एक छोर पर बढ़ती दौलत और दूसरे छोर पर बढ़ती ग़रीबी

हमारे शासक हिन्दोस्तान की उच्च आर्थिक विकास की दर के बारे डींग मारते हैं। लेकिन, इसके फलस्वरूप पूंजी में हुई वृद्धि एक बहुत छोटे समूह में ही केंद्रित रही है। यह उच्च आर्थिक विकास की दर अपने साथ मेहनतकशों के लिए बढ़ती ग़रीबी और व्यापक विपदा भी साथ लायी है।

13 जुलाई को समाचार मिला कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रमुख मुकेश अंबानी एशिया के सबसे अमीर पूंजीपति बन गए हैं। उनकी संपत्ति 2017 में 31.3 अरब डॉलर (2,00,000 करोड़ रुपये) से बढ़कर 2018 में 44.3 अरब अमरीकी डॉलर (3,00,000 करोड़ रुपये) हो गई, मतलब एक साल में 50 प्रतिशत की वृद्धि।

इसके दो हफ्ते बाद ही राजधानी दिल्ली में भुखमरी से तीन लड़कियों की मौत की ख़बर आई। तीव्र पूंजीवादी विकास का यही वरदान है - कुछ दर्जन बड़े इजारेदार पूंजीपतियों के लिए अधिकतम मुनाफ़ा व दौलत और मेहनतकश बहुसंख्या के लिए कंगाली।

अब हमारे देश में पिछले 100 वर्षों में दौलत और आय में असमानता सबसे उच्चतम स्तर पर देखी जा रही है। हिन्दोस्तान की राष्ट्रीय आय का अधिकतम हिस्सा केवल 0.001 प्रतिशत आबादी यानी लगभग 14,000 समृद्ध पूंजीपतियों की जेब में जाता है जिसका नेतृत्व लगभग 150 इजारेदार घराने करते हैं। कई व्यक्तियों द्वारा पिछले बीस वर्षों के कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व की सरकारों का उल्लेख “अरबपति राज” कहकर किया जा रहा है।

विश्व आर्थिक मंच (वल्र्ड इकॉनामिक फोरम) के अनुसार, हिन्दोस्तान को अपनी आबादी का पेट भरने के लिए प्रति वर्ष केवल 22.5-23 करोड़ टन अनाज की ज़रूरत है। 2016-17 में 27.34 करोड़ टन का रिकॉर्ड कृषि उत्पादन हुआ। फिर भी, अनाज बाहुल्य देश में लाखों लोग खाली पेट सो रहे हैं और हजारों लोग भुखमरी से मर रहे हैं। पर्याप्त पौष्टिक आहार की कमी के कारण पांच साल से कम उम्र के 38.4 प्रतिशत हिन्दोस्तानी बच्चे कुपोषित हैं।

भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीति ने कई पूंजीवादी इजारेदार  घरानों की संपत्ति में आश्चर्यजनक बढ़ोतरी की है।

टाटा समूह में अब 100 से ज्यादा कंपनियां शामिल हैं। 2016-17 में इस समूह का कुल राजस्व 6,70,000 करोड़ रुपये से भी अधिक था। इसमें से लगभग 65 प्रतिशत राजस्व विदेशों में हो रहे कारोबार से आया है। टाटा समूह अब ब्रिटेन का सबसे बड़ा विदेशी निवेशक बन गया है।

कई छोटे सीमेंट उत्पादकों को अधिग्रहित करके आदित्य बिड़ला समूह देश का सर्वोच्च सीमेंट इजारेदार बन गया है। अब वह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा सीमेंट उत्पादक है। हाल ही में एक अमरीकी कंपनी का अधिग्रहण करके वह एल्यूमीनियम शीट का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक भी बन गया है।

रिलायंस समूह दुनिया के पांच सबसे बड़े पेट्रोकेमिकल उत्पादकों में से एक है। इस समूह को पेट्रोलियम, दूरसंचार और खुदरा व्यापार के क्षेत्र में अधिकतम मुनाफ़ा मिले इसके अनुसार केंद्र सरकार की नीतियां तैयार की जा रही हैं। गुजरात के जामनगर में रिलायंस रिफाइनरी दुनिया की सबसे बड़ी एकल-स्थान रिफाइनरी है और यह हमारे देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों के विनियन्त्रण की प्रमुख लाभकारी है।

दूरसंचार के क्षेत्र में एकाधिपत्य की लड़ाई ने चार दूरसंचार कंपनियों को बंद कर दिया है जिसके फलस्वरूप मैदान में केवल तीन बड़े खिलाड़ी ही रह गए हैं। मुकेश अंबानी के जियो टेलीकॉम ने दो साल से भी कम समय में बाज़ार का 23 प्रतिशत हिस्सा हथिया लिया है और 50 प्रतिशत हिस्से के लक्ष्य की तरफ अग्रसर है। मोदी के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार ने 5जी स्पेक्ट्रम की नीलामी के लिए आरक्षित मूल्य 40 प्रतिशत कम कर दिया है। यह कहा जा रहा है कि इस क़दम का लाभ एकमात्र अंबानी के जियो को ही होगा क्योंकि नए स्पेक्ट्रम को खरीदने के लिए पैसा अन्य दूरसंचार कंपनियों के बीच में से केवल जियो के पास ही है।

खुदरा व्यापार में बड़े एकाधिपत्य वाले समूहों के प्रवेश से लाखों छोटे व्यापारी अपना व्यापार बंद करने पर मजबूर हो गए हैं। रिलायंस रिटेल के 7500 स्टोर्स की वार्षिक बिक्री 70,000 करोड़ रुपये से आधिक पहुंच गयी है। अब रिलायंस दूरसंचार ने अपने प्रभुत्व का उपयोग करके ऑनलाइन रिटेल पर हावी होने और इस क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े इजारेदार समूहों के साथ प्रतिस्पर्धा करने का इरादा रखता है।

सरकार का दावा है कि जीएसटी को लागू करके देश में अब तक का सबसे बड़ा कर सुधार किया गया है। कार्यान्वयन के एक वर्ष बाद ही इसे बड़ी सफलता के रूप में घोषित कर दिया गया है। जीएसटी जैसे अप्रत्यक्ष कर से वित्त वर्ष 2017-18 में 90,000 करोड़ रुपये के मासिक औसत संग्रह से जून 2018 में 96,000 करोड़ रुपये में वृद्धि को इसकी सफलता के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। लेकिन, जीएसटी के संग्रह में प्रति माह 6,000 करोड़ रुपये की वृद्धि का मतलब है लोगों पर 72,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त वार्षिक बोझ।

जीएसटी के कारण हुई उच्च मुद्रास्फीति ने लोगों को और नुकसान पहुंचाया है क्योंकि सेवाओं के लिए अब 15 प्रतिशत के बजाय 18 प्रतिशत की उच्च दर पर कर देना पड़ रहा है। जीएसटी के लागू होने के परिणामस्वरूप हिन्दोस्तान के निर्यात में भी भारी गिरावट आई है। 2017-18 में जीडीपी के अनुपात के रूप में निर्यात 2003-04 के बाद से सबसे कम था जिसके कारण लाखों मज़दूरों ने अपनी नौकरियां खो दीं।

जीएसटी और सरकार के कई अन्य उपाय निश्चित रूप से पूंजीवादी इजारेदारी घरानों के लिए लाभकारी रहे हैं। इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल-जून 2018 तिमाही में बड़े निजी क्षेत्र की कंपनियों का लाभ 15 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है, जो पिछले दो वर्षों के दौरान किसी भी तिमाही में सबसे ज्यादा वृद्धि होगी।

पूंजीपतियों के मुनाफ़ों में बढ़ोतरी सुनिश्चित करने के लिए मज़दूरों पर हमले और तेज़ कर दिए गए हैं। सभी उद्योगों में निश्चित अवधि के लिये अनुबंध (फिक्स टर्म कांट्रेक्ट) के आधार पर काम करवाने की अनुमति दे दी गयी है। इससे व्यवसायों को आसानी से भर्ती व छंटनी करना संभव हो जाएगा जो कि कई वर्षों से पूंजीपतियों की मांग थी। प्रत्येक क्षेत्र में अब निजीकरण किया जा रहा है।

कुछ-कुछ महीनों के बाद मज़दूर वर्ग पर एक नया हमला किया जाता है। नवीनतम हमला प्रस्तावित मोटर वाहन संशोधन अधिनियम के माध्यम से किया जा रहा है जो पूरे देश में लाखों छोटी-छोटी ऑटो रिपेयर कार्यशालाओं में कार्यरत करोड़ों मज़दूरों को बेरोज़गार बना देगा, क्योंकि अब केवल उन कार्यशालाओं को ही मरम्मत करने की अनुमति दी जाएगी जो बड़ी ऑटो कंपनियों द्वारा अधिकृत होंगी।

राज्य व्यवस्था पर अपने नियंत्रण के फलस्वरूप अत्याधिक अमीर शोषक वर्ग यह सुनिश्चित कर रहा है कि बहुसंख्या मेहनतकशों का शोषण करके अर्थव्यवस्था केवल उनके मुनाफे़ के किये काम करे। राज्य व्यवस्था को जब तक मज़दूरों और किसानों के नियंत्रण में नहीं लाया जाता है वह उनके कल्याण और प्रगति के लिए नहीं काम करेगी।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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