उदारीकरण के कार्यक्रम से किसानों और कृषि की बर्बादी

हिन्दोस्तान के किसानों ने अपनी रोज़ी-रोटी की सुनिश्चिति के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को झुकाने के लिये उनके ख़िलाफ़ जबरदस्त संघर्ष शुरू कर दिया है। अलग-अलग राज्यों में बढ़ते पैमाने पर किसानों के संगठन अपने अधिकारों के संघर्षों में शामिल हो रहे हैं। देश के अलग-अलग इलाकों से किसानों के संघर्षों की ख़बरें रोज़ आती रहती हैं।

Dharna front of Bank पिछले दो दशकों से अधिक समय से हिन्दोस्तानी राज्य के उदारीकरण कार्यक्रम के चलते हिन्दोस्तान के किसान पूरी तरह से बर्बाद हो गए हैं। लगातार बढ़ते पैमाने पर हिन्दोस्तान की कृषि को वैश्विक बाज़ारों से जोड़ा जा रहा है। राज्य द्वारा किसानों को दिये जाने वाले समर्थन में लगातार कटौती की जा रही है। कृषि की लागत और उत्पादक वस्तुओं में बड़ी पूंजीवादी कंपनियों की मौजूदगी लगातार बढ़ती जा रही है। 

कृषि में लागत की वस्तुओं जैसे बीज, उर्वरक और ट्रेक्टर इन सबके व्यापार से हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार कंपनियां मोटा मुनाफ़ा बना रही हैं। कृषि उत्पादों के बाज़ारों में अपने वर्चस्व के आधार पर ये कंपनियां किसानों से कम से कम दाम में उनकी फसल खरीदकर बाज़ार में अधिकतम मुनाफे़ बना रही हैं। कुल मिलाकर इजारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग किसानों को सब तरफ से निचोड़कर खुद अपनी तिजोरियां भर रहा है।

देशभर के किसान यह मांग कर रहे हैं कि सरकार सभी फसलों के लिए सार्वजनिक खरीदी आयोजित करते हुए किसानों की फसलों को लाभकारी दाम पर खरीदे ताकि किसानों के लिए रोज़ी-रोटी सुनिश्चित हो। किसान यह मांग कर रहे हैं कि सभी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य का ऐलान फसल बुआई से पहले की जाये और यह दाम फसल की औसत कीमत से 50 प्रतिशत अधिक हो।

हाल ही में केंद्र सरकार ने एक ऐलान करते हुए दवा किया था कि उसने न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए किसानों द्वारा उठाई जा रही मांग को पूरा कर दिया है। किसानों के संगठनों ने केंद्र सरकार के इस झूठे प्रचार का पर्दाफाश कर दिया है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि जिस न्यूनतम समर्थन मूल्य का सरकार ने ऐलान किया है वह किसानों द्वारा उठाई गयी मांग से बहुत कम है। इतना ही नहीं यह मूल्य राज्य सरकारों द्वारा घोषित किये गए न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम है। इसके अलावा ऐसा कोई तंत्र नहीं है जिसके द्वारा यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसानों को मंडियों में यह दाम असलियत में मिल रहा है। देश में पैदा की जाने वाली तमाम फसलों में से केवल गेहूं और धान की फसल की ही सरकारी खरीदी की जाती है, और यह भी केवल कुछ ही राज्यों में किया जाता है। पूरे देश में केवल 20 प्रतिशत गेहूं और धान की फसल की सरकारी रूप से खरीदी की जाती है। किसानों को मंडियों में अपनी फसल के लिए तय किये गये समर्थन मूल्य से बहुत कम दाम मिलता है। 

किसान साल दर साल बढ़ते पैमाने पर बर्बाद हो रहे हैं क्योंकि जो कुछ भी वे अपनी फसल से कमाते हैं उससे बैंकों और साहूकारों से लिए हुए कर्ज़ो का भुगतान भी नहीं हो पाता है। यह दोनों ही सूरत में होता है, जब खराब मौसम या फसलों में कीड़ों के वजह से फसल बर्बाद हो जाती है या जब बंपर फसल होती और बाज़ार की क़ीमत में भारी गिरावट आ जाती है।

मौजूदा सरकार ने बड़े शोर-शराबे के साथ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का ऐलान किया था और यह दवा किया था कि इससे फसल बर्बाद हो जाने की हालत में किसानों की तथाकथित रक्षा की जाएगी। हक़ीक़त तो यह है कि फसल बीमा योजना निजी बीमा कंपनियों की तिजोरियां भरने के लिए बनायी गयी है। फसल बीमा देने के नाम पर ये बीमा कंपनियां किसानों से और राजकोषीय खजाने से भारी मात्र में पैसा लूटकर बड़े मुनाफ़े बना रही हैं।

लाखों-लाखों किसान बैंकों और निजी साहूकारों के कर्ज़ों में बुरी तरह से डूब गए हैं। ऐसी दयनीय हालत में लाखों किसानों ने आत्महत्या कर ली है।

पिछले कई वर्षों से किसान कर्ज़ माफ़ी की मांग कर रहे हैं। ऐसा करते हुए किसान केवल यह मांग कर रहे हैं कि उनको वह पैसा लौटाया जाये जो कि बड़े पूंजीपतियों ने उनसे लूटा है। केंद्र सरकार ने किसानों को किसी भी तरह की राहत देने की अपनी ज़िम्मेदारी से इंकार किया है और ऐलान किया है कि कर्ज़ माफ़ी करने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारें उठायें। यह साफ है कि केंद्र सरकार केवल बड़े पूंजीपतियों के हितों का प्रतिनिधित्व करती है और उनकी ही रखवाली करती है। बड़े पूंजीपतियों द्वारा बैंकों से लिये गये हजारों करोड़ रुपयों के कर्ज़, जिन्हें पूंजीपति चुका नहीं रहे थे उन्हें केंद्र सरकार ने माफ़ कर दिया है। लेकिन यह सरकार किसान परिवारों के छोटे से कर्ज़ को माफ़ करने से इंकार कर रही है।

कृषि में पूंजीवाद के प्रवेश और वैश्विक बाज़ारों के साथ उसको जोड़ने से हिन्दोस्तान में कृषि पूरी तरह से बर्बाद हो गयी है, और किसानों को हाशिये पर धकेल दिया गया है, जबकि कृषि में लागत की वस्तुओं की बिक्री, कृषि उत्पादों के व्यापार और फसल बीमा के चलते इजारेदार पूंजीवादी कंपनियां और अधिक अमीर होती जा रही हैं।

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Aug 16-31 2018    Struggle for Rights    Rights     2018   

पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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