इजारेदार पूंजीपतियों के हित में भूमि अधिग्रहण

जबरदस्ती से किये जा रहे भूमि अधिग्रहण के खि़लाफ़ देशभर के किसानों और जनजातियों के विशाल विरोध के चलते कांग्रेस-नीत संप्रग सरकार को बस्तीवादी भूमि अधिग्रहण अधिनियम को वापस लेना पड़ा था और 2013 में भूमि अधिग्रहण के लिए एक नया कानून बनाना पड़ा था। यह नया कानून पूंजीपतियों को मंजूर नहीं था जो अपनी मुनाफ़ेदार परियोजनाओं के लिए जल्दी से जल्दी भूमि का आधिग्रहण करने को उत्सुक थे। भाजपा-नीत राजग सरकार ने इस 2013 के कानून को बड़े पूंजीपतियों के हित में बदलने की कई बार कोशिश की लेकिन किसानों और मज़दूरों के एकजुट संघर्ष के चलते उनको इसमें क़ामयाबी नहीं मिल पाई है।

ऐसी हालत में केद्र सरकार ने तमाम राज्य सरकारों को भूमि अधिग्रहण पर अपने राज्य स्तरीय कानूनों को बदलने को कहा ताकि “सार्वजनिक कार्य” के नाम पर जबरदस्ती से किसानों की ज़मीन का अधिग्रहण किया जा सके। गुजरात, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, और झारखण्ड की सरकारों ने महामार्ग, और “स्मार्ट सिटी” बनाने के नाम पर किसानों से जबरदस्ती भूमि अधिग्रहण करने के लिए अपने राज्य स्तरीय कानूनों में बदलाव किया है।

जंगल अधिकार अधिनियम जिसे आदिवासियों और वनवासियों के कड़े संघर्ष के चलते पारित किया गया था, उसका भी खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन किया जा रहा है। झारखण्ड में किसानों और आदिवासियों को उनकी ज़मीन से बेदखल किया जा रहा है ताकि बड़े पूंजीपति वहां कोयले की खदानें बना सकें और राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का शोषण कर सकें।

“विकास” के नाम पर जबरदस्ती से किये जा रहे भूमि अधिग्रहण के खि़लाफ़ किसानों और आदिवासियों के विशाल संघर्ष जगह-जगह पर फूट पड़े हैं। अपने कड़वे अनुभवों के आधार पर किसान और आदिवासी यह समझ गए हैं कि पूंजीवादी विकास अधिकांश लोगों को रोज़ी-रोटी से वंचित करता है। वे सब एकजुट होकर इस तरह के “विकास” का विरोध कर रहे हैं।

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इजारेदार. पूंजीपतियों    भूमि अधिग्रहण    Aug 16-31 2018    Voice of the Party    Privatisation    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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