मज़दूरों-किसानों को हिन्दोस्तान का हुक्मरान बनने के लिए संगठित होना होगा!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 12 अगस्त, 2018

हिन्दोस्तान के शहर और गांव मज़दूरों और किसानों के बढ़ते विरोध संघर्षों से गूंज रहे हैं। देश के मज़दूर-किसान संघर्ष कर रहे हैं ताकि भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के समाज-विरोधी कार्यक्रम को रोका और वापस लिया जाये। वे मांग कर रहे हैं कि सभी लोगों की सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तुरंत क़दम उठाये जाएं।

मज़दूरों और किसानों के खून पसीने से पैदा की गयी दौलत को हिन्दोस्तान के 150 इजारेदार पूंजीपति घराने हड़प रहे हैं। ये इजारेदार पूंजीपति घराने अधिकतम मुनाफ़ों की अपनी लालच को पूरा करने के लिए, हिन्दोस्तानी राज्य पर अपने नियंत्रण और दबदबे का इस्तेमाल कर रहे हैं।

एक के बाद एक, सत्ता में आई कांग्रेस पार्टी और भाजपा की अगुवाई में बनाई गयी सरकारें इन इजारेदार घरानों के समाज-विरोधी कार्यक्रम को लागू करती रही हैं। सामाजिक उत्पादन और सार्वजनिक सेवाओं के ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों और संस्थानों को बर्बाद किया जा रहा है। हर रोज़ बढ़ते पैमाने पर लोग ग़रीबी और तबाही के दलदल में धकेले जा रहे हैं। 

“विश्व स्तर पर अपनी प्रतिस्पर्धा” को बढ़ाने के नाम पर मज़दूरों के शोषण को और अधिक तीव्र करने के लिए पूंजीपति मज़दूरों पर सब तरफा हमले कर रहे हैं। मज़दूरों से ठेके पर काम करवाया जा रहा है और उनको मनमर्जी से निकाला जा रहा है, उनके काम के घंटों को लगातार बढ़ाया जा रहा है, उन्हें न्यूनतम वेतन से भी कम वेतन पर काम करने को मजबूर किया जा रहा है और उनको किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा, यूनियन बनाने के अधिकार और हड़ताल के अधिकार से भी वंचित किया जा रहा है। “व्यवसाय को आसान बनाने” (ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस) के नाम पर केंद्र और राज्य सरकारें मौजूदा कानूनों में इस तरह के बदलाव ला रही हैं जिनके चलते पूंजीपति मज़दूर वर्ग पर हमलों को और भी तेज़ कर सकते हैं। बरसों के संघर्षों और कुर्बानियों के बाद मज़दूरों ने अपने अधिकारों के लिए जो सीमित कानूनी मान्यता हासिल की थी, वह भी उनसे छीनी जा रही है।

व्यापार के उदारीकरण के झंडे तले कृषि में लागत की वस्तुओं और कृषि उत्पादों के बाज़ारों को हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार कंपनियों के तेज़ गति से प्रवेश के लिए खोला जा रहा है। किसानों को इन पूंजीवादी कंपनियों से बीज, उर्वरक और कीटनाशक महंगे दामों पर खरीदने को  मजबूर किया जा रहा है। ये पूंजीवादी कंपनियां किसानों से कृषि उत्पादों को सबसे कम दाम पर खरीदती हैं और फिर शहरों में उन्हें सबसे ऊंचे दामों पर बेचती हैं। हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीवादी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए गेहूं और धान की सार्वजनिक खरीदी में कटौती की गयी है।

किसान कृषि लागत की वस्तुओं की बढ़ती क़ीमतों और कृषि उत्पादों के लिये मिलने वाली घटती और बदलती क़ीमतों के बीच बुरी तरह से फंसकर लगातार कर्ज़ में डूबता चला जा रहा है। उसके ऊपर बैंकों और निजी साहूकारों का कर्ज़ बढ़ता ही जा रहा है। जो किसान पूरे देश के लिए अनाज पैदा करता है, वह आज रोज़ी-रोटी के लिए मोहताज है। हाल के वर्षों में लाखों किसानों ने आत्महत्या की है। बहुत से किसान अपनी ज़मीन को बैंकों और साहूकारों के हाथों गंवा चुके हैं।

अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। लोगों के खून-पसीने की कमाई से बनायी गयी सार्वजनिक संपत्ति को हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों को कौड़ियों के दाम पर बेचा जा रहा है। जिन ज़रूरी सेवाओं को आज तक राज्य की ज़िम्मेदारी माना जाता था, अब उन्हें पूंजीपतियों के हवाले किया जा रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पीने का पानी, रेल और सड़क परिवहन, सिंचाई, बीज और उर्वरक, बैंकिंग और बीमा सेवाएं, बिजली और रक्षा उत्पादन, इन सभी का निजीकरण किया जा रहा है। मज़दूरों द्वारा बैंकों में जमा की गयी बचत के धन को इजारेदार पूंजीपतियों के मुनाफ़ों के लिए सट्टा बाज़ार में लगाया जा रहा है।

केंद्र और राज्य सरकारों ने किसानों और आदिवासी लोगों की ज़मीनों का जबरदस्ती से अधिग्रहण कर लिया है, ताकि उसे पूंजीवादी कंपनियों के हवाले किया जा सके। कृषि की सिंचाई के लिए ज़रूरी पानी को बड़ी पूंजीवादी परियोजनाओं की आपूर्ति के लिए खर्च किया जा रहा है। निजी बीमा कंपनियां “फसल बीमा” देने के नाम पर किसानों को दिन-दहाड़े लूट रही हैं।

पिछले 3 दशकों में आई सभी सरकारें लगातार भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण का कार्यक्रम लागू करती आयी हैं। मज़दूरों और किसानों को अतिशोषण, बढ़ती असुरक्षा और ग़रीबी का सामना करना पड़ रहा है, ताकि टाटा, बिरला, अंबानी, और अन्य इजारेदार पूंजीपति अपने वैश्विक साम्राज्यवादी मंसूबों को हासिल कर पाएं।

कांग्रेस पार्टी-नीत संप्रग सरकार ने “मानवीय चेहरे के साथ सुधार” का वादा किया था। भाजपा-नीत राजग सरकार “सबका साथ सबका विकास” का वादा करती आई है। पर ज़मीनी हक़ीक़त यह साबित करती आई है कि पूंजीवादी व्यवस्था पूरी तरह से अमानवीय व्यवस्था है जो लोगों की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकती है। पूंजीवादी विकास केवल मुट्ठीभर सबसे अमीर लोगों को और अधिक अमीर बनाता है। इसकी भारी क़ीमत तमाम मेहनतकश लोगों के साथ-साथ पर्यावरण और पूरे समाज को अदा करनी पड़ती है।

जब तक सामाजिक उत्पादन के साधन मुट्ठीभर लालची पूंजीपतियों की निजी संपत्ति रहंेगे, तब तक आर्थिक विकास से बहुसंख्य लोगों की ज़रूरतें पूरी नहीं होंगी। पूंजीवादी विकास सभी को रोज़गार नहीं दिला सकता है। पूंजीवाद मज़दूरों को सम्मानपूर्वक जीवन जीने लायक वेतन नहीं दे सकता है। यह किसानों को रोज़ी-रोटी की सुरक्षा नहीं दे सकता है। आज पूंजीवाद जिस चरण पर खड़ा है, वह बार-बार केवल संकट ही पैदा कर सकता है, जिससे उत्पादक शक्तियों की मौत और बर्बादी होती रहती है।

आज राजनीतिक सत्ता पूंजीपति वर्ग के हाथों में है, जिसकी अगुवाई इजारेदार पूंजीपति घराने करते हैं। केंद्र और राज्य सरकारें केवल उनके हितों में काम करती हैं। लोकतंत्र की मौजूदा व्यवस्था इजारेदार पूंजीवादी घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग की हुक्मशाही को कानूनी जामा पहनाने के लिए बनायी गयी है।

हम मज़दूर-किसान इस देश की संपत्ति को पैदा करते हैं। हम मिलकर देश की आबादी का 90 प्रतिशत हिस्सा हैं। हमें राजनीतिक सत्ता को अपने हाथों में लेने के लिए संगठित होना होगा, ताकि हम देश की अर्थव्यवस्था को सभी लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में मोड़ सकें।

हिन्दोस्तान की मौजूदा अर्थव्यवस्था को इजारेदार पूंजीपतियों की अधिकतम मुनाफ़े की लालच को पूरा करने की दिशा में चलाया जाता है। जब मज़दूरों और किसानों का राज होगा, तभी अर्थव्यवस्था को हमारे देश के सभी लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में चलाया जा सकेगा और ऐसा ही किया जायेगा। तब मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करना ही सामाजिक उत्पादन की प्रेरक शक्ति बन जाएगी।

अपने हाथों में राजनीतिक सत्ता लेकर, हम निजीकरण और उदारीकरण के कार्यक्रम को तुरंत रोक देंगे। हम विदेशी व्यापार और बड़े पैमाने पर चलाये जा रहे घरेलू व्यापार का राष्ट्रीयकरण कर देंगे। मज़दूरों-किसानों का राज किसानों को कृषि में लागत की वस्तुओं की भरोसेमंद आपूर्ति की गारंटी देगा। मज़दूरों-किसानों का राज एक आधुनिक सर्वव्यापक सार्वजनिक वितरण व्यवस्था स्थापित करेगा, जिसमें घरेलू उपभोग की सभी ज़रूरी वस्तुएं शामिल होंगी। यह वितरण व्यवस्था सार्वजनिक खरीदी व्यवस्था से जुड़ी होगी, ताकि सभी फसलों के लिए स्थाई और लाभकारी दाम की गारंटी दी जा सके।

पूरी बैंकिंग और बीमा व्यवस्था का तुरंत राष्ट्रीयकरण किया जायेगा और उसे निजी पूंजीवादी लालच के लिए नहीं बल्कि सामाजिक ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में संचालित किया जायेगा। किसानों के बकाया कर्ज़ों को माफ़ कर दिया जायेगा। बैंकिंग और बीमा व्यवस्था को सभी ज़रूरतमंदों के लिए सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में आयोजित किया जायेगा।

मज़दूरों और किसानों का राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि सभी मज़दूरों को एक सम्मानपूर्वक ज़िंदगी जीने लायक वेतन मिले। मज़दूरों-किसानों का राज्य ज़मीन जोतने वालों के हाथों में ज़मीन को सुरक्षित करेगा और पूंजीवादी भूमि अधिग्रहण को पूरी तरह से रोक देगा।

हम मज़दूर-किसान मिलकर लोकतंत्र की एक बेहतर व्यवस्था का निर्माण करेंगे जिसमें फैसले लेने का अधिकार लोगों के हाथों में होगा। इस व्यवस्था के तहत सभी बालिग व्यक्तियों को न केवल वोट देने का अधिकार होगा बल्कि किसी भी चुनाव से पहले उम्मीदवारों का चयन करने का भी अधिकार होगा। उन्हें अपना फ़र्ज़ न निभाने वाले चुने गये प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार होगा। उनके पास नए कानूनों और नीतियों का प्रस्ताव करने, जनमत संग्रह द्वारा प्रमुख सार्वजनिक फैसलों को अपनाने या ठुकराने का भी अधिकार होगा।

मज़दूरों और किसानों को हिन्दोस्तान का हुक्मरान बनने के लिए संगठित करने का मतलब है कि हमें अपने संगठन और राजनीतिक एकता के स्तर को और ऊंचा करना होगा।

धर्म, जाति और पार्टी-पक्ष के आधार पर लोगों को बांटने की तमाम कोशिशों को हमें मजबूती के साथ हराना होगा।

हमें मज़दूर एकता कमेटियों, मज़दूर-किसान समितियों और लोक राज समितियों को और अधिक मजबूत करना होगा, ताकि हम अपने सांझे दुश्मनों के खि़लाफ़ अपने एकजुट संघर्ष को आगे बढ़ा सकें। हमें इन संगठनों को इस मकसद के साथ बनाना और मजबूत करना होगा कि यही संगठन आगे चलकर मज़दूरों और किसानों के राज का साधन बनेंगे।

आइये, हम सब मिलकर मज़दूरों और किसानों का राज स्थापित करने के उद्देश्य और कार्यक्रम के साथ अपनी एकता को मजबूत करें! आइये, हम सब मिलकर देश की अर्थव्यवस्था को सभी लोगों की सुख और सुरक्षा की गारंटी देने की दिशा में ले जाने के उद्देश्य और कार्यक्रम के साथ अपनी एकता को मजबूत करें!

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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