कानूनी न्यूनतम वेतन से भी इनकार

राज्य की नीति के निदेशक तत्व उद्घोषित करते हैं कि “राज्य उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से कृषि के, उद्योग के या अन्य प्रकार के सभी कर्मकारों को काम, निर्वाह मज़दूरी, शिष्ट जीवनस्तर और अवकाश का संपूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएं तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्राप्त कराने का प्रयास करेगा ...।”

हिन्दोस्तान की आज़ादी के तुरंत बाद, उचित मज़दूरी समिति का गठन किया गया और उसने घोषणा की कि कुछ वर्षों तक निर्वाह मज़दूरी (अर्थात, जीने योग्य वेतन या लिविंग वेज) सुनिश्चित करना संभव नहीं होगा। उसने न्यूनतम वेतन की सिफारिश की। न्यूनतम वेतन की परिभाषा है - वह कम से कम वेतन जिससे कम में एक मज़दूर व उसके परिवार को सबसे निचले स्तर पर जीवन निर्वाह करने के लिये खाद्य पदार्थों, कपड़ों और आवास जुटाना मुश्किल होता है। यह “जीने योग्य वेतन”, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और एक अच्छे जीवन के लिये अन्य ज़रूरतें शामिल होती हैं, उससे कम है।

1957 में भारतीय श्रम सम्मेलन (आई.एल.सी.) के 15वें सत्र में न्यूनतम वेतन के आकलन का एक सूत्र बनाया गया। 1991 के सर्वोच्च अदालत के फैसले में घोषणा की गयी थी कि इस सूत्र में 25 प्रतिशत और जोड़ना होगा ताकि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, त्यौहारों, शादियों और बुढ़ापे की ज़रूरतों को भी पूरा किया जा सके। किसी भी सरकार ने अब तक आई.एल.सी. द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन ही लागू नहीं किया है, सर्वोच्च अदालत की वृद्धि की देने की तो बात ही अलग।

वर्तमान समय में ट्रेड यूनियनें प्रति माह 18,000 रुपये के वेतन को पूरे देश में एक स्तर पर लागू करवाने के लिये लड़ रही हैं जिससे कम वेतन पर देशभर में किसी भी मज़दूर को काम पर नहीं रखा जाना चाहिये। दिल्ली में मज़दूरों की यूनियनों ने 20 जुलाई को एक आम हड़ताल आयोजित की जिसमें 20,000 रु. प्रति माह के न्यूनतम वेतन की मांग रखी गयी।

न्यूनतम वेतन के संबंध में मज़दूरों को दो मुख्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। पहली है कि केन्द्र सरकार आई.एल.सी. की सिफारिश को मानने से इनकार कर रही है। दूसरी समस्या है कि सरकार मौजूदा कानून के अनुसार भी न्यूनतम वेतन को लागू करने में असफल रही है। करोड़ों मज़दूरों को कानूनी न्यूनतम वेतन से कम वेतन मिलता है और मालिकों पर कोई कार्यवाई नहीं की जाती है।

सरमायदारों के विचारक लगातार इस झूठ का प्रचार करते रहते हैं कि अगर श्रमिकों का न्यूनतम वेतन बढ़ाया जायेगा तो पूंजीपति दिवालिया हो जायेंगे। सच्चाई तो यह है कि अपने देश में श्रमिकों के वेतन अत्यंत कम हैं और पूंजीपतियों के मुनाफे़ अत्यंत ज्यादा। न्यूनतम वेतन को अवमानवीय स्तर पर रख कर और इस अपर्याप्त न्यूनतम वेतन को लागू करके, सरकार हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों के लिये हिन्दोस्तानी श्रम के अतिशोषण को चोटी के स्तर पर ला रही है।

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न्यूनतम वेतन    Aug 16-31 2018    Voice of the Party    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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