केंद्र और राज्यों में एक साथ चुनावों का प्रस्ताव

एक प्रस्ताव, जिस पर इस समय काफी चर्चा हो रही है, वह है कि लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं का एक ही समय पर चुनाव कराना। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने “एक राष्ट्र, एक चुनाव” के नारे के साथ इस विचार को बढ़ावा दिया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने संसद में इस विषय को उठाया है। नीति आयोग ने इस विषय पर चर्चा के लिए एक दस्तावेज़ तैयार किया है, जिसमें केंद्र और राज्यों में एक साथ चुनावों को दो सत्रों में करने का प्रस्ताव किया गया है।

इस प्रस्ताव को जायज़ ठहराने के लिए कहा जा रहा है कि ऐसा करने से बहुत समय और पैसे बचाए जा सकते हैं। इसका एक और औचित्य यह दिया जा रहा है कि केंद्र और राज्य सरकारें चुनावों के सालों के बीच के समय में, किसी आदर्श आचार संहिता से निर्बाधित, अपना काम कर सकती हैं।

इस प्रस्तावित सुधार से किसे लाभ होगा?

अगर केंद्र और राज्यों के सारे चुनाव एक साथ होंगे तो टाटा, बिरला, अम्बानी और दूसरे इजारेदार पूंजीपति एक साथ अपना धन डालकर, केंद्र और सभी राज्यों में अपनी पसंद की पार्टी और नेता के समर्थन में एक बड़ी “लहर” खड़ी कर सकते हैं। अगर लोकसभा और राज्यसभा दोनों में एक ही पार्टी हावी हो, तो इजारेदार पूंजीपति और ज्यादा आसानी के साथ, उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम को बढ़ावा दे सकते हैं। इस तरह, इस प्रस्तावित सुधार से सबसे ज्यादा लाभ बड़े सरमायदारों को होगा।

1960 के दशक के बीच तक, सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ, एक ही समय पर हुआ करते थे। उसके बाद, कई राज्य सरकारें और केंद्र सरकारें अपने पूरे समय तक नहीं चल पायीं। वे किसी न किसी अविश्वास प्रस्ताव का शिकार बन गयीं। इन मामलों में विधानसभा को भंग करके फिर से चुनाव कराने पड़े। इसकी वजह से, समय के साथ-साथ, अलग-अलग राज्यों में चुनावों के समय लोकसभा चुनावों के समय से भिन्न हो गए।

वर्तमान संसदीय व्यवस्था और राजनीतिक प्रक्रिया के चलते, एक साथ केंद्र और राज्यों में चुनाव कराने से केन्द्रीय राज्य और उस पर नियंत्रण करने वाले इजारेदार घरानों के हाथों में सत्ता और ज्यादा हद तक संकेंद्रित हो जायेगी। किसी राज्य की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य अगर किन्हीं हालातों में, विधानसभा को भंग करके फिर से चुनाव कराने की मांग करते हैं, तो उन्हें ऐसा करने के अधिकार से वंचित किया जायेगा। इससे केंद्र और राज्य सरकारों पर इजारेदार घरानों का नियंत्रण और मजबूत हो जाएगा।

हिन्दोस्तान में तमाम राष्ट्र, राष्ट्रीयता और लोग हैं, जो सब बरतानवी उपनिवेशवादी शासन के खि़लाफ़ संघर्ष में एक साथ आगे आये थे। हिन्दोस्तान में हरेक राष्ट्र, राष्ट्रीयता और लोगों के अधिकारों को मान्यता, आदर और सुरक्षा देनी होगी। तभी हिन्दोस्तान स्थाई और विघटन के ख़तरे से सुरक्षित रह सकता है। तभी हिन्दोस्तानी राष्ट्र को बनाने की परियोजना हिन्दोस्तानी समाज के अन्दर विविध लोगों को स्वेच्छा के साथ इकट्ठे रहने और अपने भविष्य के लिए मिलकर काम करने को प्रेरित कर सकती है। केंद्र और राज्यों में एक पार्टी पर इजारेदार सरमायदारों के नियंत्रण को स्थापित करने के लिए एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव एक प्रतिगामी कदम है, जिससे देश के अन्दर सभी राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों पर इजारेदार पूंजीवादी घरानों की हुक्मशाही और बढ़ जायेगी।

इन सब कारणों की वजह से, मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों की सभी पार्टियों और संगठनों को केंद्र और राज्यों में एक साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव का जमकर विरोध करना चाहिए।

देश के अधिकतम लोगों के लिए, वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था की मौलिक समस्या यह नहीं है कि देश के अलग-अलग भागों में अलग-अलग समय पर चुनाव होते हैं। मौलिक समस्या यह है कि लोगों को अपनी संप्रभुता से वंचित किया जाता है, व्यक्तिगत तौर पर और विभिन्न राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और जनसमुदायों के सदस्य बतौर भी।

चुनाव के उम्मीदवारों के चयन में लोगों की कोई भूमिका नहीं होती है। वोट डालने के बाद लोगों की कोई भूमिका नहीं होती। सत्तारूढ़ पार्टी अपने कार्यों के लिए, निर्वाचित विधायिकी के प्रति जवाबदेह नहीं होती है। निर्वाचित प्रतिनिधि मतदाताओं के प्रति जवाबदेह नहीं होते। वे सिर्फ उन पार्टियों के प्रति जवाबदेह होते हैं जिनके टिकट पर वे चुनाव में खड़े होते हैं। निर्वाचित विधानसभाओं पर केन्द्रीय मंत्रीमंडल की सर्वोपरि ताक़त है।

वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के संपूर्ण नव-निर्माण के बिना, इन समस्याओं को हल नहीं किया जा सकता।

देश के संविधान को यह गारंटी देनी होगी कि संप्रभुता लोगों की हाथ में हो। उसे हिन्दोस्तान के हर राष्ट्र, राष्ट्रीयता और जनसमुदाय के अधिकारों की गारंटी देनी होगी। केन्द्रीय, राज्य और स्थानीय सरकारों के स्तरों पर, कार्यकारिणी को निर्वाचित विधायिकी के प्रति जवाबदेह होना होगा और निर्वाचित विधायिकी को मतदाताओं के प्रति। चुनाव से पहले, लोगों को उम्मीदवारों का चयन करने का अधिकार होना चाहिए। लोगों के पास चुने गए प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए। लोगों को कानून प्रस्तावित करने का अधिकार होना चाहिए। लोगों को संविधान को फिर से लिखने का अधिकार होना चाहिए।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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