उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के बकाये भुगतान के लिये आंदोलन

उत्तर प्रदेश के हर हिस्से के किसान मेरठ में 16 अगस्त 2018 से हड़ताल और प्रदर्शन कर रहे हैं। उनकी मांग है कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि गन्ना किसानों की बकाया रकम का तुरंत भुगतान हो।

इस हड़ताल में किसानों के अनेक संगठन भाग ले रहे हैं और बहुत से अन्य संगठनों के शामिल होने की संभावना है। प्रदर्शन करने वाले किसान मेरठ के चैधरी चरण सिंह पार्क में जमा हुए हैं, जो शहर के मुख्य प्रशासनिक दफ्तरों के पास में स्थित है और वहां वे दिन-रात बिता रहे हैं। अब किसानों ने धमकी दी है कि अगर उनकी बकाया राशि नहीं दी जाती है तो वे सामूहिक आत्महत्या कर लेंगे। भाग ले रहे संगठनों में से एक संगठन के अध्यक्ष ने कहा कि, “हम चाहते हैं कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों की बकाया राशि 1 सितम्बर 2018 तक मिल जानी चाहिये। अगर ऐसा नहीं किया जाता तो हम यहां ही आत्महत्या कर लेंगे।”

Cane farmers protestआंदोलनकारी किसानों ने घोषणा कर दी है कि जब तक उनकी बकाया राशि नहीं दी जाती है वे वहां से हटने वाले नहीं हैं। भाग ले रहे एक किसान ने कहा, “इस बार हम तब तक नहीं हिलेंगे जब तक भुगतान नहीं होता। पहले हमें बहुत बार आश्वासन दिये जा चुके हैं, परन्तु कुछ भी हुआ नहीं है। इस बार हम कार्यवाई चाहते हैं। हमें हमारी बकाया राशि मिलनी ही चाहिये।”

किसान पूंछ रहे हैं कि केन्द्र सरकार के राहत पैकेज का असली मकसद क्या है। उसका घोषित उद्देश्य ’चीनी उद्योग के मौजूदा संकट’ से जूझना है। जून में केन्द्र सरकार ने चीनी उद्योग के लिये 7000 करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की थी। परन्तु अभी तक किसानों को इस में से कुछ भी नहीं मिला है। 20 अगस्त 2018 तक, उत्तर प्रदेश के किसानों की चीनी मिलों से 10,622 करोड़ रुपये की राशि बकाया थी।

किसानों को स्पष्ट है कि उनको मूर्ख बनाया जाता रहा है। जैसा कि एक किसान ने कहा, “बेवकूफ बनाया गया है जी और कुछ नहीं। कोई मिल पेमेंट नहीं कर रही है। कहानी वहां की वहां ही अटकी हुई है।”

पश्चिम उत्तर प्रदेश के गन्ना किसान पिछले दो महीनों से आंदोलन कर रहे हैं। मुज़फ्फरनगर में किसान चीनी मिल के गेट पर जुलाई के मध्य से धरने पर बैठे हैं। बिजनौर में किसान स्थानीय चीनी मिलों को समय से पहले बंद करने का विरोध कर रहे हैं। वहां उन्होंने चीनी मिल मालिक की दारू की दुकानों को जबरदस्ती बंद करवा दिया है।

भारतीय किसान यूनियन सितम्बर में हरिद्वार से दिल्ली तक प्रदर्शन करने की योजना बना रही है। उनकी मांगों में  एकमुश्त कर्ज़ माफी और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के साथ-साथ, गन्ना किसानों की बकाया राशि की भुगतान की मांग सबसे अहम है।

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पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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