पूंजीपतियों के मुनाफ़ों के लिए मज़दूरों के अधिकारों पर हमला

केंद्र सरकार ने औद्योगिक संबंधों की एक संहिता का मसौदा तैयार किया है जो तीन मौजूदा कानूनों की जगह लेगा। ये कानून हैं - औद्योगिक विवाद अधिनियम, ट्रेड यूनियन अधिनियम और औद्योगिक रोज़गार (स्थायी आदेश) अधिनियम।

प्रस्तावित नयी संहिता के तहत जो भी पूंजीपति 300 से कम स्थायी मज़दूरों को काम पर रखता है, वह उन मज़दूरों को अपनी मर्जी से किसी भी वक्त नौकरी से निकाल सकता है, और इसके लिए उसे सरकार से इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं होगी। मौजूदा औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत ऐसा केवल 100 से कम मज़दूरों वाली फक्ट्रियों में ही किया जा सकता है। यह नयी संहिता हड़तालों पर करीब-करीब पूरी तरह से प्रतिबंध लगाती है और जो कोई हड़ताल आयोजित करता है या उसमें हिस्सा लेता है उस पर भारी जुर्माना लगाया जायेगा। इस संहिता के तहत कंपनी मालिक किसी भी वक्त अपनी मनमर्ज़ी से एक तरफा तरीके से मज़दूरी की शर्तों को बदल सकता है। 

इस समय मज़दूरों का बहुत ही छोटा सा हिस्सा ऐसा है जिसके लिये मौजूदा कानून लागू होते हैं जो उनके कुछ अधिकारों की रक्षा करते हैं। इसके बावजूद जिन फैक्ट्रियों और कारखानों में ये कानून लागू होते हैं वहां भी अस्थायी मज़दूरों को इन कानूनों के दायरे से बाहर रखा गया है। सार्वजनिक क्षेत्रों में 50  प्रतिशत मज़दूर अस्थायी या अनुबंध पर हैं तो निजी क्षेत्रों में इनकी तादाद करीब 70 प्रतिशत है। पूंजीपति वर्ग लगातार यह प्रचार करता रहता है कि मज़दूरों का केवल बहुत ही छोटा सा तबका है जो इन “श्रम कानूनों का फायदा उठाता है” और उनको विशेषाधिकार दिए जा रहे हैं। ऐसा करते हुए पूंजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग के सबसे अधिक संगठित तबके पर हमला कर रहा है और इस तरह से वह पूरे मज़दूर वर्ग पर हमला कर रहा है।

प्रशिक्षु अधिनियम में इस तरह के बदलाव किये गए हैं जिनसे नौजवान मज़दूर बरसों-बरसों न्यूनतम वेतन पर नौकरी करने को मजबूर होंगे और उन्हें अवकाश या कोई भी अन्य सामाजिक सुरक्षा की सुविधायें नहीं दी जाएंगी। सरकार ने एक राष्ट्रीय रोज़गार क्षमता वृद्धि मिशन का ऐलान किया है जिसके तहत पूंजीपति स्थायी मज़दूरों की जगह पर प्रशिक्षु (ट्रेनी) या अप्रेंटिस मज़दूरों को काम पर रख पायेंगे। इस मिशन के तहत पूंजीपति नौजवान मज़दूरों को तीन साल के लिए “ट्रेनिंग” के नाम पर सबसे कम वेतन देकर मज़दूरी पर रख पायेंगे और उनको तमाम कानूनी सुविधाओं से वंचित कर पायेंगे।

श्रम कानून (संशोधन) अधिनियम को भी पारित किया गया है जिसके मुताबिक कोई प्रतिष्ठान 40 से कम मज़दूरों को नौकरी पर रखता है तो उन्हें “लघु उद्योग” की श्रेणी में माना जायेगा। इन “लघु उद्योगों” को किसी भी तरह का रजिस्टर रखने या श्रम कानूनों को लागू न करने की जानकारी देने से छूट दी गयी है, जिसका मज़दूरों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से सीधा संबंध है। इनमें न्यूनतम वेतन, अवकाश और मज़दूरी के हालात संबंधी कानून शामिल हैं। कारखाना अधिनियम में भी इस तरह के संशोधन प्रस्तावित किये गए हैं जिसके मुताबिक 40 से कम मज़दूरों को काम पर रखने वाले कारखानों में कोई भी श्रम कानून लागू नहीं होगा। ऐसा किये जाने से देश की 70 प्रतिशत फैक्ट्रियों के मज़दूर ऐसी फक्ट्रिरियों में काम करेंगे जहां कोई भी श्रम कानून लागू नहीं होगा।

सरकार ने औद्योगिक रोज़गार (स्थायी आदेश) अधिनियम में संशोधन करते हुए सभी प्रतिष्ठानों में “निर्धारित अवधि का रोज़गार” के लिए इज़ाज़त दे दी है। इसके मुताबिक निर्धारित अवधि के समाप्त होने के बाद मज़दूरों को बिना किसी नोटिस या मुआवजे़ के नौकरी से निकाला जा सकता है। इस संशोधन के ज़रिये पूंजीपति न केवल मज़दूरों के शोषण को और अधिक तीव्र करना चाहते हैं बल्कि, स्थायी रोज़गार की अवधारणा को ही ख़त्म करना चाहते हैं।

“व्यवसाय को सुगम बनाने” के नाम पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारें दोनों ही मज़दूरों के अधिकारों पर हमले कर रही हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, और आंध्र प्रदेश की सरकारों ने पूंजीपतियों के हित में श्रम कानूनों में पहले ही बदलाव किये हैं और अब अन्य राज्य सरकारें भी उसी रास्ते पर चल रही हैं।  

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औद्योगिक विवाद अधिनियम    ट्रेड यूनियन अधिनियम    औद्योगिक रोज़गार    Aug 16-31 2018    Struggle for Rights    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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