असम में नागरिकता के रजिस्टर की अंतिम सूची जारी : भाई-भाई के बीच खून-खराबे से लोगों के संघर्षों को कुचलने की हिन्दोस्तानी राज्य की घिनौनी चाल

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 8 अगस्त, 2018

30 जुलाई, 2018 को असम के नागरिकों के रजिस्टर (एन.आर.सी.) की दूसरी सूची जारी की गयी जिसमें “हिन्दोस्तानी नागरिकों” का संपूर्ण मसौदा है। 3.29 करोड़ आवेदकों में से 40 लाख महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के नाम इस सूची में नहीं हैं।

एक ही झटके में 40 लाख लोगों को “गैर-नागरिक”, “घुसपैठिये” और “विदेशी” घोषित कर दिया गया है। मतदान और जायदाद के अधिकार सहित, एक नागरिक बतौर उनके तमाम अधिकार उनसे छीन लिए गए हैं। उनको 30 अगस्त से 28 सितम्बर के बीच का समय दिया गया है, जिसके दौरान हिन्दोस्तानी राज्य को उन्हें यह साबित करना है कि उनका नाम किसी गलती से निकाल दिया गया है, ताकि उनके अधिकार वापस बहाल किये जाएं।

एन.आर.सी. को पूरी तरह से मनमाने और जन-विरोधी तरीके से संकलित किया गया है। बजाय इसके कि राज्य यह साबित करे कि कोई व्यक्ति “गैर-कानूनी अप्रवासी” है, लोगों पर ज़िम्मेदारी डाल दी गयी है कि वे यह साबित करें कि वे इस देश के नागरिक हैं। इसके लिए उनको अपने परिवार की पीढ़ी-दर-पीढ़ी सूची सहित 12 दस्तावेज़ पेश करने पड़े। इनमें से कोई भी दस्तावेज़ अधिकारियों द्वारा स्वीकार न करने पर, जैसा कि बहुत बार मनमाने ढंग से होता आया है, उन्हें गुनहगार करार दिया गया है। उनपर “बांग्लादेशी घुसपैठिये” का ठप्पा लगा दिया गया है। असम में ऐसे कई जिले हैं जहां एक तिहाई से अधिक लोगों के नाम एन.आर.सी. सूची से गायब हैं।

बांग्लादेश ने ऐलान किया है कि एन.आर.सी. की प्रक्रिया हिन्दोस्तान का आतंरिक मामला है। उसने जिन लोगों का नाम एन.आर.सी. सूची में शामिल नहीं किया है उन्हें अपना नागरिक मानने से इंकार कर दिया है। पीढ़ियों से हिन्दोस्तान में रहने वाले 40 लाख से अधिक लोगों को राज्य-हीन बना दिया गया है। उनका भविष्य अत्यंत अनिश्चित बना दिया गया है। अब उनके सामने अपने ही घर से खदेड़े जाने, सेना द्वारा भेड़-बकरियों की तरह डिटेंशन कैंपों में भेजे जाने और बंदूक की नोक पर बांग्लादेश में घुसने के लिए मजबूर किये जाने का ख़तरा मंडरा रहा है।

पूरे असम राज्य में धारा 144 लागू कर दी गयी है और हर जगह पर अर्ध-सैनिक बल तैनात कर दिये गए हैं।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ऐलान किया है कि जिन लोगों के नाम एन.आर.सी. सूची में शामिल नहीं हैं वे “घुसपैठिये” हैं, जो तथाकथित तौर पर असम के लोगों का “रोज़गार छीन रहे हैं” और “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा” हैं। यह सरासर भयानक झूठ है। इस तरह से लोगों के बीच दुश्मनी फ़ैलाने की कोशिश की घोर निंदा की जानी चाहिए। इस बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि सभी लोगों को रोज़गार और ज़िन्दगी की गारंटी देने में पूरी तरह से असमर्थ इस राज्य की नाकामियों के लिए किसी एक तबके के लोगों को दोषी करार दिया जाये। इस बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि असम के मेहनतकश लोगों के एक तबके को गुनहगार करार दिया जाये और उनपर “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा” होने का ठप्पा लगा दिया जाये।

कई पीढ़ियों से अलग-अलग राष्ट्रों के, अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले और धर्मों को मानने वाले लोग असम में रहते आये हैं। बस्तीवादी राज के दौरान बिहार और बंगाल से कई लोग असम के चाय बागानों में काम करने के लिए यहां आ बसे। 1947 में हुए बंटवारे के बाद कई लोग शरणार्थियों के रूप में यहां आ बसे। 1971 में पाकिस्तान के साथ जंग के बाद बांग्लादेश का निर्माण हुआ और इस दौरान कई शरणार्थी असम में आये। असम इन सभी लोगों का घर है।

हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार शासक हमेशा से असम के लोगों के साथ बस्तीवादी साम्राज्यवादी नज़रिये के साथ बर्ताव करते आये हैं। उन्होंने असम के कच्चे तेल और जंगलों जैसे प्राकृतिक संसाधनों को बेदर्दी से लूटा है। असम के अधिकतर नौजवानों को रोज़गार की अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है। असम के लोग अपने शोषण व दमन के खि़लाफ़ और अपने राष्ट्रीय अधिकारों की हिफ़ाज़त में लगातार लड़ते आये हैं।

असमिया लोगों के संघर्ष को कुचलने के लिए, ख़ास तौर से 1980 के बाद से हिन्दोस्तानी राज्य ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से उनके आंदोलन पर साम्प्रदायिकता थोपी है। असम के अलग-अलग लोगों को एक-दूसरे के खि़लाफ़ भड़काने के लिए वह तमाम कार्यवाहियां करता आया है। इसके लिए वह कभी लोगों के एक तबके की तरफदारी करने का दिखावा करता है तो कभी दूसरे की। बड़े ही सुनियोजित तरीके से शासक वर्ग यह झूठा प्रचार करता आया है कि असमिया लोगों की तमाम समस्याओं के लिए बांग्लादेश से आये अप्रवासी ज़िम्मेदार हैं। हिन्दोस्तान के शासक वर्ग ने असम में हुए हर एक चुनाव का इस्तेमाल सांप्रदायिक और गुटवादी उन्माद को हवा देने; और भाषा, राष्ट्रीयता तथा धर्म के आधार पर लोगों के बीच फूट डालने के लिए किया है।

1985 का असम समझौता जिसकी भाजपा और कांग्रेस पार्टी दोनों ही दुहाई देती हैं, यह समझौता असम के लोगों की समस्याओं का समाधान निकालने के मकसद से नहीं किया गया था। इस समझौते का मकसद था असम के लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों के संघर्ष को कुचलकर खत्म करना। इस समझौते का काम यही था कि असम के लोगों को भाषा के आधार पर हमेशा के लिये बांट कर रखा जाये। असम आंदोलन के कुछ चुनिन्दा नेताओं को सत्ता और विशेषाधिकार देकर राज्य-व्यवस्था में शामिल कर लिया गया। जिन लोगों ने ऐसा करने से इंकार किया, उन्हें बांटने और कुचलने के लिए सेना और ख़ुफ़िया एजेंसियों का इस्तेमाल किया गया। लोगों के अधिकारों के लिए चलाये जा रहे जन-आंदोलनों को बदनाम करने के लिए ख़ुफ़िया एजेंसियों ने आतंकवादी संगठन खड़े किये।

असम के नागरिकों का रजिस्टर का संकलन किया जाना भी हिन्दोस्तान के शासक वर्ग द्वारा असम के लोगों के अधिकारों के संघर्ष को भाई-भाई को लड़वाकर खून-खराबे में डुबाने की साज़िश का हिस्सा है।

असम और हिन्दोस्तान के तमाम लोगों की एकता और भाइचारे को सबसे बड़ा ख़तरा हिन्दोस्तान के शासक वर्ग और उसकी राजनीतिक पार्टियों से है। मौजूदा बंटवारे को और अधिक गहरा करने के लिए केंद्र सरकार ने संसद में नागरिकता कानून में संशोधन लाने का प्रस्ताव पेश किया है,  जिसके तहत बांग्लादेश सहित अन्य पड़ोसी देशों से हिन्दू और सिख धर्म के “गैर-कानूनी अप्रवासियों” को हिन्दोस्तान की नागरिकता दिए जाने का प्रस्ताव किया गया है। शासक वर्ग की पार्टियों ने पश्चिम बंगाल और अन्य उत्तर पूर्व के राज्यों में भी ऐसा ही “नागरिकों का रजिस्टर” लागू करने की मांग को लेकर अभियान चलाना शुरू कर दिया है।

असम, बंगाल और पंजाब के लोग 1947 में किये गए सांप्रदायिक बंटवारे और मनमाने तरीके से बनायी गयी सरहदों के शिकार हैं। अविभाजित हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों और बड़े ज़मींदारों ने इस गद्दार कार्यवाही को अंजाम देने में बर्तानवी बस्तीवादियों का साथ दिया था। उन सभी को इस बात का डर था कि हिन्दोस्तान के मज़दूर और किसान देश की हुकूमत की बागडोर कहीं अपने हाथों में न ले लें। बड़े पैमाने पर आयोजित किये गए सांप्रदायिक कत्लेआम के बीच हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों और बड़े ज़मींदारों को सत्ता का हस्तांतरण किया गया।

हिन्दोस्तानी राज्य हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों की अगुवाई में, शोषकों के हाथों में एक हथियार है, जिसका इस्तेमाल वे लोगों का शोषण और दमन करने और उनको लूटने के लिए करते हैं। यह लोगों को बांटने और उनपर राज चलाने के लिए शोषकों के हाथों में हथियार है। एन.आर.सी. सूची का ऐलान किये जाने के बाद जो घटनायें हुयी हैं उनसे यह साफ़ नज़र आता है कि हिन्दोस्तानी शासक वर्ग एक बार फिर लोगों के संघर्ष को भाई-भाई के बीच खून-खराबे करवा के दबाने की तैयारी कर रहा है। इस योजना को लागू करने के लिये भाजपा और कांग्रेस पार्टी, दोनों अपनी भूमिका अदा कर रही हैं।

आज के हालात यह मांग कर रहे हैं कि देश के मज़दूर, किसान, महिला और नौजवान, तमाम उत्पीड़ित राष्ट्र और लोग, उनकी इस चाल के बारे में बहुत ही जागरुक रहें और शासक वर्ग द्वारा बिछाये हुए जाल में न फंसें। वे अपने संघर्ष को इस मकसद के साथ और तेज़ करें कि उनको एक नए राज्य का निर्माण करना है, जो हिन्दोस्तान में बसे सभी लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों सहित तमाम मानव अधिकारों और जनतान्त्रिक अधिकारों की गारंटी देगा।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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