दिल्ली के श्रमिक संगठनों ने श्रममंत्री से की बैठक

20 जुलाई, 2018 को सभी मज़दूर यूनियनों द्वारा दिल्ली में आयोजित संयुक्त औद्योगिक हड़ताल सफलतापूर्वक हुई। हड़ताल का आह्वान 11 ट्रेड यूनियनों और कई मज़दूर संगठनों ने किया था। इसमें उद्योगों और सेवाओं के अलग-अलग क्षेत्रों से लाखों-लाखों मज़दूरों ने भाग लिया था।

Meeting withe lebore minister9 अगस्त, 2018 को दिल्ली सरकार के श्रममंत्री ने 11 ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक बुलायी। कई अन्य श्रमिक संगठन भी इस बैठक में उपस्थित थे। इस बैठक में शामिल संगठन थे - एटक, इंटक, सीटू, मज़दूर एकता कमेटी, एचएमएस, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी, बीएमएस, सेवा, ऑल इंडिया कंस्ट्रक्शन वर्कर्स काउंसिल, एक्टू, एलपीएफ, यूटीयूसी, निर्माण मज़दूर पंचायत संगम, दिल्ली श्रमिक संगठन, साउथ दिल्ली एसोसियेशन, दिल्ली लेदर कारीगर संगठन, आईसीटीयू आदि। 

सभी श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने दिल्ली के मज़दूरों की तमाम समस्याओं और मांगों, जिनके लिये वे लगातार संघर्ष करते आ रहे हैं, को फिर से श्रममंत्री को पेश किया। प्रतिनिधियों ने इस बात पर रोष प्रकट किया कि बार-बार ज्ञापन देने के बाद भी दिल्ली सरकार ने इन मांगों पर कोई ठोस क़दम नहीं लिया है। इसके अलावा श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों से मिलने और उनसे सलाह मशवरा करने का भी दिल्ली सरकार ने कोई प्रयास नहीं किया है।

दिल्ली के लगभग 55 लाख मज़दूरों के लिये न्यूनतम वेतन सुनिश्चित करने के मुद्दे पर श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने दिल्ली सरकार की कड़ी आलोचना की।

विदित है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल में सरकार के न्यूनतम वेतन लागू करने के फैसले को खारिज़ कर दिया है। इसके लिये कोर्ट ने यह बहाना दिया है कि पूंजीपतियों के संस्थानों - फिक्की, एसोचैम, सीआईआई - के प्रतिनिधि कमेटी में शामिल नहीं थे, कि अन्य राज्यों की तुलना में यह वेतन वृद्धि ज्यादा है और यह संवैधानिक क़ायदों के अनुसार नहीं किया गया है।

श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने दिल्ली के मज़दूरों के अधिकार को पूरा करने में दिल्ली सरकार की नाकामयाबी पर अपना गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जब हाई कोर्ट में यह केस चल रहा था, तो उस दौरान दिल्ली सरकार ने सभी यूनियनों को इस कार्यवाही में शामिल करने की कोई पहल नहीं ली और न ही वेज बोर्ड की कोई मीटिंग बुलायी।

बैठक में यह फैसला किया गया कि 1) केन्द्र सरकार द्वारा तय किया गया न्यूनतम वेतन लागू किया जायेगा; 2) दिल्ली सरकार सुप्रीम कोर्ट में दुबारा याचिका दाखिल करेगी; 3) 21 अगस्त को मज़दूरों की बाकी मांगों को लेकर सभी श्रमिक संगठन दिल्ली सरकार के श्रममंत्री के साथ फिर बैठक करेंगे।

बैठक में मज़दूरों का प्रतिनिधित्व करने वालों में शामिल थे -एटक से धीरेंद्र शर्मा, मज़दूर एकता कमेटी से सन्तोष कुमार, इंटक से ऋषिपाल, बीएमएस से भाटी, एचएमएस से हरभजन सिंह सिद्धू, सीटू से अनुराग सक्सेना, एआईयूटीयूसी से मैनेजर चैरसिया, टीयूसीसी से रमेश, सेवा से लता, ऑल इंडिया कंस्ट्रक्शन वर्कर्स काउंसिल से गौतम, एलपीएफ से जवाहर और यूटीयूसी से मानवेंद्र, निर्माण मज़दूर पंचायत संगम से सुभाष भटनागर, एक्टू से अभिषेक, दिल्ली श्रमिक संगठन से रामेन्द्र, दिल्ली लेदर कारीगर संगठन से राजवीर, आईसीटीयू से उदय नारायण आदि।

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श्रममंत्री    न्यूनतम वेतन    संवैधानिक    Aug 16-31 2018    Struggle for Rights    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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