हिन्दोस्तान-अमरीका के बीच 2-प्लस-2 वार्ता : हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच सैनिक रणनैतिक गठबंधन राष्ट्र-विरोधी और जंग-फरोश है!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 24 अगस्त, 2018

हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच पहली “2-प्लस-2” वार्ता दिल्ली में 6 सितम्बर 2018 को होगी। इस दौरान अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और रक्षा मंत्री जेम्स मेटिस का स्वागत विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा किया जायेगा। सार्वजनिक रूप से यह बताया जा रहा है कि इस वार्ता का लक्ष्य “हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच रणनैतिक, सुरक्षा और रक्षा सहयोग को मज़बूत बनाना” है जिससे अमरीका और हिन्दोस्तान “हिन्द-प्रशांत क्षेत्र की चुनौतियों को संयुक्त रूप से हल किया जा सके”।

दोनों देशों के विदेश और रक्षा मंत्रियों के बीच नियमित रूप से द्विपक्षीय वार्ता करना यह दिखाता है कि इन दो देशों के हुक्मरान अपने सैनिक रणनैतिक गठबंधन को कितना महत्वपूर्ण मानते हैं। शीत युद्ध के समाप्त होने के बाद से, और खास तौर से 2003 से, इस गठबंधन को मजबूत किया गया है।

अमरीका इस गठबंधन को पूरे एशिया पर अपना वर्चस्व जमाने की रणनीति के हिस्से बतौर देखता है। अपने रणनैतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए अमरीका तेल, गैस और अन्य खनिज संपदा से संपन्न एशिया के देशों पर अपना नियंत्रण कायम करने, चीन की घेराबंदी करते हुए उस पर काबू पाने और रूस को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है। इस मकसद को हासिल करने की दिशा में अमरीका ने एशिया के देशों पर फौज़ी हमले किये हैं, सत्ता परिवर्तन आयोजित किये हैं, और उनको पूरी तरह से असहाय बनाने के लिए आर्थिक नाकाबंदी लागू की है। साथ ही, इस इलाके के कई अन्य देशों के साथ उसने द्विपक्षीय और बहु-पक्षीय रणनैतिक गठबंधन किये हैं। अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए अमरीका जानबूझकर अलग-अलग देशों के बीच टकराव को भड़का रहा है, जिससे सभी देशों को कमजोर बनाया जा सके।

हिन्दोस्तानी हुक्मरान वर्ग के, हिन्द महासागर क्षेत्र में एक बड़ी साम्राज्यवादी ताकत बनने के अपने मनसूबे हैं, जिसमें दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया, हिन्द महासागर के तट से लगे अफ्रीका के देश और दक्षिण पूर्व एशिया का इलाका शामिल है। अपने इस लक्ष्य को हासिल करने के रास्ते में वह चीन को एक बड़ी चुनौती के रूप में देखता है। उसे उम्मीद है कि वह अपना लक्ष्य अमरीका के साथ सैनिक रणनैतिक सांझेदारी करके हासिल कर सकता है।

अमरीका ने कदम-दर-कदम यह सुनिश्चित किया है कि हिन्दोस्तानी राज्य उसके रणनैतिक जकड़ में फंसता रहे। उसने हिन्दोस्तान के हुक्मरान वर्ग को चीन और पाकिस्तान के प्रति जंग-फरोश बर्ताव करने को उकसाया है। सबसे आधुनिक हथियारों की बिक्री करते हुए वह हिन्दोस्तानी राज्य को अपनी फौज़ी ताक़त में सुधार करने में मदद कर रहा है। इसके साथ-साथ वह हिन्दोस्तानी सशस्त्र बलों की योजना और अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियों की योजना के बीच ताल-मेल बनाने पर भी काम कर रहा है।

इस दिशा में अमरीका यह मांग कर रहा है कि हिन्दोस्तान उनके साथ तीन समझौतों पर हस्ताक्षर करें। इनमें से पहला समझौता है - लोजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ़ अग्रीमेंट (लेमोआ) यानि लोजिस्टिक्स लेनदेन पर समझौता। अगस्त 2016 में इस समझौते पर हस्ताक्षर किये गए। इस समझौते के तहत हिन्दोस्तानी राज्य को अमरीकी फौज़ों के लिए सभी प्रकार की सैनिक सहायता देने के लिए बाध्य किया गया है। देश के बंदरगाह और नौसेना के अड्डे अब अमरीकी सेना और नौसेना के लिए सहायता देने और इस इलाके में जासूसी कार्यवाहियों के लिए समर्थन देने के लिए बाध्य है।

खबरों के अनुसार, अब हिन्दोस्तान की सरकार अमरीका के साथ कम्युनिकेशन कम्पेटिबिलिटी एंड सिक्युरिटी एग्रीमेंट यानि कि संचार समता व सुरक्षा समझौता (सी.ओ.एम्.सी.ए.एस.ए., कोमकासा)  पर हस्ताक्षर करने को तैयार है। इस समझौते से यह सुनिश्चित किया जायेगा कि देश के सशस्त्र बल अब से अमरीकी सशस्त्र बालों द्वारा दी गयी संचार तकनीक का इस्तेमाल करेगी। इसका नतीजा यह होगा कि अमरीका को देश के सशस्त्र बलों के आपसी संचार की पूरी जानकारी हासिल हो जाएगी। इसके अलावा अमरीकी सशस्त्र बलों को देश के फौज़ी अड्डों पर तैनात कोमकासा उपकरणों की समय-समय पर जांच करने की इजाज़त होगी। कोमकासा के अलावा अमरीका हिन्दोस्तान पर तीसरे और समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव डाल रहा है। इस समझौते को बेसिक एक्सचेंज एंड कोऑपरेशन अग्रीमेंट फॉर जिओ-स्पेसियल कोऑपरेशन (बी.इ.सी.ए., बेका) यानि भू-स्थानिक सहयोग के लिए मूल विनिमय और सहयोग समझौता कहा जाता है।

ये सारे समझौते हिन्दोस्तान के सशस्त्र बलों को अमरीकी सशस्त्र बलों के साथ जोड़कर देश की संप्रभुता को खतरे में डालते हैं। इन समझौतों के चलते देश को अमरीका से बड़े पैमाने पर आधुनिक हथियार खरीदने होंगे। इस समझौतों के चलते अपरे देश पर बराबर दबाव बना रहेगा कि वह अपनी रणनीति को हिन्द-प्रशांत इलाके में अमरीकी रणनीतिक के साथ तालमेल बनाकर चलाये। जैसे-जैसे अमरीकी साम्राज्यवाद हमलावर जंग के द्वारा पूरे एशिया पर अपना दबदबा कायम करने की ओर कदम उठाएगा, वैसे-वैसे हमारे देश का एशिया के अन्य देशों के साथ जंग में खिंचते चले जाने का ख़तरा बढ़ता जायेगा।

साथ-साथ अमरीका जोर-शोर से कोशिश कर रहा है कि हिन्दोस्तान एक चतुर्भुज गठबंधन में एक बड़ी भूमिका अदा करें। चतुर्भुज गठबंधन हिन्द-प्रशांत इलाके में एक सैनिक गठबंधन है जिसमें हिन्दोस्तान, जापान, ऑस्ट्रेलिया, और अमरीका शामिल है। हिन्दोस्तान न केवल अरब महासागर और बंगाल की खाड़ी में संयुक्त नौसैनिक अभ्यास में हिस्सा ले रहा है बल्कि वह प्रशांत महासागर में भी आयोजित ऐसे अभ्यासों में शामिल हो रहा है। चीन की घेराबंदी करने की अपनी योजना में शामिल करने के लिए वह देश के हुक्मरानों के मंसूबों को हवा दे रहा है।

हिन्दोस्तान अमरीका सैनिक गठबंधन के मजबूत होने से हिन्दोस्तान के अन्य देशों के साथ संबंधों में तनाव बढ़ता ही जा रहा है। इसमें चीन, रूस, पाकिस्तान और ईरान शामिल है।

हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच 2-प्लस-2 वार्ता ऐसे समय पर हो रही है जब अमरीका ने रूस और ईरान के साथ किसी भी देश द्वारा व्यापार किये जाने पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। इन दोनों देशों के साथ हिन्दोस्तान के बरसों पुराने और करीबी संबंध रहे हैं। अमरीका, हिन्दोस्तान को यह धमकी दे रहा है कि यदि वह इन दो देशों के साथ व्यापार जारी रखता है तो वह अपने देश के खिलाफ़ प्रतिबंध लगाने की कार्यवाही करेगा।

इस वक़्त हिन्दोस्तान रूस से एस-400 हवाई सुरक्षा प्रणाली ख़रीदने जा रहा है। जबकि हिन्दोस्तान का हुक्मरान वर्ग हिन्दोस्तान-अमरीका सैनिक गठबंधन में शामिल होना चाहता है, लेकिन वह किसी भी तरह से रूस से ख़रीदे जा रहे सैनिक उपकरणों के सौदे के विकल्प को खतरे में नहीं डालना चाहता है। वह अमरीका के साथ सौदेबाज़ी कर रहा है कि उसे रूस से हथियार खरीदने की इजाज़त दी जाये।

ईरान हिन्दोस्तान को तेल की आपूर्ति करने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है। हिन्दोस्तान ईरान में चाबहार में एक बंदरगाह का निर्माण कर रहा है जो कि हिन्दोस्तान के लिए अफ़गानिस्तान और रूस से व्यापार के रास्ते खोल देगा। अमरीका ने सभी देशों को चेतावनी दी है कि वे नवंबर से पहले ईरान के साथ तमाम व्यापार बंद कर दे, वर्ना प्रतिबंधों का सामना करने को तैयार रहें। ईरान के खिलाफ लगाए गए प्रतिबंधों से न केवल ईरान के लोगों को नुकसान होगा बल्कि इससे दुनिया भर में कच्चे तेल की क़ीमतों में भारी बढ़ोतरी होगी। इन अन्यायपूर्ण और एक-तरफ़ा प्रतिबंधों का विरोध करने के बजाय हिन्दोस्तान की सरकार ने देश की तेल रिफाइनरी कंपनियों को आदेश दिया है कि वो ईरान से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दे। हिन्दोस्तान की सरकार का यह कदम हिन्दोस्तान और ईरान के लोगों के हितों के खिलाफ़ है। ऐसा करने से हिन्दोस्तान और ईरान के संबंधों को नुकसान पहुंचता है।

इस बात पर गौर करना जरूरी है कि भले ही हिन्दोस्तान एक साम्राज्यवादी ताकत है जो एक विश्व स्तर की ताकत बनने का मंसूबा रखता है, और अपने इस मंसूबे को हासिल करने के लिए वह अमरीका के साथ सैनिक रणनैतिक गठबंधन मज़बूत कर रहा है। लेकिन असलियत तो यह है कि हिन्दोस्तान और अमरीका के बीच जो संबंध है, वे बराबरी के संबंध नहीं है। इसमें अमरीका का पलड़ा भारी है। वह सैनिक और आर्थिक - हर मायने में हिन्दोस्तान से कहीं अधिक ताकतवर है।   

दुनियाभर के तमाम देशों का अनुभव, जिन्होंने अमरीका के साथ सैनिक रणनैतिक गठबंधन बनाया था, यही दिखाता है कि अमरीकी साम्राज्यवाद का कोई उसूल नहीं है। अमरीकी साम्राज्यवाद गठबंधन में शामिल साथी देशों का इस्तेमाल अपने ही हितों को आगे बढ़ाने के लिए करता है। इस दिशा में वह समझौतों की शर्तों का खुलेआम उल्लंघन करता है, और खुद को साथी देशों के आतंरिक मामलों में दखलंदाजी करने और उनकी संप्रभुता का उल्लंघन करने का “अधिकार” देता है। आज तक का अनुभव यही दिखाता है अमरीका के लिए सैनिक रणनैतिक गठबंधन अपने साथी देशों पर अपना नियंत्रण और दबदबा ज़माने का एक ज़रिया रहा है। जो भी देश अमरीका के साथ सैनिक रणनैतिक गठबंधन बनाता है, उसे इसकी बहुत भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है। अमरीका द्वारा पाकिस्तान, मिस्र, और तुर्की में हर दखलंदाजी और उन देशों को अस्थिर बनाये जाने का अनुभव साफ़ दिखाता है, कि जो देश अमरीका के साथ सैनिक रणनैतिक गठबंधन बनाता है, उसके लोगों का क्या हश्र होता है।

हमारे देश के लोगों के लिए यह बेहद जरूरी है कि वे हिन्दोस्तानी राज्य और अमरीकी राज्य के बीच बढ़ते सैनिक रणनैतिक गठबंधन का जमकर विरोध करें। अमरीकी साम्राज्यवाद एक बेहद आक्रामक जंग-फरोश रास्ते पर चल रहा है। उसने खुलेआम ऐलान किया है कि वो एक-ध्रुवीय दुनिया का निर्माण करना चाहता है जहां केवल उसका वर्चस्व होगा, और इसके लिए वो कोई भी तरीका इस्तेमाल कर सकता है। अमरीकी साम्राज्यवाद ने दुनियाभर में सबसे घिनौने गुनाह किये हैं और आज भी कर रहा है। पिछले दो दशकों में उसने अपनी फौजी ताकत के बल पर यूगोस्लाविया को टुकड़े-टुकड़े कर दिया, अफ़ग़ानिस्तान, इराक और लीबिया पर हमला करके उन्हें तबाह कर दिया। सिरिया पर उसने एक बर्बर गृह-युद्ध थोप दिया, तो ईरान, उत्तरी कोरिया और क्यूबा पर अमानवीय प्रतिबंध लगाये हैं। एशिया, अफ्रीका, और लातिन अमरीका के कई देश जो उसकी दादागिरी को मानने से इंकार कर रहे हैं, उन सभी देशों को आर्थिक नाकेबंदी, अस्थिरता फ़ैलाने और सत्ता परिवर्तन की धमकी दे रहा है।

अमरीका के साथ बढ़ता सैनिक रणनैतिक गठबंधन हिन्दोस्तान के लोगों के हित में नहीं है। अमरीका के साथ गठबंधन में अन्य देशों और लोगों के खिलाफ़ साम्राज्यवादी जंग में शामिल होने से देश के लोगों को कुछ भी हासिल नहीं होगा, बल्कि उनका सब कुछ नष्ट जायेगा। हिन्दोस्तान-अमरीकी रणनैतिक और सैनिक गठबंधन का जमकर विरोध किया जाना चाहिए। यह गठबंधन हिन्दोस्तान के लोगो की संप्रभुता और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शांति और सुरक्षा के खिलाफ़ है। यह एक राष्ट्र-विरोधी व जंग-फरोश गठबंधन है, जो पूरी तरह से देश के मज़दूर वर्ग व लोगों, और इस इलाके के तमाम राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं, और लोगों के खिलाफ़ है।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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