हिन्दोस्तान की आज़ादी की 71वीं सालगिरह के अवसर पर :

हिन्दोस्तान सच्चे मायने में आज़ाद तब होगा जब उसकी शासन-सत्ता लोगों के हाथ में होगी

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 1 अगस्त, 2018

हर साल, स्वतंत्रता दिवस पर सुनाये गए झूठे वादों से हमारे लोग तंग आ चुके हैं। जवाहरलाल नेहरू के “समाजवादी नमूने का समाज” से लेकर इंदिरा गाँधी का “ग़रीबी हटाओ”, मनमोहन सिंह के “मानवीय चेहरे वाला पूंजीवाद” से लेकर नरेन्द्र मोदी का “सब का विकास”, एक के बाद दूसरे प्रधानमंत्री हर 15 अगस्त को खोखले सपने बेचते रहे हैं। लोग जो सुनना चाहते हैं वही कहना पर करना वही जो टाटा, बिरला, अम्बानी और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घराने चाहते हैं, यही इन नेताओं का प्रशिक्षण है।

जिन अरमानों और लक्ष्यों को लेकर हमारे पूर्वज लडे़ और शहीद हुए थे, उनसे वर्तमान हिन्दोस्तान की हक़ीक़त बहुत ही भिन्न है।

उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष में मज़दूरों, किसानों और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों ने सक्रियता से भाग लिया था, एक ऐसे नए हिन्दोस्तान का निर्माण करने के लक्ष्य और सपने के साथ, जो विश्व साम्राज्यवादी लूट की व्यवस्था से मुक्त होगा। उन्होंने एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था की स्थापना करने के लिए संघर्ष किया था जो आत्मनिर्भर होगी और सबको खुशहाली और सुरक्षित रोज़गार देगी। पर उपनिवेशवादी शासन के ख़त्म हो जाने के 7 दशक बाद, आज हिन्दोस्तान की अर्थव्यवस्था संकट-ग्रस्त विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था के साथ ज्यादा से ज्यादा नजदीकी से जुड़ती जा रही है।

उत्पादन और व्यापार के सभी क्षेत्रों में विदेशी पूंजी के तेज़ी से प्रवेश करने से, करोड़ों मज़दूरों और किसानों की रोज़ी-रोटी तबाह हो रही है। इसके बावजूद, हमारी सरकार दूसरे देशों के इजारेदार पूंजीपतियों से भीख मांगती फिर रही है कि हिन्दोस्तान में ज्यादा पूंजीनिवेश करें। विदेशी कंपनियों को यह आश्वासन दिया जा रहा है कि हिन्दोस्तान के मज़दूरों का अति-शोषण किया जा सकता है, उन्हें अपने मूल अधिकारों से भी वंचित किया जा सकता है, कि किसानों और आदिवासियों को अपनी ज़मीन से बलपूर्वक बेदखल किया जा सकता है।

करोड़ों किसानों और छोटे उत्पादकों की रोज़ी-रोटी को दांव पर रखकर, हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के मुनाफ़ों के लिए बहु-तरफा व्यापार समझौते किये जा रहे हैं। एक के बाद दूसरी सरकार ने देश की अनमोल खनिज सम्पदा को अधिकतम लूट के लिए, हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों को सौंप देने के कदम उठाये हैं।

हमारे पूर्वजों ने एक ऐसी नयी राजनीतिक सत्ता के लिए संघर्ष किया था जिसमें धर्म, जाति, राष्ट्रीयता, नस्ल और लिंग के आधार पर लोगों का दमन और भेदभाव ख़त्म होगा। परन्तु आज भी करोड़ों लोग धर्म, जाति, राष्ट्रीयता और नस्ल के आधार पर दमन और भेदभाव को झेलते हैं। हमारी महिलाएं जीवनभर दमन और भेदभाव का शिकार बनी रहती हैं।

हमारे शहीदों ने एक ऐसे नए राज्य का सपना देखा था जिसमें हिन्दोस्तान में रहने वाले विविध लोगों के अधिकारों की रक्षा की जायेगी। पर वर्तमान हिन्दोस्तानी राज्य, हमारे अधिकारों की रक्षा करना तो दूर, खुद ही मानव अधिकारों और राष्ट्रीय अधिकारों समेत सभी जनवादी अधिकारों का सबसे ज्यादा हनन करता है। यह राज्य अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने वालों पर वहशी अत्याचार करता है। यह राज्य लोगों को बांटने और उन्हें इजारेदार पूंजीपतियों की हुक्मशाही का गुलाम बनाये रखने के लिए सांप्रदायिक हिंसा और अन्य प्रकार के राजकीय आतंक को आयोजित करता है।

इस समस्या की जड़ यह है कि 15 अगस्त, 1947 को राजनीतिक सत्ता लोगों के हाथों में नहीं आयी थी। राजनीतिक सत्ता हिन्दोस्तानी बड़े पूंजीपतियों के हाथों में हस्तांतरित हुयी थी। हिन्दोस्तानी बड़े पूंजीपति देश में बड़े ज़मींदारों और दूसरे परजीवी व गद्दार तत्वों के साथ तथा विदेश में साम्राज्यवाद के साथ मिले हुए थे। बड़े पूंजीपतियों ने फैसला किया कि उसी दमनकारी उपनिवेशवादी राज्य और शोषण व लूट की उसी आर्थिक व्यवस्था को बरकरार रखा जायेगा, जिसे बर्तानवी साम्राज्यवाद ने स्थापित किया था। हिन्दोस्तानी लोगों को बांटने, कुचलने और उन पर राज करने के लिए जो राज्य तंत्र और “कानून का राज” स्थापित किया गया था, उसे वैसे का वैसा ही रखा गया।

1947 में बर्तानवी संसद में जो इडियन इंडिपेंडेंस एक्ट पास हुआ था, उसके अनुसार विभाजित क्षेत्र पर संप्रभुता को बर्तानवी ताज से हिन्दोस्तान की संविधान सभा में हस्तांतरित किया गया। संविधान सभा ने एक ऐसे संविधान को अपनाया जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि संप्रभुता लोगों के हाथों में नहीं होगी। संप्रभुता संसद में राष्ट्रपति के हाथों में सौंपी गयी और राष्ट्रपति मंत्रीमंडल की सलाह के अनुसार काम करने को बाध्य है।

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि 1947 में राजनीतिक आज़ादी प्राप्त हुयी परन्तु सामाजिक क्रांति का रास्ता रुका रहा। संविधान ने पहले से चली आ रही दमन, शोषण और लूट की व्यवस्था को बरकरार रखने व अतिकुशल बनाने का काम किया। संविधान ने बहुपार्टीवादी, प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र की राजनीतिक प्रक्रिया को वैधता दी, जिसका मकसद है लोगों को सत्ता से बाहर रखना। राज्य, उपनिवेशवादी काल की तरह, देशी व विदेशी शोषकों के खि़लाफ़ हमारे लोगों के संघर्ष को कुचलने का साधन बना रहा।

बीते 71 वर्षों में, बड़े पूंजीपतियों ने, बर्तानवी उपनिवेशवादियों से विरासत में प्राप्त राज्य का इस्तेमाल करके, अपनी राजनीतिक प्रधानता को मजबूत किया है और दुनियाभर के पूंजीपतियों के साथ सहयोग व स्पर्धा करते हुए, अपनी तिजौरियों व निजी साम्राज्यों को मालामाल किया है। उन्होंने अपने तंग ख़ुदगर्ज़ हितों के लिए, हिन्दोस्तान को साम्राज्यवादी व्यवस्था के अन्दर रखा है।

इस समय, लगभग 150 इजारेदार पूंजीवादी घराने अर्थव्यवस्था पर हावी हैं और हिन्दोस्तानी गणराज्य पर उन्हीं का वर्चस्व व नियंत्रण बना हुआ है। वे समाज का कार्यक्रम और अर्थव्यवस्था की दिशा तय करते हैं। किस चीज का उत्पादन किया जाता है, कितना उत्पादन किया जाता है, यह लोगों की ज़रूरतों से नहीं निर्धारित होता है। सभी फैसलों की प्रेरक शक्ति हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के अधिकतम निजी मुनाफ़ों की लालच है। फैसले लेने की प्रक्रिया में लोगों की कोई जगह नहीं है।

बहुपार्टीवादी, प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र की व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि सिर्फ उन पार्टियों को ही सरकार चलाने का काम सौंपा जा सकता है जो सत्ता पर बैठे इन मुट्ठीभर शोषकों के हितों का प्रतिनिधत्व करती हों। कांग्रेस पार्टी और भाजपा जैसी पार्टियां अपनी सरकार बनाने और इजारेदार पूंजीवादी घरानों के कार्यक्रम को लागू करने के लिए आपस में होड़ लगाती हैं।

आज़ादी के ठीक बाद के दशकों में, कांग्रेस पार्टी की अगुवाई में बनी सरकारों ने “समाजवादी नमूने के समाज” के झंडे तले पूंजीवाद को विकसित करने वाली टाटा-बिरला योजना को लागू किया था। वह आयातों के बजाय घरेलू उत्पाद और राज्य द्वारा निवेश के ज़रिये विविध उद्योगों का निर्माण करने और हिन्दोस्तान की सैनिक ताक़त को मजबूत करने की योजना थी। इसके लिए धन अमरीका, ब्रिटेन, विश्व बैंक और सोवियत संघ से अनुदानों व उधारों के रूप में जुटाया गया।

1980 के दशक से और खास कर 1991 से ज्यादा खुले रूप से, जो भी सरकार आयी है, वह अर्थव्यवस्था की सारी समस्याओं के लिए “समाजवादी नमूने के समाज” को दोषी ठहराती रही है। उन्होंने उदारीकरण और निजीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के कार्यक्रम को खुलेआम अपना लिया। इससे यह स्पष्ट होता है कि हिन्दोस्तान के इजारेदार पूंजीवादी घराने हमलावर, वैश्विक विस्तार के रास्ते पर उतर आये हैं। वे ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों में विदेशी पूंजी को आकर्षित करके, हमारे देश में पूंजीवादी विकास की गति को खूब तेज़ करना चाहते हैं, और इसके सहारे विदेशों में हिन्दोस्तानी पूंजी का विस्तार करना चाहते हैं। उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं है कि इस रणनीति का हमारी जनता पर क्या ताबहकारी परिणाम होगा।

अपने साम्राज्यवादी मंसूबों से प्रेरित होकर, हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ एक सैनिक रणनैतिक गठबंधन को क्रमशः मजबूत कर रहे हैं। यह बढ़ता हिन्दोस्तान-अमरीका गठबंधन हमारे देश के लोगों तथा इस इलाके के दूसरे देशों के लोगों के लिए बहुत ख़तरनाक है। यह हिन्दोस्तान के, अमरीकी साम्राज्यवाद की इच्छाओं के अनुसार काम करने को मजबूर होने का ख़तरा बढ़ाता है। यह अमरीकी साम्राज्यवादियों की नाजायज़ जंगों में हिन्दोस्तान के फंस जाने के ख़तरे को बढ़ाता है।

जब तक हिन्दोस्तान की सरकार अमरीकी साम्राज्यवाद की भू-राजनीतिक कार्यदिशा के अनुसार चलती है और उससे सिर्फ थोड़ी-बहुत भटकती है, तब तक हिन्दोस्तान के अन्दर अमरीकी एजेंसियां चुपचाप रहेंगी। परन्तु अगर हिन्दोस्तान की सरकार ज्यादा भटकती है, तो अमरीकी साम्राज्यवादी अपने अस्त-व्यस्तता फैलाने वाले तंत्रों को क्रियाशील कर देंगे, गुप्त आतंकवादी हरक़तों, “भ्रष्टाचार-विरोधी”, “जनवाद-परस्त” और अलगाववादी आंदोलनों को आयोजित करने का अपना काम शुरू कर देंगे। आम तौर पर अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों में और खास तौर पर हिन्दोस्तान में, अमरीकी साम्राज्यवाद का, अपना उल्लू सीधा करने का, यही जाना-पहचाना तौर-तरीका रहा है।

हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदारों के साम्राज्यवादी रास्ते पर तेज़ी से आगे बढ़ने से और हिन्दोस्तान-अमरीका रणनैतिक गठबंधन के और मजबूत होने से, न सिर्फ हिन्दोस्तान पर विदेशी दबाव और नाजायज़ साम्राज्यवादी जंगों में हिन्दोस्तान के फंस जाने के ख़तरे बढ़ रहे हैं, बल्कि इन साम्राज्यवादी दांवपेचों की वजह से, हिन्दोस्तानी संघ के टुकड़े-टुकड़े हो जाने का ख़तरा भी बढ़ रहा है।

कुल मिलाकर, बड़े सरमायदार हिन्दोस्तान को एक बहुत ही ख़तरनाक रास्ते पर ले जा रहे हैं। वे लोगों को रोज़गार और जीवन की बढ़ती असुरक्षा की स्थिति में धकेल रहे हैं। वे अपने ख़ुदगर्ज़ हितों के लिए, शांति और देश की आज़ादी के साथ समझौता कर रहे हैं।

1857 के क्रांतिकारी शहीदों, हिंदुस्तान ग़दर पार्टी, हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष के अन्य वीरों का सपना था एक ऐसा नया हिन्दोस्तानी राज्य, जिसमें सभी की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित होगी। उनका लक्ष्य था साम्राज्यवादी व्यवस्था से पूरी तरह नाता तोड़ना और उपनिवेशवाद की पूरी विरासत को ख़त्म करना। परन्तु 1947 में उनके इस सपने के साथ विश्वासघात किया गया था। उनका सपना पूरा करना आज हमारा अत्यावश्यक काम है।

हिन्दोस्तान को तभी बचाया जा सकता है अगर उसके मज़दूर, किसान, औरत और जवान उसके मालिक बन जाते हैं। परन्तु बहुपार्टीवादी, प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र की वर्तमान व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया के चलते, ऐसा होना संभव नहीं है। यह व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया लोगों को सत्ता से बाहर रखने के लिए बनायी गयी है।

हमें एक ऐसे नए समाज की रचना करने के लक्ष्य के साथ अपने संघर्षों को आगे बढ़ाना होगा, जिसमें हमारे हितों को प्राथमिकता दी जायेगी। हमें एक नया संविधान अपनाना होगा, जिससे मानव अधिकार और जनवादी अधिकार सुनिश्चित होंगे। हमें एक ऐसा नया राज्य स्थापित करना और उसे मजबूत करना होगा, जो सबकी खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करेगा और अंदरूनी व विदेशी ताक़तों द्वारा शोषण और लूट के सभी प्रयासों को कुचल देगा। हमें एक नयी राजनीतिक प्रक्रिया की ज़रूरत है, जिसमें फैसले लेने की ताक़त लोगों के पास होगी।

जब लोगों के हाथ में फैसले लेने की ताक़त होगी, तब लोग अर्थव्यवस्था को नयी दिशा दिला सकेंगे, ताकि लोगों की ज़रूरतें पूरी की जायें, न कि पूंजीपतियों की लालच। संतुलित और आत्म-निर्भर आर्थिक विकास सुनिश्चित करने के लिए अर्थव्यवस्था की अलग-अलग शाखाओं में पूंजीनिवेश किये जायेंगे। विदेश व्यापार लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए घरेलू उत्पादन का पूरक होगा और आत्म-निर्भरता के असूल का पालन किया जायेगा।

जब हिन्दोस्तान के लोग सत्ता में होंगे, तो हिन्दोस्तान साम्राज्यवादी व्यवस्था के चंगुल से मुक्त होकर वास्तव में एक आज़ाद देश बतौर उभर कर आगे आएगा। वह सभी देशों और लोगों के साथ शांति, मित्रता और सहयोग के संबंध बनाएगा तथा साम्राज्यवाद-प्रेरित शासन परिवर्तन व कब्ज़ाकारी जंग का डटकर विरोध करेगा।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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