एन.पी.ए. का संकट और भारतीय रिज़र्व बैंक

देश में सार्वजनिक बैंकों में गैर-निष्पादित संपत्ति (एन.पी.ए.) या डूबे हुए कर्ज़ की समस्या कम होने का नाम नहीं ले रही है। ऐसी ख़बर है कि सबसे अधिक एन.पी.ए. के मामले में हिन्दोस्तान के बैंक दुनिया में अब पांचवें नंबर पर हैं। अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आई.एम.एफ.) जैसे अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों ने चिंता जताई है कि जिस रफ़्तार से एन.पी.ए. बढ़ते जा रहे हैं, उससे हिन्दोस्तान की आर्थिक विकास दर पर विपरीत असर हो सकता है।

इन हालातों के चलते रिज़र्व बैंक कई बैंकों द्वारा किये जा रहे व्यापार और लेन-देन पर पाबंदी लगाने पर मजबूर हो गया है। इसके साथ ही, इस समस्या पर काबू पाने के लिए रिज़र्व बैंक ने न चुकाये गये कर्ज़ से संबंधित कुछ नए निर्देश सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को जारी किये हैं।

जून 2017 और जून 2018 के बीच, देश के 21 सार्वजनिक बैंकों में न चुकाये गये कर्ज़ की कुल मात्रा में 19 प्रतिशत का और इज़ाफा हुआ है तथा वह 7.1 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 8.5 लाख करोड़ रुपये हो गया है। एन.पी.ए. और कर्ज़ माफ़ी के प्रावधान में अप्रैल-जून 2018 की तिमाही में 21 सार्वजनिक बैंकों का कुल नुकसान पिछले साल के मुकाबले 50 गुना बढ़कर 16,600 करोड़ हो गया है। पिछले वर्ष यह नुकसान 307 करोड़ था। इसके अलावा जनवरी-मार्च 2018 के दौरान 21 सार्वजनिक बैंकों को 62,700 करोड़ का नुकसान हुआ है। अप्रैल-जून 2018 की तिमाही के दौरान यह प्रावधान 51,500 करोड़ था, जो कि अप्रैल-जून 2017 की तिमाही की तुलना में 28 प्रतिशत अधिक है। 

सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंक अपने मुनाफ़ों को अधिकतम बनाने के लिये काम करते हैं। जब अर्थव्यवस्था तेज़ी में थी और बहुत से इजारेदार पूंजीपतियों ने अलग-अलग क्षेत्रों में बड़ी-बड़ी परियोजनाएं शुरू कीं, तब उनको कर्ज़ देने के लिये बैंकों में होड़ लगी थी। जब तेज़ी मंदी में बदल गयी और कर्ज़ लेने वाली बहुत-सी कंपनियां दिवालिया हो गयीं (कर्ज़ों पर ब्याज देने में भी असमर्थ हो गयीं), तब बैंकों को भी नुकसान हुआ और उनके एन.पी.ए. बहुत ज्यादा बढ़ गये। सभी इजारेदारों की तरह, उन्होंने बैलेंस शीट से घाटे की मात्रा को छुपाने की कोशिश की। परन्तु कभी न कभी तो सच्चाई सामने आने वाली थी और सामने आ ही गयी।

तेज़ी से बढ़ते न चुकाये गये कर्ज़ के चलते, रिज़र्व बैंक को त्वरित सुधार कार्यवाई (प्रोम्प्ट करेक्टिव एक्शन) के तहत 11 बैंकों पर कई प्रतिबंध लगाने पड़े, जैसे कि कर्ज़ की निर्धारित सीमा को कम करना, बैंकों की नयी शाखाएं खोलने पर रोक लगाना, अतिरिक्त ऑडिट-जांच करना, इत्यादि। इन बैंकों में शामिल हैं - इलाहाबाद बैंक, यूनाइटेड बैंक ऑफ़ इंडिया, कारपोरेशन बैंक, आई.डी.बी.आई. बैंक, यूको बैंक, बैंक ऑफ़ इंडिया, सेंट्रल बैंक ऑफ़ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक, ओरिएंटल बैंक ऑफ़ कॉमर्स, देना बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र।

500 करोड़ और ख़ास तौर से 2000 करोड़ से अधिक मात्रा के कर्ज़ों के संबंध में रिज़र्व बैंक ने फरवरी 2018 से नए निर्देश जारी किये हैं। 50 के करीब बड़े पूंजीपतियों के पास 2000 करोड़ या उससे अधिक के कर्ज़ हैं जो कुल मिलाकर 2.5 लाख करोड़ से अधिक हैं। इनमें से कई कर्ज़ों को पुनर्गठित (रिस्ट्रक्चर्ड) किया गया है जिससे कि उनको एन.पी.ए. की श्रेणी से निकालकर साधारण कर्ज़ (गैर-एन.पी.ए.) की श्रेणी में डाल दिया गया है। रिज़र्व बैंक की एन.पी.ए. की समस्या को हल करने की योजना में यदि पुनर्गठित कर्ज़ शामिल किये जाते हैं तो ऐसे कर्ज़ भी एन.पी.ए. की श्रेणी में आ जायेंगे।

यदि किसी पूंजीपति पर 2000 करोड़ रुपयों से अधिक का कर्ज़ बकाया है तो उसके लिए समस्या-निवारण योजना (रेजोलुशन प्लान) तैयार करना होगा। रिज़र्व बैंक द्वारा जारी किये गए संशोधित निर्देशों के अनुसार, इसके तहत मूल कर्ज़ का 20 प्रतिशत और उस पर लागू ब्याज की रकम को इस योजना के लागू किये जाने के एक वर्ष के अंदर वापस करना होगा। यदि कोई कंपनी ऐसा करने से चूक जाती है तो इसे भुगतान की एक नयी चूक माना जाएगा।

ऐसी परिस्थिति में, उस पूंजीपति के एन.पी.ए. को हल करने के लिए 180 दिनों का समय निर्धारित किया गया है। इस अवधि के समाप्त होने के 15 दिन बाद उसे दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आई.बी.सी.) के तहत दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी।

कर्ज़ों का पुनर्गठन करके संकटग्रस्त संपत्ति (स्ट्रैस्ड अस्सेट्स) की समस्या को सुलझाने के सभी मौजूदा प्रावधानों को रिज़र्व बैंक के नए निर्देशों के तहत निरस्त कर दिया गया है। संकटग्रस्त संपत्ति में एन.पी.ए., पुनर्गठित कर्ज़ तथा बट्टे खाते में डाली संपत्तियां शामिल हैं।

रिज़र्व बैंक ने 5 करोड़ रुपयों से अधिक के न चुकाये जाने वाले कर्ज़ों की साप्ताहिक सूचना भेजने का निर्देश दिया है जो उसके केन्द्रीकृत डेटाबेस में रखी जायेगी।

रिज़र्व बैंक के नये मानदंडों के अनुसार विलंबित कर्ज़ों को जारी रखने (जिसे री-ग्रीनिंग कहा जाता है) इस पर रोक लगाई है और चाहता है कि आई.बी.सी. के ज़रिये ही बैंकों के बढ़ते एन.पी.ए. का सामाधान निकाला जाये। बैंक और पूंजीपति सांठ-गांठ करते आये हैं ताकि री-ग्रीनिंग के ज़रिये पूंजीपतियों को अदायगी में चूक से बचाया जा सके और बैंकों को एन.पी.ए. दिखाने से बचाया जा सके।

बहुत से पूंजीपति संकट के बढ़ने के लिये रिज़र्व बैंक के सख्त क़दमों को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं। जिन पूंजीपतियों के बड़े स्तर के कर्ज़े हैं, खास तौर पर ढांचागत व पावर क्षेत्रों में, वे चाहते हैं कि रिज़र्व बैंक अपने मानदंडों में ढील दे। अगर रिज़र्व बैंक के नये मानदंडों को लागू किया जाता है तो इस्पात व अचल संपत्ति क्षेत्र के पूंजीपतियों को दिवाला का सामना करना पड़ सकता है।

दूसरी तरफ, कुछ बड़े हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपति आई.बी.सी. के ज़रिये एन.पी.ए. के त्वरित समाधान के लिये रिज़र्व बैंक के नये मानदंडों का स्वागत कर रहे हैं। इसमें उनके लिये उत्पादक क्षमता को सस्ते दाम में खरीदने की लुभावनी संभावनाएं पैदा होंगी। इन पूंजीपतियों के पास एन.पी.ए. वाली कंपनियों को खरीदने के लिये पर्याप्त धन है।

टाटा स्टील ने आई.बी.सी. प्रक्रिया के ज़रिये भूषण स्टील लिमिटेड (बी.एस.एल.) को खरीद लिया है जिसकी सालाना उत्पादन की क्षमता 56 लाख टन स्टील  है। अब टाटा स्टील देश का सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक बन गया है। भूषण स्टील का बैंकों के प्रति 56,000 करोड़ रुपया बकाया है पर इसे टाटा स्टील ने मात्र 35,200 करोड़ रुपयों में खरीद लिया। भूषण स्टील का कर्ज़ सबसे बड़ा एन.पी.ए. था। इस एन.पी.ए. के समाधान के लिये बैंक को 21,000 करोड़ रुपये के कर्ज़ को बट्टे खाते में डालना पड़ा।

न चुकाये जाने वाले कर्ज़ों के संकट का बड़े पूंजीपति पूरा फायदा उठा रहे हैं। यह व्यवस्था एक ही इजारेदार घराने की एक कंपनी को दिवालिया घोषित होने की अनुमति देती है जबकि उसी घराने की दूसरी कंपनी को किसी अन्य पूंजीपति की दिवालिया कंपनी को खरीदने की अनुमति होती है। टाटा समूह गुजरात में अपनी पावर उत्पादन कंपनी कोस्टल गुजरात पावर लिमिटेड को दिवालिया घोषित करने की तैयारी में है जबकि टाटा स्टील एक और इस्पात कंपनी को खरीदने की कोशिश कर रही है जिसका बड़ा एन.पी.ए. है।

सभी संकटों की तरह वर्तमान संकट में भी कुछ कंपनियां दिवालिया होंगी और दूसरी कंपनियों के हाथ बिक जायेंगी। इससे इजारेदारी बढ़ेगी और बैंकिंग सहित विभिन्न क्षेत्रों में मालिकी कम हाथों में होगी।

आने वाले वर्षों में यह आशा की जा सकती है कि अब से काफी ज्यादा मात्रा में कर्ज़ों को बट्टे खाते में डाला जायेगा। परिणामस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का घाटा काफी ज्यादा हो जायेगा। पहले ही सरकार विभिन्न सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को संकट से बचाने के लिये 2.11 लाख करोड़ रुपये डालने की योजना पर चल रही है। यह पूंजी सार्वजनिक धन से ली जायेगी और इसका इस्तेमाल पिछले कुछ वर्षों के घाटे, जबसे बड़े एन.पी.ए. की समस्या सामने आयी है, उसकी पूर्ति करने के लिये किया जायेगा। जैसे-जैसे बैंकों के घाटे बढ़ेंगे, और भी सार्वजनिक धन इन बैंकों में डाला जायेगा ताकि वे डूबने से बच सकें।

इतने भयंकर स्तर तक एन.पी.ए. के बढ़ने का कारण है कि बैंक (चाहे वे सार्वजनिक क्षेत्र के हों या निजी क्षेत्र के), वित्त पूंजी के अधिकतम मुनाफे़ की दिशा में काम करते हैं।

वित्त पूंजी बैंकिंग और औद्योगिक पूंजी का विलयन है। वित्त पूंजी हिन्दोस्तानी राज्य पर हावी है। सबसे बड़े इजारेदार पूंजीपति नज़दीकी से बैंक व्यवस्था से जुड़े हैं। वे निदेशकों की हैसियत से बैंकों के बोर्डों में बैठते हैं जबकि बैंकों के निदेशक इज़ारेदार घरानों के बोर्ड में बैठते हैं। आसान शर्तों पर कर्ज़ पाने के लिये वे बैंकरों से सांठ-गांठ में करते हैं। उन्हें मालूम होता है कि अगर वे कर्जे़ को न चुका सके तो उन्हें राज्य बचा लेगा। ये इज़ारेदार घराने बैंकों से लिये कर्ज़ के काफी बड़े हिस्से को मुनाफ़ा बनाने की तरह-तरह की सट्टेबाजी गतिविधियों में लगाते हैं। वर्तमान एन.पी.ए. संकट में, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के सारे एन.पी.ए. के दो-तिहाई के लिये करीब 40 इजारेदार घरानें ज़िम्मेदार हैं।

वित्त पूंजी के सर्वोपरि हित की मांग है कि बैंकिंग व औद्योगिक, दोनों क्षेत्रों का बचाव सरकार सार्वजनिक धन से, ”अर्थव्यवस्था के बचाने“ के नाम पर करे। उनके दावों की पूर्ति के लिये अधिकांश मेहनतकश लोगों के दावों की बलि चढ़ाई जा रही है। अर्थव्यवस्था और बैंकिंग व्यवस्था को इसी दिशा में चलाया जा रहा है।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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