अराजकता, हिंसा और आतंक - पूंजीपतियों के शासन को कायम रखने के लिये

देश के हर कोने में लोग अपनी रोज़ाना जिन्दग़ी में हिंसा और आतंक का सामना कर रहे हैं। खास धर्म, जाति, नस्ल या भाषा के लोगों के खिलाफ़ नफ़रत फैलायी जा रही है।

हर रोज किसी व्यक्ति या जनसमुदाय पर शारीरिक हमलों की ख़बरें मिलती है। लोगों के क़त्ल होते हैं परन्तु गुनहग़ार आज़ाद घूमते हैं। प्रगतिशील विचारकों और पत्रकारों की हत्याएं की जाती हैं परन्तु किसी को पकड़ा नहीं जाता है, किसी को सज़ा नहीं दी जाती। राजनीतिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को फर्ज़ी आरोपों के आधार पर गिरफ्तार किया जाता है। जो भी दबे-कुचले लोगों के लिये या किसी भी तबके के अधिकारों के लिए संघर्ष करता है, उसके साथ ऐसे बर्ताव किया जाता है जैसे कि वह कोई अपराधी हो। उसे “राष्ट्र-विरोधी”, “आतंकवाद का समर्थक”, “माओवाद का समर्थक” या “पाकिस्तानी एजेंट” करार दिया जाता है।

देश के कुछ भागों में लोग कई पीढ़ियों से आतंक के माहौल का सामना कर रहे हैं, जैसे कि कश्मीर, मणिपुर और नगालैंड में, जहां सेना को किसी पर भी गोली चलाकर उसकी ह्त्या करने की पूरी छूट है। असम और पंजाब जैसे कुछ इलाकों में 1980 के दशक से हालत बिगड़ने लगे। 1992 में, बाबरी मस्जिद के विध्वंस के साथ-साथ, राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा और आतंक देश भर में बहुत ज्यादा फैल गया।

आज राजकीय आतंकवाद देश के कोने-कोने में फैल गया है। केन्द्रीय ख़ुफिया एजेंसियों के सहारे, व्यक्तियों को निशाना बनाकर आतंकी हमले आयोजित करना और फिर उसे बहाना बनाकर खुलेआम राजकीय आतंक को बहुत बढ़ावा देना, यह शासन का पसंदीदा तरीका बन गया है। जैसे-जैसे एक पार्टी या दूसरी पार्टी नयी दिल्ली में सत्ता पर आती रही है, वैसे-वैसे हिंसा और आतंक के खास रूप और तौर-तरीके बदलते रहे हैं। परन्तु राजनीतिक सत्ता के अपराधी चरित्र में कोई तबदीली नहीं हुयी है, बल्कि वह बद से बदतर होता जा रहा है।

दुनिया के अधिकतम पूंजीवादी देशों में अराजकता, हिंसा और आतंक बढ़ता जा रहा है। न्यूज मीडिया और सोशल मीडिया के ज़रिये नस्लवाद, साम्प्रदायिकता और तरह-तरह के झूठों व पूर्वागृहों को नियमित तौर पर फैलाया जाता है। ऐसा माहौल पैदा किया जा रहा है ताकि इन नफ़रत के अपराधों को लोगों की नजरों में जायज़ ठहराया जा सके।

1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद से, अमरीका की अगुवाई में साम्राज्यवादी ताकतें एक अप्रत्याशित समाज-विरोधी हमला करती आयी हैं। राज्य की खुफिया एजेंसियों के ज़रिये आतंकवादी हमले आयोजित करना और “इस्लामवादी ख़तरे” के बारे में लगातार प्रचार करते रहना, यह पूंजीवादी शासन के तरीके का एक भाग बन गया है। सांप्रदायिक हिंसा और आतंक राज्य की मशीनरी के अभिन्न भाग बन गए हैं, पूंजीवादी शासन का अनिवार्य हिस्से बन गए हैं।

पूंजीवाद, जो अपने उच्चतम और सबसे अधिक इजारेदारी पड़ाव पर पहुंच गया है, बेहद परजीवी और विनाशकारी बन गया है। पूंजीवादी संचय की प्रक्रिया के चलते, बहुत कम नयी नौकरियां पैदा हो रही हैं, जबकि उससे कहीं ज्यादा संख्या में नौकरियां और जीविका के स्रोत खत्म हो रहे हैं। वित्त पूंजी के संस्थान लाखों-लाखों लोगों को असहनीय कर्ज़-भार के तले पीस रहे हैं। पूंजीवादी राज्य बार-बार संकट में फंसने से खुद को नहीं बचा पा रहे हैं। हर संकट के साथ-साथ उत्पादक ताकतों का भारी विनाश होता है। प्रतिस्पर्धी पूंजीवादी समूहों और साम्राज्यवादी राज्यों के आपसी झगड़ों की वजह से, आर्थिक और सैनिक युद्ध हो रहे हैं।

अराजकता, हिंसा और आतंक का माहौल पैदा करना ही एकमात्र रास्ता है, जिसके ज़रिये पूंजीपति वर्ग समाज पर अपना शासन बरकरार रख सकता है। इससे मज़दूर वर्ग और लोगों का ध्यान भटकाया जा सकता है, लोगों को इजारेदार पूंजीपतियों और उनकी सेवा में काम करने वाली सरकारों के खिलाफ एकजुट होने से रोका जा सकता है।

हमारे देश के इजारेदार पूंजीपति वर्ग की अगुवाई करने वाले टाटा, बिरला, अम्बानी और अन्य इजारेदार घराने बड़े हमलावर तरीके से दुनिया में अपना साम्राज्यवादी प्रसार करने के रास्ते पर निकल पड़े हैं। वे देश के अन्दर और विदेशों में भी अपनी पूंजी का विस्तार करना चाहते हैं। कांग्रेस पार्टी और भाजपा की बारी-बारी से आने वाली सरकारें उसी आर्थिक कार्यक्रम को लागू करती आयी हैं, जिसका मकसद हैं मेहनतकश जनसमुदाय की रोजीरोटी और अधिकारों को छीनकर, इजारेदार घरानों की पूंजीवादी लालच और साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करना।

पूंजीपति वर्ग मज़दूरों और किसानों को सांझे संघर्ष में एकजुट होने से रोकना चाहता है। इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए पूंजीपति अपनी परखी हुयी पार्टियों पर निर्भर करते हैं। ये पार्टियां सांप्रदायिक झगड़े उकसाती हैं और अराजकता फैलाती हैं, जिससे राज्य को खुलेआम राजकीय आतंकवाद को और तेज़ करने का बहाना मिल जाता है।    

इजारेदार पूंजीवादी घराने यही चाहते हैं कि मज़दूर, किसान और सभी दबे-कुचले लोग आपस में बंटे रहें और अपनी समस्याओं के असली स्रोत को न पहचाने। इजारेदार पूंजीवादी घराने चाहते हैं कि लोग या तो भाजपा की पीछे लामबंध हो जायें या कांग्रेस पार्टी के पीछे। वे भाजपा को कांग्रेस पार्टी के “स्वच्छ विकल्प” बतौर बढ़ावा देते हैं। वे कांग्रेस पार्टी को भाजपा के “धर्मनिरपेक्ष विकल्प” बतौर बढ़ावा देते हैं।

सच तो यह है कि भाजपा और कांग्रेस पार्टी, दोनों भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के एक ही कार्यक्रम को लागू करने पर वचनबद्ध हैं। लोगों को बुद्धू बनाने में और धर्म, जाति आदि के आधार पर बांट कर रखने में ये दोनों पार्टियां माहिर व परखी हुयी हैं। सांप्रदायिक हिंसा आयोजित करने और हजारों-हजारों लोगों का कत्लेआम करवाने के लिए राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल करने के, इन दोनों पार्टियों के बीते कारनामों की लम्बी सूची है। ये दोनों इजारेदार घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग की भरोसेमंद और परखी हुयी पार्टियां हैं।

यह वक्त की ज़रूरत है कि एक वैकल्पिक कार्यक्रम के इर्द-गिर्द मज़दूरों, किसानों और सभी दबे-कुचले लोगों की राजनीतिक एकता बनायी जाये, एक ऐसा वैकल्पिक कार्यक्रम जो उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के बिल्कुल विपरीत हो। यह वक्त की ज़रूरत है कि सभी कम्युनिस्ट एकजुट हों और सभी प्रगतिशील व जनवादी ताक़तों के साथ मिलकर, इस प्रयास को अगुवाई दें।

मज़दूर वर्ग आन्दोलन का उद्देश्य सिर्फ भाजपा को सरकार से हटाने तक सीमित नहीं है। हमारा उद्देश्य है इजारेदार घरानों की अगुवाई में पूंजीपति वर्ग को सत्ता से हटाना।

मज़दूर और किसान देश की दौलत को पैदा करते हैं। हम आबादी के 90 प्रतिशत से ज्यादा हैं। हम अपने हाथों में राज्य सत्ता ले सकते हैं और हमें ऐसा करने के लिए संगठित होना होगा।

मज़दूरों और किसानों का शासन स्थापित करने, हिन्दोस्तानी समाज की ख़तरनाक दिशा को रोकने और उसे संकट से बाहर निकालने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द सभी कम्युनिस्टों को एकजुट होने की आज ज़रूरत है। हमें इस कार्यक्रम पर अडिग रहना होगा और इसे लागू करने के लिए संघर्ष करना होगा, सड़कों पर और चुनाव के मैदान में भी।

हम कम्युनिस्टों को चुनाव के मैदान का इस्तेमाल करके वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था का पर्दाफाश करना होगा और शासक वर्ग के उस दावे को चुनौती देनी होगी कि संसदीय लोकतंत्र और उदारीकरण, निजीकरण व भूमंडलीकरण का कोई विकल्प नहीं है। हमें मज़दूरों और किसानों की हुकूमत और अर्थव्यवस्था की नयी समाजवादी दिशा के क्रांतिकारी विकल्प को आगे रखना होगा।

बढ़ती अराजकता, हिंसा और आतंक पूंजीवादी हुकूमत के लक्षण हैं। पूंजीवादी व्यवस्था ही हमारी सारी समस्याओं का स्रोत है। पूंजीवाद मरणासन्न है। वह प्रकृति और मानव समाज को नष्ट किये बिना आगे नहीं बढ़ सकता है। इसीलिये यह जरूरी है कि सभी कम्युनिस्ट एकजुट होकर, मज़दूरों और किसानों की राज्य सत्ता हासिल करने के संघर्ष को अगुवाई दें। ऐसा करके ही सबके अधिकारों को सुनिश्चित किया जा सकता है। ऐसा करके ही सबके सुख और सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सकता है।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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