दूरों ने सैकड़ों की संख्या में हिस्सा लेकर अपने शोषण और लूट के खिलाफ़ गुस्से का इजहार किया। इन सभी जुलूसों ने पूरे औद्योगिक क्षेत्र में मार्च किया। अंत में, सारे जुलूस बी.एस.ई.एस. पावर स्टेशन पर पहुंचकर समापन सभा में तब्दील हो गया। इस सभा को संबोधित करने वालों में शामिल थे - एटक से कामरेड महेन्द्र पाल सिंह, सीटू से कामरेड जे.पी. दूबे, एक्टू से कामरेड दिनेश सिंह, मज़दूर एकता कमेटी से कामरेड संतोष कुमार, ए.आई.यू.टी.यू.सी. से कामरेड भास्कर, एच.एम.एस. से कामरेड आर.बी. यादव, इफ्टू से कामरेड अनिमेश दास, आई.सी.टी.यू. से कामरेड उदय नारायण, आर.एम.एस. से शंभूनाथ झा, लेदर कारीगर संगठन से रामबीर सिंह और दक्षिणी दिल्ली ट्रेड यूनियन एसोसियेशन से बलराज। सभा का संचालन कामरेड बिरजू नायक ने किया। सभी वक्ताओं ने केन्द्र सरकार और दिल्ली सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों की निन्दा की और संघर्ष को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।

हड़ताल की कामयाबी दिखाती है कि दिल्ली के मज़दूर अपने अधिकार के लिए संघर्ष करने को तैयार हैं। संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए ट्रेड यूनियनों को आगे भी एकताबद्ध होकर काम करना होगा। हर औद्योगिक क्षेत्र में संयुक्त ट्रेड यूनियन कमेटियों को स्थायी रूप देकर मज़दूरों को संगठित करना होगा और उनके अधिकारों के लिए संघर्ष करना होगा।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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