गैर कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम : लोकतांत्रिक, राष्ट्रीय और मानव अधिकारों पर वहशी हमला

गैर कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यू.ए.पी.ए.) एक भयानक और कठोर कानून है। किस तरह से इसका इस्तेमाल असहमति की आवाज़ों को कुचलने के लिये होता है, यह एक बार फिर सामने आया है।

यू.ए.पी.ए. एक फासीवादी कानून है जो हिन्दोस्तानी लोगों के लोकतांत्रिक, राष्ट्रीय और मानव अधिकारों पर वहशी हमलों को जायज़ ठहराता है। यह कानून बेगुनाह लोगों को लंबे वक्त तक हिरासत में रखने की अनुमति राज्य को देता है, उनके खि़लाफ़ आरोपों को साबित किये बगैर।

यू.ए.पी.ए. को 1967 में पहली बार पास किया गया था ताकि हिन्दोस्तानी राज्य उन संगठनों को “गैरकानूनी” घोषित कर सके जिन्हें “अलगाववाद का समर्थक” माना जा सकता था। इसमें 2004 में संशोधन किया गया, जब पोटा के खि़लाफ़ जन-विरोध बहुत बढ़ गया और संप्रग सरकार को, अपने चुनावी वादों में एक वादे बतौर इसे रद्द करना पड़ा। संशोधित यू.ए.पी.ए. में पोटा के सबसे कठोर प्रावधानों को शब्द-ब-शब्द जोड़ दिया गया था। इनमें शामिल थे “आतंकवादी हरकत” और “आतंकवादी संगठन” की परिभाषाएं तथा आतंकवादी घोषित किये जाने वाले संगठनों की सूची। 26 नवम्बर को मुबंई में हुये हमलों के बाद, 2008 में इसे फिर संशोधित किया गया। तब यू.ए.पी.ए. में पुलिस हिरासत की अधिकतम अवधि का प्रावधान, बिना आरोप पत्र के हिरासत और जमानत पर रिहा होने पर प्रतिबंध जैसे पोटा और टाडा कानूनों के प्रावधानों को शामिल किया गया। यू.ए.पी.ए. में 2012 के संशोधनों से “आतंकवादी कृत्य” की परिभाषा में “नकली नोट छापने” व “अवैध घोषित किये” संगठनों के लिये पैसे जुटाना जैसे “देश की आर्थिक सुरक्षा के लिये ख़तरनाक” अपराधों को शामिल किया गया था।

प्रत्येक संशोधन के साथ उन दायरों को योजनाबद्ध तरीके से बढ़ाया गया है, जिनके तहत अधिकारी राजकीय आतंक व अन्याय के खि़लाफ़ लड़ने वाले संगठनों व व्यक्तियों को हिरासत में रख सकते हैं। आरोपी के बचाव को लगातार और ज्यादा कठिन बना दिया गया है।

यू.ए.पी.ए. के प्रावधानों को जानबूझकर ऐसे मनमाने ढंग से बनाया गया है ताकि मौजूदा सत्ता के खि़लाफ़ सभी तरह के विरोधों को राज्य अपराधी ठहरा सके। इस कानून के अनुसार, “गैरकानूनी गतिविधियों” में शामिल है मात्र किसी की मंशा, जिस पर कोई क़दम भी नहीं उठाया गया हो, जो “हिन्दोस्तान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखण्डता” को नहीं मानता, उस पर प्रश्न उठाता है, उसे भंग करता है या भंग करने का इरादा रखता हो, या जो “हिन्दोस्तान के खि़लाफ़” नाराजगी पैदा करता है या ऐसा करने का इरादा रखता है। आतंक की परिभाषा में “लड़ाकापन, बग़ावत और नक्सलवादी उग्रवाद” के साथ-साथ अन्य अहिंसक राजनीतिक विरोधों को भी शामिल किया गया है।

निवारक नज़रबंदी की अवधि 180 दिनों तक कर दी गयी है। 30 दिन तक की पुलिस हिरासत और जमानत पर प्रतिबंध, इस कानून की कुछ अन्य विशेषताएं हैं। यह कानून पुलिस अफ़सरों को “संदेह” के आधार पर तलाशी लेने या बिना वारंट के किसी को भी गिरफ़्तार करने व उसकी संपत्ति छीनने की अनुमति देता है। पुलिस को जानकारी न देने के लिये भी किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार किया जा सकता है!

यू.ए.पी.ए. के तहत “अदालतें यह मान कर चलेंगी, अगर इससे उल्टा साबित नहीं किया गया, कि आरोपी ने वह अपराध किया है जिसके लिये उसे गिरफ़्तार किया गया है”; दूसरे शब्दों में किसी भी व्यक्ति को अपराधी माना जायेगा जब तक कि वह अपने आप को बेकसूर साबित नहीं करता। साथ ही, पुलिस को आरोपी के परिजनों को ख़बर देने की भी ज़रूरत नहीं है और तब अपने आपको बेकसूर साबित करने की कोशिश करने का सवाल ही नहीं उठता है।

इस कानून की धारा 35 के अंतर्गत एक संगठन को आतंकवादी होने का ठप्पा लगाने के लिये सरकारी गजट में सूचना जारी करनी होती है पर इसका कारण बताने की ज़रूरत नहीं होती। यू.ए.पी.ए. कानून में गैर कानूनी बनाये करीब 40 संगठनों के नाम संलग्न किये गये हैं।

यह कानून विशेष अदालतें बनाने की अनुमति देता है जिनके पास खुली कार्यवाई करने की बजाय कैमरे के सामने (बंद दरवाज़े में) मुकदमे चलाने और गुप्त गवाही लेने की विस्तृत विवेकाधीन ताक़त है।

यू.ए.पी.ए. अपने लोगों के ज़मीर के अधिकार पर एक खुल्लम-खुल्ला हमला है। यह लोगों को उनकी विचारधारा व संगठनात्मक संबंध के आधार पर अपराधी घोषित करता है। न केवल किसी संगठन की सदस्यता या उसके साथ संबंध को “गैर कानूनी” घोषित किया गया है, बल्कि उसके साहित्य का पाया जाना या उसकी विचारधारा की वकालत करने वालों को भी इस कानून के तहत अपराधी माना गया है (जबकि उन्होंने इसके आधार पर कोई भी हिंसक कार्यवाई नहीं की हो)।

आदिवासियों, गरीब किसानों, राज्य द्वारा आयोजित साम्प्रदायिक हिंसा के शिकार लोगों के अधिकारों के लिये लड़ने वाले संगठनों के नेताओं व कार्यकर्ताओं को भी इस कानून का निशाना बनाया गया है, इस तर्क के आधार पर कि वे भी इस संगठन से “संबंध” रखते हैं! उन्हें भी अनिश्चित काल के लिये गिरफ़्तार किया गया है और जमानत नहीं दी गयी है।

अपने राष्ट्रीय अधिकारों के लिये कश्मीर व पूर्वोत्तर के लोगों के संघर्षों को, अपनी रोज़ी-रोटी के लिये किये जा रहे संघर्षों को तथा राज्य के अधिकारियों की मदद से बड़े कारपोरेटों द्वारा किसानों व आदिवासियों की ज़मीन की बेदखली के खि़लाफ़ संघर्षों को हिन्दोस्तान की क्षेत्रीय अखण्डता के लिये ख़तरा माना जा रहा है। जो भी ऐसे संघर्षों के लिये अपना समर्थन दिखाते हैं या उन्हें जायज़ बताते हैं उनको भी इस कानून के तहत गिरफ़्तार किया जा सकता है।

यू.ए.पी.ए. के तहत पुलिस द्वारा सिर्फ शक के आधार पर किसी को भी गिरफ़्तार करने की असीमित ताक़त से अनगिनत लोगों को बिना किसी आधार पर गिरफ़्तार किया जा चुका है।

एक कुख्यात उदाहरण 2008 का “हुबली आतंकी षड्यंत्र” मामला था जिसमें, गैरकानूनी घोषित की गयी स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमि) के 17 मुस्लिम नौजवानों को हत्यारा बताकर भारतीय दंड संहिता के विभिन्न प्रावधानों और यू.ए.पी.ए. के तहत गिरफ़्तार किया गया था। उन पर तथाकथित आरोप था कि वे पूरे कर्नाटक में आतंकी हमले की योजना बना रहे थे। नौजवानों पर आरोप लगाया गया था कि उनके पास “जेहादी” साहित्य था, जो असलियत में कुरान की किताबें निकलीं। सात साल के बाद हुबली की अदालत ने सभी 17 नौजवानों को बरी कर दिया।

2012 में जामिया टीचर्स एसोसिएशन ने 16 मामलों का इतिहास लिखा जिसमें सभी आरोपी बाद में बरी किये गये थे। परन्तु इसकी प्रक्रिया - पहले गैर कानूनी हिरासत और यातनाएं, फिर कैद और मुकदमा - ही आरोपियों पर भारी पड़ा। कारोबार नष्ट हो गये, परिवारों को बहुत अपमान व सदमा सहना पड़ा और यहां तक कि मानसिक बीमारियां हो गयीं। उनके बच्चों ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी, जबकि उनके मां-बाप टूटे दिल के साथ मर गये। कुछ आरोपियों को तो मानसिक तनाव के साथ 14 साल जेल में काटने पड़े।

ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जिनमें यू.ए.पी.ए. के तहत लोगों को एक या अनेक आरोपों में हिरासत में लिया गया है और सालों-साल “तहक़ीक़ात” करने के बाद भी आरोप सिद्ध नहीं किये जा सके। अंत में, आरोपियों पर दूसरे कुछ और ही आरोप लगा दिये गये जिनका पहले के आरोपों से कुछ भी लेना-देना नहीं था या सबूत न होने की वजह से बरी करना पड़ा।

इस सबसे स्पष्ट है कि यू.ए.पी.ए. निहायत फासीवादी विधान है जिसका मकसद असहमति की आवाज़ को कुचलना है और समाज के निश्चित तबकों को तंग करना और यातनाएं देना है। इसका इस्तेमाल मुस्लिम समुदाय, बंग्लादेशी अप्रवासियों और क्रांतिकारी कम्युनिस्टों को निशाना बनाने के लिये किया जाता है, जबकि सरकार दावा करती है कि ऐसा नहीं किया जाता। इसका इस्तेमाल उन सभी के खि़लाफ़ किया जाता है जो बड़े इजारेदार पूंजीपति वर्ग की हुकूमत का विरोध करते हैं और जो लोगों के अधिकारों की रक्षा में आवाज़ उठाते हैं। इसका मकसद है लोगों में दहशत का एक माहौल बनाना ताकि लोग इस डर से, कि उन्हें संभावित आतंकवादी बताकर जेलों में डाल दिया जायेगा, इसलिये अपने विचारों को प्रकट करने, अपनी आस्था को मानने के ज़मीर के अधिकार की रक्षा करने की हिम्मत न करें।

कानून प्रवर्तन की सभी एजेंसियां यू.ए.पी.ए. का इस्तेमाल सबसे अहम “आतंक-विरोधी” कानून बतौर पूरे देश में करती हैं। इसके साथ-साथ, बहुत से राज्यों ने अपने-अपने “आतंक-विरोधी” कानून बनाये हुए हैं। महाराष्ट्र में, महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम, 1999 है। छत्तीसगढ़ में, छत्तीसगढ़ स्पेशल पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट, 2005 है। जम्मू-कश्मीर में, जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ्टी एक्ट, 1978 है और आन्ध्र प्रदेश में, आन्ध्र प्रदेश पब्लिक सिक्योरिटी एक्ट, 1992 है। ये कानून उतने ही कठोर हैं जितना यू.ए.पी.ए. है, और कई तो उससे भी ज्यादा कठोर हैं। यू.ए.पी.ए. के साथ, इनका इस्तेमाल राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसियां करती हैं।

हिन्दोस्तानी राज्य यू.ए.पी.ए. जैसे कठोर कानूनों की यह कहकर सफाई देता है कि इनके बिना आतंकवाद की समस्या का सामना नहीं किया जा सकता है। परन्तु यू.ए.पी.ए. और दूसरे कठोर कानूनों से अपने लोगों का अनुभव स्पष्ट रूप से दिखाता है कि इनके इस्तेमाल से आतंकवादी हमलों की घटनाओं में कोई कमी नहीं हुई है। इसके विपरीत इनका इस्तेमाल मज़दूर वर्ग और अधिकारों के लिये लड़ रहे अन्य लोगों के विभिन्न तबकों को आतंकित करने और उन्हें जेलों में ठूसने के लिये किया जाता है।

यह भी दुनियाभर में ज्ञात है कि साम्राज्यवाद और सरमायदारी राज्य नियमित तौर पर मज़दूर वर्ग और मेहनतकश लोगों के विरोध को कुचलने के लिये आतंकवाद के औजार का प्रयोग करते हैं। हिन्दोस्तानी राज्य अलग नहीं है। आतंकवादी घटनाओं पर सुक्ष्मता से किये गये एक अध्ययन ने दिखाया है कि अपने देश के विभिन्न इलाकों में राज्य की विभिन्न एजेंसियां, नौकरशाही, खुफिया विभाग व सशस्त्र बलों के साथ-साथ विभिन्न साम्राज्यवादी एजेंसियां लोगों के खि़लाफ़ आतंकवाद की बहुत-सी घटनाओं के साथ नज़दीकी से जुड़ी होती हैं।

“आतंक के खि़लाफ़ लड़ने” की आड़ में आतंकवाद और राजकीय आतंकवाद, इजारेदार पूंजीपति वर्ग के शासन व साम्राज्यवादियों के हाथों में पसंदीदे हथियार हैं। इनके ज़रिये शासक वर्ग मज़दूर वर्ग के शोषण को तीव्र करता है और मेहनतकश लोगों द्वारा किये जाने वाले उनके राज के विरोध को कुचलता है। इनके ज़रिये वह देश में अपने वर्चस्व को मजबूत करता है और विदेशों में अपने हितों की रक्षा करता है।

अतः यह आशा नहीं की जा सकती कि यू.ए.पी.ए. जैसे राजकीय आतंक के तंत्र को मजबूत करके, आतंकवाद की समस्या को ख़त्म किया जा सकता है। यह वैसे सोचने जैसा होगा कि फांसी चढ़ाने वाला फांसी का फंदा अपने ही गले में कसेगा।

आतंकवाद का ख़ात्मा तभी किया जा सकता है जब मज़दूर वर्ग और लोग राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में लेंगे और उस सत्ता का इस्तेमाल उन सभी को कड़ी सज़ा दिलाने के लिये करेंगे, जिन्होंने लोगों के खि़लाफ़ ऐसे जघन्य आतंकवादी अपराध किये हैं। शासन सत्ता अपने हाथों में लेकर मज़दूर वर्ग और लोग एक नयी व्यवस्था स्थापित करेंगे जिसमें ज़मीर के अधिकार समेत, लोकतांत्रिक अधिकार और आज़ादियां, मेहनतकश जनसमुदाय के लिये वास्तविकता बन जायेंगी।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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